Awwal Sahafi

किसान आंदोलन की औरतें किस चश्मे से दिखाई देती हैं?
दलजीत अमी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और अव्वल सहाफ़ी नाम का चर्चित यूट्यूब चैनल चलाते है।
दिल्ली में रहने वाले एक पंजाबी गायक ने फ़ेसबुक पर लिखा है, “दो साल हो गए हैं। पंजाबी चेतना का ज़बरदस्त, बेजोड़ मंथन चल रहा है और उसका नतीजा? सिर्फ़ और सिर्फ़ मर्द ऊर्जा का विस्फोट। किरदारों की लंबी फ़ेहरिस्त पर उसमें औरतों की मौजूदगी? नाम मात्र भी नहीं। हम जो बर्ताव औरतों के साथ करते हैं, वहीं धरती के साथ भी कर रहे हैं।पंजाब की आधुनिक संकट की जड़ों में भी हमें यही रुझान मिलेगा।” दो दशकों से लंबे गायक जीवन में संजीदगी के साथ सामाजिक-राजनैतिक मुद्दों पर बात करने वाले बंदे की यह बात भी संजीदा है।
मालूम होता है कि यह टिप्पणी मौजूदा किसान आंदोलन के संदर्भ में की गई है। उनकी टिप्पणी को अगर विशाल संदर्भ में देखा जाए तो इसके साथ सहमत होने की काफ़ी गुंजाइश बनती है। इस टिप्पणी मैं औरतों का विशेष हवाला चर्चा की माँग करता है।
नई खेती कानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे किसान मोर्चे के हवाले से औरतों के बारे में चर्चा लगातार होती रही है। यह चर्चा औरतों के वहाँ होने, न होने और उनकी हैसियत के हवाले से होती रही है। बीती 11 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले में टिप्पणी की थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े ने सवाल पूछा था, "औरतों और बुजुर्गों को आंदोलन में क्यों रखा गया है।” उनकी इस टिप्पणी से स्पष्ट था कि आंदोलन में औरते हैं पर अदालत को लगता है कि औरतों को वहाँ रखा गया है और वह अपनी मर्ज़ी या हैसियत से वहाँ नहीं आयी है। आंदोलनकारियों और नारीवादियों के अलावा कई तरफ़ से अदालत की इस टिप्पणी की आलोचना हुई थी। आलोचना की एक दलील थी कि यह टिप्पणी औरत को इंसान की जगह माल समझती है, जबकि ओरतें किसान भी हैं और आंदोलनकारी भी। आंदोलनकारी औरतों की बयान आए थे कि वह अपनी मर्ज़ी और हैसियत के साथ आंदोलन का हिस्सा है क्योंकि यह आंदोलन औरतों का भी है।
मुख्य न्यायाधीश का सवाल उपरोक्त टिप्पणी करने वाले गायक के साथ जुड़ता है। इन दोनों की पहुँच, समझ और इरादा अलग-अलग हो सकते हैं पर उसमें कुछ बुनियादी समानता भी है। आंदोलन की कुछ तफ़सील के साथ इस मुद्दे पर बात करते हैं। जब यह आंदोलन दिल्ली पहुँचा तो दिल्ली वाला आंदोलन के पक्ष वाले मीडिया का कहना था कि यह आंदोलन बढ़िया है पर नेता रहित है। केन्द्रीय सरकार में सारी ताक़त प्रधान मंत्री के हाथ में होने की शिकायत करने वाली प्रेस आंदोलन से माँग कर रही थी कि कोई एक नेता होना चाहिए। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि अलग-अलग क़िस्म से सोचने वाले लोग मिलकर आंदोलन कर सकते हैं और अपनी अलग-अलग पहचान क़ायम रख सकते हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इस आंदोलन की लोकतांत्रिक ख़ूबसूरती को पहचानने में या तो नाकामयाब थे या इस आंदोलन की लोकतांत्रिक कामयाबी को नज़रअंदाज़ कर रहे थे। ज़्यादातर लोग आंदोलन करने वाले संगठनों के इतिहास और उनकी लामबंदी करने की ताक़त से अनजान थे। पंजाब के किसान संगठनों के आंदोलन दिल्ली की प्रेस कवर नहीं करती तो उसे लगा कि यह पहली बार हो रहा है। जो पहली बार हो रहा था वह आंदोलन का दिल्ली में होना और उसके बाद लगातार क़ायम रहना है।
जब औरतों की बात चली तो पहला सवाल था कि नेताओं में औरतें कहाँ है। जवाब में किसी ने हरिंदर कौर बिंदु के बारे में लिखा और किसी ने जसवीर कौर नत्त के बारे में लिखा। ज़्यादातर बयान उन्हीं औरतों के आए जिनकी मीडिया के साथ अपने रुपये के चलते जान पहचान थी या जो शहरी मजलिसी आदाब से वाक़िफ़ हैं। किसान संगठनों में सक्रिय औरतें औरतें ग्रामीण इलाकों से आती हैं और उनका मजलिसी आदाब अलग है।
इस तरह यह खिड़की या कैमरे की आँख ऐसी जगह है यहाँ से औरतें और औरतों की हैसियत कम दिखाई देती है। इस आंदोलन की औरतों को देखने और उनकी खासियत को समझने के लिए अपने सवाल छोड़कर सिर्फ़ कान और आँख खोलकर वहाँ जाने की ज़रूरत है। थोड़ा अपनी जिज्ञासा को खुला छोड़ने की ज़रूरत है तो सुनाई देता है और दिखाई भी देता है।
इस आंदोलन में जब महिला किसान दिवस मनाया गया तो सभी मंच औरतों के पास थे। वह बोल भी रही थी और दिखाई दे रही थी। अगले दिन मीडिया में तस्वीरें थी पर वह तफ़सील ग़ायब थी जो शहर के नारीवादी आंदोलनों के हवाले से छपती है। इस मौक़े पर सौहार्द जताने के लिए नामी विद्वान और कार्यकर्ता आई थी पर उनको भी वह कवरेज नहीं मिली जो उन्हें अलग-अलग मौकों पर मिलती रही है। महिला किसान दिवस को अगर शक्तिप्रदर्शन का एक ढंग मात्र मान लिया जाए तो आठ मार्च को महिला दिवस इस दलील को रद्द कर देता है। आठ मार्च को किसान आंदोलन में हुई औरतों की रैलियों के बारे में यह बात आसानी से कही जा सकती है कि औरतों के इतिहास में शायद यह सबसे बड़े जलसे हों। सबसे बड़ा जलसा कहने के लिए कुछ खोज दरकार है पर इसे सबसे बड़ा जलसों में एक मानने में कोई मुश्किल नहीं है। आठ मार्च वाले दिन भी इस जलसे को संबोधन करने वाली किसान औरतों के इलावा प्रोफैसर, वक़ील, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हुई नामी औरतें थी। इस समागम की जलसे की भी तस्वीरें छाया हुई पर मीडिया का रवैया वहीं रहा।
इस आंदोलन में हर रोज़ मंच चलता है और भाषण होते हैं। टिकरी बॉर्डर पर पकौड़ा चौक के पास भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहां) का मंच है। इस मंच पर हर रोज़ औरतें बोलती हैं और हफ़्ते में एक दिन मंच से सिर्फ़ औरतें बोलती हैं। किसी को पंजाबी और हरियाणवी की उप-बोलियों में खेती और खाने की रसोई से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदारों के हवाले से ग्रामीण औरतों का तजुर्बा समझना तो आँख और कान खोलकर वहाँ बैठ जाना चाहिए। वहाँ पर दशकों तक चूल्हा जलाने वाली, खेती करने वाली, बच्चे पालने वाली, औरतें बोलती हैं। वह अपने जीवन के तजुर्बे को आंदोलन के साथ जोड़ती हैं। इन औरतों के पास नारीवादी समाज का देसी मुहावरा है। यह मुहावरा पढ़े-लिखों की भाषा में नहीं है पर वह जिससे बात कर रही हूँ उसे समझ में आ रहा है। जिनको वह सुनाई नहीं देती, जिनको वह दिखाई नहीं देती वह उनसे बात भी नहीं कर रही है। इन औरतों को अपना मक़सद स्पष्ट है। अब किसी को औरतों को सुनना या देखना है तो कुछ कुछ प्रयास करना होगा।
इन औरतों को देखने सुनने के लिए कुछ जिज्ञासा और कुछ संजम दरकार है। कैमरे का लैंस तब्दील करने की ज़रूरत है, चश्मा बदलने की ज़रूरत है। वहाँ पर आपको गाँव में विज्ञान पढ़ाती, नर्स का काम करती, मिड डे मील कुक या आशा वर्कर का काम करने वाली औरतें मिल जाएंगी। कोई बता देगी कि वह इस आंदोलन में तीसरी बार आई है, पहली बार अपने संगठन की तरफ़ से आई थी, दूसरी बार गाँव की तरफ़ से ज़िम्मेवारी लगी थी और तीसरी बार किसान यूनियन में उनकी बारी आई है। इतनी सारी पह्चानों को उठाकर चल रही आंदोलनकारी औरतों को देखिए तो, सुनिए तो अगर आप इसी नतीजे पर पहुँचे तो जिन्हें यह औरत दिखाई दे रही हैं, सुनाई दे रही है, उनको चश्मा बदल देना चाहिए।
Daljit ami

4 years ago | [YT] | 15

Awwal Sahafi

"नरेन्द्र मोदी जी ने चाय की केतली में सब कुछ बहा दिया।" चायवाली को 'चायवाले' से उम्मीद क्यों नहीं है?
Note: Watch with Subtitles only.

4 years ago | [YT] | 2

Awwal Sahafi

Daljit Ami in conversation with Ranjit Singh Gill about moments of extreme loneliness.
Full Interview: https://youtu.be/LJB2p-Hqdos
ਦਲਜੀਤ ਅਮੀ ਦੀ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਗਿੱਲ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ। ਇਹ ਮੁਲਾਕਾਤ ਬੇਇੰਤਹਾ ਇਕੱਲਤਾ ਦੇ ਪਲਾਂ ਬਾਰੇ ਹੈ ਜੋ ਰਣਜੀਤ ਨੇ ਖਾੜਕੂ ਲਹਿਰ ਅਤੇ ਜੇਲ੍ਹ ਦੌਰਾਨ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡੇ ਉੱਤੇ ਹੰਢਾਏ।

दलजीत अमी, रंजीत सिंह गिल के साथ उनकी ज़िंदगी में आए अकेलेपन के पलों के बारे में मुलाकात कर रहे हैं।

#RanjitSinghGill #KukiGill #DaljitAmi

4 years ago (edited) | [YT] | 25