विज्ञान अभ्युदय

हम भारतीय धर्म संस्कृति के आधार वेद और प्राचीन भारतीय विज्ञान/विद्या को सरल रूप में जन मानस तक पहुंचाने हेतु प्रतिबद्ध है।
"जन जन वेद घर घर वेद"




विज्ञान अभ्युदय

प्राचीन भारत के महान नियम-विधाता महर्षि मनु ने वेदों को धर्म का मूल आधार बताया है। उन्होंने कहा, "वेदोऽखिलो धर्ममूलम्", जिसका अर्थ है कि वेद ही समस्त धर्म और धर्मशास्त्र का मूल स्रोत हैं।

वेद को धर्म का मूल कहने का कारण क्या है? वेद में इस विश्व का समस्त मूलभूत ज्ञान वर्णित है, वेद में सृष्टि को इतने सुंदर सहज तरीके से प्रस्तुत करना और इसे जानने की इच्छा शक्ति पैदा करना, इसे विशेष बनाती है, हमने पहले लेखों में देखा ही है, ईश्वर को जानने के लिए सृष्टि और सृष्टि संचालन को जानना जरूरी है।
ऐसे मैं आज एक और वेद मंत्र प्रस्तुत है, ऋषि गृत्समदः शौनकः इंद्र सूक्त द्वारा कहते है -
यः पृ॑थि॒वीं व्यथ॑माना॒मदृं॑ह॒द्यः पर्व॑ता॒न्प्रकु॑पिताँ॒ अर॑म्णात्। यो अ॒न्तरि॑क्षं विम॒मे वरी॑यो॒ यो द्यामस्त॑भ्ना॒त्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥
इस मंत्र के दो तरीके के अर्थ मेरी दृष्टि में है, एक स्वामी शरण जी का और दूसरा महर्षि दयानंद जी का,
पहला अर्थ -
जो पृथ्वी को स्थित करने वाला है, जो व्यथित पर्वतों को रमणीयता देने वाला है, जिसने अंतरिक्ष को विशेष मान से बनाया और ग्रहों एवं नक्षत्रों को स्थापित किया, हे लोगो, वो इंद्र अर्थात महान ऐश्वर्यवान ईश्वर है।

दूसरा अर्थ -
हे मनुष्यो ! जो ईश्वर सूर्य को न रचे तो चलते हुए बड़े-बड़े भूगोलों/ग्रहों को कौन धारण करे, कौन मेघ को वर्षावे और कौन अन्तरिक्ष को अपने प्रकाश से पूरित करे

दोनों ही अर्थों में सृष्टि संचालन और स्थापन का बहुत सुंदर वर्णन हमको प्राप्त होता है।
स्मरण रहे हम यहां पर वेद मंत्रों का अनुवाद प्रस्तुत नहीं कर रहे, अपितु जो हमारे विद्वानों ने वेद से अमृत निकाला है, उसको सरल रूप से प्रस्तुत कर रहे है।
धन्यवाद
✍️ पुलकित वैदिक

3 months ago | [YT] | 4

विज्ञान अभ्युदय

आज का विषय कुछ महत्वपूर्ण है, हमारे धर्म ग्रन्थ वेद इंद्र की महिमा गाते है लेकिन ये इंद्र कौन है? वर्षा का देवता? स्वर्ग का राजा? नहीं नहीं! वेद में इंद्र कोई व्यक्ति नहीं अपितु ईश्वर का गुणवाची नाम है।
और ऐसा मै नहीं कह रहा है, गृत्समदः शौनकः ऋषि इंद्र सूक्त में कहते है
यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान्दे॒वो दे॒वान्क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत्। यस्य॒ शुष्मा॒द्रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥
यहां सभी को आव्हान करते हुए इंद्र की विशेषताएं बताई गई है,
जो मनस्वी (मननशील) सृष्टि में प्रथम है, जो देवों/विद्वानों/प्रकाशमानो को उत्पन्न करने वाला है, जिसने अपने कर्मों द्वारा सृष्टि को सभी ओर से आभूषित किया, जिसके बल द्वारा देव जन दुष्टों को डराते है, जिसने समस्त सृष्टि को आपस में संबंधित किया हुआ है, हे लोगो! वह इंद्र (परम ऐश्वर्यवान ईश्वर) है।

हमारे लिए सीख:
1. कर्म की महानता
2. ईश्वरीय शक्ति का उपयोग
3. बल की महानता

✍️ पुलकित वैदिक

3 months ago (edited) | [YT] | 3

विज्ञान अभ्युदय

यूरोप - Leeuwenhoek (17 वीं शताब्दी)
भारत - महर्षि कण्व (मानव सभ्यता का आरंभ (वेद)
*सूक्ष्मजीवों की खोज*

1 year ago | [YT] | 9