🚩 *"साधना का प्रभात: जब गुरु ने शिष्यों को सरस्वती पुत्र बना दिया"*🚩
🕞 *सुबह के ठीक 3:30 बजे।* अशोकनगर में शिविरार्थियों के शयन स्थल पर अचानक गूंजती मधुर धुन - *"जागो मोहन प्यारे..."*
यह कोई साधारण आवाज नहीं। यह ब्रह्मचारी विनोद भैया जबलपुर का स्वर है, जो स्नेह और वात्सल्य से लबालब भरा हुआ है। धीरे-धीरे सुप्रभात स्त्रोत की धुन गूंजती है और एक-एक कर शिविरार्थी निद्रा से बाहर आकर जीवन के नव प्रभात में प्रवेश करते हैं।
धोती-दुपट्टा पहनकर सभी तैयार हैं। चारों ओर शांति, लेकिन नवीन गल्ला मंडी शिविर स्थल मानो जीवन्त हो उठा है। श्री पार्श्व जैन मिलन की टीम धोती-दुपट्टा वितरित कर रही है, वहीं बाहर भक्तामर मंडल के युवा हाथ जोड़कर विनम्र आग्रह कर रहे हैं -“बस में बैठ जाइए...” करीब 100 बसें कतार में खड़ी, हजारों शिविरार्थियों को साधना-स्थल तक पहुंचाने को तत्पर।
🕔 *सुबह 5 बज चुके हैं -*
👏🏻 *पाण्डाल में गुरुवर मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज मंच पर आ चुके हैं। मौन पसरा है, केवल गुरुजी की वाणी गूंज रही है।* वे हर एक शिविरार्थी के मस्तक पर बीजाक्षरों का रोपण कर रहे हैं - ठीक वैसे ही जैसे पंचकल्याणक में पाषाण की प्रतिमाओं में करते हैं। क्षणभर में शिविरार्थी सामान्य नहीं रहे – वे अब सरस्वती पुत्र हो गए। *गुरुजी ने उनके भीतर की सुप्त शक्तियों को जागृत कर दिया।*
😢 *शिविरार्थियों की आंखें छलक उठीं…* आंसुओं से भीगे अधरों पर केवल एक ही भावना थी – *“हे गुरुवर! आपने हमें अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में खड़ा कर दिया।* *यह उपकार जन्म-जन्मांतर तक नहीं भूलेंगे।* *यदि कभी आवश्यकता पड़ी, तो अपने प्राणों तक को आपके चरणों में अर्पित कर देंगे।”* *वात्सल्य और भक्ति का यह प्रवाह इतना गहरा था कि गुरु और शिष्य के बीच कोई दूरी ही नहीं रह गई।*
🩷 *हर हृदय एक स्वर में बोल उठा –*
🌞 *“हे गुरुवर, हमें ऐसी शक्ति देना कि हम बार-बार जन्म लें तो भी आपके ही गुण गाएं।* *हमारे जीवन की हर सांस आपके चरणों की धूलि से सुगंधित हो।* *यदि जन्म लेना भी पड़े तो केवल आपके चरणों में आकर।”* *यही वह अनंत प्रेम से भरा गुरु-शिष्य संबंध है –* *जो काल के हर प्रवाह में अमर रहेगा, अविच्छिन्न रहेगा।*
इस शिविर में 8 साल का बालक भी है, और 86 वर्ष का बुजुर्ग भी। मंच पर दोनों का संगम देख पूरी सभा भाव-विभोर हो गई। जब 86 वर्षीय शिविरार्थी ने वहीं शीर्षासन किया, तो पूरा पाण्डाल तालियों से गूंज उठा।
🕕 *सुबह 6 बजे।* पूजन-स्थल पर मंगलाष्टक गूंज रहा है। अभिषेक-शांतिधारा में हर कोई पुण्यशाली बनना चाहता है, जिसका नाम गुरु मुख से लिया जाए। बोली पर बोली चढ़ती जा रही है। सवा लाख... दो लाख! और अंततः बोली फाइनल होती है।
🔴पूजन के बाद *शिविरार्थी भिक्षावृत्ति के लिए शहर में निकले। कतारबद्ध, श्वेत-वस्त्रों में, सिर झुकाए जब वे सड़कों पर चले तो पूरा शहर अचंभित रह गया। “ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा।”* यह चर्चा का विषय बन गया।
भोजन के उपरांत विश्राम, फिर दोपहर 2 बजे गुरुजी मंच पर। कक्षा शुरू होने से पहले शरारती शिविरार्थियों को गुरु-वचन की डांट भी मिली। याद दिलाया गया कि साधना अनुशासन से ही सिद्ध होती है।
फिर प्रश्नोत्तर, छहढाला, जिज्ञासा समाधान – दिनभर साधना का प्रवाह चलता रहा। इस बीच बेल्जियम से आए गौरव जैन ने पूछा – “हम आलू-प्याज नहीं खाते, लोग पूछते हैं क्यों? क्या कोई ऐसी जैन पुस्तक है जो उन्हें दे सकूं?” एक शिविरार्थी ने कहा – “मैंने अपनी मां को 75% लीवर डोनेट किया, पर मां को पता नहीं... ऐसा संबंध कैसे?” गुरुजी ने उत्तर दिया – “जब निमित्त-नैमित्तिक संबंध गहरे होते हैं, तभी ऐसे भाव उपजते हैं।”
*और अंत में वह अमर वाणी –* 🪔 *“धर्म रूढ़ि नहीं है। धर्म एक जीवंत कहानी है।* 🪔 *धर्म जीने की कला है।”*
Baba
_साधना शिविर से लाइव रिपोर्ट -_
🚩 *"साधना का प्रभात: जब गुरु ने शिष्यों को सरस्वती पुत्र बना दिया"*🚩
🕞 *सुबह के ठीक 3:30 बजे।*
अशोकनगर में शिविरार्थियों के शयन स्थल पर अचानक गूंजती मधुर धुन -
*"जागो मोहन प्यारे..."*
यह कोई साधारण आवाज नहीं। यह ब्रह्मचारी विनोद भैया जबलपुर का स्वर है, जो स्नेह और वात्सल्य से लबालब भरा हुआ है। धीरे-धीरे सुप्रभात स्त्रोत की धुन गूंजती है और एक-एक कर शिविरार्थी निद्रा से बाहर आकर जीवन के नव प्रभात में प्रवेश करते हैं।
धोती-दुपट्टा पहनकर सभी तैयार हैं। चारों ओर शांति, लेकिन नवीन गल्ला मंडी शिविर स्थल मानो जीवन्त हो उठा है। श्री पार्श्व जैन मिलन की टीम धोती-दुपट्टा वितरित कर रही है, वहीं बाहर भक्तामर मंडल के युवा हाथ जोड़कर विनम्र आग्रह कर रहे हैं -“बस में बैठ जाइए...”
करीब 100 बसें कतार में खड़ी, हजारों शिविरार्थियों को साधना-स्थल तक पहुंचाने को तत्पर।
🕔 *सुबह 5 बज चुके हैं -*
👏🏻 *पाण्डाल में गुरुवर मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज मंच पर आ चुके हैं। मौन पसरा है, केवल गुरुजी की वाणी गूंज रही है।*
वे हर एक शिविरार्थी के मस्तक पर बीजाक्षरों का रोपण कर रहे हैं - ठीक वैसे ही जैसे पंचकल्याणक में पाषाण की प्रतिमाओं में करते हैं।
क्षणभर में शिविरार्थी सामान्य नहीं रहे – वे अब सरस्वती पुत्र हो गए।
*गुरुजी ने उनके भीतर की सुप्त शक्तियों को जागृत कर दिया।*
😢 *शिविरार्थियों की आंखें छलक उठीं…*
आंसुओं से भीगे अधरों पर केवल एक ही भावना थी –
*“हे गुरुवर! आपने हमें अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में खड़ा कर दिया।*
*यह उपकार जन्म-जन्मांतर तक नहीं भूलेंगे।*
*यदि कभी आवश्यकता पड़ी, तो अपने प्राणों तक को आपके चरणों में अर्पित कर देंगे।”*
*वात्सल्य और भक्ति का यह प्रवाह इतना गहरा था कि गुरु और शिष्य के बीच कोई दूरी ही नहीं रह गई।*
🩷 *हर हृदय एक स्वर में बोल उठा –*
🌞 *“हे गुरुवर, हमें ऐसी शक्ति देना कि हम बार-बार जन्म लें तो भी आपके ही गुण गाएं।*
*हमारे जीवन की हर सांस आपके चरणों की धूलि से सुगंधित हो।*
*यदि जन्म लेना भी पड़े तो केवल आपके चरणों में आकर।”*
*यही वह अनंत प्रेम से भरा गुरु-शिष्य संबंध है –*
*जो काल के हर प्रवाह में अमर रहेगा, अविच्छिन्न रहेगा।*
इस शिविर में 8 साल का बालक भी है, और 86 वर्ष का बुजुर्ग भी।
मंच पर दोनों का संगम देख पूरी सभा भाव-विभोर हो गई।
जब 86 वर्षीय शिविरार्थी ने वहीं शीर्षासन किया, तो पूरा पाण्डाल तालियों से गूंज उठा।
🕕 *सुबह 6 बजे।*
पूजन-स्थल पर मंगलाष्टक गूंज रहा है। अभिषेक-शांतिधारा में हर कोई पुण्यशाली बनना चाहता है, जिसका नाम गुरु मुख से लिया जाए। बोली पर बोली चढ़ती जा रही है। सवा लाख... दो लाख! और अंततः बोली फाइनल होती है।
🔴पूजन के बाद *शिविरार्थी भिक्षावृत्ति के लिए शहर में निकले। कतारबद्ध, श्वेत-वस्त्रों में, सिर झुकाए जब वे सड़कों पर चले तो पूरा शहर अचंभित रह गया। “ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा।”* यह चर्चा का विषय बन गया।
भोजन के उपरांत विश्राम, फिर दोपहर 2 बजे गुरुजी मंच पर। कक्षा शुरू होने से पहले शरारती शिविरार्थियों को गुरु-वचन की डांट भी मिली। याद दिलाया गया कि साधना अनुशासन से ही सिद्ध होती है।
फिर प्रश्नोत्तर, छहढाला, जिज्ञासा समाधान – दिनभर साधना का प्रवाह चलता रहा।
इस बीच बेल्जियम से आए गौरव जैन ने पूछा – “हम आलू-प्याज नहीं खाते, लोग पूछते हैं क्यों? क्या कोई ऐसी जैन पुस्तक है जो उन्हें दे सकूं?”
एक शिविरार्थी ने कहा – “मैंने अपनी मां को 75% लीवर डोनेट किया, पर मां को पता नहीं... ऐसा संबंध कैसे?”
गुरुजी ने उत्तर दिया – “जब निमित्त-नैमित्तिक संबंध गहरे होते हैं, तभी ऐसे भाव उपजते हैं।”
*और अंत में वह अमर वाणी –*
🪔 *“धर्म रूढ़ि नहीं है। धर्म एक जीवंत कहानी है।*
🪔 *धर्म जीने की कला है।”*
*रवि जैन, पत्रकार*
*9926584999*
5 months ago | [YT] | 0
View 0 replies