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वृंदावन के एक सीधे-सरल संत थे जगन्नाथ दास। वे बांके बिहारी को साक्षात अपना मित्र मानते थे। एक रात बहुत ठंड थी, तो उन्होंने अपनी फटी हुई शाल बिहारी जी के विग्रह पर उड़ा दी और मंदिर के कोने में सो गए।
सुबह जब पुजारी ने कपाट खोले, तो देखा कि बिहारी जी के गले में संत की फटी शाल थी और संत के हाथ में बिहारी जी की बहुमूल्य सोने की अंगूठी थी। पुजारी ने पहले तो संत पर चोरी का आरोप लगाया, लेकिन रात में बिहारी जी ने पुजारी को सपने में आकर कहा, "मेरा मित्र ठंड में ठिठुर रहा था, मैंने ही उसे अपनी अंगूठी प्रेमवश दी है।"
1 week ago | [YT] | 303
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प्राचीन काल में एक गरीब ब्राह्मण की बेटी थी, जो बहुत संस्कारी थी लेकिन उसकी शादी नहीं हो पा रही थी। एक साधु ने उसे बताया कि पास के गाँव में एक 'सोना धोबिन' (गुणवती) रहती है। यदि वह अमावस्या के दिन उसके घर जाकर उसकी सेवा करे और उसका आशीर्वाद पाए, तो उसका विवाह तय हो जाएगा।
लड़की ने ऐसा ही किया। बिना बताए सुबह-सुबह धोबिन का घर बुहारना और साफ करना शुरू कर दिया। जब धोबिन को पता चला, तो वह खुश हुई और उसने सोमवती अमावस्या के दिन लड़की को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। उसी समय लड़की का विवाह तय हो गया। यह कथा सिखाती है कि सोमवती अमावस्या के दिन निस्वार्थ सेवा और पीपल पूजा से जीवन के सारे कष्ट दूर होते हैं।
1 week ago | [YT] | 103
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प्राचीन काल की बात है, जब ब्रह्मा जी ने काल-गणना का निर्माण किया। उन्होंने सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष का संतुलन बनाने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीने का प्रावधान किया, जिसे 'अधिक मास' कहा गया। सूर्य संक्रांति न होने के कारण इस महीने को 'मलमास' कहकर पुकारा जाने लगा।
चूंकि इस महीने का कोई स्वामी ग्रह या देवता नहीं था, इसलिए संसार के समस्त मनुष्यों, ऋषियों और यहाँ तक कि देवों ने भी इसे अपवित्र और त्याज्य मान लिया। इस महीने में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य—जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या यज्ञ—वर्जित कर दिए गए। हर कोई इस महीने की निंदा करता था।
अपने इस तिरस्कार से दुखी होकर अधिक मास एक साकार रूप धारण करके रोता हुआ वैकुंठ धाम में भगवान विष्णु के पास पहुँचा। अधिक मास अत्यंत भावुक होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ा और बोला, "हे जनार्दन! हे त्रिलोकीनाथ! मेरा क्या अपराध है? ब्रह्मा जी ने मुझे बनाया, लेकिन संसार मुझे 'मलमास' कहकर मेरा उपहास उड़ाता है। कोई भी शुभ कार्य मुझमें नहीं किया जाता। मैं देवताओं और पितरों की पूजा से भी वंचित हूँ। ऐसी स्थिति में मेरे अस्तित्व का क्या लाभ? मुझे इस अपमानित जीवन से मुक्ति दीजिए, अन्यथा मैं स्वयं को समाप्त कर लूँगा।"
अधिक मास को अत्यंत पीड़ित देखकर करुणामयी भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा। वे उसे सांत्वना देते हुए बोले, "हे अधिक मास! धीरज रखो। जो संसार द्वारा ठुकरा दिया जाता है, उसे मैं अपनाता हूँ। आज से तुम अनाथ नहीं हो। मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ। आज से संसार तुम्हें 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जानेगा।"
भगवान विष्णु ने आगे कहा, "मैं तुम्हें अपने दिव्य गुणों के समान ही पूजनीय बनाता हूँ। जो फल मनुष्यों को वर्षों की तपस्या, कठिन यज्ञ और तीर्थ यात्राओं से नहीं मिलता, वह फल इस महीने में केवल मेरी भक्ति, दीपदान, और सात्विक कर्म करने से प्राप्त होगा। इस महीने में की गई छोटी से छोटी पूजा भी अक्षुण्ण फल देगी।" भगवान विष्णु के इस वरदान से अधिक मास का गौरव ब्रह्मांड में सर्वोच्च हो गया।
बाद में, द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया, तब उन्होंने पांडवों को उनके अज्ञातवास और वनवास के कठिन समय में इसी पुरुषोत्तम मास के महत्व की कथा सुनाई थी, जिसने पांडवों के भीतर धर्म की अलख को फिर से जगाया।
3 weeks ago | [YT] | 407
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पांडवों के वनवास काल का यह समय अत्यंत कठिन था। वे काम्यक वन में अपनी कुटिया बनाकर रह रहे थे। उनके पास न तो कोई राज्य था, न ही प्रचुर संसाधन। परंतु धर्मराज युधिष्ठिर के सत्य और धर्म के प्रति निष्ठा के कारण, अनेक ऋषि-मुनि और तपस्वी निरंतर उनसे मिलने आते रहते थे। युधिष्ठिर का यह दृढ़ नियम था कि उनकी कुटिया पर आया कोई भी अतिथि भूखा न लौटे। परंतु सीमित संसाधनों में इतने लोगों को भोजन कराना एक बड़ी चुनौती बन गया था।
तभी, भगवान सूर्य ने युधिष्ठिर की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिव्य 'अक्षय पात्र' प्रदान किया। इस पात्र की यह विशेषता थी कि द्रौपदी जब तक स्वयं भोजन नहीं कर लेती, तब तक यह पात्र असीमित भोजन प्रदान करता रहेगा। इस पात्र के कारण पांडवों की अतिथि देवो भवः की परंपरा सुचारू रूप से चलने लगी।
यह सुखद समय चल ही रहा था कि हस्तिनापुर में दुर्योधन को, पांडवों की इस व्यवस्था का पता चला। उसकी ईर्ष्या और अधिक भड़क उठी। उसने पांडवों को किसी बड़े संकट में डालने का षड्यंत्र रचा। उसे पता था कि महर्षि दुर्वासा अपने अत्यंत क्रोधी स्वभाव और श्राप देने के लिए विख्यात हैं। दुर्योधन ने अत्यंत विनम्रता का ढोंग करके ऋषि दुर्वासा को, उनके हजारों शिष्यों सहित, भोजन के लिए आमंत्रित किया। दुर्वासा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
भोजन के उपरांत, दुर्योधन ने अत्यंत धूर्तता से ऋषि दुर्वासा से कहा, "ऋषिवर! आपकी सेवा करके मैं धन्य हो गया। मेरे भाई युधिष्ठिर भी, पास के ही वन में रह रहे हैं। वे भी आपसे और आपके शिष्यों से आशीर्वाद प्राप्त करने के अत्यंत अभिलाषी हैं। कृपया आप भोजन के उपरांत उनसे मिलने अवश्य जाएं।"
दुर्वासा जी, दुर्योधन के मन की कुटिलता को नहीं समझ सके और वे अपने शिष्यों के साथ पांडवों की कुटिया की ओर चल पड़े। वह दोपहर का समय था, और दुर्योधन जानता था कि द्रौपदी भोजन कर चुकी होगी और अक्षय पात्र खाली हो गया होगा।
जब ऋषि दुर्वासा कुटिया पर पहुँचे, तो युधिष्ठिर ने अत्यंत आदर-सत्कार के साथ उनका स्वागत किया। दुर्वासा जी ने कहा, "युधिष्ठिर! हम सब अत्यंत भूखे हैं। हम नदी पर स्नान करने जा रहे हैं, हमारे लौटने तक तुम भोजन की व्यवस्था रखना।" इतना कहकर वे शिष्यों के साथ नदी की ओर चले गए।
युधिष्ठिर अत्यंत चिंतित हो गए। उन्होंने द्रौपदी से पूछा, "प्रिय! क्या आज पात्र में कुछ शेष है?" द्रौपदी का मुख सूख गया। उसने कहा, "महाराज! मैं अभी-अभी भोजन कर चुकी हूँ और पात्र को धोकर रख दिया है। अब यह आज कोई भोजन नहीं देगा।"
पांडवों के सामने एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया। यदि ऋषि दुर्वासा लौटकर भूखे रहे, तो वे निश्चित रूप से श्राप दे देंगे, जिससे पांडवों का समूल विनाश हो सकता था। द्रौपदी अत्यंत व्याकुल होकर, अपनी कुटिया के कोने में बैठकर, अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करने लगी—"हे गोविंद! हे द्वारकाधीश! लाज बचाओ। आपके बिना हमारा कोई सहारा नहीं।"
उसी क्षण, भगवान श्री कृष्ण, द्रौपदी की पुकार सुनकर, कुटिया में प्रकट हो गए। उन्हें देखते ही द्रौपदी उनके चरणों में गिर पड़ी और अपनी व्यथा सुनाई। श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "प्रिय सखी! मैं अत्यंत भूखा हूँ। पहले मुझे कुछ भोजन दो, फिर तुम्हारी समस्या सुनूँगा।"
द्रौपदी ने हताशा में कहा, "हे वासुदेव! आप भी मेरा उपहास कर रहे हैं? अक्षय पात्र खाली है, मैं आपको क्या खिलाऊँ?"
श्री कृष्ण ने कहा, "ज़रा पात्र लेकर तो आओ।" द्रौपदी ने खाली पात्र उनके सामने रख दिया। श्री कृष्ण ने पात्र को ध्यान से देखा और उसके एक कोने पर चिपका हुआ 'साग का एक छोटा सा पत्ता' और 'एक दाना' पा लिया। उन्होंने उसे अत्यंत चाव से अपने मुख में रख लिया और कहा—"इस एक दाने से, संपूर्ण ब्रह्मांड तृप्त हो जाए।"
जैसे ही श्री कृष्ण ने वह दाना खाया, एक चमत्कार हुआ। नदी पर स्नान कर रहे ऋषि दुर्वासा और उनके हजारों शिष्यों को, अचानक ऐसा अनुभव हुआ जैसे उनका पेट कंठ तक भर गया हो। उन्हें भयानक डकारें आने लगीं। उनके मन में भोजन की कोई इच्छा शेष नहीं रही।
दुर्वासा जी ने शिष्यों से कहा, "अरे! यह क्या हुआ? हमारा पेट तो इतना भर गया है कि हम एक दाना भी नहीं खा सकते। युधिष्ठिर ने हमारे लिए भोजन तैयार किया होगा। यदि हम वहाँ जाकर भोजन नहीं कर पाए, तो वह हमारे प्रति अपराध होगा। हमें अत्यंत संकोच हो रहा है।"
भयभीत होकर, दुर्वासा जी ने युधिष्ठिर के पास जाने का साहस नहीं किया और वे बिना भोजन किए ही, दूसरे मार्ग से चले गए। भीम जब उन्हें बुलाने गया, तो उसने ऋषियों को वहां न पाकर, वापस आकर सारा समाचार सुनाया। पांडवों ने समझ लिया कि यह सब श्री कृष्ण की लीला थी।
इस ऐतिहासिक घटना का, 'अधिक मास' से एक गहरा और अत्यंत महत्वपूर्ण संबंध है।
मान्यता है कि जिस वर्ष पांडवों को वनवास हुआ था, उसी वर्ष भी 'अधिक मास' (पुरुषोत्तम मास) का संयोग था। यह वह समय था जब पांडव अत्यंत संकट में थे और उनके पुण्य क्षीण हो रहे थे। अधिक मास को भगवान विष्णु ने अपना नाम दिया है और यह अत्यंत क्षमाशील, दयालु और भक्तों की लाज रखने वाला महीना माना जाता है।
जब द्रौपदी ने अत्यंत करुण भाव से, अधिक मास के स्वामी भगवान पुरुषोत्तम (श्री कृष्ण) को पुकारा, तो उन्होंने केवल एक दाने से न केवल ऋषियों की भूख शांत की, बल्कि पांडवों की लाज भी बचाई। यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि अधिक मास में, जब मनुष्य के पास सब कुछ समाप्त हो जाता है और वह केवल ईश्वर के प्रति शरणागत हो जाता है, तब भगवान उसकी रक्षा करते हैं और असंभव को भी संभव बना देते हैं। अक्षय पात्र, वास्तव में, अधिक मास में की गई निष्काम भक्ति और दान का प्रतीक है, जो कभी क्षीण नहीं होता।
3 weeks ago | [YT] | 111
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प्राचीन काल में, जब धरती का यौवन अपने चरम पर था, राजा ककुद्मी (जिन्हें रैवत भी कहा जाता था) अपनी राजधानी 'कुशस्थली' पर शासन करते थे। उनकी पुत्री रेवती इतनी गुणवान थी कि राजा को लगने लगा कि इस पूरी धरती पर ऐसा कोई पुरुष नहीं जन्मा जो उसके तेज को सह सके।
राजा ने सोचा, "जब मृत्युलोक में कोई योग्य नहीं, तो क्यों न सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी से ही परामर्श लिया जाए?"
अपनी योगशक्ति से राजा ककुद्मी पुत्री रेवती का हाथ थामे हुए सीधे सत्यलोक (ब्रह्मलोक) जा पहुँचे। वहां का दृश्य अकल्पनीय था। वहां न सूर्य का प्रकाश था, न चंद्रमा का भय; वहां केवल ब्रह्म-तेज था।
जब वे पहुंचे, ब्रह्मा जी गंधर्वों के मधुर गायन में लीन थे। ककुद्मी ने सोचा कि विघ्न डालना उचित नहीं होगा। वे अपनी पुत्री के साथ वहीं एक कोने में खड़े होकर संगीत सुनने लगे। उन्हें लगा कि केवल कुछ ही मिनट बीते हैं। संगीत समाप्त हुआ, तो ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए राजा की ओर देखा।
राजा ने झुककर प्रणाम किया और अपनी पुत्री के लिए उन राजकुमारों की सूची पढ़नी शुरू की, जिन्हें उन्होंने वर के रूप में चुना था।
ब्रह्मा जी खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले—
"हे राजन्! जिन राजकुमारों, उनके पुत्रों, पौत्रों और उनके वंशजों के नाम तुम ले रहे हो, उनका तो अब नामोनिशान भी नहीं बचा। उनकी हड्डियाँ तक धूल बनकर हवा में उड़ चुकी हैं।"
राजा सन्न रह गए। ब्रह्मा जी ने आगे कहा, "तुम्हें आभास नहीं है, लेकिन यहाँ के कुछ क्षणों में पृथ्वी पर 27 चतुर्युगी (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग के 27 चक्र) बीत चुके हैं। तुम्हारा राज्य, तुम्हारी प्रजा और तुम्हारा काल—सब 'महाकाल' के उदर में समा चुके हैं।"
राजा ककुद्मी घबरा गए। उन्होंने पूछा, "प्रभो! अब इस अजनबी दुनिया में मेरी पुत्री का रक्षक कौन होगा?"
ब्रह्मा जी ने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो। इस समय पृथ्वी का भार हरण करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु के अंश 'बलराम' और 'कृष्ण' अवतरित हुए हैं। तुम द्वारका जाओ, शेषनाग के अवतार बलराम ही रेवती के योग्य पति हैं।"
जब ककुद्मी और रेवती पृथ्वी पर उतरे, तो वे हतप्रभ थे। लोग छोटे थे, उनकी बुद्धि कम थी और प्रकृति बदल चुकी थी। रेवती, जो सतयुग के कद-काठी की थी, वह द्वापर के मनुष्यों के सामने एक विशाल पर्वत जैसी दिख रही थी।
द्वारका पहुँचकर जब राजा ने बलराम जी से विवाह का प्रस्ताव रखा, तो वहां उपस्थित लोग रेवती की लंबाई देखकर चकित रह गए। तब अंतर्यामी बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने अपना 'हल'उठाया और खेल-ही-खेल में उसके अग्रभाग से रेवती के कंधों को छुआ।
चमत्कार हुआ! बलराम जी के दिव्य स्पर्श से रेवती का कद और तेज द्वापर युग के अनुरूप संकुचित हो गया। वे एक अत्यंत सुंदर और सुडौल वधू बन गईं।
इसके बाद ककुद्मी ने अपनी पुत्री का कन्यादान किया और स्वयं तपस्या करने बदरिकाश्रम चले गए। यह कथा हमें सिखाती है कि:
अहंकार का त्याग: राजा को गर्व था कि वह ब्रह्मलोक जा सकते हैं, पर समय ने पल भर में सब छीन लिया।
अनुकूलन : बलराम जी द्वारा रेवती का कद छोटा करना यह दर्शाता है कि ईश्वर हमें नए युग और नई परिस्थितियों के अनुसार ढलना सिखाते हैं।
3 weeks ago | [YT] | 229
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एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान-पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।
शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज चलता है।
भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।
रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।
खैर, करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।
शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?
वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।
सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।
वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।
शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः .... ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।
शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो?
महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।
शास्त्री जी बोले: क्या मतलब ?
महिला बोली कि आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा भव सागर तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।
शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।
इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूँ। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले माँ चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।
3 weeks ago | [YT] | 42
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वृन्दावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में प्रवेश करते ही एक अनूठी परम्परा हर भक्त का ध्यान आकर्षित करती है: गर्भगृह के सामने तेजी से खुलता और बंद होता पर्दा। इस प्रथा को समझने के लिए सबसे पहले श्री बांके बिहारी के स्वरूप के मूल तत्व को समझना आवश्यक है। मंदिर में स्थापित विग्रह पत्थर या लकड़ी की एक निर्जीव प्रतिमा नहीं है, बल्कि भगवान का एक जीवंत और श्वास लेता हुआ स्वरूप माना जाता है । उनकी पूजा एक बालक के रूप में होती है, जिसे "बाल स्वरूप" कहा जाता है । एक बच्चे की ही तरह, उनके भी भाव, आवश्यकताएँ और भावनात्मक संवेदनशीलता होती है। इसी कारण मंदिर में घंटे नहीं बजाए जाते, ताकि बाल-गोपाल की नींद में कोई खलल न पड़े ।
इस जीवंत विग्रह का सबसे शक्तिशाली अंग हैं उनके नेत्र। ऐसी मान्यता है कि श्री बांके बिहारी की दृष्टि में एक अद्भुत चुंबकीय और मोहक शक्ति है। जो भी भक्त उनके नेत्रों में एकटक, अधिक समय तक देख ले, वह उनके प्रेम में ऐसा बंध जाता है कि सुध-बुध खो बैठता है और संसार से विरक्त हो जाता है । उनकी आँखों से स्वतः ही परमानंद के आँसू बहने लगते हैं । इस अमोघ आकर्षण का कारण यह है कि उनका विग्रह राधा और कृष्ण दोनों की सम्मिलित आध्यात्मिक शक्ति और प्रेम का पुंज है । इसलिए, बांके बिहारी का दर्शन केवल एकतरफा अवलोकन नहीं है, बल्कि यह भक्त और भगवान के बीच ऊर्जा, चेतना और प्रेम का एक तीव्र द्विपक्षीय आदान-प्रदान है । उनकी दृष्टि भक्त के हृदय को बेधकर उसे अपने साथ ले जाने की क्षमता रखती है।
मंदिर में पर्दा डालने की इस परम्परा के पीछे एक मौलिक कथा है, जो लगभग 400 वर्ष पुरानी बताई जाती है । इस कथा के विभिन्न संस्करण प्रचलित हैं, किन्तु सभी का सार एक ही है। कथा का मुख्य पात्र एक परम भक्त है, जिसे कभी एक निःसंतान वृद्ध महिला के रूप में वर्णित किया जाता है जो बिहारी जी में वात्सल्य भाव (मातृत्व प्रेम) रखती थी , कभी एक गहरे ध्यान में डूबे साधक के रूप में , तो कभी राजस्थान की एक राजकुमारी के रूप में जो उनकी भक्ति में लीन हो गई थी ।
कथा के अनुसार, यह भक्त मंदिर में बिहारी जी के सम्मुख खड़ा था, उनकी मनमोहक छवि में पूरी तरह खोया हुआ। उनकी दृष्टि अटूट थी, बिना पलक झपकाए, और उनका हृदय निश्छल, गहन प्रेम से भरा हुआ था। वे घंटों तक बस अपने आराध्य को निहारते रहे, उनका हृदय वात्सल्य या प्रेम से पिघल रहा था, और मन में बस यही कामना थी कि काश ये मेरे अपने होते और मेरे साथ मेरे घर चलते । भक्त का यह एकाग्र और निस्वार्थ प्रेम इतना तीव्र था कि बाल-स्वरूप ठाकुर जी उसका प्रतिरोध नहीं कर सके। वे प्रेम की डोरी से ऐसे बंधे कि सचमुच अपने आसन से उतर आए। जब भक्त दर्शन करके मंदिर से बाहर जाने के लिए मुड़ा, तो जीवंत विग्रह भी उनके पीछे-पीछे गर्भगृह से बाहर चल दिया । यह घटना वृन्दावन के भक्ति-सिद्धांत के उस उच्चतम सत्य को दर्शाती है कि भगवान शुद्ध प्रेम के समक्ष सर्वशक्तिमान नहीं रहते; वे "भक्त-पराधीन" हो जाते हैं, अर्थात् अपने भक्त के प्रेम के अधीन हो जाते हैं।
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मंदिर के गर्भगृह में ठाकुर जी को न पाकर पुजारियों और गोस्वामियों में हाहाकार मच गया । वे घबराकर भगवान को खोजने लगे। जल्द ही उन्हें पता चला कि बिहारी जी उस भक्त के प्रेम में बंधकर उनके साथ चले गए हैं। मंदिर के सेवक उस भक्त के पास पहुँचे और उनसे, तथा स्वयं बिहारी जी से, करबद्ध प्रार्थना की कि वे वापस मंदिर में पधारें, क्योंकि उनके बिना मंदिर सूना है और अनगिनत अन्य भक्त उनके दर्शनों के लिए व्याकुल हैं । भक्तों की व्याकुल पुकार सुनकर भगवान वापस मंदिर में अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हो गए।
इस अद्भुत घटना के बाद, मंदिर के व्यवस्थापकों को यह बोध हुआ कि किसी भी भक्त की अटूट और प्रेमपूर्ण दृष्टि का "खतरा" कितना वास्तविक है। यह निर्णय लिया गया कि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए एक उपाय करना होगा। समाधान के रूप में, हर कुछ मिनटों में ठाकुर जी के सामने पर्दा डालने की प्रथा शुरू की गई । इस पर्दे को "झाँकी" कहा जाता है। इसका उद्देश्य जानबूझकर भक्त और भगवान के बीच की दृष्टि को भंग करना है, ताकि कोई भी भक्त इतनी देर तक एकटक न देख सके कि बिहारी जी फिर से प्रेम में बंधकर उसके साथ चल दें। यह एक व्यावहारिक उपाय है जो यह सुनिश्चित करता है कि भगवान का सान्निध्य मंदिर में सभी भक्तों के कल्याण के लिए बना रहे।
पर्दे की इस परम्परा का एक और पूरक और उतना ही महत्वपूर्ण कारण है। चूँकि श्री बांके बिहारी की पूजा बाल-स्वरूप में की जाती है, उन्हें एक सुंदर और मनमोहक बालक की ही तरह "नजर" या "दृष्टि दोष" लगने की आशंका रहती है । जिस प्रकार एक माँ अपने सुंदर शिशु को लोगों की बुरी नजर से बचाने के लिए उपाय करती है, उसी प्रकार बिहारी जी को भी हजारों भक्तों की सामूहिक दृष्टि से बचाने के लिए यह पर्दा एक सुरक्षा कवच का काम करता है।
बार-बार पर्दा खींचना एक माँ के उस वात्सल्यपूर्ण कृत्य का प्रतीक है जो अपने बच्चे को बुरी नजर से बचाती है। पर्दे के साथ-साथ चँवर (याक की पूंछ से बना पंखा) डुलाया जाता है, जो किसी भी नकारात्मक ऊर्जा या दृष्टि दोष को दूर करने का एक अनुष्ठानिक तरीका माना जाता है । यह पहलू मंदिर में प्रचलित पूजा के मुख्य भाव - "वात्सल्य भाव" - को और भी सुदृढ़ करता है। इस प्रकार, पर्दा केवल भगवान को मंदिर में रोके रखने का उपाय नहीं, बल्कि उनके बाल-स्वरूप की रक्षा का एक कोमल और प्रेमपूर्ण माध्यम भी है।
यह पर्दा प्रथा एक गहन आध्यात्मिक तकनीक के रूप में भी कार्य करती है। यह दर्शन के अनुभव को बदल देती है। सामान्य मंदिरों में दर्शन एक सतत प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन यहाँ पर्दे के कारण उपस्थिति (संयोग) और अनुपस्थिति (वियोग) का एक तीव्र क्रम बनता है। जब पर्दा बंद होता है, तो भक्त के मन में विरह और तीव्र लालसा उत्पन्न होती है। कुछ क्षणों की यह प्रतीक्षा दर्शन की भूख को और बढ़ा देती है। और जब पर्दा फिर से खुलता है, तो वह क्षणिक "झाँकी" केवल एक अवलोकन नहीं, बल्कि एक आनंदमय पुनर्मिलन बन जाती है। यह भावनात्मक उतार-चढ़ाव प्रत्येक दर्शन को एक सतत दृष्टि से कहीं अधिक मूल्यवान और आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली बना देता है। इस प्रकार, पर्दा भक्त के हृदय में प्रेम-भाव को तीव्र करने का एक अनूठा माध्यम बन जाता है।
3 weeks ago | [YT] | 49
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धन्ना सेठ ने गेहूं की जगह खेत में बो दिया ‘रेत’ ------
संतो के जाने के बाद धन्नाजी सोचने लगे की बीज वाले गेहूं को तो बेचकर संतों को भोजन करा दिया अब खेत में क्या बोया जाये. अगर पिताजी से फिर बीज माँगने गया तो पिताजी बहुत नाराज होंगे. यह सोचकर धन्नाजी ने बोरियों में रेत भर ली और आसपास के लोगों को दिखने के लिए उस रेत को ही खेतों में बोने लगे. धन्नाजी ने राम-राम का नाम लेते हुए शाम तक बोरियों की सारी रेत खेत में छिड़क दी. आस पास के खेतों के किसान देख रहे थे की धन्ना सेठ खेतों में गेहूं बो रहे है परन्तु वे तो खेतों में रेत बो रहे थे. खेत बोने बाद धन्नाजी बड़े प्रसन्न मन से घर की ओर चल दिए, वे सोचने लगे खेत में तो कुछ उगना नहीं है, तो देखभाल भी नहीं करनी पड़ेगी. घर पर पिताजी ने पूछा खेत बो आये, धन्नाजी बोले, जी पिताजी बो आया. कुछ दिन बाद धन्नाजी के पिताजी और गाँव के कुछ बड़े बूढ़े लोग धन्नाजी के पास आये और बोले की तुमने कैसा खेत बोया है ऐसी फसल तो हमने अपने जीवन में आज तक नहीं देखी. ऐसा लगता है जैसे गेहूं का एक एक दाना नाप-नाप कर एक समान दुरी पर बोया गया है, और सारे ही दाने उग आएं हो. इतनी सुंदर फसल तो हमने आजतक नहीं देखी, ये सब तुमने कैसे किया. धन्नाजी सोचने लगे ये सब उनको ताने मार रहें है, खेत में कुछ उगा ही नहीं होगा इसलिए ऐसी बातें बोल रहें है. तब धन्ना जी ने स्वयं खेत पर जाकर देखा. वहाँ जाकर वे आश्चर्यचकित रह गए उन्होंने देखा जिस खेत में उन्होंने रेत बोई थी, वहाँ पर फसल उग आयी थी, और ऐसी सुन्दर फसल उन्होंने कभी नहीं देखी थी. फसल को देखकर धन्नाजी को भगवान की कृपा का अहसास हुआ और उनकी आँखों से आँसू निकल आये. धन्ना सेठ जोर-जोर से रोने लगे. जब धन्नाजी के पिताजी और अन्य गाँव वालों ने रोने का कारण पूछा. तब धन्नाजी ने रोते हुए सारी घटना कह सुनाई. धन्ना जी बोले पिताजी जब आपने संतो को घर लाने के लिए मना किया था और खेत बोने के लिए गेहूं दिया था, उसी दिन मुझे मार्ग में कुछ संत मिल गए. मैंने उन संतो को अपने खेत पर ठहराया और बीज वाला गेहूं बनिये को बेचकर संतों को भोजन करवाया. इसके बाद मैंने खेतों में रेत बो दी, रेत बोने के बाद यह फसल कैसे उग आयी मुझे नहीं मालूम. धन्ना जी की यह बात सुनकर उनके पिताजी के भी आंसू निकल आये और वे बोले मेरा धन्य भाग जो मेरे घर में ऐसे पुत्र ने जन्म लिया. आज के बाद हम तुमने रोकेंगे नहीं खूब साधु बुलाओ खूब संत सेवा करो हम तुम्हे अब कभी मना नहीं करेंगें. आज से मैं भी भगवान की भक्ति किया करूँगा और तुम्हारे साथ संतो की सेवा किया करूँगा. इसके बाद धन्नाजी और उनके परिवार वाले खूब संत सेवा करने लगे. कुछ समय बाद धन्नाजी की उगाई हुई फसल को काटने का समय आ गया. उस फसल से उतने ही आकर की खेती से 50 गुना ज्यादा गेहूँ निकला, यह गेहूँ इतना ज्यादा था की उसे रखने तक की जगह नहीं बची थी. गाँव से सभी लोग धन्नाजी की फसल देखकर आश्चर्य करने लगे..
4 weeks ago | [YT] | 65
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तमिलनाडु के कराइकल में जन्मी पुनितवती बचपन से ही भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनका विवाह एक धनी व्यापारी परमदत्त से हुआ। वे एक आदर्श पत्नी थीं, लेकिन उनका मन हमेशा शिव चरणों में रहता था।
एक दिन उनके पति ने घर पर दो आम भेजे। उसी समय एक भूखा साधु (जो स्वयं शिव का रूप थे) द्वार पर आया। पुनितवती ने श्रद्धावश एक आम साधु को खिला दिया। जब पति भोजन करने आया और दूसरा आम मांगा, तो पुनितवती संकट में पड़ गईं। उन्होंने महादेव का स्मरण किया और चमत्कारिक रूप से उनके हाथ में एक दिव्य आम आ गया। वह आम इतना स्वादिष्ट था कि पति समझ गया कि यह साधारण नहीं है।
जब पति को उनकी दिव्य शक्तियों का आभास हुआ, तो वह उनसे डरने लगा और उन्हें 'देवी' मानकर छोड़ दिया। पुनितवती को जब यह पता चला, तो उन्होंने महादेव से प्रार्थना की: "हे प्रभु, अब जब मेरे पति ने मुझे त्याग दिया है, तो मुझे इस सुंदर शरीर की आवश्यकता नहीं है। मुझे ऐसा रूप दे दो कि मैं केवल आपकी भक्ति कर सकूँ।"
महादेव की कृपा से उनका सुंदर शरीर एक अस्थिपंजर जैसा हो गया। वे इसी रूप में शिव की स्तुति गाते हुए कैलाश पर्वत की ओर चल पड़ीं।
जब वह कैलाश पहुँचीं, तो उन्होंने सोचा कि महादेव की पवित्र भूमि पर पैर रखना पाप है, इसलिए वे अपने हाथों के बल (सिर के बल) चढ़ने लगीं। माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा, "हे स्वामी! यह भयानक रूप वाली महिला कौन है जो इस तरह पहाड़ चढ़ रही है?"
तब महादेव ने बड़े गर्व और प्रेम से उत्तर दिया, "देवी, यह मेरी 'अम्मा' (माँ) हैं।"
महादेव उनके पास आए और उन्हें उठाकर प्रेम से 'अम्मा' कहकर पुकारा। उन्होंने पुनितवती से वरदान मांगने को कहा, जिस पर उन्होंने केवल यही मांगा कि वे सदा शिव के चरणों में रहकर उनकी भक्ति के गीत गाती रहें।
4 weeks ago | [YT] | 112
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एक समय की बात है, एक कृष्ण-भक्त महात्मा अपनी छोटी सी कुटिया में अकेले रहते थे। उनकी भक्ति ऐसी थी कि वे हर वस्तु में अपने 'लल्ला' (श्री कृष्ण) के ही दर्शन करते थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर केवल एक कान्हा की प्रतिमा और ठाकुर जी के भोग के लिए थोडा सा माखन-मिश्री रहता था।
एक रात एक चोर उनकी कुटिया में इस उम्मीद से घुसा कि शायद कोई कीमती बर्तन या साधु की जमापूँजी मिल जाए। महात्मा उस समय जाग रहे थे, पर उन्होंने आंखें नहीं खोलीं। वे समझ गए कि कुटिया में कोई आया है।
चोर ने अंधेरे में हाथ-पाँव मारे, पर उसे कुछ न मिला। अंत में उसे कोने में एक मिट्टी की मटकी दिखी। उसने सोचा कि इसमें शायद मुहरें होंगी। जैसे ही उसने मटकी उठाई, महात्मा ने प्रेम से पुकारा— "अरे! कन्हैया तुम आ गए?"
चोर डर गया! उसे लगा कि महात्मा जाग गए हैं और अब शोर मचाएंगे। वह मटकी लेकर बाहर की तरफ भागा। मटकी में मुहरें नहीं, बल्कि ताजा माखन था। भागते समय चोर का पैर फिसला और थोड़ी सी मिश्री ज़मीन पर गिर गई।
महात्मा कुटिया से बाहर निकले, पर वे लाठी लेकर नहीं, बल्कि हाथ में मिश्री की कटोरी लेकर दौड़े। वे चिल्ला रहे थे—
"अरे ओ लाला! रुक तो सही! सूखा माखन गले में अटक जाएगा। यह मिश्री तो लेता जा, बिना मिश्री के माखन में स्वाद नहीं आएगा। तूने तो आधी रात को आने का नियम ही बना लिया है!"
चोर चकित रह गया। वह भागता रहा और महात्मा उसके पीछे भागते रहे। अंत में चोर एक पेड़ के नीचे थककर रुक गया। महात्मा उसके पास पहुँचे, हाफते हुए उसकी हथेली में मिश्री रखी और बोले:
"मेरे कान्हा, तू चोरी क्यों करता है? जो तेरा है, उसे माँग लिया कर। आज तूने माखन खाया, तो मेरा हृदय तृप्त हो गया, पर तू भाग क्यों रहा था?"
चोर ने जब महात्मा की आँखों में देखा, तो उसे वहाँ डांट या नफरत नहीं, बल्कि एक अगाध प्रेम दिखा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने महात्मा के पैर पकड़ लिए और बोला, "महाराज, मैं भगवान नहीं, मैं तो एक नीच चोर हूँ। मैं तो आपकी मटकी चुराने आया था।"
महात्मा मुस्कुराए और बोले, "चोरी तो मेरा कृष्ण भी करता था। पर वह माखन के साथ-साथ लोगों के 'मन' भी चुरा लेता था। तूने आज मेरा माखन चुराया है, तो चल आज से एक काम कर— तू चोरी तो कर, पर अब केवल नाम की चोरी कर।"
चोर ने पूछा, "महाराज, नाम की चोरी कैसे होती है?"
महात्मा ने कहा:
"जैसे तू छिपकर दूसरों के घर घुसता है, वैसे ही अब तू एकांत में बैठकर छिपकर 'गोविंद' के नाम को अपने हृदय में बसा। दुनिया को पता भी न चले और तू प्रभु के नाम का खजाना लूट ले। याद रख, जब तू अगली बार चोरी करने जाए, तो बस यह ध्यान रखना कि तेरा कन्हैया तुझे देख रहा है। यदि उसके सामने तू चोरी कर सके, तो शौक से करना।"
वह चोर उस दिन से बदल गया। उसने चोरी तो नहीं छोड़ी, पर अब वह 'नाम-संकीर्तन' की चोरी करने लगा। उसने जान लिया कि यदि ईश्वर हमारे साथ है, तो बुराई के लिए हमारे जीवन में कोई स्थान ही नहीं बचता।
भक्त के लिए चोर भी भगवान का ही रूप है।
यह महसूस करना कि "प्रभु देख रहे हैं", इंसान को गलत रास्ते पर जाने से रोक देता है।
कृष्ण भक्ति की यह धारा हमें सिखाती है कि किसी को अपराधी मानकर त्यागने से बेहतर है, उसे प्रेम देकर सुधार देना।
4 weeks ago | [YT] | 56
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