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Himalayilog| e- Book of Himalayan Civilization | हिमालयीलोग । By Journalist Dr.Harish Chandra Lakhera, New Delhi, India /
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3 days ago | [YT] | 12
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3 days ago | [YT] | 9
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खसों के राजपूतीकरण की अनसुनी गाथा। The Untold Saga of Khas Rajputization in Census ।
https://youtu.be/S4mBh137obY?si=SC2as...
खस से राजपूत बनने का वो सच! The Untold Story of Khas Rajputization in Uttarakhand! | #Shorts -1
खसों के राजपूतीकरण की अनसुनी गाथा । विस्तार से बता रहे हैं सीनियर जर्नलिस्ट प्रो. (डा). हरीश चंद्र लखेड़ा । Prof. (Dr.) Harish Chandra Lakhera। E- mail- drhclakhera@gmail. Com
The Untold Story of Khas Rajputization in Uttarakhand! #History
क्या आप जानते हैं कि आज उत्तराखंड के जो मूल निवासी 'राजपूत या ठाकुर' कहलाते हैं, उनका एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से 'खस' समुदाय से ताल्लुक रखता था?वैभव से समृद्ध यह समाज पहाड़ों की मुख्य शासक और योद्धा कौम थी। लेकिन ब्रिटिश काल, विशेषकर 1891 की जनगणना में अंग्रेजों ने इन्हें सामाजिक पायदान पर नीचा दिखाने की कोशिश की।
इस प्रशासनिक अपमान के खिलाफ पूरे कुमाऊं और गढ़वाल में एक मौन क्रांति उठ खड़ी हुई। खुद को हीन भावना और पिछड़ेपन के तमगे से बचाने के लिए लोगों ने 'खस' कहलाने से दूरी बना ली। स्थानीय क्षत्रिय सभाओं के नेतृत्व में सामूहिक जनेऊ धारण करने और अपनी परंपराओं का 'क्षत्रियकरण' करने का एक अभूतपूर्व आंदोलन चला। लोगों ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाकर जनगणना से 'खस' का कॉलम हमेशा के लिए खत्म करवा दिया और खुद को 'राजपूत' पहचान में समाहित कर लिया। यही है पहाड़ों में एक प्राचीन शब्द के विलुप्त होने और 'खसों के राजपूतीकरण की अनसुनी गाथा'!
The transformation of the 'Khas' community into 'Rajputs' is a remarkable chapter of Uttarakhand’s social history. Historically a dominant and ruling clan, the Khas faced an identity crisis when British administrators classified them low in the caste hierarchy during the 1891 Census. To counter this humiliation and reclaim their social prestige, the community launched a powerful Sanskritization movement. Led by regional Kshatriya Sabhas, they adopted the sacred thread (Janeu) and systematically distanced themselves from the label 'Khas'. They successfully pressured the British to remove the separate 'Khas' census column, completely merging into the Rajput identity by 1931.
#खस_इतिहास #उत्तराखंड_इतिहास #खस_से_राजपूत #राजपूतीकरण #जनगणना_का_सच #हिमालयीलॉग #पहाड़ी_इतिहास #शॉर्ट्स
#KhasHistory #UttarakhandHistory #KhasToRajput #Rajputization #HimalayanHistory #CensusTrueStory #ShortsHistory #YouTubeShorts
1 week ago | [YT] | 3
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https://youtu.be/F0koEyeGUIY?si=Uibm9...
1 week ago | [YT] | 2
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https://youtu.be/F0koEyeGUIY?si=Uibm9...
पूर्व राज्यपाल और भारतीय सेना के दिग्गज जांबाज लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मदन मोहन लखेड़ा का जीवन रणभूमि से लेकर राजभवन तक राष्ट्र सेवा की एक अनूठी मिसाल रहा है।
जनरल लखेड़ा का जन्म 21 अक्टूबर 1937 को उत्तराखंड (तत्कालीन टिहरी गढ़वाल रियासत ) के जखंड गांव में हुआ था। उन्होंने राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज (RIMC) और एनडीए से शिक्षा पाई। वर्ष 1958 में वे कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन हुए और बाद में आर्टिलरी में सेवाएं दीं। अपने 37 वर्षों के शानदार सैन्य करियर में उन्होंने 1961 के गोवा मुक्ति संग्राम, तथा 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में अग्रिम मोर्चे पर अदम्य साहस का परिचय दिया। कश्मीर में उग्रवाद विरोधी अभियानों और सेना मुख्यालय में 'एडजुटेंट जनरल' के रूप में उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 'परम विशिष्ट सेवा पदक' (PVSM), AVSM और VSM जैसे शीर्ष सैन्य सम्मान मिले। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कुशल राजनीति और प्रशासन में कदम रखा। वे पुडुचेरी और अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल रहे, जहां उन्होंने 2004 की सुनामी आपदा के दौरान अभूतपूर्व राहत कार्य किए। इसके बाद, वर्ष 2006 से 2011 तक उन्होंने मिजोरम के राज्यपाल के रूप में सुशासन और जन-कल्याण की नई इबारत लिखी। 88 वर्ष की आयु में, 29 जून 2026 को देहरादून में इस महान देशभक्त का निधन हो गया। उनका जीवन हमेशा देश के युवाओं को कर्तव्यनिष्ठा और शौर्य की प्रेरणा देता रहेगा।
1 week ago | [YT] | 14
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youtube.com/live/9LK0KsRLReQ?si=_qE-TS_ecZUpiSap
1901 से 1931 जाति जनगणना का इतिहास । जब भारत में जातियों को रैंकिंग दी गई! How British Census Triggered the 'Caste Race' in India
youtube.com/live/9LK0KsRLReQ?si=bIMrse6x-qEuzmxv
इतिहास का वो पन्ना जिसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया।How British Census Triggered the 'Caste Race' in India।
आज के इस विशेष लाइव सत्र में हम भारत के इतिहास के एक ऐसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण अध्याय को टटोलेंगे, जिसने आधुनिक भारत की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आज जब पूरे देश में 'जातिगत जनगणना' (Caste Census) को लेकर एक नई बहस छिड़ी है, तब यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर इस 'जाति की रेस' की शुरुआत कहाँ से हुई थी?
इस वीडियो में हम सन 1901 और सन 1931 के बीच ब्रिटिश राज द्वारा कराई गई ऐतिहासिक जनगणनाओं का गहरा और तथ्यात्मक विश्लेषण किया गया है। कि कैसे 1901 में जनगणना आयुक्त सर हरबर्ट होप रिजली (Sir Herbert Hope Risley) के एक 'नस्लीय प्रयोग' ने भारतीय समाज में जातियों की आधिकारिक रैंकिंग शुरू की और कैसे 1931 आते-आते जे.एच. हटन (J.H. Hutton) के दौर में यह सामाजिक मान-सम्मान की लड़ाई से बदलकर राजनीतिक वजूद और प्रतिनिधित्व की होड़ बन गई।
क्या वाकई अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इस खाई को गहरा किया? बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का इस पर क्या रुख था? और आज़ादी के बाद 1951 में स्वतंत्र भारत ने इस पर रोक क्यों लगाई? इन सभी सवालों के जवाब ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें और अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें। चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना न भूलें!
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Welcome to this deep-dive historical analysis into India's Caste Census timeline. In this video, we explore how the British decennial censuses between 1901 and 1931 fundamentally reshaped Indian society and ignited a modern 'caste race'.
Learn about Sir Herbert Hope Risley's controversial 1901 experiment based on 'Social Precedence' and how it led to a flood of caste petitions. We also analyze the crucial 1931 census under J.H. Hutton, which became the baseline for identity politics and affirmative action in India. Understand the imperial motive behind these numbers and their lasting legacy on contemporary Indian politics. Don't forget to like, share, and subscribe!
1901 vs 1931: जब अंग्रेजों की जनगणना ने भारत में शुरू की 'जाति की रेस' | ऐतिहासिक सच
क्या अंग्रेजों ने बनाई आज की जातिवादी राजनीति? 1901 और 1931 की जनगणना का पूरा सच
इतिहास का वो पन्ना जिसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया: 1901 से 1931 जाति जनगणना का इतिहास
मज1901 vs 1931: How British Census Triggered the 'Caste Race' in India ।The Untold History of Caste Census (1901-1931): How British Divided Indian Society ।Why 1931 Census Still Rules Indian Politics? The Risley & Hutton Experiment Exposed
#जातिजनगणना #भारतीयइतिहास #1931जनगणना #इतिहासकेपन्ने #सामाजिकन्याय । #CasteCensus #IndianHistory #BritishIndia #Census1931 #RisleyExperiment #SocialHistory ।
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2 weeks ago (edited) | [YT] | 5
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1901 से 1931 जाति जनगणना का इतिहास । जब भारत में जातियों को रैंकिंग दी गई! How British Census Triggered the 'Caste Race' in India
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इतिहास का वो पन्ना जिसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया।How British Census Triggered the 'Caste Race' in India।
इस वीडियो में सन 1901 और सन 1931 के बीच ब्रिटिश राज द्वारा कराई गई ऐतिहासिक जनगणनाओं का गहरा और तथ्यात्मक विश्लेषण किया गया है। कैसे 1901 में जनगणना आयुक्त सर हरबर्ट होप रिजली (Sir Herbert Hope Risley) के एक 'नस्लीय प्रयोग' ने भारतीय समाज में जातियों की आधिकारिक रैंकिंग शुरू की और कैसे 1931 आते-आते जे.एच. हटन (J.H. Hutton) के दौर में यह सामाजिक मान-सम्मान की लड़ाई से बदलकर राजनीतिक वजूद और प्रतिनिधित्व की होड़ बन गई।
क्या वाकई अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत इस खाई को गहरा किया? बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का इस पर क्या रुख था? और आज़ादी के बाद 1951 में स्वतंत्र भारत ने इस पर रोक क्यों लगाई? इन सभी सवालों के जवाब ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें और अपने विचार कमेंट बॉक्स में साझा करें। चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना न भूलें!
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Welcome to this deep-dive historical analysis into India's Caste Census timeline. In this video, we explore how the British decennial censuses between 1901 and 1931 fundamentally reshaped Indian society and ignited a modern 'caste race'.
Learn about Sir Herbert Hope Risley's controversial 1901 experiment based on 'Social Precedence' and how it led to a flood of caste petitions. We also analyze the crucial 1931 census under J.H. Hutton, which became the baseline for identity politics and affirmative action in India. Understand the imperial motive behind these numbers and their lasting legacy on contemporary Indian politics. Don't forget to like, share, and subscribe!
1901 vs 1931: जब अंग्रेजों की जनगणना ने भारत में शुरू की 'जाति की रेस' | ऐतिहासिक सच
क्या अंग्रेजों ने बनाई आज की जातिवादी राजनीति? 1901 और 1931 की जनगणना का पूरा सच
इतिहास का वो पन्ना जिसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया: 1901 से 1931 जाति जनगणना का इतिहास
मज1901 vs 1931: How British Census Triggered the 'Caste Race' in India ।The Untold History of Caste Census (1901-1931): How British Divided Indian Society ।Why 1931 Census Still Rules Indian Politics? The Risley & Hutton Experiment Exposed
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2 weeks ago | [YT] | 3
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Himalayilog
इतिहास की किताबों से गायब पहाड़ी वीरों की अमर गाथाएं। Forgotten Tales of Hill Bravery ।
https://youtu.be/mnO-tdi3aqc?si=EIfAP...
यह वीडियो/लेख इतिहास की पुस्तकों से ओझल हिमालय के उन महायोद्धाओं (मार्शल रेस) की गौरवशाली गाथा है, जिन्होंने प्राचीन काल से भारत की सीमाओं और संस्कृति की रक्षा की। महाभारत के युद्ध में भाग लेने वाले 'आयुधजीवी' खस, किरात और नागों ने बौद्ध काल में मैदानी राजाओं और आचार्य चाणक्य की सेना का मुख्य आधार बनकर चंद्रगुप्त मौर्य की रक्षा की। मध्यकाल में गढ़वाल की रानी कर्णावती ने शाहजहाँ की सेना के नाक-कान काटे, तो माधो सिंह भंडारी और रिखोला लोदी ने तिब्बत तक धाक जमाई। कुमाऊं नरेश बाज़ बहादुर चंद और जम्मू के डोगरा सेनापति जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत-तकलाकोट को जीतकर मानसरोवर तक भारत की सीमाएं बढ़ाईं।
कहलूर के बाबा बंदा सिंह बहादुर ने मुगलों की ईंट से ईंट बजाई, जबकि असम के लाचित बोरफुकन ने सराईघाट में और नेपाल के गोरखाओं ने सिंधुली गढ़ी में मुस्लिम आक्रमणों को काट डाला। आधुनिक काल में गढ़वाल के दरवान सिंह नेगी को पहला विक्टोरिया क्रॉस और हिमाचल के मेजर सोमनाथ शर्मा को स्वतंत्र भारत का पहला परमवीर चक्र मिला। वहीं 1962 में अरुणाचल (नेफ़ा) के नूरानांग में बाबा जसवंत सिंह रावत ने अकेले 300 चीनियों को मारकर पहाड़ी शौर्य को अमर कर दिया।
The Unsung Warriors of Himalayas: Forgotten Tales of Hill Bravery
Himalayan Warriors History, Khas and Kirat Warriors, Dogra Regiment History, Gorkha Warriors History, Rani Karnavati Garhwal, General Zorawar Singh Tibet, Baba Banda Singh Bahadur, Lachit Borphukan Saraighat, Major Somnath Sharma Param Vir Chakra, Jaswant Singh Rawat 1962, पहाड़ी योद्धाओं का इतिहास, लाचित बोरफुकन, जसवंत सिंह रावत, प्रथम परमवीर चक्र।
2 weeks ago | [YT] | 1
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Himalayilog
भारत में सभी के निशाने पर क्यों हैं ब्राह्मण ? Why are Brahmins the target of everyone in India?
भारत में ब्राह्मण सभी के निशाने पर क्यों हैं ?
- डा. हरीश चंद्र लखेड़ा ( Dr. Harish Chandra Lakhera )
पूरी रिपोर्ट मेरे इस ब्लॉग में है।
himalayilog.blogspot.com/2025/07/why-are-brahmins-…
2 weeks ago | [YT] | 13
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Himalayilog
youtube.com/live/mnArXtcbNmo?si=pYqNLoFcaE0Rf9G1
उत्तराखंड : "डॉक्टर मरीज ढूंढ रहे हैं" या मौत मरीजों को ढूंढ रही है?
Shame on You, Dhami Govt! पहाड़ों में कब तक इलाज के अभाव में मरती रहेंगी महिलाएं?
उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री रहे धन सिंह रावत ने कहा था कि उत्तराखंड में अब डाक्टर ही मरीजों को ढूंढ रहे हैं। यह दावा कितना झठा था, यह चमोली के थराली में 35 वर्षीय सरिता देवी की मौत की घटना बयां कर रही है। उत्तराखंड के पहाड़ों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं दम तोड़ रही हैं। चमोली के थराली में 35 वर्षीय सरिता देवी की एम्बुलेंस में हुई मौत कोई पहली घटना नहीं है। गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक, गर्भवती महिलाएं विशेषज्ञ डॉक्टरों, विशेषकर गायनोकोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) की कमी और बदहाल आपातकालीन परिवहन व्यवस्था के कारण रास्ते में ही दम तोड़ने को मजबूर हैं। अस्पताल केवल 'रेफरल सेंटर' बनकर रह गए हैं, जहां गंभीर मरीजों को भगवान भरोसे मैदानी इलाकों के लिए भेज दिया जाता है। घुमावदार रास्तों पर बिना ऑक्सीजन और पंखे की एम्बुलेंस में जिंदगी की जंग हारती इन प्रसूताओं की मौत सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की नाकामी को दर्शाती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल, स्वास्थ्य सचिव और स्वास्थ्य महानिदेशक की नाक के नीचे चल रही यह बदहाली पहाड़ी जनमानस के साथ क्रूर मजाक है। आखिर कब तक पहाड़ों की माताओं-बहनों को इस लचर और संवेदनहीन सिस्टम की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी? अब समय केवल खोखले दावों का नहीं, बल्कि धरातल पर जवाबदेही तय करने और डॉक्टरों की स्थायी नियुक्ति का है।
पहाड़ का दर्द: अस्पतालों के चक्रव्यूह में टूटा फौजी के लाल का दम
जुलाई 2025 में चमोली के फौजी दिनेश चंद्र के डेढ़ वर्षीय बेटे शुभांशु की मौत ने उत्तराखंड के खोखले स्वास्थ्य तंत्र को उजागर कर दिया। गंभीर डिहाइड्रेशन से पीड़ित बच्चे को ग्वालदम, बैजनाथ और बागेश्वर के अस्पतालों से केवल 'रेफर' किया गया। 108 एम्बुलेंस की देरी और समय पर बाल रोग विशेषज्ञ न मिलने से मासूम ने हल्द्वानी में दम तोड़ दिया।
इस व्यवस्था के खिलाफ अक्टूबर 2025 में अल्मोड़ा के चौखुटिया से देहरादून तक ऐतिहासिक पैदल सत्याग्रह यात्रा निकाली गई। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन सिंह कठायत के नेतृत्व में उमड़े जनसैलाब ने मांग की कि पहाड़ के अस्पतालों को केवल 'रेफरल सेंटर' बनाना बंद किया जाए।
उत्तराखंड में विशेषज्ञ डाक्टरों के 45% से अधिक पद खाली हैं। राज्य में सर्जन, शिशु रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञों के लगभग 45% से 50% पद रिक्त पड़े हैं।
गायनाकोलॉजिस्ट का बड़ा अकाल: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) और जिला अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों (Gynecologists) की कमी सबसे घातक साबित हो रही है। कुल स्वीकृत पदों में से मात्र 25% से 30% पर ही स्थायी महिला डॉक्टर तैनात हैं, जिससे प्रसूताओं को मैदानी क्षेत्रों में रेफर करना मजबूरी बन गया है।
सरकार कहती रही है कि इस कमी को दूर करने के लिए 'यू-कोट' (You Quote We Pay) जैसी योजनाओं के तहत संविदा पर डॉक्टरों को ऊंचे वेतन पर रख रही है। साथ ही, जून 2026 में 300 से अधिक डॉक्टरों के तबादले कर पर्वतीय क्षेत्रों में डॉक्टरों को भेजने की कोशिश की गई है, मगर धरातल पर अब भी चमोली और उत्तरकाशी जैसे सीमांत जिले डॉक्टरों के इंतजार में हैं।
दावा देखिए--- आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, जहाँ वर्ष 2021-22 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय ₹1,94,670 थी, वह अब बढ़कर ₹2,73,921 तक पहुँच गई है। सरकार का मुख्य दावा यह है कि उत्तराखंड की यह औसत वार्षिक आय देश के राष्ट्रीय औसत (लगभग ₹2.19 लाख) से करीब ₹54,000 अधिक है और यह पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश से भी आगे है। सरकार इस विकास का श्रेय होमस्टे, पर्यटन और बढ़ते औद्योगिक निवेश को देती है।
"The healthcare infrastructure in the mountains of Uttarakhand is in a state of collapse. The tragic demise of 35-year-old Sarita Devi in a poorly equipped ambulance in Chamoli's Tharali is not an isolated incident. Across the Himalayan state, pregnant women are losing their lives on treacherous roads due to a severe shortage of specialists, particularly gynecologists, and a dysfunctional emergency transit system. Rural community health centers have turned into mere 'referral hubs' that push critical patients toward plains without stabilizing them. Fighting for breath in moving cages without oxygen or functional fans, these mothers pay the ultimate price for systemic apathy. This critical failure directly points toward the negligence of CM Pushkar Singh Dhami, Health Minister Subodh Uniyal, the Health Secretary, and the Director-General of Health. How long will the women of the hills remain victims of administrative indifference? It is high time the government stops making empty promises, ensures accountability, and deploys permanent medical staff in remote areas to save innocent lives."
#उत्तराखंड_स्वास्थ्य_संकट #पहाड़_का_दर्द #धामी_सरकार_जवाब_दो #सुबोध_उनियाल #थराली_घटना #पहाड़_में_लापरवाही #उत्तराखंड_पलायन #स्वास्थ्य_सुविधाएं_शून्य
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2 weeks ago | [YT] | 8
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