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भारतीय पौराणिक कथाओं में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि देवी के रूप में पूजा जाता है। दक्षिण भारत की जीवनरेखा, 'कावेरी नदी' की उत्पत्ति की कहानी भी भक्ति, दृढ़ संकल्प और लोक-कल्याण की एक अद्भुत मिसाल है। आइए जानते हैं, कैसे एक दिव्य कन्या, दक्षिण भारत की 'गंगा' बन गई।
✨ विष्णु की भक्ति और राजा कावेर का वरदान
कथाओं के अनुसार, ब्रह्मदेव की मानस पुत्री, 'विशमाया', भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर, विष्णु जी ने उन्हें वरदान दिया कि वे अगले जन्म में राजा 'कावेर' की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी और अंततः उनके चरणों की सेवा करेंगी।
इधर, ब्रह्मगिरि पर्वत पर राजा कावेर संतान प्राप्ति के लिए तपस्या कर रहे थे। वरदान स्वरूप उन्हें वही दिव्य कन्या प्राप्त हुई, जिनका नाम 'कावेरी' रखा गया। बचपन से ही कावेरी के मन में संसार के दुखों को दूर करने और प्यासी धरती को तृप्त करने की गहरी इच्छा थी।
💍 महर्षि अगस्त्य से विवाह और एक अनूठी शर्त
उस समय दक्षिण भारत भयानक सूखे से जूझ रहा था। जब महान महर्षि अगस्त्य ने कावेरी की दिव्य आभा और भक्ति को देखा, तो उन्होंने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। कावेरी ने यह प्रस्ताव स्वीकार तो किया, लेकिन एक अनूठी शर्त के साथ:
"हे मुनि, यदि आप मुझे कभी भी अकेला छोड़कर कहीं दूर जाएंगे, तो मैं स्वतंत्र होकर बहने के लिए आज़ाद होंगी।"
अगस्त्य मुनि ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया।
🤔 इंद्र की योजना और गणेश जी की चतुरता
सूखे की समस्या विकराल थी। भगवान इंद्र और अन्य देवता चाहते थे कि कावेरी एक नदी के रूप में बहें ताकि लोक-कल्याण हो सके। एक दिन, महर्षि अगस्त्य भगवान विष्णु के ध्यान में इतने मग्न हो गए कि वे कावेरी को अपने कमंडल में सुरक्षित रखकर स्नान के लिए चले गए।
यही वह क्षण था जिसका देवताओं को इंतज़ार था। उन्होंने भगवान गणेश से सहायता माँगी। गणेश जी ने एक छोटे कौवे का रूप धारण किया और अगस्त्य मुनि के कमंडल पर जाकर बैठ गए। जब मुनि ने कौवे को हटाने के लिए हाथ हिलाया, तो कौवे ने चतुराई से कमंडल को पलट दिया।
🌊 कावेरी का नदी रूप में प्राकट्य
जैसे ही कमंडल का पवित्र जल धरती पर गिरा, कावेरी ने एक विशाल, कल-कल करती नदी का रूप ले लिया और ढलान की ओर बहने लगीं। जब अगस्त्य मुनि को यह ज्ञात हुआ, तो वे क्रोधित होकर कौवे के पीछे भागे, लेकिन तभी गणेश जी ने अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिए और समझाया कि यह सब लोक-कल्याण और सूखे को समाप्त करने के लिए हुआ है।
कावेरी ने अपनी शर्त याद दिलाई और कहा कि अब वे नदी के रूप में जन-जन की प्यास बुझाएंगी। अगस्त्य मुनि ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया।
🙏 कावेरी का महत्त्व: तालकावेरी से श्रीरंगम तक
आज भी कर्नाटक के कोडागु जिले में 'तालकावेरी' वह पवित्र स्थान है, जहाँ से यह नदी निकलती है। हर साल अक्टूबर में 'तुला संक्रमण' के अवसर पर, माना जाता है कि यहाँ के कुंड में पानी अचानक ऊपर की ओर उछलता है, जो देवी कावेरी का साक्षात प्राकट्य है।
कावेरी को दक्षिण में गंगा के समान पूजा जाता है। और एक दिलचस्प बात - उनकी भगवान के चरणों के पास रहने की इच्छा भी पूरी हुई, क्योंकि प्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर (भगवान विष्णु का निवास) इसी नदी के किनारे स्थित है।
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2 days ago | [YT] | 54
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जब उद्धव ने भगवान कृष्ण से पूछा: "आप द्रोपदी चीरहरण के समय चुप क्यों रहे?"
एक बार उद्धव जी ने भगवान श्री कृष्ण से मित्रता और धर्म पर एक बहुत ही तीखा प्रश्न पूछा। यह संवाद हम सभी के जीवन के लिए एक बड़ा सबक है।
उद्धव का प्रश्न:
"हे कृष्ण! आप तो अंतर्यामी हैं। आपने कहा कि सच्चा मित्र वही है जो बिना मांगे मदद करे। फिर आप पांडवों के संकट के समय चुप क्यों रहे?
आपने युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नहीं रोका?
आपने पासे को धर्मराज के पक्ष में क्यों नहीं पलटा?
जब द्रोपदी को भरी सभा में घसीटा गया, तब भी आप नहीं आए।
आप तब आए जब दुशासन उनका चीर हरण करने लगा। इतनी देरी क्यों? क्या यही सच्ची मित्रता है?"
भगवान कृष्ण का उत्तर (कर्म और विवेक का सिद्धांत):
भगवान मुस्कुराए और बोले, "उद्धव, विजय उसी की होती है जो विवेक से काम लेता है। दुर्योधन के पास विवेक था, उसने शकुनि को अपनी ओर से खेलने दिया। धर्मराज युधिष्ठिर भी विवेक से काम लेकर मुझे अपनी ओर से खेलने को कह सकते थे। सोचो, अगर शकुनि और मैं खेलते तो कौन जीतता?"
भगवान को 'बाँध' दिया गया:
"धर्मराज ने मुझसे प्रार्थना की थी कि मैं तब तक सभाकक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए। वे मुझसे छुपकर जुआ खेलना चाहते थे। मैं उनकी प्रार्थना से बंधा हुआ बाहर प्रतीक्षा कर रहा था। जब वे हारते गए, तो उन्होंने मुझे नहीं, बल्कि भाग्य को कोसा।"
द्रोपदी की पुकार:
"जब दुशासन द्रोपदी को सभा में लाया, तब तक उसने मुझे नहीं पुकारा। जब उसकी स्वयं पर से निर्भरता टूटी और उसने 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा' कहकर मुझे पुकारा, मैं उसी क्षण वहां पहुँच गया। बताओ उद्धव, मेरी गलती कहाँ थी?"
साक्षी भाव:
उद्धव ने फिर पूछा, "क्या आप तभी आएंगे जब बुलाया जाएगा? क्या आप स्वतः मदद नहीं करेंगे?"
कृष्ण बोले, "उद्धव, सृष्टि कर्मफल के सिद्धांत पर चलती है। मैं हस्तक्षेप नहीं करता, मैं केवल 'साक्षी' हूँ। मैं हर क्षण तुम्हारे साथ रहकर सब देखता हूँ। यही मेरा धर्म है।"
उद्धव का कटाक्ष और अंतिम सत्य:
उद्धव बोले, "वाह! तो हम पाप करते रहें और आप बस देखते रहेंगे?"
भगवान ने अंतिम सत्य कहा: "उद्धव, जब तुम यह अनुभव कर लोगे कि मैं हर क्षण तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हें देख रहा हूँ, तो क्या तुम पाप कर सकोगे? तुम पाप तभी करते हो जब मुझे भूल जाते हो और सोचते हो कि कोई नहीं देख रहा। युधिष्ठिर की भी यही भूल थी।"
निष्कर्ष:
उद्धव जी अभिभूत हो गए। यह संवाद हमें सिखाता है कि पाप हम तभी करते हैं जब भगवान को भूल जाते हैं। अगर हम हर पल उनकी उपस्थिति महसूस करें, तो हमारा जीवन पापमुक्त और दिव्य हो जाएगा।
|| हरे कृष्ण ||
3 days ago | [YT] | 78
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श्री घमण्ड देव जी की यह कथा ब्रज के भक्ति साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है। यह कहानी सिखाती है कि कैसे एक अहंकारी विद्वान, राधा नाम के प्रभाव से एक परम भक्त बन गया।
श्री घमण्ड देव जी की दिव्य कथा
1. एक अहंकारी विद्वान का आगमन
घमण्ड देव जी दक्षिण भारत के एक बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हें शास्त्रों, व्याकरण और तर्कशास्त्र का इतना ज्ञान था कि वे पूरे भारत में विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराकर 'विजय पत्र' इकट्ठा करते थे। उनके मन में अपनी विद्या का बहुत अहंकार था, इसलिए लोग उन्हें इसी नाम से जानने लगे।
2. श्री हरिव्यास देव जी से भेंट
अपनी विजय यात्रा के दौरान वे वृंदावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने निम्बार्क संप्रदाय के महान संत श्री हरिव्यास देव जी की ख्याति सुनी। घमण्ड देव जी उनके पास पहुँचे और अहंकार के साथ शास्त्रार्थ की चुनौती दी।
संत हरिव्यास देव जी बहुत सरल थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा— "हे विद्वान! मुझे तर्क-वितर्क नहीं आता। मैं तो बस अपने प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) के नाम में डूबा रहता हूँ। अगर आपको जीतना है, तो ये लीजिए मेरा हार स्वीकार करने वाला पत्र, मुझे हराना बहुत आसान है।"
3. मृत कौवे का चमत्कार
घमण्ड देव जी को लगा कि ये संत डर गए हैं। लेकिन उसी समय एक विचित्र घटना घटी। रास्ते में एक मरा हुआ कौवा पड़ा था। हरिव्यास देव जी ने अपनी तुलसी की कंठी (माला) उतारी और उस मृत कौवे के गले में डाल दी और धीरे से उसके कान में "राधे-राधे" कहा।
सबके देखते ही देखते वह मरा हुआ कौवा जीवित हो उठा, पंख फड़फड़ाने लगा और "राधे-राधे" जैसी ध्वनि निकालता हुआ आकाश में उड़ गया।
4. अहंकार का नाश और शरणागति
यह दृश्य देखकर घमण्ड देव जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें समझ आ गया कि जिस विद्या पर उन्हें गर्व था, वह एक पक्षी को प्राण नहीं दे सकती, लेकिन राधा नाम में वह शक्ति है जो मृत को भी जीवित कर दे।
वे तुरंत संत के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने अपने सारे 'विजय पत्र' फाड़ दिए और रोते हुए बोले— "महाराज! मेरा नाम तो 'घमण्ड' था, पर आज मेरा सारा घमंड चूर हो गया। मुझे अपनी शरण में ले लीजिए।"
5. अंजनि कुंड पर वास
दीक्षा लेने के बाद वे बरसाना के पास अंजनि कुंड पर रहने लगे। अब उनका "घमंड" अपनी विद्या पर नहीं, बल्कि अपनी "किशोरी जी" (राधा रानी) की सेवा पर था। कहा जाता है कि जब वे भजन करते थे, तो वन के हिंसक पशु जैसे शेर और चीते भी उनके पास शांत होकर बैठ जाते थे।
सीख
"विद्या ददाति विनयम" — विद्या विनय देती है। लेकिन यदि विद्या अहंकार पैदा करे, तो वह बंधन बन जाती है। भक्ति उस बंधन को काटकर हृदय को सरल बना देती है।
3 days ago | [YT] | 143
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श्री हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं | #hanumanjayanti #sankatmochan #hanuman #hanumanjanmotsav #हनुमानजन्मोत्सव #हनुमान #जन्मोत्सव #birthday #hanumanchalisa
4 days ago | [YT] | 108
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हनुमान जयंती विशेष
हनुमान जी के बचपन की यह घटना जितनी रोमांचक है, उतनी ही सीख देने वाली भी है। यह कहानी हमें बताती है कि अत्यधिक शक्ति और चंचलता कभी-कभी संकट का कारण भी बन सकती है।
जब देवताओं ने हनुमान जी को अजेय होने के वरदान दिए, तो उनकी शक्ति और ऊर्जा असीमित हो गई। अब वह केवल एक साधारण वानर बालक नहीं थे, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली प्राणी बन चुके थे। लेकिन थे तो वह आखिर एक बालक ही, और स्वभाव से अत्यंत चंचल!
हनुमान जी अक्सर ऋषियों के आश्रमों में चले जाते थे। वहाँ ऋषि-मुनि शांति से यज्ञ और तपस्या में लीन रहते थे। नन्हे हनुमान अपनी शक्तियों का प्रयोग करके कभी ऋषियों की दाढ़ी खींच देते, कभी उनके कमंडल का जल उलट देते, तो कभी उनके वल्कल (पेड़ों की छाल के वस्त्र) पेड़ों पर टांग देते।
ऋषिगण जानते थे कि यह बालक भगवान शिव का अंश है और पवन देव का पुत्र है, इसलिए वे उन पर क्रोध नहीं करते थे। लेकिन हनुमान जी की शरारतें दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थीं। वह अपनी शक्ति के मद में इतने मगन थे कि बड़े-बड़े पर्वतों को खिलौनों की तरह फेंक देते थे।
एक बार हनुमान जी ने एक परम तपस्वी ऋषि के आश्रम में बहुत अधिक उत्पात मचाया। उन्होंने ऋषि के यज्ञ की वेदी को भंग कर दिया और उनके पवित्र कुश-आसन को आकाश में उड़ा दिया।
ऋषि ने देखा कि यह बालक अपनी शक्तियों का सही उपयोग नहीं समझ पा रहा है। उन्हें आभास हुआ कि यदि हनुमान अपनी शक्तियों को इसी तरह अनियंत्रित रखेंगे, तो संसार में व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो जाएगा। साथ ही, हनुमान जी का असली उद्देश्य प्रभु श्री राम की सेवा करना था, जिसके लिए उनमें विनम्रता और धैर्य का होना अनिवार्य था।
तब उन तेजस्वी ऋषि ने हनुमान जी को एक 'हितकारी श्राप' दिया:
"हे अंजनीपुत्र! तुम्हें अपनी इन शक्तियों का इतना अहंकार है कि तुम मर्यादा भूल रहे हो। जाओ, मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम अपनी समस्त शक्तियों और पराक्रम को भूल जाओगे। तुम्हें अपनी शक्ति का आभास तब तक नहीं होगा, जब तक कोई अन्य तुम्हें तुम्हारी शक्तियों की याद न दिलाए।"
श्राप मिलते ही हनुमान जी एक साधारण वानर बालक की तरह शांत हो गए। उनके भीतर का सारा कोलाहल थम गया। उन्हें याद ही नहीं रहा कि वह सूर्य को निगल सकते हैं या समुद्र लांघ सकते हैं।
यही कारण था कि जब रावण माता सीता का हरण करके ले गया, तब भी हनुमान जी चुपचाप ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव के साथ बैठे रहे। उन्हें नहीं पता था कि वह अकेले ही पूरी लंका को भस्म करने का सामर्थ्य रखते हैं।
सालों बाद, जब वानर सेना समुद्र तट पर पहुँची और विशाल समुद्र को देख कर सब हताश हो गए, तब वृद्ध और बुद्धिमान जामवंत जी ने हनुमान जी को एकांत में बुलाया। जामवंत जी हनुमान जी के जन्म और उनके पराक्रम के साक्षी थे। उन्होंने हनुमान जी से कहा:
"कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहीं होइ तात तुम्ह पाहीं।"
(हे तात! संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो आप नहीं कर सकते?)
जैसे ही जामवंत जी ने हनुमान जी को उनके बचपन की कहानियाँ सुनाईं और उनके 'पवनपुत्र' होने की याद दिलाई, ऋषि का श्राप समाप्त हो गया। हनुमान जी का शरीर पर्वत जैसा विशाल होने लगा, उनकी आँखों में तेज आ गया और उन्होंने गर्जना करते हुए समुद्र लांघने की तैयारी की।
यह श्राप वास्तव में एक वरदान साबित हुआ, क्योंकि इसने हनुमान जी को अहंकार से मुक्त कर दिया और उन्हें 'परम भक्त' बनने के योग्य बनाया।
6 days ago | [YT] | 121
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जनाबाई एक सेविका थीं। उनका सौभाग्य था कि वे संत नामदेव के घर में परिचारिका का कार्य करती थीं। पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन मांजना, कपड़े धोना और चक्की पीसना उनका नित्यकर्म था।
संत के घर में सदैव भगवान का भजन-कीर्तन होता था और भक्ति की अविरल सरिता बहती थी। धीरे-धीरे जनाबाई भी इस सरिता में स्नान करने की अभ्यस्त हो गईं और उनके मन-प्राणों के द्वार खुल गए।
भक्ति का प्रवाह अंतर्मन तक होने लगा। अब तो जनाबाई के मुख से ही नहीं, अपितु उनके प्राणों से भी निरंतर पवित्र भगवन्नाम का उच्चारण होने लगा। एक बार एकादशी के दिन संत नामदेव जी के यहाँ भक्तमंडली एकत्रित हुई थी।
पूरी रात भगवान विट्ठल का कीर्तन चलता रहा। दिनभर व्रत के कारण जनाबाई ने अन्न ग्रहण नहीं किया था। भक्तजन कीर्तन करते रहे और जनाबाई एक कोने में बैठकर प्रेमाश्रु बहाती रहीं।
अंततः भजन समाप्त हुआ और जनाबाई अपने विश्राम स्थल पर लौट गईं। रातभर की थकान के कारण अगले दिन उन्हें उठने में विलंब हो गया। जब नींद खुली, तो वे हड़बड़ाकर उठ बैठीं और शीघ्र ही नित्यकर्म से निवृत्त होकर संत नामदेव के घर पहुँचीं। उन्होंने झाड़ू लगाई, बर्तन मांजे और फिर कपड़े धोने के लिए पास ही बहती चंद्रभागा नदी के तट पर पहुँचीं।
कपड़े धोते-धोते उन्हें स्मरण आया कि जिस कक्ष में कीर्तन होता है, उसे व्यवस्थित करना तो वे भूल ही गईं। कपड़े जल में भिगोए जा चुके थे, इसलिए उन्हें छोड़कर जाना संभव नहीं था। जनाबाई का हृदय अपने आराध्य के लिए उचित व्यवस्था न कर पाने के ग्लानि भाव से भर उठा। भक्त के मन की पीड़ा भगवान तक शीघ्र पहुँच जाती है और वे तत्काल कोई न कोई उपाय करते हैं।
जनाबाई चिंतामग्न बैठी थीं कि तभी एक वृद्धा वहाँ आई और पूछा, "पुत्री, तुम किस सोच में डूबी हो?" जनाबाई ने अपनी सारी व्यथा कह सुनाई। वृद्धा ने कहा, "तुम जाकर कीर्तन वाला कक्ष ठीक कर आओ, तुम्हारे कपड़े मैं धो देती हूँ।"
जनाबाई को मानो संजीवनी मिल गई। उन्होंने कहा, "माता! आप कष्ट न करें, बस आप यहाँ उपस्थित रहें, मैं अभी कार्य पूर्ण करके आती हूँ।"
जनाबाई के पास इतना समय नहीं था कि वे सोचतीं कि यह वृद्धा कौन है और उसने उनकी व्यथा इतनी सहजता से कैसे जान ली। वे तुरंत भागीं और कक्ष की व्यवस्था कर उल्टे पाँव नदी तट पर लौटीं।
तभी उन्होंने दूर से देखा कि वह वृद्धा जा रही थी और सारे कपड़े धुलकर सूख रहे थे। 'कपड़े धुल भी गए और सूख भी गए? इतनी जल्दी यह कैसे संभव हुआ?' जनाबाई तुरंत उस वृद्धा के पीछे दौड़ीं और उन्हें रोकने का प्रयास किया।
तभी उन्हें ठोकर लगी और वे गिर पड़ीं। क्षण भर के लिए उनकी दृष्टि ओझल हुई और वह वृद्धा लुप्त हो गई, किंतु गीली मिट्टी पर उनके चरणों के चिन्ह शेष थे। जनाबाई तुरंत संत नामदेव जी के घर पहुँचीं जहाँ सभी भक्त एकत्र थे। उन्होंने यह अद्भुत घटना सबको सुनाई और सभी ने आकर उन चरण-चिन्हों के दर्शन किए।
उस मंडली में बड़े-बड़े संत और महात्मा थे; वे तुरंत पहचान गए कि ये साक्षात महामाया (जगदंबा) के चरणों के निशान हैं। नामदेव जी ने कहा, "जनाबाई, तुम धन्य हो! जिसके लिए स्वयं माता ने आकर कपड़े धोए।"
इस घटना के पश्चात जनाबाई की अवस्था ही बदल गई। वे भक्ति में इतनी लीन रहने लगीं कि उनके रोम-रोम से सदैव भगवन्नाम गुंजायमान होने लगा। इसके बाद तो यह नित्य की बात हो गई। घर का काम करते-करते जनाबाई अक्सर भाव-विह्वल हो जाती थीं। नटखट नागर प्रभु विट्ठल तो बस इसी अवसर की प्रतीक्षा में रहते थे।
जैसे ही जनाबाई प्रेमवश अपनी सुध-बुध खोतीं, भगवान स्वयं आकर उनका कार्य करने लगते। कभी चक्की पीस देते, तो कभी अन्य कार्य कर देते। जब जनाबाई का भावावेश समाप्त होता, तो वे देखतीं कि कार्य पूर्ण हो चुका है।
इन्हीं प्रसंगों का वर्णन करते हुए मराठी संतों ने लिखा है— “जनी संगे दळिण दळि चक्रपाणि” अर्थात् करुणामय प्रभु स्वयं जनाबाई के साथ चक्की पीसते थे।
इसीलिए गीता में भगवान ने कहा है:
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
(जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य निरंतर मुझमें स्थित भक्तों का योगक्षेम (आवश्यकताओं की पूर्ति और रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।)
1 week ago | [YT] | 166
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श्रीनाथजी अपने अंतरंग सखाओं के माध्यम से समय-समय पर अपनी लीलाएँ प्रकट करते रहे हैं। कुंभनदासजी का यह प्रसंग सूरदासजी की लीलाओं से अलग होते हुए भी उन्हीं के समान दिव्य है।
एक दोपहर, कुंभनदासजी अपने खेत की झोपड़ी के बाहर शांति से बैठे थे। श्रीनाथजी राजभोग के बाद उनके साथ खेलने के लिए पधारे। प्रभु अभी कुछ कहना ही चाह रहे थे कि अचानक राजा मानसिंह वहाँ आ पहुँचे। प्रभु की लीला में विघ्न पड़ा और श्रीनाथजी तुरंत पास के एक पेड़ के पीछे छिप गए।
राजा की उपस्थिति कुंभनदासजी को बहुत अखरने लगी। राजा उनके कीर्तनों से मंत्रमुग्ध होकर उन्हें कुछ धन-संपत्ति भेंट करना चाहते थे, लेकिन विरक्त कुंभनदासजी उन्हें टालने की कोशिश कर रहे थे। काफी देर के प्रयास के बाद, जब राजा को लगा कि कुंभनदासजी कुछ स्वीकार नहीं करेंगे, तो वे निराश होकर लौट गए। कुंभनदासजी ने राहत की सांस ली। आखिर जिसे स्वयं साक्षात् 'ब्रह्म' का सान्निध्य प्राप्त हो, उसे सांसारिक धन की क्या चाह?
यह प्रसंग एक भक्त की परीक्षा मात्र था, जिसमें श्रीनाथजी ने यह गहरा संदेश दिया:
"यदि एक बार मेरा आश्रय ले लिया, तो फिर मन से भी किसी दूसरे का सहारा मत ढूँढना। तभी मैं पूर्णतः तुम्हारा होकर रहूँगा। मुझे चाहने वाले तो बहुत हैं, लेकिन जिसे 'मैं' चाहूँ, ऐसा अनन्य भक्त करोड़ों में कोई एक कुंभनदास जैसा ही होता है।"
जैसे ही राजा की पीठ फिरी, श्रीनाथजी पेड़ के पीछे से दौड़कर आए और कुंभनदासजी की गोद में जा बैठे।
श्रीनाथजी: "कुंभना! तू अचानक इतना बेचैन क्यों हो गया था? तेरे मन में क्या चल रहा है, मुझे बता?"
कुंभनदासजी: "लाला, मेरी आँखों से तू कभी ओझल मत होना। तेरे बिना एक पल भी युगों जैसा लगता है। मैं चाहता हूँ कि जब तक मेरे प्राण हैं, मेरी दृष्टि सिर्फ तुझ पर रहे। मैं किसी दूसरे का विचार तक न करूँ, बस तेरे सुख का ही चिंतन करूँ। तू ही मेरा सर्वस्व है। ये राजा-महाराजा मुझे अपने दरबारों में क्यों बुलाते हैं? मुझे उनकी कोई आवश्यकता नहीं है।"
यह सुनकर भावविभोर होकर श्रीनाथजी ने कुंभनदासजी को गले लगा लिया। जिनके चरणों की धूल के लिए ऋषि-मुनि तरसते हैं, वे स्वयं अपने भक्त की गोद में समा गए।
श्रीनाथजी: "कुंभना, जैसा तू चाहता है वैसा ही होगा। तेरी इच्छा ही मेरी इच्छा है। अब मेरी बात सुन, मैं यहाँ एक प्रतियोगिता की बात करने आया था। आज सभी सखाओं में शर्त लगी है कि सबके घर से अलग-अलग पकवान आएंगे और हम दावत करेंगे। जिसकी सामग्री सबसे स्वादिष्ट होगी, वही जीतेगा। क्या तू इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेगा?"
कुंभनदासजी: "लाला, जिस खेल को शुरू करने वाला भी तू है और उसका आनंद लेने वाला भी तू, उसमें मैं भला पीछे क्यों रहूँ? बता, तुझे सबसे ज्यादा क्या पसंद है?"
1 week ago | [YT] | 166
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रामलला का सूर्य तिलक 🙏🙏
1 week ago | [YT] | 103
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चैत्र नवरात्र के सप्तम दिवस पर आज प्रभु श्रीरामलला सरकार के दिव्य दर्शन
On the seventh day of Chaitra Navratri, today, divine darshan of Prabhu Shri Ramlalla Sarkar
1 week ago | [YT] | 33
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#जय_श्री_भोलेनाथ
‼️द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र
🌹हर हर महादेव🌹
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मल्लिकार्जुनं!
ॐ उज्जयिन्यां महाकालं ओमकारं ममलेश्वरं!!
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं!
सेतुबंधे तू रामेशं नागेशं दारुकावने!!
वाराणस्यां तू विश्वेशं त्र्यंबकं गौतमी तटे!
हिमालये तू केदारं धृष्णेशं तू शिवालये!!
एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः!
सप्तजन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति!!
भावार्थ:-
सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्री शैलम में मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाल, ओंकारेश्वर में ममलेश्वर (अमलेश्वर), परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक क्षेत्र में भीमशंकर, सेतुबंध पर रामेश्वर, दारूकावन में श्री नागेश्वर, वाराणसी में काशी विश्वनाथ, गोदावरी तट पर (गौतमी) त्र्यंबकेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, शिवालय में धृष्णेश्वर का स्मरण करें। जो मनुष्य इस स्तोत्र का सायंकाल-प्रातःकाल स्मरण करता/करती है, उसके सात जन्मों के पापों का विनाश हो जाता है। साथ ही जो भक्त बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करने में असमर्थ हो, फिर भी इस स्तोत्र के पठन-मात्र से वह द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन का फल प्राप्त करता/करती है!
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🪷जय भोलेनाथ🪷
#Highlights #all #fypジ
#Everyone #Followers #Nonfollower #Friends #Fouryou
1 week ago | [YT] | 106
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