Rebel Against Myths

Rebel Against Myths
यह चैनल भीतर और बाहर फैले हर मिथक के विरुद्ध एक विद्रोह है।
धर्म, ईश्वर, राजनीति, पर्यावरण, शिक्षा, अहिंसा, आधुनिकता — हर क्षेत्र में झूठ को सच कहकर पेश किया गया है।
Acharya Prashant की दृष्टि में यह चैनल तुम्हें चुनौती देता है — देखने, सोचने और भीतर के अंधकार से टकराने की।

यहाँ तुम जानोगे कि सच्चा धर्म क्या है, हिंसा कहाँ से शुरू होती है, और आज़ादी का अर्थ वास्तव में क्या है।
यह चैनल जवाब नहीं देता — यह प्रश्न उठाता है।

अगर तुम भीड़ से अलग हो, तो यह चैनल तुम्हारे लिए है।
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CREDIT -- ACHARYA PRASANT


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Rebel Against Myths

Shree Acharya Prasant ji🙏🙏🙏

5 months ago | [YT] | 3

Rebel Against Myths

छोटी इच्छा रखोगे तो उसकी अपूर्णता भी खलेगी और पूर्णता उसकी एक नई समस्या बनकर सामने आएगी। और बड़ी चुनौती जीवन में उठा लोगे, बड़े सरोकार रखोगे, तो पहली बात तो ये कि छोटी समस्याएँ तिरोहित हो जाएँगी और दूसरी बात, एक लड़ाई बचेगी। वो लड़ाई अगर जीत ली, तो तर गए। और नहीं जीती, जीतने की कोशिश में मर गए, तो मर गए। कम से कम जरा शान के साथ मरोगे, किसी बड़े अभियान में मरोगे। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या है? आपके द्वारा बताई गई युक्ति से लाभ तो हुआ, परंतु बीच-बीच में माया अपना कार्य कर जाती है और फिर फिसल जाता हूँ। बहुत बेचैनी होती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: नहीं तो माया अपना काम न करे? गेंदबाज गेंद तुम्हें अंडर आर्म लुड़का के देगा क्या? जानते हो फिर दिक्कत क्या आएगी? छक्का नहीं मार पाओगे। सुर्रा गेंद समझते हो? उस पर छक्का पड़ सकता है? मज़ा भी तभी आता है न, जब बिल्कुल नाक-गर्दन की ओर आ रही बाउंसर हो और उसको हुक करो मुँह के सामने से और छ: रन।
देने वाले ने माया को भी सामर्थ्य दी है और तुम्हें भी, वो अपना काम करेगी। वो क्या कर रही है, उसकी शिकायत छोड़ो, चर्चा भी मत करो। तुम अपना काम करो न, जीव पैदा हुए हो। पहली माया तो यही है कि तुम जीव पैदा हो गए, यही बड़ी मायावी बात है। और इसके बाद तो मायावी घटनाओं की पूरी श्रृंखला लगी ही रहेगी। तुम देखो कि तुम्हें फँसना है या नहीं। तुम देखो कि तुम्हें दुख कितना सहना है और आनंद की तुम्हारी अभिप्सा कितनी है।
माया पर तुम्हारा बस नहीं है, अपने सामर्थ्य पर तुम्हारा बस हो सकता है।

प्रकृति तुमसे बाहर का तंत्र है, वो तुमसे पूछकर नहीं चलेगी। जीवन के संयोग तुम्हारे अधिकार के नहीं हैं, तुम्हें नहीं पता कब, क्या, कहाँ, कैसे हो जाएगा। कोई नहीं जानता। अवतार और पैगंबर भी जब जमीन पर उतरते हैं तो उनके साथ भी संयोगवश अनहोनी घटनाएँ हो जाती हैं। उनको भी झटके लग जाते हैं।
हम कौन हैं?
इंसान होने का मतलब ही है, बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। हो सकते हैं, ज़रूरी नहीं है कि हों। अधिकांश लोगों के हाथ में नहीं होते।
अधिकांश लोग तो संयोगों के ग़ुलाम बनकर ही जीते हैं। बाहर किसी ने रुष्ट किया तो भीतर का मौसम बिल्कुल गर्म हो गया। बाहर से कोई आया और प्रशंसा कर गया तो भीतर फूल खिल गए। निंदा हो गई तो भीतर मरुता हो गई।
कोई तारीफ़ करेगा, कोई आलोचना, किसका बस है। जीवन-मरण पर भी किसका बस है। लेकिन एक चीज़ है जिस पर माया का ज़रा भी अधिकार नहीं — वो है तुम्हारी आंतरिकता। तुम्हारे भीतर क्या है। और ये बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो, दुश्वारी हो, भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ। अन्यथा तो जीवन कुछ नहीं है, क्रिया-प्रतिक्रिया की एक सीमित श्रृंखला मात्र है।
कुछ बाहर हुआ, कुछ तुमने किया। जो तुमने किया उसके फलस्वरूप फिर बाहर कुछ हुआ, फिर तुमने कुछ किया। ऐसे ही अपनी कड़ी आगे बढ़ती रहती है, एक दिन मर-मुरा जाता है आदमी। कई बार तो मरना भी एक प्रतिक्रिया ही होती है। बाहर कुछ हुआ, साहब ने अपनी जान ही ले ली। जैसे पैदा हुए थे, ठीक वैसे ही मरे! प्रतिक्रिया वश। समझ में आ रही है बात?
क्रिया-प्रतिक्रिया की कठपुतली ही बनकर न जियो। इसके लिए ज़रूरी है कि भीतर वो हो, जिसको ऋषियों ने कहा आत्मा।

आत्मान माने वो जो पूरी तरह से तुम्हारा है, जो दूसरों की ग़ुलामी में नहीं चलता, जो दूसरों के बहकावे और प्रभाव में नहीं आ जाता, उसको कहते हैं, आत्मा।
अधिकांश लोग आत्मा से बड़े हीन होते हैं, आत्मा से बड़ी दूरी होती है उनकी। अपने आप को ऐसी जगह ले आए होते हैं जहाँ आत्मा से उन्होंने सब संबंध ही छोड़ दिया होता है। फिर वो क्या हैं? वे फिर हाड़-मांस हैं बस। आध्यात्मिक अर्थों में उनको जीवित कहना भी ठीक नहीं होगा। वे चलते हैं, फिरते हैं, खाते हैं, पीते हैं, उठते-बैठते हैं, सोते-जागते हैं। तो वैज्ञानिक दृष्टि से, भौतिक दृष्टि से ऐसा लगता है कि वो ज़िंदा हैं, पर वो ज़िंदा हैं नहीं। ज़िंदा सिर्फ़ उसको मान सकते हो, जिसका कोई अपना वजूद हो।
जिसका वजूद संसार को एक प्रतिक्रिया मात्र है, उसकी अपनी कोई हस्ती हुई क्या? अपनी कोई हस्ती हुई उसकी? तो हम में से अधिकांश लोग हैं ही नहीं। इसी को बुद्ध बता गए थे — अनत्ता, हम नहीं हैं। हमें बड़ा अच्छा लगता है कहना कि हम हैं। "मैं, मैं" हम खूब करते रहते हैं पर हम हैं नहीं।
हम कठपुतली भर हैं। और कठपुतली सोचो, बोले बार-बार "मैं," तो हँसोगे न। जितना ज़्यादा वो बोलेगी "मैं," उतना हँसोगे। तुम कहोगे, तू है कहाँ? तेरी डोर तो पता नहीं कितने दूसरे लोगों के हाथ में है। तुझे रचा भी दूसरों ने और तुझे चला भी दूसरे ही रहे हैं। तू क्यों बोलती है "मैं"? यही माया है — न होना पर कहना "मैं हूँ।" यः माः सः माया जो है नहीं, पर कहती खूब है कि "मैं हूँ," उसको कहते हैं माया।
तो हम में से अधिकांश लोग माया का सामना नहीं कर रहे, हम में से अधिकांश लोग माया ही हैं। क्योंकि हम हैं ही नहीं, पर हमें एहसास ऐसा होता है जैसे कि हम हैं। हम हैं ही नहीं। हम ठीक उतने ही हैं जितना एक कठपुतली होती है या जितना ये पंखा है, कि किसी ने चला दिया तो चल रहा है, कोई बंद करेगा तो बंद भी हो जाएगा। हमसे बेहतर है, क्योंकि वहाँ बैठकर "मैं-मैं" तो नहीं चिल्ला रहा। क्योंकि "मैं-मैं" नहीं चिल्ला रहा, इसीलिए कष्ट में भी नहीं है। हम पहली बात तो मशीन हैं और हम बड़ी मैमियाती हुई मशीन हैं। एक ऐसी मशीन जिसको इस बात के लिए भी संस्कारित कर दिया गया है कि हर वाक्य के साथ बोलो, "मैं।"
अध्यात्म फिर क्या है? अध्यात्म है मशीन को याद दिलाना कि तू मशीन नहीं है। तू मशीन ही होती तो तुझे कोई कष्ट नहीं होता। कोई मशीन है जो तड़प के रोती हो? पर हम रोते हैं न। कोई मशीन है जो कहती हो कि मुझे मुक्ति दे दो, कहती है कभी? झड़ सकती है, जंग लग सकता है, गिर सकती है, बेकार हो सकती है, पर कष्ट में नहीं जीती न।
हम कष्ट का अनुभव करते हैं, इसी से साबित होता है कि हमने गलती कर दी मशीन बनके। हम कुछ और हैं, बन कुछ और गए हैं, इसको कहते हैं माया से बाहर आना। जब तुम्हें दिख जाए, कुछ और हो और कुछ और ही बनकर जी रहे हो, इसीलिए परेशान हो। उस दिन तुम कुछ ऐसा करते हो जो धारणाओं, संस्कारों, कंडीशनिंग से बाहर का होता है। कुछ नया करते हो बिल्कुल, कुछ अलग, अप्रत्याशित। अब कुछ नया हुआ।
श्रोता: जो डेली हमारी लाइफ़ में प्रॉब्लम्स आती हैं, उनको कैसे फेस करना है?
आचार्य प्रशांत: उन्हें एक समस्या क्यों कहते हैं आप? जब आप कह रहे हैं कि जीवन की रोज़मर्रा की समस्याओं का सामना कैसे करें? मैं थोड़ा समझना चाहूँगा। आप समस्या किसको कहते हैं?
श्रोता: अनएक्सपेक्टेड इवेंट्स।
आचार्य प्रशांत: आप एक्सपेक्ट क्या कर रहे होते हैं? और अनएक्सपेक्टेड इवेंट ये हो कि सुबह-सुबह कोई आकर बताए, लॉटरी लग गई। क्या तो भी वो समस्या है? वो भी तो अप्रत्याशित ही है न। उसको भी समस्या कहते हैं क्या? उसको तो समस्या नहीं कहते। समस्या की हमारी परिभाषा क्या है?
श्रोता: जो हमारे अनुरूप न हो। जो हमारी आदतों के हिसाब से न हो।
आचार्य प्रशांत: हमारी कुछ इच्छाएँ होती हैं। उन इच्छाओं से हमारी अपेक्षाएँ, उम्मीदें निकलती हैं। जब उनके खिलाफ़ कुछ हो जाता है तो हम कहते हैं समस्या। हम कहते हैं समस्या। तो समस्या वास्तव में आपकी इच्छाओं के विरुद्ध है। है न?
अब ये बताइएगा कि आपकी जो इच्छाएँ समस्याओं से रुकी नहीं, पूरी भी हो गईं, वो क्या वाक़ई आपको संतुष्टि दे पाई हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है, ग़ौर करके देखिएगा कि आज आप जिन समस्याओं में अपने आप को घिरा पाते हैं, उनमें से अधिकांशतः आपकी पूरी हुई इच्छाओं से जनित हैं। कहिए? आज आप जिसको समस्या कह रहे हैं, उस समस्या के मूल में कहीं आपकी कोई पुरानी इच्छा ही तो नहीं है। अपूर्ण इच्छा नहीं, पूर्ण इच्छा। इच्छा जो कल पूरी हो गई थी वो आज की समस्या है। कहीं ऐसा तो नहीं है।
कल की पूर्ण इच्छा आज की समस्या है और हम कहते हैं कि जो मेरी इच्छा पूरी नहीं हो रही हैं, मैं उनको पूरा करना चाहता हूँ। जो पूरी हो रही हैं इच्छाएँ, वही बन जा रही हैं समस्याएँ। आपने इस दृष्टि से शायद देखा नहीं होगा, ग़ौर करेंगे तो बात कुछ खुलेगी। दोहराता हूँ, जो पूरी हो जा रही हैं इच्छाएँ, आप पा रहे हैं कि वही बन जा रही हैं समस्याएँ। और फिर भी आपका आग्रह ये है कि आज जो इच्छाएँ हैं, उन्हें मुझे पूरा करना ही करना है। अब ये तो बड़ी दिक्कत है, पूरी नहीं हुई इच्छा तो आप कहते हैं समस्या। और ये नहीं देखते हैं कि आज जो सामने खड़ी है समस्या, वो आ रही है पूरी हुई इच्छा से ही ही।
हम आमतौर पर सोचते हैं कि इच्छा का पूरा न होना बड़ी बुरी बात है। बड़ा दुख मनाते हैं न इच्छा नहीं पूरी हुई। जो पूरी हो गई थीं इच्छाएँ, उन्होंने फल क्या दिए ये हम नहीं देखते। विचारणीय है। ज़्यादा बुरा क्या है, अपूर्ण इच्छाएँ या पूर्ण इच्छाएँ? ज़्यादा बुरा कब होता है? जब जो चाहा, वो मिला नहीं या जब जो चाहा, वो मिल ही गया।
याद रखिएगा, हर इच्छा को पूरी करने की एक कीमत होती है। जो इच्छा पूरी हुई है, आवश्यक नहीं है कि वो आपको बड़ा नुकसान पहुँचाए। तभी आप कहें कि ये तो भारी पड़ी, ये तो समस्या बन गई। ये भी देखिएगा कि जो पूरी हुई इच्छा, उसको पूरी करने में आपने जितना समय लगाया, जीवन लगाया, संसाधन लगाए, ऊर्जा लगाई, वो अगर किसी और दिशा में, सही दिशा में लगाए होते तो क्या मिलता?
बात समझ रहे हो?
क्योंकि समय सीमित है, संसाधन सीमित हैं। चार साल लगा दिए किसी इच्छा को पूरी करने में। वो पूरी हो भी गई मान लो, तो ये बताओ कि जीवन के वो जो चार वर्ष हैं, क्या उनका सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही था कि इसी में लगाया जाए? इच्छाओं को लेकर के बहुत सतर्क रहिए। दिक्कत ये नहीं है कि आप जो माँगते हैं उसको पाना बड़ा मुश्किल है। मैंने देखा है कि आदमी का दुर्भाग्य ये है कि वो जो मांगता है, अक्सर उसको वो मिल जाता है। तो बहुत सावधान रहिए माँगने में। कहीं ऐसा न हो, जो चाह रहे हैं वो हो ही जाए। फिर क्या करोगे? किसको दोष दोगे? तुम ही ने चाहा था।
जब इच्छा उठे तो ग़ौर से पूछिए, क्या है जो माँगने लायक है वाक़ई? जो ऊँचे से ऊँचा है, उसको ही माँगो। ऊँचे से ऊँचा माँगोगे तो बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि हमारी तो छोटी ही माँगे मुश्किल से पूरी होती हैं और यही बड़ी राहत की बात है। जिसने कोई बहुत ऊँची चीज़ माँग ली, उसके सामने एक ऊँची समस्या खड़ी हो जाती है कि वो ऊँची चीज़ चाहिए।
राहत क्या मिलती है? राहत ये मिलती है कि समस्या खड़ी हो जाती है, समस्याएँ गायब हो जाती हैं। हमारे पास तो समस्याओं की लंबी सूची होती है न, दिनभर की इच्छाएँ और हर इच्छा की पूर्ति में कुछ बाधा। ये समस्या, ये समस्या, ये समस्या, ये समस्या, जैसे किसी आदमी को दस जगह से मच्छर काट रहे हों। तो मैं कहा करता हूँ, इससे अच्छा जाकर तुम शेर का सामना कर लो। और जो मच्छरों से आतंकित हों, वो पुष्टि करेंगे मेरी बात। वो कहेंगे, शेर से भिड़ लेना ज़्यादा ठीक है। एक बार में आर-पार कर देते हैं।
कल्पना ही कर लो न, जीवन अगर ऐसा हो कि लगातार आठों पहर 10–20–40 मच्छर तुम्हें चुग ही रहे हैं, तो जियोगे कैसे? बोलो, जी पाओगे? उससे अच्छा क्या ये नहीं है कि एक बड़ी चुनौती स्वीकार कर लो ताकि ये सब छोटी-मोटी समस्याएँ तिरोहित हो जाएँ।
ज़िंदगी का नर्क है — रोज़मर्रा की समस्याएँ, और ज़िंदगी का अमृत है — एक ऊँची चुनौती।

5 months ago | [YT] | 3

Rebel Against Myths

उपनिषदों के दर्शन ने आदिकाल से ही भारत और पूरे विश्व में श्रेष्ठतम चिंतकों को प्रेरित किया है। पॉल ड्यूसेन ने कहा, “वेदांत मानव चेतना की सबसे उत्कृष्ट कृतियों में है।” भारत की सुधारवादी धाराओं के मूल में भी उपनिषदों का ही चिंतन है। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, रमण महर्षि, जिद्दू कृष्णमूर्ति, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी इत्यादि उपनिषदों से गहराई से प्रभावित थे। पश्चिम पहुँचने के दो सौ वर्षों के भीतर ही उपनिषदों ने पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारकों, लेखकों व कलाकारों पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है
आचार्य प्रशांत: उपनिषद् भारत में भले ही घर-घर में लोकप्रियता न रखते हों, पर लोकप्रियता बहुधा श्रेष्ठता का मापदंड नहीं होती। उपनिषदों के दर्शन ने आदिकाल से ही भारत और पूरे विश्व में श्रेष्ठतम चिंतकों को प्रेरित किया है।
उपनिषदों के दर्शन और चरित्रों को हम अनगिनत भारतीय ग्रन्थों में पाते हैं। औपनिषदिक विचार के अवलंबन के बिना शायद ही कोई भारतीय ग्रंथ अस्तित्व में आ पाता। महाभारत में, विशेषकर भगवद्गीता में, रामायण में, पुराणों में, स्मृतियों में, मध्यकालीन संतवाणी में, और यहाँ तक कि वेदों से हटकर भी जो नास्तिक दर्शन हैं, उनमें भी उपनिषदों के विचारों को पाया जाता है।
उपनिषदों से साझे सिद्धांत, कथाएँ, चरित्र व पात्र हमें बौद्ध और जैन ग्रन्थों में भी मिलते हैं। वहाँ पर भी आत्मा और कर्म आदि सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है; यद्यपि आत्मा और कर्म से जो उनका अर्थ है, आशय है, वो भिन्न हो सकता है। विशेषकर महात्मा बुद्ध के दर्शन का आधार निश्चित रूप से उपनिषद् ही हैं। बुद्ध को तो निश्चित ही महानतम वेदान्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता है।
इसके अलावा जो बहुत सारे भाष्यकार हैं जिन्होंने उपनिषदों पर बात करी है उनको देखकर पता चलता है कि भारतीय दर्शन के पूरे इतिहास पर ही उपनिषदों की कितनी गहरी छाप रही है।
वेदान्त दर्शन सब भारतीय दर्शनों में समाविष्ट है, बल्कि सब भारतीय दर्शनों का मूल है।

भले ही कतिपय भारतीय समुदाय, वेदान्त क्या वेद से भी बिल्कुल न जुड़े होने का दावा करते हों पर सभी भारतीय धार्मिक समुदाय अपने मूल रूप में, आधारभूत रूप में — हैं उपनिषदों से ही प्रभावित।
विचारणीय है कि उपनिषद् स्वयं बहुत ज़्यादा कभी प्रचलित नहीं हो पाए और उनको जनसामान्य में कभी वो लोकप्रियता नहीं मिली जो कई अन्य दूसरे विचारों-सिद्धांतों या दर्शनों को मिली। लेकिन फिर भी जो कुछ भी दर्शन के तौर पर भारत भूमि से उपजा, उसको प्रेरणा तो वेदान्त से ही मिली है। तो उपनिषदों पर तो दार्शनिक और विचारक और पंडित लोग ही व्याख्या करते रहे, लेकिन उपनिषदों से प्रेरित जो कथाएँ थीं, पुराण थे, मूल सिद्धान्त थे, वो जनसामान्य में बड़े प्रचलित हो गए। यहाँ तक कि जो मध्यकालीन भक्ति और अन्य धाराएँ हैं उनपर भी उपनिषदों का प्रभाव साफ़ परिलक्षित होता है।
“सब भेद मिथ्या है, आत्मा अखंड है, अटूट है, विविधता माया मात्र है। जहाँ कहीं भी आपको कोई दूसरा दिखाई देता है, या पराया दिखाई देता है, वो सबकुछ बस आँखों का धोखा है, मन का खेल है।" इसी सिद्धांत पर फिर आगे चलकर समाज में व्याप्त तमाम कुरीतियों का भी विरोध किया गया। जैसे, जातिप्रथा है, जिसमें ऊँच-नीच की बात है, तो उस पर फिर यही उत्तर दिया गया कि, “देखो जब आत्मा एक है तो ऊँच-नीच कैसे हो सकती है? और जब आत्मा मात्र सत्य है, बाकी सब मिथ्या है तो ऊँच-नीच भी मिथ्या है न।“
जो सुधारवादी धाराएँ भारत में बहीं, मध्यकाल से लेकर के आधुनिक काल तक, उनके मूल में भी उपनिषदों का ही चिंतन है।
दाराशिकोह ने फ़ारसी में जो उपनिषदों का अनुवाद किया था, सम्भावना है कि उससे सूफ़ी चिंतन पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा। त्याग और विलासिता से दूरी, मोह और आसक्ति से दूरी – ये सिद्धांत मूलरूप से उपनिषदों से हैं। और संभावना है कि सूफ़ियों ने भी इन्हें वहीं से ग्रहण किया।
अट्ठारहवीं शताब्दी के सुधारवादी माहौल में राजा राममोहन राय ने सब कर्मकांड व मूर्तिपूजा का खंडन किया परंतु वेदान्त में पूर्ण विश्वास रखा। ब्रह्म समाज के माध्यम से वो उपनिषदों के पाठ को प्रेरणा देते, उन्होंने उपनिषदों का बंगाली, हिन्दी व अंग्रेज़ी में अनुवाद किया व ब्रह्म समाज के माध्यम से उनका प्रचार भी किया।
इसी तरह से आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती भी उपनिषदों से कई बार उद्धृत किया करते थे। रमण महर्षि का जो उपनिषदों से लगाव था उसकी तो क्या ही बात करें! इनके अलावा जिद्दू कृष्णमूर्ति भी जो बात कहते थे, वो मूल रूप से वेदान्त की ही है। स्वामी विवेकानंद का तो कहना ही क्या, उन्होंने तो वेदान्त को भारत में ही नहीं पश्चिम में भी बहुत प्रचारित किया। महात्मा गाँधी भी भगवद्गीता को रोज़ पढ़ा करते थे, उनको अपनी माँ बोलते थे, ईशावास्य उपनिषद् से भी काफ़ी प्रभावित थे, 'ईशावास्य इदं सर्वं' उनका प्रिय श्लोक था। जवाहरलाल नेहरू ने उपनिषदों की गौरवपूर्ण बात करी है ‘भारत एक खोज’ में, भीमराव अम्बेडकर ने भी 'अहम् ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों को उद्धृत किया ये बताने के लिए कि जातिभेद वगैरह व्यर्थ की बात है, हालाँकि वे यह भी कहते थे कि उपनिषदों के विचार हिन्दू धर्म की मुख्यधारा में समाहित नहीं हो पाए।
तो इस तरह उपनिषदों का प्रभाव तो ज़बरदस्त रहा है लेकिन फिर भी माया का कुछ ऐसा खेल है कि स्वयं उपनिषद् ही हिन्दू धर्म की मुख्यधारा से थोड़ा अलग ही रह गए।
कोई भारतीय उपनिषदों का यदा-कदा ही पाठ करता होगा, अधिकांश लोग तो उपनिषदों का नाम भी नहीं जानते।

सम्पूर्ण विश्व में
उपनिषदों से एकदम मिलते-जुलते सिद्धांत हमें ग्रीक दर्शन में देखने को मिलते हैं। उदाहरण के लिए – पाइथागोरस, सुकरात, प्लेटो आदि ईसा पूर्व पाँचवीं से दूसरी शताब्दियों तक के दार्शनिकों के वक्तव्यों में। प्लेटो का 'गुफा का रूपक' तो अवश्य ही उपनिषदों से प्रेरित प्रतीत होता है। मैक्स मूलर ने प्लेटो के लेखन और उपनिषदों के दर्शन के बीच की समानता को अद्भुत माना है। प्लेटो के गुरु सुकरात भी, कहा जाता है कि, एथेंस की सड़कों पर विचरते एक भारतीय दार्शनिक से मिले जिससे उन्होंने ब्रह्म और अब्रह्म के बीच संबंध का ज्ञान पाया। ग्रीक दार्शनिकों का पुनर्जन्म में विश्वास भी संभवतः पूर्व से ही आया।
दाराशिकोह की 1657 ई. की 'सिर्र-ए-अकबर' नामक पुस्तक में 52 उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद था। दाराशिकोह ने बनारस से विद्वानों को दिल्ली बुलाया, और लगभग दो वर्ष में यह किताब पूर्ण हुई। सनातन धर्म के प्रति सम्मान और उदारता का दृष्टिकोण रखने के कारण औरंगज़ेब ने उसे काफ़िर घोषित कर दिया और अंततः उसकी हत्या कर दी। आज इतिहास में दाराशिकोह हाशिये का एक नाम बनकर रह गया है, लेकिन उनका योगदान बहुत आगे तक गया। फ़ारसी से उपनिषदों की एक प्रति फ्रेंच में, फ़्रांस्वा बर्नियर, जो बारह साल तक औरंगज़ेब के चिकित्सक थे, द्वारा अनुवादित होकर फ्रांस पहुँच गई। यूरोप में उसका फ्रेंच और लैटिन में अनुवाद हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में जब ब्रिटिश और जर्मन पंडितों ने उपनिषदों का अनुवाद करना शुरू करा, उससे पहले ही दाराशिकोह की किताब पश्चिम में पहुँच चुकी थी।
लगभग सौ साल बाद अब्राहम ऐन्केटिल ने इस किताब का लैटिन में अनुवाद किया, ‘ओउपनख़ात’ नाम से। इसी लैटिन किताब के माध्यम से जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर व अन्य यूरोपियन बुद्धिजीवियों का उपनिषद् से परिचय हुआ। शोपेनहावर की ‘द वर्ल्ड ऐज़ विल एंड रिप्रेजेंटेशन’ छान्दोग्य उपनिषद् पर आधारित है। उनके पास टूटा-फूटा लैटिन अनुवाद आया था, लेकिन फिर भी शोपेनहावर किसी तरह समझ ही गए कि उपनिषदों की मूल बात क्या है।
इसी तरीके से फ़्रेडरिक नीत्शे और कार्ल गुस्ताव युंग – इन सब पर स्पष्ट रूप से उपनिषदों का प्रभाव था और फिर इसके बाद तो अंग्रेज़ी अनुवाद भी उपलब्ध होने लग गए। जब अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध होने लग गए तो कवि जैसे टी. एस. इलियट और राल्फ वाल्डो एमर्सन, व्हिटमैन – जो ट्रांससेंडेन्टलिस्ट्स कहे जाते थे – उपनिषदों के सिद्धांतों से प्रभावित हुए। सर विलियम जोंस ने तो एक अनुवाद भी किया अंग्रेज़ी में ईशावास्य उपनिषद् का और यही करने वाले आगे थे राजा राममोहन राय, मैक्स मूलर आदि चिंतक।
उन्नीसवीं शताब्दी के फ्रेंच दार्शनिक विक्टर कज़िन ने भगवद्गीता के दो अध्यायों का अनुवाद किया। कहा कि, “जब हम भारत के दर्शन की ओर देखते हैं तो वहाँ हमें ऐसे अथाह सत्य का ज्ञान होता है जो हमारे यूरोपियन विचारकों के उथले निष्कर्षों के सर्वथा विपरीत है। हमें विवश होकर के पूर्व के सामने घुटने टेकने ही पड़ते हैं और मानना पड़ता है कि उच्चतम मानव दर्शन का यही जन्मस्थान है।"
फ़्रेडरिक शैलिंग ने शोपेनहावर से भी ज़्यादा उत्कंठित भाषा में उपनिषदों की वंदना की और अपने शिष्य मैक्स मूलर को उपनिषदों के अनुवाद के लिए प्रेरित किया। मैक्स मूलर ने संस्कृत सीखी, ऋग्वेद मे गहरी रुचि दिखाई और अपने समय के प्रख्यात भारतविद् हुए। उनके उत्तराधिकारी पॉल ड्यूसेन ने कहा, “वेदान्त मानव चेतना की सबसे उत्कृष्ट कृतियों में है। बोध वृक्ष पर उपनिषदों से सुंदर कोई पुष्प नहीं और वेदान्त जैसा उत्कृष्ट कोई फल नहीं।“
इमर्सन कठ उपनिषद् से प्रभावित थे और उनकी कविताएँ ‘सेलेस्टियल लव’, ‘वुड-नोट्स’ व ‘ब्रह्म’ एक सार्वभौम औपनिषदिक सिद्धांत की अभिव्यक्ति करती हैं। वॉल्ट व्हिटमैन ने अपनी ‘लीव्स ऑफ़ ग्रास’ व ‘सॉन्ग ऑफ़ माइसेल्फ’ में अपने अनंत अमर स्वभाव का वर्णन किया है।

ट्रांससेंडेन्टलिस्ट्स से भी पहले अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एडम्स ने उपनिषदों का महान पाठ किया था। अपने जीवन के आख़िरी दिन भी वे अपने मित्र थॉमस जेफ़रसन के साथ वेदान्त विषय पर ही चर्चा कर रहे थे। उनकी व जेफ़रसन की मृत्यु साथ ही हुई।

प्रख्यात वैज्ञानिक बेंजामिन फ़्रेंकलिन ने भी आत्मा की अमरता का वर्णन किया है।

रूसी कहाँ पीछे रहने वाले थे यूरोप और अमेरिका से! लिओ टॉलस्टॉय ने उपनिषदों व भगवद्गीता में गहरी रुचि दिखाई। महात्मा गाँधी को प्रेषित “फ्री हिन्दुस्तान” में छपा उनका पत्र ‘अ लेटर टु अ हिन्दू’ वेदान्तिक सूत्रों व उद्धरणों से भरा हुआ है।

आधुनिक युग में पॉल गौगुइन ने अपनी कृतियों में कर्म विषयक विवेचनाएँ करीं। वे ये भी मानते थे कि पायथागॉरस प्राचीन भारतीय ऋषियों के शिष्य थे।

जेम्स जॉयस ने ‘यूलिसिस’ में, जैक लंडन ने ‘स्टार रोवर’ में, हरमन हेस ने ‘सिद्धार्थ’ में, और रिचर्ड बाक ने ‘जोनाथन लिविंग्स्टन सीगल’ में वेदान्त को ही आधारभूत रखा है। नोबेल पुरस्कार विजेता इसाक बेशविस सिंगर ने, व कवि जॉन मेसफील्ड ने वेदान्त के सूत्रों को कलात्मक अभिव्यंजना दी है। पश्चिम पहुँचने के दो-सौ वर्षों के भीतर ही उपनिषदों ने पाश्चात्य दार्शनिकों, विचारों, लेखकों व कलाकारों पर परिवर्तनकारी प्रभाव डाला है।

उपनिषद् ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली तो बहुत रहे हैं, पर बस उन्हीं चिंतकों और साधकों के लिए जो सच के खोजी हैं।

आज समय ऐसा है कि सच की निकटता बहुत आवश्यक हो गई है। तो कालधर्म है कि उपनिषदों को जनसामान्य के बीच भी वो स्थान दिलाया जाए जिसके वे अधिकारी हैं। ‘घर-घर उपनिषद्’ इसी दिशा में एक प्रयास है।
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