LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi


Hi, everyone! Welcome to my YouTube channel LEGAL EYES with ADV M R where I am sharing something new which is useful in daily life.

Friend,
Self awareness is the only key to success in human life. We often spend our life trying to prove ourselves in the absence of knowledge. A large section of the society is still unfamiliar with the legal awareness related to their rights and duties. As a result, our relationship, personal productivity or should we say that our overall personality is getting compromised.
Legal awareness and legal literacy are
the base of any effort toward legal empowerment. Knowledge of legal provisions and procedures will empower people to demand justice, accountability and effective remedies at all levels.
As an Advocate, for this aim , I am making an effort.
If anyone wants me to make a video on any topic of your choice then write on Comment option on any of my videos and I will try to work on it as soon as possible.
Subscribe me .
Rashmimathuradeep@gmail.com


LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

क्या बेटी का पिता की खरीदी हुई संपत्ति में बराबर का अधिकार है?


अगर पिता ने अपनी कमाई से संपत्ति खरीदी थी और बिना वसीयत के उनका निधन हो गया है, तो बेटी का भी बेटों के समान कानूनी अधिकार हो सकता है। विवाह हो जाने या 2004 या 2005 से पहले जन्म होने से यह अधिकार समाप्त नहीं होता।
हालांकि, हर मामला अलग होता है। संपत्ति का प्रकार, वसीयत, उत्तराधिकार और अन्य कानूनी तथ्यों के आधार पर अधिकार तय किए जाते हैं।
⚖️ अपने अधिकार जानिए, लेकिन परिवार में संवाद और समझदारी से समाधान निकालने की कोशिश भी कीजिए।
👉 ऐसे ही कानूनी सवालों के जवाब पाने के लिए channel को Like, share, Subscribe करें।

#LegalAdvice #PropertyRights #Inheritance #DaughterRights #HinduSuccessionAct #LegalAwareness #Law #PropertyDispute #WomenRights #IndianLaw #FacebookReels #InstagramReels #YouTubeShorts

11 hours ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि केवल विवाहित होने के आधार पर किसी बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कल्याणकारी योजनाओं, अनुकंपा नियुक्ति अथवा ऐसे अन्य लाभों के लिए विवाहित बेटियों को अयोग्य ठहराना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता के सिद्धांत के विपरीत।

मामले की पृष्ठभूमि:
इस case में कुलसुम निशा ने अपनी माँ के निधन के बाद उचित मूल्य की दुकान (PDS) के आवंटन का दावा किया।
राज्य अधिकारियों तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनका दावा यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वे विवाहित पुत्री हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को असंवैधानिक मानते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया।

यह निर्णय केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि उन सभी बेटियों के सम्मान, समानता और अधिकारों की पुष्टि है जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक रूढ़ियों के कारण अपने वैधानिक अधिकारों से वंचित किया गया।
Supreme court ने कहा-
"बेटी पराया धन नहीं, परिवार का अभिन्न हिस्सा है।"

— Adv. Mukta Rashmi


📌 Disclaimer: यह पोस्ट केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से है। इसे किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह न माना जाए।

#SupremeCourt #KulsumNisha #Article14 #Article15 #CompassionateAppointment #MarriedDaughter #WomenRights #Equality #LegalAwareness #AdvMuktaRashmi

6 days ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

क्या App से घरेलू सहायिका बुलाना सुरक्षित है?

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आजकल लोग मोबाइल ऐप के माध्यम से घरेलू सहायिका, ड्राइवर, केयरटेकर, कुक या अन्य घरेलू कर्मचारी आसानी से बुक कर लेते हैं। लेकिन  क्या केवल ऐप पर भरोसा कर लेना पर्याप्त है?

इस विषय पर आपकी राय जानना चाहूंगी।
@Ashwini Upadhyay @Bureau of Police Research & Development @Ministry of Home Affairs
#LegalAwareness #DomesticHelp #PoliceVerification #SafetyFirst

1 week ago | [YT] | 1

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

इन महान भारतीय वैज्ञानिकों की प्रेरणादायक यात्रा, जिनकी प्रतिभा को विदेश में सम्मान मिला। लेकिन आरक्षण की धुंध में अंधा भारत पहचान भी न सका। क्योंकि भारत में प्रतिभा, अवसर और आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर विचार करने का कभी प्रयास ही नहीं हुआ।

इस वीडियो का उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय या व्यवस्था के प्रति घृणा या वैमनस्य फैलाना नहीं, बल्कि तथ्यों और इतिहास के आधार पर एक स्वस्थ चर्चा को बढ़ावा देना है।
💬 आपकी क्या राय है? क्या भारत में प्रतिभा और अवसर के बीच बेहतर संतुलन होना चाहिए?
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
👍 ऐसे ही कानूनी और सामाजिक विषयों पर जानकारी के लिए Legal Eyes by Adv. Mukta Rashmi को Follow/Subscribe करें।
@आरक्षण हटाओ देश बचाओ
#Reservation #Talent #India #America #IndianScientist #AdvMuktaRashmi #IndianEducation #History #SocialAwareness

1 week ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

Can a widow legally disinherit her adopted daughter from her deceased husband's self-acquired property?

दरअसल, एक viewer ने यह पूछा है कि क्या एक Widow कानूनी तौर पर अपनी गोद ली हुई बेटी को अपने दिवंगत पति की खुद कमाई हुई संपत्ति यानी Self acquired property से बेदखल कर उसे वापस उसके Biological parent's के पास उस भेज सकती है?

तो Friends इसका उत्तर जानकर आप चौंक सकते हैं।
यदि दत्तक ग्रहण विधिवत और वैध रूप से हुआ है, तो Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956 Section -12 के अनुसार दत्तक संतान, दत्तक माता-पिता की वैधानिक संतान बन जाती है।

* क्या दत्तक पिता की मृत्यु से दत्तक संबंध समाप्त होता है?

उत्तर- नहीं।


* क्या केवल संपत्ति से वंचित करने के लिए दत्तक बेटी को उसके जैविक माता-पिता के पास भेजा जा सकता है?

सामान्यतः नहीं।


* कोर्ट किस बात को सबसे अधिक महत्व देती है?

बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child)।


⚖️ कानून दत्तक ग्रहण को एक स्थायी कानूनी संबंध मानता है। इसे केवल इच्छा बदल जाने, पारिवारिक विवाद या संपत्ति बचाने के उद्देश्य से समाप्त नहीं किया जा सकता।

इस विषय की पूरी कानूनी जानकारी और सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को सरल भाषा में समझने के लिए इस पोस्ट को अवश्य देखें। मैं बहुत जल्द इस मामले से संबंधित एक विस्तृत वीडियो सीरीज शुरू करने वाली हूँ। अगर मामले से सम्बन्धित आपका भी कोई प्रश्न है तो comment box में लिखें।
मैं हर व्यक्तिगत प्रश्नों का सटीक उत्तर देने की कोशिश करूंगी।

अगर पोस्ट उपयोगी लगे तो Like 👍 करें, Share 📲 करें और अपने विचार Comment 💬 में जरूर लिखें।
– Adv. Mukta Rashmi
Legal Eyes by Adv. Mukta Rashmi
#Adoption #AdoptedChild #HinduAdoptionAct #PropertyRights #LegalAwareness #SupremeCourt #IndianLaw #ChildRights #WidowRights

1 week ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

Can a widow legally disinherit her adopted daughter from her deceased husband's self-acquired property?

दरअसल, एक viewer ने यह पूछा है कि क्या एक Widow कानूनी तौर पर अपनी गोद ली हुई बेटी को अपने दिवंगत पति की खुद कमाई हुई संपत्ति यानी Self acquired property से बेदखल कर उसे वापस उसके Biological parent's के पास उस भेज सकती है?

तो Friends इसका उत्तर जानकर आप चौंक सकते हैं।
यदि दत्तक ग्रहण विधिवत और वैध रूप से हुआ है, तो Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956 Section -12 के अनुसार दत्तक संतान, दत्तक माता-पिता की वैधानिक संतान बन जाती है।

* क्या दत्तक पिता की मृत्यु से दत्तक संबंध समाप्त होता है?

उत्तर- नहीं।


* क्या केवल संपत्ति से वंचित करने के लिए दत्तक बेटी को उसके जैविक माता-पिता के पास भेजा जा सकता है?

सामान्यतः नहीं।


* कोर्ट किस बात को सबसे अधिक महत्व देती है?

बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child)।


⚖️ कानून दत्तक ग्रहण को एक स्थायी कानूनी संबंध मानता है। इसे केवल इच्छा बदल जाने, पारिवारिक विवाद या संपत्ति बचाने के उद्देश्य से समाप्त नहीं किया जा सकता।

इस विषय की पूरी कानूनी जानकारी और सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों को सरल भाषा में समझने के लिए इस पोस्ट को अवश्य देखें। मैं बहुत जल्द इस मामले से संबंधित एक विस्तृत वीडियो सीरीज शुरू करने वाली हूँ। अगर मामले से सम्बन्धित आपका भी कोई प्रश्न है तो comment box में लिखें।
मैं हर व्यक्तिगत प्रश्नों का सटीक उत्तर देने की कोशिश करूंगी।

अगर पोस्ट उपयोगी लगे तो Like 👍 करें, Share 📲 करें और अपने विचार Comment 💬 में जरूर लिखें।
– Adv. Mukta Rashmi
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1 week ago | [YT] | 1

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

क्या पत्नी को माता-पिता का सहारा मिलने पर पति की मेंटेनेंस देने की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
जानें ,इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी अपने माता-पिता के साथ रह रही है या उन्हें आर्थिक सहायता मिल रही है, तो केवल इसी आधार पर पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
न्यायालय ने कहा कि पत्नी के माता-पिता की आय या सहायता को पत्नी की स्वयं की आय नहीं माना जा सकता। पत्नी का भरण-पोषण करना पति की कानूनी जिम्मेदारी है और माता-पिता का सहयोग इस जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बन सकता।
इस मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी की मेंटेनेंस याचिका खारिज कर दी थी, जबकि बच्चों के लिए भरण-पोषण राशि निर्धारित की गई थी। हाई कोर्ट ने इस आदेश की समीक्षा करते हुए कहा कि प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर पत्नी के अधिकारों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

लेकिन ध्यान रहे :
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर मामले में पत्नी को स्वतः मेंटेनेंस मिलेगा। मेंटेनेंस का निर्णय पति-पत्नी की आय, परिस्थितियों, साक्ष्यों और कानून के अनुसार कोर्ट द्वारा सुनिश्चित किया जाता है।
📌 इस महत्वपूर्ण फैसले का कानूनी महत्व क्या है?
क्या कोर्ट का यह निर्णय सही है?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
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#इलाहाबादहाईकोर्ट #गुजाराभत्ता #Maintenance #LegalRights #FamilyCourt #WomenRights #LegalEyesByAdvMuktaRashmi #IndianLaw

2 weeks ago | [YT] | 1

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

फर्जी मामलों की आड़ में न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग किसी भी निर्दोष व्यक्ति के जीवन को बर्बाद कर सकता है।
विष्णु तिवारी जैसे कई लोग इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने कथित रूप से झूठे मामले में अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष जेल में बिताए। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस दर्द की झलक है जो Legal procedure में देरी या त्रुटि के कारण पैदा होती है।
👉 सवाल यह नहीं है कि कानून गलत है या सही,
👉 सवाल यह है कि क्या उसका दुरुपयोग रोका जा रहा है?
SC/ST Act का उद्देश्य सामाजिक न्याय और सुरक्षा देना है, लेकिन यदि किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल होता है, तो वह न्याय के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है।
UGC के विरोध में कई बुद्धिजीवी लोगों ने इस विषय पर आवाज उठाते हुए अपनी नौकरी अपने परिवार की जिंदगी दांव पर लगा दी है । ये लोग अपने लिये नहीं लड़ रहे हैं, इनकी लड़ाई हमारे लिए हमारी आने वाली पीढ़ीयों के लिए है।
निर्दोष लोगों को न्याय मिलना उतना ही जरूरी है, जितना पीड़ितों की सुरक्षा।
आवश्यकता है:
निष्पक्ष जांच की
झूठे मामलों में जवाबदेही तय करने की
और न्याय प्रक्रिया को तेज करने की
ताकि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक “नरक समान जीवन” न जीना पड़े।

क्या आप इस बात से सहमत हैं, तो UGC rollback लिख कर अपना समर्थन दीजिए !
#UGCrollback#आरक्षणहटावदेशबचाव

3 months ago | [YT] | 3

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

इतिहास में पहली बार 10 पुलिस पुलिसवालों को फांसी की सज़ा!

जब कानून की नजरों में सब बराबर तो पुलिस से क्यों डरना?
अगर आप सही हैं तो पुलिस और सिस्टम के खिलाफ लड़कर भी जीत हासिल की जा सकती है।
तमिलनाडु की एक ऐसी घटना… जिसने पूरे देश को हिला दिया था …
आज 6 साल बाद… उसपर आया फैसला… पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया है।
वह केस अब अपने अंजाम तक पहुंच गई है।
तमिलनाडु के सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 6 साल बाद आया ऐतिहासिक फैसला, 
जहां कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं था, बल्कि इंसानियत को झकझोर देने वाली घटना थी,जहां एक पिता और बेटे को हिरासत में बेरहमी से पीटा गया और उनकी मौत हो गई।

3 months ago | [YT] | 0

LEGAL EYES by Adv. Mukta Rashmi

सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबे वैवाहिक विवाद को समाप्त करते हुए स्पष्ट किया कि जब वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हों और उनके पुनर्जीवन की कोई संभावना न हो, तो अनावश्यक मुकदमेबाजी को जारी रखना न्याय के हित में नहीं है।
अदालत ने विवाह को समाप्त करते हुए पति द्वारा दायर 80 से अधिक मामलों को निरस्त कर दिया।
पीठ ने पाया कि पति, जो स्वयं एक वकील है, ने गुजारा भत्ता से बचने के उद्देश्य से पत्नी, उसके परिजनों और यहां तक कि उसके वकीलों के खिलाफ भी अनेक मुकदमे दायर किए। अदालत ने इस आचरण को दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधपूर्ण करार देते हुए कड़ी टिप्पणी की।
विवाद के पूर्ण और अंतिम निपटान के लिए न्यायालय ने पति को 5 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि अदा करने का निर्देश दिया। इस राशि में गुजारा भत्ता, बच्चों के पालन-पोषण और लंबित मुकदमों का खर्च शामिल है।
दोनों नाबालिग बच्चों की पूर्ण अभिरक्षा मां को सौंपी गई है, जबकि पिता को सीमित मुलाकात का अधिकार प्रदान किया गया है। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी भी प्रकार की उत्पीड़नात्मक कानूनी कार्यवाही को सहन नहीं किया जाएगा।
यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि न्यायालय वैवाहिक विवादों को अंतहीन कानूनी लड़ाई में बदलने की अनुमति नहीं देगा।

क्या आपको लगता है कि ऐसे मामलों में सख्त फैसले जरूरी हैं? अपनी राय जरूर बताएं 👇
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3 months ago | [YT] | 2