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संजीवनी बूटी की खोज - भक्ति और बल का प्रदर्शन
लड़का युद्ध चरम पर था। रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर शक्ति बाण का प्रहार किया, जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। पूरी वानर सेना में हाहाकार मच गया। लंका के विभीषण के परामर्श पर लंका से ही सुषेण वैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने परीक्षा के बाद कहा, "महाराज! लक्ष्मण जी के प्राण केवल हिमालय पर पाई जाने वाली संजीवनी बूटी से ही बच सकते हैं। लेकिन यह कार्य केवल वही कर सकता है जो बहुत तीव्र गति से जा सके, क्योंकि सूर्योदय से पहले बूटी का आना अनिवार्य है।"

प्रभु राम का आदेश पाते ही हनुमान जी पवन वेग से हिमालय की ओर उड़ चले। हनुमान जी ने हिमालय पहुँचकर बूटी खोजने का प्रयास किया, लेकिन वैद्यराज ने बताया था कि संजीवनी बूटी प्रकाशमान होती है। रावण ने अपनी माया से वहाँ कई और पौधे भी वैसे ही चमकदार बना दिए थे। हनुमान जी असमंजस में पड़ गए कि कौन सी बूटी वास्तविक है। समय बीतता जा रहा था और सूर्योदय का समय निकट आ रहा था।

अपनी बुद्धि और भक्ति का परिचय देते हुए हनुमान जी ने एक निर्णय लिया। उन्होंने कहा, "हे माता! यदि मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ, तो मैं तुम्हें पहचानकर ले जाने में असमर्थ हूँ। लेकिन मैं प्रभु राम के भाई को इस अवस्था में नहीं छोड़ सकता। इसलिए मैं तुम सबको साथ लेकर चलता हूँ।" यह कहकर हनुमान जी ने पूरा द्रोणागिरी पर्वत ही अपने विशाल हाथ पर उठा लिया और लंका की ओर उड़ चले।

जब वे लंका पहुँचे, तो वैद्य सुषेण ने पर्वत पर से संजीवनी बूटी पहचानी और उसका रस लक्ष्मण जी को पिलाया। रस पीते ही लक्ष्मण जी तुरंत मूर्छित अवस्था से जाग गए और प्रभु राम के चरणों में वंदन किया। हनुमान जी ने अपनी अपार शक्ति और चतुराई से लक्ष्मण जी के प्राण बचाकर यह सिद्ध कर दिया कि वे प्रभु राम के प्रति कितने समर्पित हैं। यह घटना उनकी असाधारण भक्ति और बल की कथा के रूप में आज भी गाई जाती है।

18 hours ago | [YT] | 132

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श्री राधा रमण जी: भक्त की भक्ति से प्रकट हुई मूरत
प्रसंग: गोपाल भट्ट गोस्वामी की निष्ठा

राधा रमण जी का विग्रह वृंदावन के सात मुख्य मंदिरों में से एक है। इसकी कथा बहुत भावुक है। चैतन्य महाप्रभु के शिष्य गोपाल भट्ट गोस्वामी नेपाल की गंडकी नदी से 12 शालिग्राम शिलाएँ लेकर आए थे। वे उनकी सेवा करते थे, लेकिन उनके मन में एक टीस थी। वे सोचते थे कि "काश! मेरे पास भगवान का एक सुंदर विग्रह होता जिसे मैं सुंदर वस्त्र और आभूषण पहना सकता।"

Pakistani Reaction on PM Modi’s Boat Ride & Photography Stuns Mamta | Pak Media on Bengal Election https://youtu.be/j3-h-QRqPbQ

एक पूर्णिमा की रात, गोपाल भट्ट जी ने अपनी शिलाओं को झोले में रखा और रोते हुए सो गए। सुबह जब उन्होंने झोला खोला, तो वे दंग रह गए। उन 12 शिलाओं में से एक शिला (दामोदर शिला) ने स्वयं को भगवान कृष्ण के एक अत्यंत सुंदर मनमोहक विग्रह में बदल लिया था। उनके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो राधा जी के मन को रमन करती है, इसलिए उनका नाम 'राधा रमण' पड़ा। इस विग्रह की विशेषता यह है कि यह 'स्वयंभू' (अपने आप प्रकट) है और आज भी उसी भट्टी की अग्नि से भोग बनता है जो 500 साल पहले जलाई गई थी।

1 day ago | [YT] | 127

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देवगुरु बृहस्पति: देवताओं के संरक्षक और ज्ञान के सागर
प्रसंग: बृहस्पति देव का महत्व (बृहस्पतिवार विशेष)

कल गुरुवार है, जो देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं और देवताओं के गुरु हैं। उनके पास 'नीति' और 'न्याय' का अगाध ज्ञान है। एक बार जब इंद्र अहंकार वश गुरु का अपमान कर बैठे, तो बृहस्पति जी ने देवताओं का साथ छोड़ दिया। गुरु के बिना देवता शक्तिहीन हो गए और असुरों ने उन्हें पराजित कर दिया। बाद में तपस्या और क्षमा के बाद बृहस्पति पुनः लौटे और देवताओं को अमृत और विजय का मार्ग दिखाया।

बृहस्पति देव का वर्ण पीला (स्वर्ण जैसा) है। उन्हें पीली वस्तुएँ अत्यंत प्रिय हैं। वे बुद्धि, धन, और सौभाग्य के कारक हैं। उनकी कथा हमें सिखाती है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, बिना 'गुरु' के मार्गदर्शन के वह जीवन के युद्ध में सफल नहीं हो सकता।

4 days ago | [YT] | 152

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श्री बांके बिहारी: निधिवन से प्रकट होने की अलौकिक गाथा
प्रसंग: बांके बिहारी जी का प्राकट्य (वृंदावन)

यह कहानी है संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी की। हरिदास जी तानसेन के गुरु थे और वृंदावन के निधिवन में कुटिया बनाकर रहते थे। वे दिन-भर प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) के ध्यान में डूबे रहते और अपने मधुर संगीत से उन्हें रिझाते थे। एक दिन उनके शिष्यों ने आग्रह किया कि "गुरुदेव, आप तो रोज प्रभु के दर्शन करते हैं, हमें भी उनके दर्शन कराइए।"

हरिदास जी ने मधुर राग छेड़ा। उनकी भक्ति और संगीत के आकर्षण में राधा-कृष्ण साक्षात प्रकट हो गए। दिव्य प्रकाश फैल गया। लेकिन प्रभु की छवि इतनी जाज्वल्यमान थी कि साधारण मनुष्य उसे सहन नहीं कर पा रहे थे। तब हरिदास जी ने प्रार्थना की, "प्रभु! आपकी यह छवि बहुत तेजवान है, मेरे शिष्य इसे देख नहीं पाएंगे। आप दोनों एक रूप हो जाइए और इसी रूप में यहीं निवास कीजिए।" भक्त की पुकार पर राधा और कृष्ण की छवि एक साथ मिलकर एक विग्रह में समा गई। यही विग्रह 'बांके बिहारी' कहलाया। बांके का अर्थ है 'तिरछा' और बिहारी का अर्थ है 'विहार करने वाले'। आज भी बिहारी जी की झाँकी में पर्दा बार-बार किया जाता है, क्योंकि कहा जाता है कि उनकी आँखों में जो आकर्षण है, वह भक्त को अपनी ओर खींच लेता है।

5 days ago | [YT] | 110

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महाबली हनुमान का लंका दहन और शक्ति प्रदर्शन
रामायण (सुंदरकांड)
यह गाथा केवल एक नगर के जलने की नहीं है, बल्कि यह अहंकारी रावण के पतन की शुरुआत और एक अटूट भक्त की असीमित शक्ति का प्रमाण है। जब रावण ने सोचा कि वह एक 'वानर' को अपमानित कर सकता है, तब हनुमान जी ने सिद्ध कर दिया कि राम का दूत काल का भी काल है।
माता सीता की खोज और अशोक वाटिका का उजाड़ना:
हनुमान जी ने समुद्र लांघकर लंका में प्रवेश किया और माता सीता को खोज निकाला। माता को सांत्वना देने और प्रभु राम की मुद्रिका देने के बाद, हनुमान जी के मन में रावण की शक्ति को परखने की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने रावण की सबसे प्रिय 'अशोक वाटिका' को उजाड़ना शुरू कर दिया। बड़े-बड़े वृक्ष उखाड़ दिए और फल खाए। जब रावण के रक्षकों ने उन्हें रोकना चाहा, तो हनुमान जी ने उन्हें धूल चटा दी।
रावण ने अपने महाबली पुत्र 'अक्षय कुमार' को भेजा, लेकिन हनुमान जी ने उसे यमलोक पहुँचा दिया। अंततः, रावण का सबसे बड़ा पुत्र 'इंद्रजीत' (मेघनाद) रणभूमि में आया। भीषण युद्ध के बाद, हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए स्वयं को बंधक बना लिया ताकि वे रावण की सभा में जाकर उसे सीधे चेतावनी दे सकें।
रावण की सभा में निर्भीक हनुमान:
जब हनुमान जी को जंजीरों में जकड़कर रावण की स्वर्ण सभा में लाया गया, तो सारा दरबार उनके तेज से चकाचौंध रह गया। रावण ऊँचे सिंहासन पर बैठकर अट्टहास कर रहा था। उसने पूछा, "रे वनचर! तू कौन है? तूने मेरे पुत्र का वध क्यों किया और मेरी वाटिका क्यों उजाड़ी?"
हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने गरजते हुए कहा, "हे लंकेश! मैं उन प्रभु श्री राम का दूत हूँ जिन्होंने बाली को एक ही बाण से मार गिराया और खर-दूषण का वध किया। मैं यहाँ तुम्हें समझाने आया हूँ—माता सीता को ससम्मान लौटा दो, वरना तुम्हारी यह स्वर्ण लंका श्मशान बन जाएगी।"
क्रोध में पागल होकर रावण ने हनुमान को मृत्युदंड देने का आदेश दिया। परंतु विभीषण ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि दूत का वध करना शास्त्र विरुद्ध है। तब रावण ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "वानरों को अपनी पूंछ बहुत प्रिय होती है। इसके अंगों को घी में डूबे कपड़ों से लपेटकर इसमें आग लगा दो! फिर यह पूंछ कटा हुआ वानर अपने स्वामी के पास जाएगा, तो वह भी डरेगा।"
पूंछ का विस्तार और लंका दहन:
राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ पर कपड़े लपेटना शुरू किया। लेकिन यहाँ हनुमान जी ने अपनी दिव्य माया दिखाई। जैसे-जैसे वे कपड़े लपेटते, हनुमान जी अपनी पूंछ की लंबाई बढ़ाते जाते। लंका के सारे कपड़े और घी समाप्त होने लगे, पर पूंछ कम नहीं पड़ रही थी। अंततः, रावण की आज्ञा से उनकी पूंछ में आग लगा दी गई।
आग लगते ही हनुमान जी ने एक हुंकार भरी। उन्होंने अपने छोटे रूप को त्याग कर विशाल पर्वताकार रूप धारण किया और अपनी जंजीरें तोड़ दीं। वे एक अट्टालिका से दूसरी अट्टालिका पर कूदने लगे। जिस स्वर्ण लंका पर रावण को गर्व था, वह अब आग की लपटों में घिरने लगी।
हनुमान जी ने लंका की छतों पर दौड़ते हुए अग्निदेव को आह्वान किया। देखते ही देखते रावण के महल, मंत्रियों के घर और राक्षसों की छावनियां धू-धू कर जलने लगीं। लंका में हाहाकार मच गया। रावण का अहंकार उसकी अपनी आँखों के सामने जल रहा था। हनुमान जी ने पूरी लंका जलाई, लेकिन विभीषण का घर और माता सीता की अशोक वाटिका सुरक्षित रही, क्योंकि वे धर्म के रक्षक थे।
उपसंहार:
पूरी लंका को भस्म करने के बाद हनुमान जी ने समुद्र के जल में अपनी पूंछ की आग बुझाई। यह घटना राक्षसों के मनोबल को तोड़ने वाली थी। हनुमान जी ने यह संदेश दिया कि अधर्म के साम्राज्य का अंत अग्नि से ही होता है। वे वापस प्रभु राम के पास पहुँचे और उन्हें "चूड़ामणि" सौंपकर लंका की पूरी स्थिति का विवरण दिया।
हनुमान जी की यह कथा हमें सिखाती है कि जब उद्देश्य पवित्र हो और हृदय में भगवान का वास हो, तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती।

6 days ago | [YT] | 89

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एक सन्यासी, सारी दुनिया की सैर करके, अपने वतन भारत लौटा और एक छोटी सी रियासत का मेहमान बना. जब वहां के राजा को पता चला, तो वे फौरन महात्मा से मिलने पहुंचे. राजा ने सन्यासी से कहा, 'हे महात्मा, बीस सालों से एक सवाल मुझे चैन नहीं लेने दे रहा है. मैंने कई विद्वानों से पूछा, पर किसी का जवाब मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया. क्या आप मुझे इस सवाल का उत्तर देंगे?' महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, 'बिल्कुल दूंगा राजन, पूछिए तो सही. आज आप खाली हाथ नहीं लौटेंगे.'

राजा ने कहा, 'मैं सीधे ईश्वर से मिलना चाहता हूं. और हां, आप भी मुझे दूसरों की तरह ईश्वर के बारे में लंबे-चौड़े उपदेश मत देना. बस, मुझे उनसे मिलवा दीजिए.' सन्यासी ने बड़ी सहजता से पूछा, 'अभी मिलना चाहते हो या कुछ देर रुककर?' राजा चौंक गया और बोला, 'शायद आप समझ नहीं पाए, मैं परमेश्वर से मिलने की बात कर रहा हूं, किसी आम इंसान से नहीं.'

सन्यासी ने गंभीर होकर कहा, 'राजन, मैं अच्छी तरह समझ रहा हूं. मेरा काम ही चौबीसों घंटे लोगों को ईश्वर से मिलवाना है. आप सीधे-सीधे जवाब दो, अभी मिलोगे या थोड़ी देर बाद?'

राजा कुछ पल हक्का-बक्का होकर सन्यासी को देखता रहा. फिर हिम्मत जुटाकर बोला, 'मैं अभी मिलना चाहता हूं. आप बस अभी मिलवा दीजिए. मैं आपका एहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूंगा.' सन्यासी ने एक कागज़ का टुकड़ा राजा की तरफ बढ़ाया और कहा, 'इस छोटे से कागज़ पर अपना नाम और पता लिख दो, ताकि मैं भगवान को बता सकूं कि उनसे कौन मिलना चाहता है.'

राजा ने उस कागज़ पर अपना नाम, पता, उम्र, अपनी सारी उपाधियां और परिचय विस्तार से लिख दिया. सन्यासी ने कागज़ पढ़ा और राजा की आंखों में आंखें डालकर कहा, 'राजन, आपने जो कुछ भी लिखा है, वह सब मुझे झूठ लग रहा है.' राजा हैरान रह गया और बोला, 'मैंने तो सब सच लिखा है!' सन्यासी ने तब राजा से पूछा, 'अगर आपका नाम बदल दिया जाए, तो क्या आप बदल जाएंगे?'

राजा ने सोचा और कहा, 'नहीं, नाम बदलने से मैं कैसे बदल सकता हूं? मैं तो वही रहूंगा.' सन्यासी ने कहा, 'चलो, यह बात तो साफ हो गई कि यह नाम आपका असली परिचय नहीं है.'

सन्यासी ने फिर पूछा, 'आज आप राजा हैं, कल को अगर आपका राज-पाट छिन जाए और आप भिखारी बन जाएं, तो क्या आप बदल जाएंगे?' राजा ने सिर हिलाया और कहा, 'नहीं महात्मा, मैं तब भी वही रहूंगा जो मैं हूं.' सन्यासी ने कहा, 'तो यह भी तय हो गया कि आपका राज्य और आपकी उपाधियां भी आपका परिचय नहीं हैं.'

अब सन्यासी ने तीसरा सवाल पूछा, 'राजन, आपकी उम्र क्या है?' राजा ने जवाब दिया, 'चालीस साल.' सन्यासी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'तो क्या जब आप पचास साल के होंगे, तो आप कोई और बन जाएंगे? और जब आप बीस साल के थे, तो क्या आप कोई दूसरे व्यक्ति थे? या जब आप छोटे बच्चे थे, तो क्या आप कोई और थे?'

राजा सोच में पड़ गया और बोला, 'नहीं, बचपन से शरीर बदला, उम्र बदली, कपड़े बदले, उपाधियां बदलीं, लेकिन मैं तो वही हूं जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था.' सन्यासी ने दृढ़ता से कहा, 'फिर तो राजन, यह उम्र भी आपका परिचय नहीं है, और न ही यह शरीर आपका असली 'मैं' है... तो फिर... आप कौन हैं राजन?'

'जो आप वास्तव में हैं, वह लिख दीजिए, तभी मैं भगवान के पास आपका संदेश पहुंचा पाऊंगा. वरना भगवान मुझसे कहेंगे कि तुम झूठ बोल रहे हो, किसी और का पता लेकर आ गए हो.' राजा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे. वह कुछ देर शांत खड़ा रहा... फिर बोला, 'हे महात्मा, यह तो बड़ी मुश्किल बात है... मैं तो इन्हीं सब बातों को अपना परिचय मानता आया हूं...'

सन्यासी ने गंभीर होकर कहा, 'हां राजन, मुश्किल तो है. जिसका परिचय मैं न दे सकूं, भगवान भी उससे मिलने से इंकार कर सकते हैं. भगवान कहेंगे कि तुम मुझे आखिर किससे मिलवाने लाए हो? जाओ राजन, पहले उसे खोज लो, जो तुम वास्तव में हो... तुम्हारा असली परिचय, तुम्हारा वजूद, तुम्हारा होना... आखिर तुम इस धरती पर किस मकसद से हो.'

और सन्यासी ने आखिर में एक बड़ी बात कही, 'राजन, जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम भगवान को खोजने नहीं आओगे... क्योंकि भगवान को खोजना ही तो यह जानना है कि तुम क्या हो. हमारी आत्मा ही भगवान का दूसरा रूप है.'

यह कहानी हमें सिखाती है कि ईश्वर हर इंसान के भीतर है, हर कण में है. आप कहीं भी रहें, अगर आप दिल से ईश्वर को पुकारेंगे, तो वह आवाज़ उन तक ज़रूर पहुंचेगी. लेकिन ईश्वर से मिलने से पहले, हमें खुद से मिलना होगा, खुद को जानना होगा.

1 week ago | [YT] | 141

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गजलक्ष्मी, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘गज’ (हाथी) और ‘लक्ष्मी’ (समृद्धि) का दिव्य मिलन है। यह स्वरूप सौभाग्य, ऐश्वर्य और असीम शक्ति का प्रतीक है, जिसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में गहराई से समाई हुई हैं।

इनकी कथा का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग समुद्र मंथन से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर का मंथन किया, तो उसमें से चौदह अनमोल रत्न निकले। इन्हीं रत्नों में से एक साक्षात माँ लक्ष्मी प्रकट हुईं।

वे दिव्य कमल के पुष्प पर विराजमान थीं, और उनके अलौकिक सौंदर्य और वैभव को देख हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। इसी समय, दिशाओं के रक्षक ‘दिग्गज’ (हाथी) वहाँ पधारे। उन्होंने स्वर्ण कलशों में पवित्र नदियों का जल लेकर माँ लक्ष्मी का अभिषेक किया। हाथियों द्वारा किए गए इसी दिव्य अभिषेक वाले रूप को 'गजलक्ष्मी' के नाम से जाना जाता है।

गजलक्ष्मी व्रत से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा महाभारत काल की है, जो उत्तर भारत में अत्यंत प्रचलित है:

हस्तिनापुर में जब गजलक्ष्मी व्रत का आयोजन हुआ, तो माता गांधारी ने अपने सौ पुत्रों की मदद से मिट्टी का एक विशाल हाथी बनवाया। उन्होंने नगर की सभी स्त्रियों को पूजन के लिए आमंत्रित किया, लेकिन कुंती को नहीं बुलाया। माता कुंती इस बात से बहुत दुखी हुईं। अपने माता को उदास देख अर्जुन ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे उनके लिए साक्षात ऐरावत (इंद्र का हाथी) को स्वर्ग से धरती पर लाएंगे।

अर्जुन ने अपने बाणों से स्वर्ग तक की सीढ़ी बना दी और इंद्र देव से प्रार्थना कर ऐरावत को धरती पर बुलाया। जब नगर की स्त्रियों को पता चला कि कुंती के महल में साक्षात ऐरावत पधारे हैं, तो सब गांधारी के मिट्टी के हाथी को छोड़कर कुंती के पास पूजन के लिए पहुँच गईं। देवी लक्ष्मी इस भक्ति और श्रद्धा से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने आशीर्वाद दिया कि जो भी इस दिन गजलक्ष्मी का पूजन करेगा, उसके घर में कभी दरिद्रता नहीं आएगी और सुख-समृद्धि का वास रहेगा।

गजलक्ष्मी के स्वरूप को अगर गहराई से समझें, तो इसमें एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है:

हाथी (गज): यह राजसी ठाठ-बाट, बुद्धिमत्ता और असीम शक्ति का प्रतीक है।

अभिषेक: हाथियों द्वारा जल की वर्षा करना यह दर्शाता है कि शुभ विचारों और निरंतर प्रयासों की वर्षा से ही जीवन में सच्ची समृद्धि आती है।

कृषि और वर्षा: प्राचीन काल में गजलक्ष्मी को उर्वरता की देवी माना जाता था, जहाँ हाथी बादलों का और उनके द्वारा गिराया गया जल वर्षा का प्रतीक था, जो फसलों और जीवन के लिए अनिवार्य है।

गजलक्ष्मी का विशेष पूजन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को किया जाता है, जिसे 'हाथी पूजा' या 'महालक्ष्मी व्रत' के समापन के रूप में मनाया जाता है। दिवाली के पावन पर्व पर भी लक्ष्मी जी के इसी स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व है।

गजलक्ष्मी का स्वरूप हमें न केवल भौतिक समृद्धि, बल्कि आंतरिक शक्ति और बुद्धिमत्ता का भी आशीर्वाद देता है। उनकी कथा हमें श्रद्धा, भक्ति और शुभ विचारों के महत्व की याद दिलाती है।

1 week ago | [YT] | 310

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यह प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन की सबसे अलौकिक और भावुक कर देने वाली घटनाओं में से एक है। 'भक्तमाल' (नाभादास जी द्वारा रचित) और प्रियादास जी की टीकाओं में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।

जब तुलसीदास जी काशी के अस्सी घाट पर 'रामचरितमानस' की रचना कर रहे थे, तब स्थानीय कुछ लोग उनकी बढ़ती प्रसिद्धि से ईर्ष्या करने लगे। उन्हें लगता था कि संस्कृत के बजाय लोकभाषा (अवधी) में रामायण लिखकर वह सनातन धर्म का अपमान कर रहे हैं। पहले उन्होंने ग्रंथ को नीचा दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब सफल नहीं हुए, तो उन्होंने 'मानस' की मूल प्रति चुराने के लिए दो पेशेवर चोरों को भेजा।

आधी रात का समय था, चारों ओर सन्नाटा था। चोर तुलसीदास जी की कुटिया के करीब पहुँचे और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर दो बेहद सुंदर किशोर, हाथ में धनुष-बाण लिए पहरा दे रहे हैं।

एक का रंग नभ के बादलों जैसा सांवला था।

दूसरे का रंग दमकते सोने जैसा गोरा था।

उनका व्यक्तित्व इतना तेजस्वी था कि चोरों को आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई और वे डरकर भाग गए।

अगली दो-तीन रातों तक यही सिलसिला चलता रहा। चोर जितनी बार आते, उतनी बार उन दिव्य राजकुमारों को पहरा देते देख लौट जाते। वे हैरान थे कि इस गरीब साधु के पास ऐसा कौन सा खजाना है, जिसकी रक्षा के लिए राजाओं जैसे राजकुमार रात भर जाग रहे हैं?

अगली सुबह, कौतूहल और ग्लानि से भरे चोर तुलसीदास जी के पास पहुँचे और उनके पैर पकड़कर पूछा— "बाबा! आप तो बहुत साधारण रहते हैं, फिर वे दो राजकुमार कौन हैं जो रात भर आपकी कुटिया के चक्कर काटते हैं? एक सांवला है, एक गोरा है... उनके हाथों में धनुष है और वे बहुत थके हुए लग रहे थे।"

चोरों के मुंह से यह वर्णन सुनते ही तुलसीदास जी के हाथ से लेखनी गिर गई। वे समझ गए कि वे कोई और नहीं, स्वयं भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी थे।

तुलसीदास जी फूट-फूट कर रोने लगे। वे बार-बार अपने आप को धिक्कारने लगे— "हे नाथ! मुझ अधम की रक्षा के लिए, कागज़ के कुछ पन्नों की रक्षा के लिए, आपको रात भर जागना पड़ा? आपने अपने कोमल चरणों को रात भर कष्ट दिया?"

इस घटना ने तुलसीदास जी को इतना झकझोर दिया कि उन्होंने प्रभु को फिर से कष्ट न देना पड़े, इसलिए कुटिया का बचा-कुचा सामान भी दान कर दिया। उन्होंने 'रामचरितमानस' को सुरक्षित स्थान (टोडरमल के पास) पर रखवा दिया।

वहीं, वे दोनों चोर भी भगवान के दर्शन पाकर कृतार्थ हो गए। उन्होंने चोरी का पेशा हमेशा के लिए त्याग दिया और राम-नाम का जप करते हुए साधु का जीवन व्यतीत करने लगे।

यह कथा हमें विश्वास दिलाती है कि यदि हृदय में सच्ची लगन हो, तो ईश्वर हमारे घर की चौखट पर पहरा देने के लिए भी तैयार रहते हैं।

1 week ago | [YT] | 172

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यहाँ प्रस्तुत है नीलांचल क्षेत्र के अधिपति, भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य और उनके अद्वितीय 'निराकार' स्वरूप के पीछे की एक अत्यंत मार्मिक और प्राचीन पौराणिक कथा. विष्णु पुराण, नारद पुराण और हरिवंश पुराण जैसे शास्त्रों में वर्णित यह कथा द्वापर युग से जुड़ी हुई है.

कथा का आरम्भ: एक अनूठी जिद

कथा द्वारिका के राजमहल से शुरू होती है. एक दिन, श्री कृष्ण की दो पत्नियां, सत्यभामा और जाम्बवंती, श्री कृष्ण की माता रोहिणी से जिद कर बैठीं. जाम्बवंती ने कहा, “माता, यहाँ सभी श्री कृष्ण की द्वारिका वाली कहानियाँ तो सुनते हैं, लेकिन हमें उनकी ब्रज-गोकुल और वृन्दावन की बाललीलाओं को विस्तार से सुनना है.” सत्यभामा ने भी जोर देते हुए कहा, “हाँ माता! मैंने तो राधा रानी की कहानियाँ भी सुनी हैं, पर कोई विस्तार से नहीं बताता. आप तो उनकी माता हैं, आप ही हमें वो कथाएं सुनाएं.”

पहले तो माता रोहिणी ने संकोच किया. उन्हें डर था कि अगर कथा सुनते समय श्री कृष्ण और बलराम आ गए, तो वे बाल्यकाल की स्मृतियों में खो जाएंगे और शायद फिर से ब्रज की ओर चले जाएंगे. तब सत्यभामा ने एक युक्ति निकाली. उन्होंने कहा, “आप चिंता न करें. हम सभी रैवतक पर्वत पर मां अम्बिका के पूजन के बहाने चलेंगे. वहाँ एकांत मिलेगा और हम सब शांति से कथा सुन पाएंगे.”

कथा का प्रवाह और भाव विभोरता

तय दिन पर, सभी रानियां और माता रोहिणी रैवतक पर्वत पहुंचीं. सुरक्षा के लिए उन्होंने बहन सुभद्रा को द्वार पर पहरे पर बिठा दिया और फिर माता रोहिणी ने कथा शुरू की. उन्होंने वसुदेव-देवकी के विवाह, कंस के अत्याचार, देवकी के छह पुत्रों की हत्या और फिर उस भयानक काली रात में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को कृष्ण के जन्म की कथा सुनाई.

जैसे-जैसे माता रोहिणी कथा सुनाती जा रही थीं, सभी रानियां उस भाव सागर में डूबती जा रही थीं. बाहर खड़ी बहन सुभद्रा भी द्वार पर कान लगाकर कथा सुनने लगीं. उनके लिए भी यह सिर्फ़ उनके भाई की कथा नहीं, बल्कि उनके भी बचपन की स्मृतियाँ थीं. सुभद्रा भी कथा के भाव में इतनी खो गईं कि वे द्वार पर ही 'जड़वत' (पूरी तरह से स्थिर, जैसे कोई मूर्ति हो) होकर खड़ी हो गईं.

कथा आगे बढ़ती गई. माता रोहिणी ने गोकुल में श्री कृष्ण और बलराम की नटखट शरारतों, गोपियों संग रास, शकटासुर और पूतना जैसे राक्षसों के वध और सबसे बढ़कर, कृष्ण की बांसुरी की धुन का वर्णन किया. उन्होंने बताया कि कैसे कृष्ण की मुरली सुनकर गोपियां सुध-बुध खो देती थीं, गायों के थन से दूध खुद-ब-खुद झरने लगता था और पूरी सृष्टि जैसे स्तब्ध हो जाती थी. इस सबमें सबसे विचलित होती थीं राधा रानी, जो मुरली की तान सुनकर सब कुछ छोड़कर वन की ओर दौड़ी चली आती थीं.

परमलीला: 'जड़वत' स्वरूप

उधर, द्वारिका के राजमहल में जब रानियों के न मिलने पर खलबली मची, तो श्री कृष्ण और बलराम उन्हें ढूंढते हुए रैवतक पर्वत तक आ पहुंचे. द्वार पर बहन सुभद्रा को 'जड़वत' स्थिति में खड़ा देखकर वे भी चौंक गए. वे दोनों भी सुभद्रा के साथ खड़े होकर अंदर से आ रही माता रोहिणी की कथा सुनने लगे. अपनी ही बाललीलाओं को सुनते-सुनते तीनों भाई-बहन परमानंद की एक ऐसी अवस्था में पहुंच गए, जहाँ वे पूरी तरह से जड़ हो गए. उनकी आँखें फैलने लगीं, और उनके हाथ-पैर शरीर में लुप्तप्राय होने लगे. ऐसा लग रहा था कि उनका अस्तित्व शरीर से परे होकर सिर्फ़ भावमय रह गया हो. यह उनकी एक परमलीला थी.

देवर्षि नारद की विनती और प्रभु का वचन

ठीक उसी समय, देवर्षि नारद वहां पहुंचे. प्रभु को इस 'अंगहीन' और 'निराकार' से स्वरूप में देखकर वे भी विह्वल हो उठे. नारद मुनि ने उन्हें इस अवस्था से बाहर निकाला और फिर हाथ जोड़कर विनती की, “हे प्रभु! मैंने आज आपके जिस दिव्य स्वरूप के दर्शन किए हैं, मैं चाहता हूँ कि धरती लोक पर आपके भक्त चिरकाल तक इसी रूप में आपके दर्शन पाएं.”

श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “देवर्षि, जैसा आपने कहा है, वैसा ही होगा. कलिकाल (कलयुग) में मैं इसी बालभाव वाले स्वरूप में, नीलांचल क्षेत्र (पूरी) में अपना स्वरूप प्रकट करूंगा. तब मेरा यही 'अंगहीन' विग्रह प्रकट होगा, जैसा आपने आज देखा है. अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मेरा यह स्वरूप 'जगन्नाथ' (जगत के नाथ) के नाम से जाना जाएगा.”

कलयुग में भगवान जगन्नाथ

श्री कृष्ण के उसी वचन के अनुसार, आज कलयुग में हम भगवान जगन्नाथ को उनके दिव्य और 'निराकार' विग्रह में देखते हैं. रथयात्रा के पावन अवसर पर, भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने भक्तों के बीच आते हैं. इस स्वरूप में उनके हाथ-पैर नहीं हैं, केवल बड़ी-बड़ी आँखें हैं, ताकि वे अपने भक्तों को जी भरकर देख सकें और भक्तों के प्रति उनका प्रेम हमेशा बना रहे.

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान सिर्फ़ भाव के भूखे हैं. उनका यह स्वरूप प्रेम, समर्पण और परमानंद की परम अवस्था का प्रतीक है.

जय जगन्नाथ! 🙏❤️

2 weeks ago | [YT] | 150

Uttishthata Bharat

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत के महादानी कर्ण ने जीवन भर अपनी सारी संपत्ति दान की, परंतु मृत्यु के पश्चात उन्हें चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से मना कर दिया। इसका कारण यह था कि कर्ण ने सोने-चांदी और संपत्ति का दान तो किया था, लेकिन उन्होंने कभी अन्न का दान नहीं किया था, जिसके कारण उन पर पितृ ऋण शेष रह गया था। पितृ ऋण के निवारण के बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं थी।

कर्ण ने पितृ ऋण को उतारने के लिए धर्मराज से अनुमति मांगी और 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर वापस आए। उन्होंने इन दिनों में अपने ज्ञात और अज्ञात पितरों को प्रसन्न करने के लिए विधिवत श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान किया। इस प्रकार, उन्होंने पितृ ऋण से मुक्ति पाई और मोक्ष प्राप्त किया। इसी के साथ ही श्राद्ध की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जोगे और भोगे दो भाई थे। जोगे अमीर था, जबकि भोगे गरीब। पितृ पक्ष के आने पर, जोगे की अभिमानी पत्नी ने श्राद्ध करने का निर्णय लिया, लेकिन वह इसे एक दिखावे के रूप में करती थी। भोगे की पत्नी ने भी श्राद्ध करने की इच्छा जताई, परंतु उनकी आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वह केवल नाम मात्र का श्राद्ध कर पाई।

पित्र पक्ष में, पितर जोगे के यहां गए, जहां उन्होंने देखा कि जोगे के ससुराल वाले भोजन कर रहे हैं। निराश होकर, वे भोगे के घर पहुंचे, जहां उन्होंने देखा कि भोगे ने केवल एक 'अगियारी' ही दी है। पितरों को भोगे की गरीबी पर दया आई और उन्होंने उसे समृद्ध होने का आशीर्वाद दिया। भोगे के बच्चों ने आंगन में मोहरें पाईं और वे भी अमीर हो गए।

भोगे के अमीर होने के बाद, उसने अगले पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को बुलाकर विधिवत श्राद्ध किया, उन्हें भोजन कराया और दक्षिणा दी। इससे पितर बहुत प्रसन्न और तृप्त हुए।

इन कथाओं से हमें सीख मिलती है कि पितृ पक्ष में अन्न दान, सेवा और दान-पुण्य करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हमारे पितरों को प्रसन्न करता है, बल्कि हमारे जीवन में भी सुख-समृद्धि लाता है और हमें मोक्ष की प्राप्ति में सहायता करता है।

2 weeks ago | [YT] | 141