Sufinama by Rekhta

Welcome to the Sufinama, a gateway to the mystical world of Sufi Bhakti tradition!

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Through captivating videos, enchanting music, and insightful discussions, we invite you to delve deeper into the world of Sufi spirituality and experience the transformative power of love and devotion. ❤️

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सूफ़ीनामा की पूरी टीम की तरफ़ से ईद-उल-अद्'हा की दिली मुबारकबाद ✨

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2 years ago | [YT] | 29

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2 years ago | [YT] | 20

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सूफ़ी कलाम

ऐ तेग़-ए-यार मिल के गले से जुदा न हो
अब रूठने का वक़्त नहीं है ख़फ़ा न हो

वो क्या ख़िराम-ए-नाज़ है जो फ़ित्ना-ज़ा न हो
वो फ़ित्ना क्या है जिस से क़यामत बपा न हो

हुस्न-ओ-वफ़ा का साथ तो ऐ दिल हुआ न हो
मा'शूक़ नाम उसी का है जिस में वफ़ा न हो

मेरी निगाह-ए-यास की इक चोट खा तो ले
बे-दर्द फिर मैं देखूँ कि दर्द-आश्ना न हो

चटका चमन में ग़ुंचा तो बोला झिझक के यार
टूटा कहीं मिरा ही ये बंद-ए-क़बा न हो

~ अमीर मीनाई

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2 years ago | [YT] | 18

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What is the real name of Baba Bulleh Shah?

2 years ago | [YT] | 5

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किसी सूफी संत को ‘सुल्तान-उल-तारीकिन‘ (संन्यासियों के सुल्तान) की उपाधि मिली?

2 years ago | [YT] | 5

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सूफ़ी कलाम

इस ज़ीस्त का ए'तिबार क्या है
कोई दम में ये ज़िंदगी हवा है

गुज़रा है नज़र से एक आ'लम
ये चश्म नहीं है नक़्श-ए-पा है

ज़ालिम टुक इधर तो देख ले तू
कोई पल में ख़ुदा ही जाने क्या है

ढाना तो है दिल के तईं व-लेकिन
तू जान ये ख़ाना-ए-ख़ुदा है

है दीद-ए-फ़ना ही हासिल-ए-चश्म
उ'क़्दा ये हबाब पर खुला है

~ ख़्वाजा मीर दर्द

2 years ago | [YT] | 7

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Darghah Hazrat Makhdoom Shah Vilayat, Maulana Wajihuddin Yusuf RA, Chanderi,M.P.

कहते हैं कि एक बार आप को हज़रत निजामुद्दीन औलिया के दर्शन की लालसा हुई.उस समय हज़रत मौलाना युसूफ़ जहाँ रहते थे वहां से ग़यासपुर 6-7 कोस की दूरी पर स्थित था. उन्होंने अपने घर से अभी कुछ ही क़दम बढ़ाए थे कि मन में विचार आया -ऐ युसुफ़ तुम महबूब ए इलाही से अपने पैरों पर चलकर मिलने जा रहे हो ! अपने पीर से तो मुरीद को सर के बल चलकर मिलने जाना चाहिए !

यह सोचकर उन्होंने कलाबाज़ों की तरह उल्टा होकर चलना शुरू कर दिया. वह अपने मुर्शिद के ध्यान में इतने मगन थे कि सिर्फ़ तीन बार रास्ते में रुके. वह अपने मुर्शिद के ध्यान में सुध बुध भूल चुके थे और ग़यासपुर पहुँचने से पहले ही जमुना के किनारे बेहोश हो गए. जब उन्हें होश आया तो उनके गले दस्तार पड़ी थी और बदन धूल से सना था. उन्होंने मुंह हाथ धोये, अपने कपड़े ठीक किये और महबूब ए इलाही की ख़ानक़ाह में पहुंचे. हज़रत को उनकी इस अनोखी यात्रा की जानकारी मिल चुकी थी.

हज़रत ने आप को ख़िलाफ़त प्रदान की और चंदेरी जाने का हुक्म दिया. कहते हैं एक दिन हज़रत निजामुद्दीन औलिया बड़े प्रसन्न थे. मौलाना युसूफ़ जब वहां पहुंचे और क़दमबोसी की तो हज़रत ने अपने ख़ादिम इक़बाल से फ़रमाया - वह फलों से भरा लकड़ी का बक्सा लेकर आओ. वह बक्सा उन्होंने मौलाना युसुफ़ को भेंट करते हुए फ़रमाया कि यह बक्सा मेरे पास तीस वर्षों से है जिसे आज मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ ! मौलाना युसुफ़ ने अपने कुर्ते को झोली की तरह आगे कर दिया. महबूब ए इलाही ने वह बक्सा उनकी झोली में दाल दिया और दुआ की -ईश्वर करे तुम्हें आजीवन रोटी और दूसरी दुनियावी ज़रूरतों की पूर्ति होती रहे !
हज़रत मौलाना युसूफ़ फ़रमाते हैं कि ऐसा ही हुआ और आजीवन मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं हुई.
हज़रत के आदेशानुसार हज़रत मौलाना युसुफ़ चंदेरी पहुँचे और वहीं आजीवन उपदेश देते रहे. चंदेरी में ही उनका विसाल हुआ. इनकी दरगाह चंदेरी में है.
- सन्दर्भ - सियर उल औलिया

2 years ago | [YT] | 13

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क़व्वाली का सबसे रोचक पक्ष यह है कि हिंदुस्तान में गंगा-जमुनी तहज़ीब की जब नीव डाली जा रही थी, क़व्वाली ने उस काल को भी अपने रस से सींचा है. क़व्वाली ने हिन्दुस्तानी साझी संस्कृति को न सिर्फ़ बनते देखा है बल्कि इस अनोखी संस्कृति के पैराहन में ख़ूबसूरत बेल बूटे भी लगाये हैं और अपने कालजयी संगीत से इस संस्कृति की नीव भी मज़बूत की है. क़व्वालों को यह संस्कृति विरासत में मिली है. क़व्वालों के क़िस्से आज के दौर में इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्यूंकि इन्हों ने हमारी इस गंगा-जमुनी तहज़ीब को अपना स्वर दिया है.


ज़्यादातर क़व्वालों को जहाँ एक सीमित क्षेत्र में ही प्रसिद्धि मिल पायी वहीँ कुछ क़व्वाल ऐसे भी थे जिन्होंने बड़े-बड़े उस्ताद गायकों को भी पीछे छोड़ दिया. 1975 में जब सोने का भाव 520 रूपये प्रति तोला हुआ करता था उस दौर में एक क़व्वाल ऐसे भी थे जिन्होंने कलकत्ता के कला मंदिर में अपने एक प्रोग्राम के लिए 1,80,000 रूपये की राशि ली थी. इनकी प्रसिद्धि का आ’लम यह था कि उनकी राँची यात्रा के दौरान लोगों ने ट्रेन रोक दी थी ताकि इनसे एक बार हाथ मिलाने का मौक़ा’ मिल सके. 1977 में दोबारा झांसी में ट्रेन रोकनी पड़ी और लोगों ने इनका इस्तिक़बाल किया. ये क़व्वाल थे अ’ज़ीज़ नाज़ाँ जिन्हें ‘बाग़ी क़व्वाल’ भी कहा जाता है .

2 years ago | [YT] | 9