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Himalayilog| e- Book of Himalayan Civilization | हिमालयीलोग । By Journalist Dr.Harish Chandra Lakhera, New Delhi, India /
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Himalayilog || हिमालयी संस्कृति, इतिहास, लोक, साहित्य और सरोकार आदि का चैनल || हिमालय को लेकर मेरा दृष्टिकोण अफगानिस्तान के हिंदुकुश से लेकर भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान और म्यांमार तक फैली हिमालय की ढलानों पर विकसित सभ्यता है। This YouTube channel is the voice of the Himalayan people | We want a stake in the history of India. Our history should be in the books of history of India.
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https://youtu.be/JKTC6ZJP6vc?si=kQYhA...

1931 की जनगणना भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। इस जनगणना और अंग्रेजों के निर्णयों को लेकर कांग्रेस तथा डॉ. बी.आर. अंबेडकर के दृष्टिकोण में बुनियादी अंतर था। कांग्रेस का जनगणना (1931) के प्रति विरोध हिंदू समाज के विभाजन का डर: कांग्रेस और महात्मा गांधी का मानना था कि जाति आधारित जनगणना (विशेषकर दलितों की अलग गिनती) से हिंदू समाज आपस में बंट जाएगा।राष्ट्रीय आंदोलन से ध्यान भटकना: कांग्रेस इसे अंग्रेजों की "बांटो और राज करो" (Divide and Rule) नीति का हिस्सा मानती थी, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम को कमजोर करना था।नागरिक पहचान पर जोर: गांधी जी का मानना था कि राजनीतिक पहचान धर्म या जाति के आधार पर नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक के रूप में होनी चाहिए। डॉ. अंबेडकर द्वारा जनगणना का समर्थन वास्तविक जनसंख्या का आंकड़ा: डॉ. अंबेडकर का तर्क था कि जब तक दलितों (तथाकथित 'अस्पृश्यों') की सटीक संख्या पता नहीं होगी, तब तक उनके अधिकारों, संसाधनों और प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की जा सकती। 1931 की जनगणना के नतीजे: 1931 की जनगणना में ही पहली बार वैज्ञानिक मानकों पर दलितों की आबादी लगभग 5 करोड़ (कुल आबादी का 20%) दर्ज की गई, जिसने आगे चलकर पूना पैक्ट और आरक्षण की नींव रखी। सच्चाई को उजागर करना: उनका मानना था कि जाति को छिपाने से जातिवाद खत्म नहीं होता, बल्कि वंचितों की समस्याओं पर पर्दा पड़ जाता है। डॉ. अंबेडकर अंग्रेजों के फैसलों के साथ क्यों दिखते थे? रणनीतिक सहयोग, न कि गुलामी: अंबेडकर का मुख्य लक्ष्य दलितों का सामाजिक और राजनीतिक उद्धार था। वे ब्रिटिश सरकार को एक ऐसी शक्ति के रूप में देखते थे जिसका उपयोग सवर्ण हिंदुओं के सामाजिक वर्चस्व को तोड़ने के लिए किया जा सकता था। संविधानत्मक सुधारों का अवसर: साइमन कमीशन और गोलमेज सम्मेलनों के जरिए अंग्रेजों ने भारत में जो प्रशासनिक और संवैधानिक सुधार शुरू किए, अंबेडकर ने उनमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) और राजनीतिक आरक्षण हासिल करने का अवसर देखा।प्राथमिकता का अंतर: कांग्रेस की पहली प्राथमिकता "अंग्रेजों से आजादी" (स्वराज) थी, जबकि डॉ. अंबेडकर की पहली प्राथमिकता "आंतरिक सामाजिक असमानता से आजादी" थी। उनका मानना था कि बिना सामाजिक समानता के मिली स्वतंत्रता केवल उच्च जातियों का राज बनकर रह जाएगी। इस ऐतिहासिक संदर्भ और डॉ. अंबेडकर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर यह वीडियो अधिक जानकारी प्रदान करती है।

17 hours ago | [YT] | 0

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https://youtu.be/JKTC6ZJP6vc

1931 जाति जनगणना: गांधी ने किया विरोध, तो अंबेडकर का क्या था स्टैंड?
1931 की जनगणना भारत के सामाजिक इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जहाँ राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक न्याय की नीतियाँ आमने-सामने आ खड़ी हुई थीं।उस दौर में महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अंग्रेजों की जातिगत जनगणना के सख्त खिलाफ थे। कांग्रेस का मानना था कि जातियों की अलग गिनती से समाज आपस में बंटेगा और अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति से आजादी की लड़ाई कमजोर होगी।दूसरी ओर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस जनगणना का खुलकर समर्थन किया। उनका स्पष्ट तर्क था कि जब तक शोषित और वंचित वर्गों की सटीक आबादी का वैज्ञानिक आंकड़ा सामने नहीं आएगा, तब तक उनके सामाजिक अधिकारों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की जा सकती। अंबेडकर का यह स्टैंड आंकड़ों के जरिए शोषितों को पहचान दिलाने की रणनीति थी।इतिहास का चक्र देखिए—जिस जाति जनगणना का कांग्रेस ने 1931 में पुरजोर विरोध किया था, आज वही कांग्रेस इसकी सबसे बड़ी पैरोकार बनी हुई है और देश भर में जातिगत जनगणना कराने की मांग कर रही है।राजनीतिक प्राथमिकताएं बदली हैं या सामाजिक न्याय की परिभाषा? 95 सालों में भारतीय राजनीति के इस रुख बदलाव ने कई गंभीर सवाल छोड. दिए हैं। #1931जातिजनगणना #गांधीऔरअंबेडकर #सामाजिकन्याय #CasteCensus #भारतीयइतिहास #राजनीतिक_बदलाव #AmbedkarVSGandhi

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https://youtu.be/JKTC6ZJP6vc

1931 जाति जनगणना: गांधी ने किया विरोध, तो अंबेडकर का क्या था स्टैंड?
1931 की जनगणना भारत के सामाजिक इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जहाँ राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक न्याय की नीतियाँ आमने-सामने आ खड़ी हुई थीं।उस दौर में महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अंग्रेजों की जातिगत जनगणना के सख्त खिलाफ थे। कांग्रेस का मानना था कि जातियों की अलग गिनती से समाज आपस में बंटेगा और अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति से आजादी की लड़ाई कमजोर होगी।दूसरी ओर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस जनगणना का खुलकर समर्थन किया। उनका स्पष्ट तर्क था कि जब तक शोषित और वंचित वर्गों की सटीक आबादी का वैज्ञानिक आंकड़ा सामने नहीं आएगा, तब तक उनके सामाजिक अधिकारों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की जा सकती। अंबेडकर का यह स्टैंड आंकड़ों के जरिए शोषितों को पहचान दिलाने की रणनीति थी।इतिहास का चक्र देखिए—जिस जाति जनगणना का कांग्रेस ने 1931 में पुरजोर विरोध किया था, आज वही कांग्रेस इसकी सबसे बड़ी पैरोकार बनी हुई है और देश भर में जातिगत जनगणना कराने की मांग कर रही है।राजनीतिक प्राथमिकताएं बदली हैं या सामाजिक न्याय की परिभाषा? 95 सालों में भारतीय राजनीति के इस रुख बदलाव ने कई गंभीर सवाल छोड. दिए हैं। #1931जातिजनगणना #गांधीऔरअंबेडकर #सामाजिकन्याय #CasteCensus #भारतीयइतिहास #राजनीतिक_बदलाव #AmbedkarVSGandhi

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1931 जाति जनगणना: गांधी ने किया विरोध, तो अंबेडकर का क्या था स्टैंड?

18 hours ago | [YT] | 6

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1931 जाति जनगणना: गांधी ने किया विरोध, तो अंबेडकर का क्या था स्टैंड?

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बाढ़ का गवाह नेपाल का नुवाकोट: यहीं से हुआ अजेय गोरखा सेना उदय। The Rise of the Gorkhas ।
youtube.com/live/fu0I--ORg1U?si=AThtM2CqyIMjVp4d

19 hours ago | [YT] | 4

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बाढ़ का गवाह नेपाल का नुवाकोट: यहीं से हुआ अजेय गोरखा सेना उदय। The Rise of the Gorkhas ।
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गोरखा सेना का अभ्युदय केवल एक सैन्य दल का निर्माण नहीं, बल्कि आधुनिक नेपाल के एकीकरण की सबसे मजबूत नींव था। 1743 ईस्वी में नुवाकोट के प्रथम युद्ध में मिली करारी हार ने राजा पृथ्वीनारायण शाह को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया। इस पराजय के बाद उन्होंने ठकुरी, छेत्री (खस), मगर और गुरुंग समुदायों के लड़ाकों को एकजुट कर एक समावेशी व पेशेवर सेना का पुनर्गठन किया।

आधुनिक हथियारों और कठोर प्रशिक्षण से लैस इस नई गोरखा सेना ने 1744 ईस्वी में नुवाकोट पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। नुवाकोट से शुरू हुआ यह विजय अभियान आगे चलकर गोरखाली अदम्य साहस और अजेय पहचान का प्रतीक बन गया।

2 days ago | [YT] | 3

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743 ईस्वी में राजा बनने और नुवाकोट पर पहला हमला हारने से पहले तक गोरखा की सेना कोई पेशेवर, बहु-जातीय अनुशासित स्थाई सेना नहीं थी। वह मध्यकालीन सामंती ढर्रे पर बनी एक पारंपरिक सेना थी, जिसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित वर्गों का प्रभुत्व था:ठकुरी (दरबारी व शाही वर्ग): शाह राजवंश खुद ठकुरी श्रेणी में आता था। राजा नरभूपाल शाह (पृथ्वीनारायण शाह के पिता) के समय सेना के शीर्ष नेतृत्व और कमान पर ठकुरी परिवारों का नियंत्रण था। खस (छेत्री/क्षत्रिय सैनिक): गोरखा क्षेत्र के पारंपरिक लड़ाके और सैनिक (जैसे पांडे, बस्न्यात, कुँवर, थापा आदि) मुख्य रूप से खस समुदाय से आते थे। मगर समुदाय (सीमित भागीदारी): गोरखा और आसपास के क्षेत्रों में मगरों की आबादी बहुत अधिक थी, इसलिए पहले भी मगर समुदाय के कुछ लोग सैनिक और छोटे कमांडर के रूप में शामिल थे (जैसे जयंत राणा मगर, जो नरभूपाल शाह के समय गोरखा सेनापति थे, पर बाद में नुवाकोट चले गए थे)। ब्राह्मण (सलाहकार व ज्योतिषी): सेना का सीधा हिस्सा न होकर रणनीति, प्रशासन और पंचांग/शुभ मुहूर्त तय करने में अर्याल, पन्त, पौडयाल आदि ब्राह्मण वर्ग जुड़ा रहता था।पुरानी सेना में क्या कमियाँ थीं?सीमित सामाजिक आधार: सेना मुख्य रूप से दरबार के कुछ खास कुलीन घरानों (पांडे, बस्न्यात आदि) और खस-ठाकुरियों के भरोसे चलती थी।स्थाई ट्रेनिंग का अभाव: किसान युद्ध के समय हथियार उठाकर आ जाते थे और खेती के समय वापस लौट जाते थे। कमजोर हथियार: सेना पारंपरिक हथियारों (तलवार, खुकुरी, धनुष-बाण, भाला) पर निर्भर थी। 1743-44 के बाद क्या बदला?नुवाकोट की पहली हार के बाद पृथ्वीनारायण शाह ने समझा कि केवल एक-दो कुलीन जातियों की भीड़ से राज्य नहीं जीता जा सकता। उन्होंने मगर और गुरुंग जनजाति के जुझारू युवकों को बड़े पैमाने पर शामिल किया, दलितों (कामी, सार्की, दमाई) को हथियार निर्माण, जूते-वर्दी और नगाड़े/संगीत की जिम्मेदारी दी और पूरी सेना को एक राष्ट्रीय व पेशेवर चरित्र दिया।

2 days ago | [YT] | 3