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रामकृष्ण एक दिन गंगा पार कर रहे हैं। बैठे हैं नाव में। अचानक चिल्लाने लगते हैं जोर से, कि मत मारो, मत मारो, क्यों मुझे मारते हो? आस-पास बैठे लोग कोई भी उनको नहीं मार रहे हैं। सब भक्त हैं, उनके पैर छूते हैं, पैर दबाते हैं, उनको कोई मारता तो नहीं। सब कहने लगे, आप क्या कह रहे हैं? कौन आपको मार रहा है? रामकृष्ण चिल्लाये जा रहे हैं। उन्होंने पीठ उघाड़ दी। पीठ पर देखा तो कोड़े के निशान हैं। खून झलक आया है। सब बहुत घबरा गये। रामकृष्ण से पूछा, यह क्या हो गया? किसने मारा आपको? रामकृष्ण ने कहा, वह देखो, वे मुझे मार रहे हैं।
उस किनारे पर मल्लाह एक आदमी को मार रहे हैं कोड़ों से, और उसकी पीठ पर जो निशान बने हैं वे रामकृष्ण की पीठ पर भी बन गये। ठीक वही निशान। और जब तट पर उतर कर भीड़ लग गई है और दोनों के निशान देखे गये हैं तो तय करना मुश्किल हो गया कि कोड़े किसको मारे गये? ओरिजिनल कौन है? रामकृष्ण को चोट ज्यादा पहुंची है मल्लाह से। निशान वही हैं, चोट ज्यादा है। क्योंकि मल्लाह तो विरोध भी कर रहा होगा भीतर से, रामकृष्ण ने तो पूरा स्वीकार ही कर लिया! चोट ज्यादा गहरी हो गई। लेकिन रामकृष्ण के मुख से जो शब्द निकला–“मुझे मत मारो’, इसका मतलब समझते हैं? एक शब्द है हमारे पास, सहानुभूति। यह सहानुभूति नहीं है।
सहानुभूति हिंसक के मन में होती है। वह कहता है, मत मारो उसे। दूसरे को मत मारो। सहानुभूति का मतलब है कि मुझे दया आती है। लेकिन दया सदा दूसरे पर आती है। यह सहानुभूति नहीं है, यह समानुभूति है, यहां रामकृष्ण यह नहीं कह रहे हैं कि “उसे’ मत मारो। रामकृष्ण कह रहे हैं “मुझे’ मत मारो–यहां दूसरा गिर गया!
असल में दूसरे से जो हमारा फासला है वह शरीर का ही फासला है, चेतना का कोई फासला नहीं। चेतना के तल पर दो नहीं हैं। हम दूसरे को बचायें तो वह अहिंसा नहीं हो सकती। हम दूसरे को बचायें, तो वह भी हिंसा ही है। जिस दिन हम ही रह जाते हैं, और बचने को कोई भी नहीं रह जाता, उस दिन अहिंसा फलित होती है।
2 days ago | [YT] | 19
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मेरे मन की होली – कथा संग्रह
वृंदावन की फागुन भरी सुबह थी। मंद-मंद हवा में गुलाल की खुशबू घुली हुई थी। मंदिरों की घंटियाँ बज रही थीं और भक्तों के स्वर में “राधे-राधे” की मधुर ध्वनि गूँज रही थी।
आज कोई साधारण दिन नहीं था। आज वह दिन था जब स्वयं श्रीकृष्ण अपने प्रिय स्वरूप श्रीनाथ जी और करुणामय विठ्ठल देव के रूप में भक्तों के संग होली खेलने वाले थे।
मंदिर के प्रांगण में संत और संन्यासी एकत्र थे। कोई मृदंग बजा रहा था, कोई झांझ। सबकी आँखों में प्रतीक्षा थी—प्रभु के आगमन की। तभी शंखनाद हुआ।
श्रीनाथ जी प्रकट हुए—मोरपंख मुकुट, पीतांबर और अधरों पर मधुर मुस्कान। उनके एक हाथ में गुलाल था। दूसरी ओर विठ्ठल देव, कमर पर हाथ रखे, भक्तों को स्नेह भरी दृष्टि से निहार रहे थे।
एक वृद्ध संत आगे बढ़े। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु! आज हमारे मन की होली खेलिए। बाहर तो हर वर्ष रंग लगते हैं, पर भीतर का मन सूना रह जाता है।”
श्रीकृष्ण मुस्कुराए।
उन्होंने संत के हृदय पर हल्के से गुलाल लगाया और बोले—
“जब प्रेम का रंग चढ़ जाता है, तब मन की होली अपने आप हो जाती है।”
इतना सुनते ही वातावरण बदल गया। अबीर-गुलाल की वर्षा होने लगी। संतगण भजन गाने लगे—
"आज बिरज में होली रे रसिया..."
विठ्ठल देव ने एक बाल-संन्यासी को रंग लगाया और कहा—
“भक्ति का रंग सबसे गाढ़ा होता है, इसे कोई धो नहीं सकता।”
धीरे-धीरे सब भक्त रंगों में भीग गए। पर आश्चर्य! किसी के वस्त्रों का रंग फीका पड़ा, पर मन का रंग और गहरा होता गया।
एक युवा साधक मन ही मन सोच रहा था—
“प्रभु, मेरे भीतर अभी भी अहंकार, क्रोध और द्वेष है।”
तभी श्रीनाथ जी उसके पास आए। उन्होंने उसके माथे पर चंदन लगाया और कहा—
“जिस दिन तुम इन भावों को त्याग दोगे, उसी दिन तुम्हारी सच्ची होली होगी।”
युवा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने अनुभव किया कि आज सचमुच उसके मन में होली खिल उठी है।
संध्या होते-होते रंगों का उत्सव शांत हुआ, पर हृदयों में प्रेम का रंग अमिट हो गया।
उस दिन सबने जाना—
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं,
यह मन को निर्मल करने का उत्सव है।
यह प्रेम का संदेश है।
यह भगवान और भक्त के मधुर मिलन का क्षण है।
और तभी से उस कथा का नाम पड़ा—
🌷🌷 “मेरे मन की होली” 🌷🌷
जहाँ हर वर्ष फागुन में नहीं,
बल्कि हर दिन हृदय में प्रेम के रंग बरसते हैं।
1 week ago | [YT] | 188
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श्री जगन्नाथ प्रसाद भक्तमाली जी
श्री भक्तमाली जी का जन्म सन 1898 ई में मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक छोटे से ग्राम चांचौड़ा में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने जन्म स्थान चांचौड़ा में संपन्न हुई।
भक्ति के प्रबल संस्कार भक्तमाली जी में बचपन से ही थे, अन्य कार्यों को करने के साथ उनकी भक्ति में भी प्रगाड़ता आती जा रही थी।
इनके मौसेरे भाई श्री लक्ष्मी दास जी, जो वृंदावन निवासी थे, कभी-कभी इनको वृंदावन की महिमा एवं कृष्ण चरित्र सुनाते रहते थे। एक दिन दर्शन के लिए लक्ष्मी दास जी इन्हें वृंदावन ले आये। यहां दर्शन अधिक करने के पश्चात हृदय में गुरु बनाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई।
भगवान दास जी टटिया स्थान के महंत के पास पहुंचे और प्रार्थना करके मंत्र दीक्षा दिलवा दी।
एक बार वृंदावन आए और दर्शन के पश्चात जब वापस जाने लगे तो श्री वृंदावन धाम को प्रणाम करते हुए बोले- हे ! श्री धाम वृंदावन अब तो ऐसी कृपा करो कि दास को अपनी शरण में रख लो। ऐसा कहकर भक्तमाली जी चांचौड़ा चले गए ।
श्रीधाम वृंदावन तो कल्प वृक्ष के समान है। यहां जो वस्तु मांगोगे निश्चित ही प्राप्त हो जाएगा। कुछ समय पश्चात भक्तमाली जी पत्नी के सहित श्री धाम वृंदावन में आ गए। टटिया स्थान वृंदावन में कई कुंजे हैं। जिनमें एक कुंज ताड़वाली कुंज है।वहां इन्हें रहने को दे दिया, गुरुदेव श्री भगवान दास जी महाराज ने जो उस समय टटिया स्थान के महंत थे।
वृंदावन का वास करते हुए भक्तमाली जी ने भागवत जी का गहन अध्ययन किया। टोपी कुंज के महंत श्री माधव दास जी ‘भक्तमाली’ से भक्तमाल का अध्ययन किया और अब भागवत व भक्तमाल की कथा सुमधुर कंठ से भाव में डूबकर करने लगे कथा कहते-कहते तन्मय और भाव विभोर हो जाते थे। श्रोता भी भाव समुंदर में डुबकियां खा दूर -दूर से लोग केवल श्री भक्तमाली जी की कथा सुनने के लिए ही आते थे।
कथा में रस बरसता ऐसे। अमृत की धारा हो जैसे ।।
श्री भक्तमाल जी को भक्तमाली जी ने अपना इष्ट ग्रंथ माना । लोग इन्हें भक्तमाली नाम से पुकारने लगे। प्रभु कथा को उन्होंने अपनी जीविका का साधन नहीं बनाया। बल्कि अपनी साधना का एक परम आवश्यक अंग समझा।
एक बार भक्तमाली जी अपने घर में बैठे हुए हरमोनियम बजाते हुए भजन गा रहे थे। भक्तमाली जी का कंठ अत्यंत सुरीला था। भाव में डूबकर भजन गाते समय एक बालक उनके सामने आकर बैठ गया और तन्मय होकर भजन सुनने लगा। अचानक भक्तमाली जी की दृष्टि उस बालक पर पड़ी। बालक को देखकर भक्तमाली जी को लगा कि किसी रसधारी का बालक है। भजन सुनने को चला आया है। भक्तमाली जी ने पूछा -लाला ! आप कहां रहौ ? बालक ने कहा – मैं भतरोड मंदिर में अक्रूर घाट पै रहूँ। भक्तमाली जी ने पूछा – तुम्हारौ काह नाम है ? बालक ने कहा – मेरौ नाम लड्डू गोपाल है। भक्तमाली जी बोले – लड्डू खाओगे कि पेड़ा? बालक ने हंसकर कहा – मैं तो पेड़ा खाउँ गो। संयोग कि भक्तमाली जी के पास पेड़ा ही थे। लड्डू नहीं थे। भक्तमाली जी ने उठकर पेड़ा लाकर दिए और वह बालक पेड़ा खाता हुआ चल दिया। जाते समय पीछे मुड़कर एक बार देखा और मुस्कुरा कर चला गया। वह जादू भरी मुस्कान और तिरछी चितवन ने भक्तमाली जी के हृदय को घायल कर दिया। पूरी रात भक्तमाली जी सोए नहीं। यही विचार करते रहे, ऐसा सुंदर बालक तो कभी देखा नहीं और वह निसंकोच घर के अंदर आकर बैठ गया वह कौन था?
दूसरे दिन प्रातः काल भक्तमाली जी पता लगाने के लिए अक्रूर घाट भतरोड बिहारी मंदिर पहुंचे और मंदिर के पुजारी जी से पूछा – पुजारी जी! यह लड्डू गोपाल नाम का कोई बालक रहता है क्या ? पुजारी जी बोले- लड्डू गोपाल तो मंदिर के ठाकुर जी का नाम है। और यहां पर कोई बालक नहीं रहता । इतना सुनते ही भक्तमाली जी की आंखों में जल की धारा बह चली आंसू पोछते हुए पुजारी जी से कहा – कल मेरे पास एक बालक आया था, उसने अपना नाम लड्डू गोपाल बताया और निवास भतरोड मंदिर। मैंने उसे खाने को पेड़ा दिए और पेड़ा खाकर वह बहुत बहुत प्रसन्न हुआ। कही ये सारी लीला आपके ठाकुर जी की तो नहीं थी ? पुजारी जी बोले – भक्तमाली जी ! आप धन्य हैं। हमारे ठाकुर ने ही आप पर कृपा की इसमें कोई संदेह नहीं है। इन्हें पेड़ा बहुत प्रिय है।
कई दिन से पेड़ा शेष हो गए थे। मैं बाजार नहीं जा पाया था। इसलिए पेड़ों का भोग नहीं लगा सका था। उसकी पूर्ति आपके पास आकर कर ली। तब भक्तमाली जी ने मंदिर में जा कर लड्डू गोपाल के दर्शन किए और प्रार्थना की -ठाकुर ! ऐसे ही कृपा बरसाते रहना। अपने स्थान पर लौट आए।
1984 में इनका निकुन्ज गमन हुआ
1 week ago | [YT] | 168
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नंद बाबा चुपचाप रथ पर कान्हा के वस्त्राभूषणों की गठरी रख रहे थे। दूर ओसारे में मूर्ति की तरह शीश झुका कर खड़ी यशोदा को देख कर कहा- दुखी क्यों हो यशोदा, दूसरे की बस्तु पर अपना क्या अधिकार?
यशोदा ने शीश उठा कर देखा नंद बाबा की ओर, उनकी आंखों में जल भर आया था। नंद निकट चले आये। यशोदा ने भारी स्वर से कहा- तो क्या कान्हा पर हमारा कोई अधिकार नहीं? ग्यारह वर्षों तक हम असत्य से ही लिपट कर जीते रहे?
नंद ने कहा- अधिकार क्यों नहीं, कन्हैया कहीं भी रहे, पर रहेगा तो हमारा ही लल्ला न! पर उसपर हमसे ज्यादा देवकी वसुदेव का अधिकार है, और उन्हें अभी कन्हैया की आवश्यकता भी है।
यशोदा ने फिर कहा- तो क्या मेरे ममत्व का कोई मोल नहीं?
नंद बाबा ने थके हुए स्वर में कहा- ममत्व का तो सचमुच कोई मोल नहीं होता यशोदा। पर देखो तो, कान्हा ने इन ग्यारह वर्षों में हमें क्या नहीं दिया है। उम्र के उत्तरार्ध में जब हमने संतान की आशा छोड़ दी थी, तब वह हमारे आंगन में आया। तुम्हें नहीं लगता कि इन ग्यारह वर्षों में हमने जैसा सुखी जीवन जिया है, वैसा कभी नहीं जी सके थे। दूसरे की वस्तु से और कितनी आशा करती हो यशोदा, एक न एक दिन तो वह अपनी बस्तु मांगेगा ही न! कान्हा को जाने दो यशोदा।
यशोदा से अब खड़ा नहीं हुआ जा रहा था, वे वहीं धरती पर बैठ गयी, कहा- आप मुझसे क्या त्यागने के लिए कह रहे हैं, यह आप नहीं समझ रहे।
नंद बाबा की आंखे भी भीग गयी थीं। उन्होंने हारे हुए स्वर में कहा- तुम देवकी को क्या दे रही हो यह मुझसे अधिक कौन समझ सकता है यशोदा! आने वाले असंख्य युगों में किसी के पास तुम्हारे जैसा दूसरा उदाहरण नहीं होगा। यह जगत सदैव तुम्हारे त्याग के आगे नतमस्तक रहेगा।
यशोदा आँचल से मुह ढांप कर घर मे जानें लगीं तो नंद बाबा ने कहा- अब कन्हैया तो भेज दो यशोदा, देर हो रही है।
यशोदा ने आँचल को मुह पर और तेजी से दबा लिया, और अस्पस्ट स्वर में कहा- एक बार उसे खिला तो लेने दीजिये, अब तो जा रहा है। कौन जाने फिर...
नंद चुप हो गए।
यशोदा माखन की पूरी मटकी ले कर ही बैठी थीं, और भावावेश में कन्हैया की ओर एकटक देखते हुए उसी से निकाल निकाल कर खिला रही थी। कन्हैया ने कहा- एक बात पूछूं मइया?
यशोदा ने जैसे आवेश में ही कहा- पूछो लल्ला।
तुम तो रोज मुझे माखन खाने पर डांटती थी मइया, फिर आज अपने ही हाथों क्यों खिला रही हो?
यशोदा ने उत्तर देना चाहा पर मुह से स्वर न फुट सके। वह चुपचाप खिलाती रही। कान्हा ने पूछा- क्या सोच रही हो मइया?
यशोदा ने अपने अश्रुओं को रोक कर कहा- सोच रही हूँ कि तुम चले जाओगे तो मेरी गैया कौन चरायेगा।
कान्हा ने कहा- तनिक मेरी सोचो मइया, वहां मुझे इस तरह माखन कौन खिलायेगा? मुझसे तो माखन छिन ही जाएगा मइया।
यशोदा ने कान्हा को चूम कर कहा- नहीं लल्ला, वहां तुम्हे देवकी रोज माखन खिलाएगी।
कन्हैया ने फिर कहा- पर तुम्हारी तरह प्रेम कौन करेगा मइया?
अबकी यशोदा कृष्ण को स्वयं से लिपटा कर फफक पड़ी। मन ही मन कहा- यशोदा की तरह प्रेम तो सचमुच कोई नहीं कर सकेगा लल्ला, पर शायद इस प्रेम की आयु इतनी ही थी।
कृष्ण को रथ पर बैठा कर अक्रूर के संग नंद बाबा चले तो यशोदा ने कहा- तनिक सुनिए न, आपसे देवकी तो मिलेगी न? उससे कह दीजियेगा, लल्ला तनिक नटखट है पर कभी मारेगी नहीं।
नंद बाबा ने मुह घुमा लिया। यशोदा ने फिर कहा- कहियेगा कि मैंने लल्ला को कभी दूभ से भी नहीं छुआ, हमेशा हृदय से ही लगा कर रखा है।
नंद बाबा ने रथ को हांक दिया। यशोदा ने पीछे से कहा- कह दीजियेगा कि लल्ला को माखन प्रिय है, उसको ताजा माखन खिलाती रहेगी। बासी माखन में कीड़े पड़ जाते हैं।
नंद बाबा की आंखे फिर भर रही थीं, उन्होंने घोड़े को तेज किया। यशोदा ने तनिक तेज स्वर में फिर कहा- कहियेगा कि बड़े कौर उसके गले मे अटक जाते हैं, उसे छोटे छोटे कौर ही खिलाएगी।
नंद बाबा ने घोड़े को जोर से हांक लगाई, रथ धूल उड़ाते हुए बढ़ चला।
यशोदा वहीं जमीन पर बैठ गयी और फफक कर कहा- कृष्ण से भी कहियेगा कि मुझे स्मरण रखेगा।
उधर रथ में बैठे कृष्ण ने मन ही मन कहा- तुम्हें यह जगत सदैव स्मरण रखेगा मइया- "तुम्हारे बाद मेरे जीवन मे जीवन बचता कहाँ है" ?
लीलायें तो ब्रज में ही छूट जायेंगी...
जय श्री राधे कृष्ण
1 week ago | [YT] | 67
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जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया। पिता की मृत्यु के पश्चात माँ भी चल बसी। कुटुंब में रह गये भाई और भाभियाँ, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। जड़भरत इधर-उधर मजदूरी करते थे। जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहाँ जगह मिलती थी, सो जाया करते थे। सुख-दु:ख और मान-सम्मान को एक समान समझते थे। भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है, तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया। जड़भरत रात-दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे। वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे-कट्टे थे।
एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे। मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई। राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं। रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े। उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी। सेवक उन्हें पकड़कर ले गए।
जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल-संभल कर चलने लगे। उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इसलिए उनके पैर डगमगा उठते थे। इससे राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था। राजा रहूगण ने कहारों से कहा, तुम लोग किस तरह चल रहे हो? संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’
कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज, हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है। इसके पैर रह-रह कर डगमगा उठते हैं।’
राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते? देखने में तो हट्टे-कट्टे मालूम होते हो। क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता? सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूँगा।’
रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूँ। दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’
जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए। उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी। पालकी से उतरकर कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए। कृपया बताइए आप कौन हैं? कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूँ और न कोई ॠषि हूँ। मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। मेरा नाम भरत था। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर-द्वार छोड़ दिया था। मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। किंतु एक मृग शिशु के मोह में फँसकर मैं भगवान को भी भूल गया। मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ।
मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर बड़ा दु:खी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! एक मृगी के बच्चे के मोह में फँसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह शरीर प्राप्त हुआ। यह शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हुए हूँ। मैं दिन-रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूँ, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता।
राजन! इस जगत में न कोई राजा है न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। सब आत्मा ही आत्मा हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म हैं।
‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मानव-जीवन की सार्थकता है। यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’
रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन! मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूँ, वही आप हैं। न कोई गुरु है, न कोई शिष्य। सब आत्मा हैं, ब्रह्म हैं।’
जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे। जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए।
यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है। ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है
1 week ago | [YT] | 64
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उड़त अबीर, गुलाल भर- भर थारी, आयी बृजनारी I
बाँध के पगड़ी , कसकर फेंटा गिरधर मारे पिचकारी II
काहू को बिगरो, गौरा मुखड़ा, काहू की बिगरी सारी I
बृजमण्डल खेले, प्रेम की होरी संग में राधाकुंजबिहारी II
युगलछबि निहार 'वृंदासखी' निजभाग जाऊ बलिहारी I
लाल गुलाल मल दियो मोहन , मैं तो वा पर वारि वारि II🌹
कई जन्मो से खेल रही हूँ जग की होरी, अब खेलु श्याम संग बृजहोरी I
होरी में मोरे संग करे मनमोहन बरजोरी,प्रेम में मैं हो जाऊ अतिबोरी II
सुधबुध मेरी बिसर जाए सब जगत की,निहारु मैं श्यामराधिका गोरी I
'वृंदासखी' छूट जाए सब रंग मेरे,रंगे निज रंग सो मोहे मोहन या होरी II🌹🌹
2 weeks ago | [YT] | 54
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अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥
हे कृपा और सुख के पुंज श्री रामजी! मेरा अत्यंत असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजी के द्वारा सेवित युगल चरण कमलों को अपने नेत्रों से देखा॥
2 weeks ago | [YT] | 186
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पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही॥
रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥
पीली और महीन झँगुली शरीर पर शोभित हो रही है। किलकारी व चितवन बहुत प्रिय लगती है। महाराज दशरथ के आँगन मे विहार करने वाले रूपकी राशि श्री रामचंद्रजी अपनी परछाई देखकर नाचते है॥
2 weeks ago | [YT] | 69
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तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे (संपूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञान के भंडार) भगवान् हैं, वे निरामय (विकाररहित), अजन्मे, व्यापक, अजेय, अनादि और अनंत ब्रह्म हैं।।
2 weeks ago | [YT] | 91
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🔱 भृंगी ऋषि – तीन पैरों वाले अद्भुत शिवभक्त 🔱
#भृंगी ऋषि भगवान शिव के परम अनन्य भक्त माने जाते हैं। उनका जीवन शिव-भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि वे केवल भगवान शिव की ही आराधना करते थे और माता पार्वती को प्रणाम नहीं करते थे।
एक बार जब भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे, तब भी भृंगी ऋषि ने केवल शिव की परिक्रमा करने का निश्चय किया। माता पार्वती ने उन्हें समझाया कि शिव और शक्ति अभिन्न हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है। परंतु भृंगी ऋषि अपने संकल्प पर अडिग रहे।
तब माता ने अपने तेज से उनकी देह का रक्त और मांस भाग खींच लिया, जिससे वे केवल अस्थि-पंजर मात्र रह गए। शरीर में शक्ति न रहने से वे खड़े भी न रह सके। उनकी अटल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें तीसरा पैर प्रदान किया, जिससे वे पुनः स्थिर होकर खड़े हो सके।
इसी कारण उन्हें “तीन पैर वाले भृंगी ऋषि” कहा जाता है। उनका तीसरा पैर शिव-कृपा और अटूट भक्ति का प्रतीक है।
यह कथा यह संदेश देती है कि शिव और शक्ति एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं —
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।
अर्थात् शक्ति के बिना शिव भी स्पंदित नहीं हो सकते।
भृंगी ऋषि हमें सिखाते हैं कि भक्ति दृढ़ हो, परंतु उसमें समत्व और पूर्णता का भाव भी आवश्यक है। शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना ही जीवन में संतुलन और सिद्धि प्रदान करती है।
हर हर महादेव। 🔥
2 weeks ago | [YT] | 117
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