ॐनम:
📿श्री शांतिसागराय नम:📿
🌅मुनिकुल पितामहआचार्यवर्य गुरुणाम गुरू प्रथमाचार्य, चारित्र्य चक्रवर्ती 🦚परम पूज्य श्री १०८शांतिसागरजी महाराज की जय हो🙏🙏🙏
जैन संस्कृतीची संस्कार केंद्रे जिन प्रतिमा 🙏🙏🙏जिनमंदीर🛕
🌅जिनधर्म प्रभावणा ⛳

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Pradip Patil

*चारित्र चक्रवर्ती, समाधी सम्राट, गुरुणांगुरु,धर्मसाम्राज्यनायक, उपसर्ग विजेता, मुनिकुल पितामह,प्रातःस्मरणीय,
युगप्रवर्तक प्रथमाचार्य श्री१०८ शांतिसागरजी महाराजजीयांच्या ७० व्या पुण्यतिथी निमित्त त्रिवार नमोस्तु ....!🙏🙏🙏💐
*भाद्र.शु.द्वितीया..*
*प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी महामुनिराज पुण्यतिथी* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रथमाचार्य 108 श्री शांतिसागरजी महामुनिराज यांनी जैन समाज, संस्कृती आणि परंपरा या सर्वांचे पुनरुज्जीवन करण्याचे अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य केले.
प्रथमाचार्य शांतिसागरजी महामुनिराज यांचा आजोळ यळगुळ येथे जन्म, भोज ही महाराजांची कर्मभूमी ! ध.श्री.भिमगौंडा पाटील आणि ध.सौ.सत्यवती यांचे सुपुत्र म्हणजे ध.श्री.सातगौंडा पाटील हे होत !
लहानपणापासूनच धर्माची आवड, त्यागाचे भाव, स्वाध्यायाची सवय या सर्वांच्या परिणामी सातगोंडा यांची दीक्षा संपन्न झाली. महाराजांनी अंगावरचे शेवटचे लंगोटीचे वस्त्रही उतरवून जी दिगंबरी, जैनेश्वरी दीक्षा धारण केली, तीचे त्यांनी अखेरपर्यंत कठोरपणे पालन केले. किंबहुना दिगंबर विहाराला परवानगी मिळवून देण्याचे महान कार्य महाराजांच्या माध्यमातून झाले !
अगदी थोडक्यात जर बघायला गेलो तर
सन 1915 - क्षुल्लक दीक्षा,
सन 1919 - ऐल्लक दीक्षा,
सन 1920 - मुनि दीक्षा,
सन 1924 - चतुःसंघाकडून आचार्य पद प्रदान,
सन 1925 - श्रवणबेळगोच्या महामस्तकाभिषेकात मंगल सानिध्य,
सन 1925 - आपल्या गुरूंना पुन्हा दीक्षा दिली,
सन 1927 - उत्तर भारताकडे विहार,
सन 1933 - गुरुदेव समंतभद्र महाराजजींना क्षुल्कक दीक्षा,
सन 1937 - गजपंथ येथे चारित्र चक्रवर्तीपद प्रदान,
सन 1942 - शास्त्र संरक्षणार्थ प्रेरणा,
सन 1952 - हीरक महोत्सव आणि
सन 1955, भाद्र.शु.व्दितीया, स.6.50 मि. - सल्लेखनापूर्वक समाधी !
..असा हा महाराजांचा अगदी थोडक्यात जीवनालेख बघितल्यानंतर महाराजांनी अखेरपर्यंत सचित्त, जागृत अवस्थेत 36 दिवसांची सल्लेखना साधली आणि अत्यंत शांतपणे नश्वर देहाचा त्याग करून आद्रपद शुद्ध द्वितीया, सन 1955 रोजी सकाळी कुंथलगिरी या सिद्ध क्षेत्रावरून स्वर्गमोक्षमार्गक्रमण केले.
या भव्याज्ञाने हजारो किलोमीटर्सचा विहार केला, 9938 दिवस उपवास केला, अनेक व्रते धारण केली, विविध पंचकल्याण पूजांमध्ये सानिध्य दिले, मिथ्यात्वाचे निराकरण करून सम्यक्त्वाचा प्रचार केला, अनेक भव्य जीवांना दीक्षा देऊन त्यांच्या जीवनाचे कल्याण केले..!
*..आणि अखेरीला शरीराचा त्याग करुन मृत्यू सुद्धा कसा शांतपणे स्वीकारता येतो, हे जगाला दाखवून दिले !*

*त्रिवार शुद्धीपूर्वक नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु..*
🌹🙏🙏🙏🌹

*( क्रमशः ) ( दि.25/08/2025)*

*--डॉ.अजित ज.पाटील, सांगली*
🌿🌿🌿
(ए.8599/आ.3018)

4 months ago (edited) | [YT] | 26

Pradip Patil

आशुकवि 🦚मुनिश्री१०८उत्तमसागरजी महाराज जी 🙏🙏🙏३८ वा पावन वर्षायोग चातुर्मास २०२५मंगल कलश स्थापना अतिशय क्षेत्र 🚩🚩श्रीधरगिरी कुंडल ता,पलूस जिल्हा सांगली

5 months ago (edited) | [YT] | 32

Pradip Patil

श्री शांति वीर शिव धर्माजीत वर्द्धमान सुर्रिभ्यो नमः🙏🙏🙏

🦚प्रथमाचार्य चारित्र चक्र वति आचार्य श्री शांति सागर जी जी के 153 वे वर्ष वर्धन अवतरण दिवस आषाढ़ वदी 6 जन्म दिन के अवसर पर श्री शान्तिसागर जी महा मुनिराज का परिचय✳️✳️✳️

दिगम्बर साधु सन्त परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी सन्त हुए। उनमें आचार्य शान्तिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं, जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवन्त किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर जी तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजित सागर जी तथा पंचम पट्टाचार्य वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर के रूप में आज तक प्रवाहमान है।

जन्म -

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगाँव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान यळगूड महाराष्ट्र यलगुल गाँव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6, विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया ।



बचपन

- सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे, बाल्यकाल से ही वे शान्ति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परन्तु माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा! जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे।



व्यवसाय -

मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कन्धे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे, तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दी। इस प्रकार उनकी निस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुम्ब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया।



संयम पथ -

माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गये एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1915को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। क्षुल्लक जी ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते ? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ।


ऐलक दीक्षा

नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया वहाँ से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।

मुनि दीक्षा

उस समय यरनाल में पञ्चकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था वहाँ जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपने अपने गुरुदेव देवेन्द्रकीर्ति जी से फागुन शुक्ला चतुर्दशी 24 मार्च सन 1920 को मुनिदीक्षा ग्रहण की। सन 2020 में यरनाल मुनि दीक्षा स्थली पर पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में मुनि दीक्षा का शताब्दी वर्ष मनाया गया।

आचार्य पद

समडोली में श्री नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा व श्री वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।

चारित्र चक्रवति
गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।
सल्लेखना -
जीवन पर्यन्त मुनिचर्या का निर्दोष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण सल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने सल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-सल्लेखना का व्रत लिया जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम सल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री १०८ वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहाँ मुनिराज विराजमान थे) पहुँचाया। आचार्य श्री ने ३६ दिन की सल्लेखना में केवल १२ दिन जल ग्रहण किया।
१८ सितम्बर १९५५ को प्रातः ६.५० पर ॐ सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शान्तिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शान्तिसागर नाम को सार्थक किया।


साधु जीवन में सर्प ,शेर आदि के अनेक उपसर्ग हुए।आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे।चींटियों का, मकोड़े का, पागल व्यक्ति द्वारा प्रहार सहित अनेक उपसर्ग आपने शांति के सागर बन कर साम्य भाव से सहन किए

आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था 18 वर्ष में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया कम उम्र 25 वर्ष में जूते तथा बिस्तर का त्याग कर दिया ।32 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था

उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन उपवास किए। कुल 9938 उपवास किए

अन्नाहार का त्याग

बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष पश्चात् इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबन्धन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया।
दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अत: 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गये तथा जामामस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहाँ रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आवेगा, दिगम्बर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिन्ता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।
आगम ग्रन्थों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्ररेणा से सिद्धान्त ग्रन्थों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्य श्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।

दीक्षित शिष्य
1 मुनि 26
2 आर्यिका 4
3 ऐलक 16
4 क्षुल्लक 28
5 क्षुल्लिका 14
योग 88

गुरुणा गुरु

श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है
वर्ष 1925 में आप श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे

राजेश पंचोलिया इंदौर
9926065065
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार

6 months ago | [YT] | 47

Pradip Patil

चारित्र चक्रवर्ती, मुनिकुलपितामहा .समाधी सम्राट,गुरुणांगुरु, धर्मसाम्राज्यनायक, उपसर्ग विजेता, प्रातःस्मरणीय, युग प्रवर्तक,
२०व्या शतकातील प्रथमाचार्य 🦚श्री १०८ शांतिसागरजी महाराज यांच्या १५३ व्या जन्म जयंती* निमित्त
*शुद्धीपूर्वक नमोस्तु नमोस्तु...!!!🙏🙏🙏

6 months ago (edited) | [YT] | 48

Pradip Patil

🦚मुनिकुलपितामहा गुरुणामगुरू चारित्र्य चक्रवर्ती समाधी सम्राट प्रथमाआचार्यश्री श्री१०८ शांतिसागरजी महाराजजी 🙏🙏🙏मुनि दीक्षा दिवस संयम वर्ष १०६ फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी सन १९२०🙏🙏🙏नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु आचार्यश्री

9 months ago (edited) | [YT] | 73

Pradip Patil

........पर्यूषण पर्व २०२४....... उत्तम हायकू...... धर्म
🌿 उत्तम शौच🙏🙏🙏
----------------☀️---------------
|| पर्युषण पर्व || उत्तम शौच || ११ सप्टेंबर २०२४
जो आंतरिक शुचिता या आंतरिक निर्मलता का भाव हे वही शौच धर्म है !

1 year ago | [YT] | 97

Pradip Patil

*प. पू. समाधिसम्राट चारित्रचक्रवर्ती प्रथमआचार्य श्री १०८शांतिसागर महाराज श्री का जीवन चरित्र*
*~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~*
*संकलन - प. पू. गणिनीप्रमुख आर्यिकारत्न 105 श्री जिनदेवी माताजी*
🪷 *जन्मतिथि व स्थान - 26 जुलाई 1872 आषाढ़ कृष्ण षष्ठी बुधवार रात्रि यलगुड यळगूड गाँव महाराष्ट्र में*
🪷 *माता-पिता नाम- सौ.सत्यवती पाटील, श्री भीमगौंडा पाटील*
🪷 *जन्म नाम - श्री सातगौंडा पाटील,*
🪷 *भाई-बहनों के नाम - आदिगोडा, देवगोडा, कुमगोडा*
*बहन कृष्णाबाई*

🪷 *विवाह 9 वर्ष की उम्र में 6 साल की कन्या के साथ विवाह हुआ था लेकिन 6 महीने के बाद ही धर्मपत्नी का स्वर्गवास हुआ। बाल ब्रह्मचारी रहे।*
🪷 *क्षुल्लक दीक्षा व दीक्षा गुरु- 1914 उत्तुर गाँव (कर्नाटक) में प.पू.देवेंद्रकीर्तीजी महाराज*

🪷 *ऐल्लक दीक्षा - श्री सिद्धक्षेत्र गिरनारजी*

🪷 *मुनि दीक्षा व दीक्षा गुरु - 1920 यरनाल गाँव (कर्नाटक) पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में प.पू. देवेंद्रकीर्तीजी महाराज*

🪷 *आचार्य पद - 1924 समडोळी गाँव (महाराष्ट्र)*

🪷 *संपूर्ण भारत में लगभग 20 हजार किलोमीटर का विहार किया।*

🪷 *सम्यक्त्व का प्रसार और मिथ्यात्व का निराकरण करने का श्रेष्ठतम कार्य किया था।*

🪷 *चारित्रचक्रवर्ती पद प्रदान - 1937 श्री क्षेत्र गजपंथा पर चतुर्विध संघ द्वारा*

🪷 *ताम्रपट पर शास्त्र उत्कीर्ण करके श्रुतसंरक्षणा के महानतम कार्य किया।*

🪷 *उपवास की संख्या- 9938*
*चारित्र शुद्धि के 1234*
*तीस चौबीस के 720*
*कर्मदहन व्रत तीन बार - 156×3=468*
*सिंहनिष्क्रिडित व्रत तीन बार - 90×3= 270*
*सोलहकारण व्रत के16 बार - 16×16= 256*
*श्रुतपंचमी के व्रत- 36*
*विदेह क्षेत्र के बीस तीर्थंकर व्रत - 20*
*दसलक्षण के व्रत-10*
*अष्टाह्निका व्रत के - 8*
*सिद्ध व्रत के -8*
*गणधर व्रत के-1452 में से 200 उपवास*
*16 दिन के तीन बार -16×3= 48*
*10 दिन के -10*
*9 दिन के 6 बार - 9×6=54*
*8 दिन के 7 बार- 8×7= 56*
*7 दिन के 6 बार -7×6=42*
*6 दिन के 6 बार - 6×6=36*
*5 दिन के 6 बार - 5×6=30*
*4 दिन के 6 बार- 4×6=24*
*अंतिम समाधि के -36 उपवास*
*और भी 6372*

🪷 *अमर अमूल्य अंतिम उपदेश - 8 सितम्बर 1955, सायं 5 बजे श्री क्षेत्र कुंथलगिरी पर*

🪷 *संलेखना के 26वें दिन 22 मिनट तक अंतिम उपदेश हुआ - भव्य बंधुओं! संयम धारण करो। संयम धारण करने के लिए डरो मत। संयम और सम्यक को धारण किए बिना कल्याण नहीं।*

🪷 *अंतिम चातुर्मास- सन् 1955 कुंथलगिरी सिद्धक्षेत्र पर*

🪷 *यम सल्लेखना ग्रहण- 15 अगस्त 1955*

🪷 *समाधिमरण - भाद्रपद शु. व्दितीया 18 सप्टेबर 1955 की सुबह 6:50 पर श्री सिद्ध क्षेत्र कुंथलगिरी में*

🪷 *आचार्यश्री द्वारा दीक्षित त्यागीवृंद-*
1) वीरसागर जी
2) सुधर्मसागर जी
3) नेमिसागर जी
4) चंद्रसागर जी
5) कुंथुसागर जी
6) पायसागर जी
7) नमीसागर जी
8) चंद्रकीर्ति जी
9) धर्मसागर जी
10) वर्धमान सागर जी
11) पिहितास्रव जी आदि

1 year ago (edited) | [YT] | 110

Pradip Patil

#आप किसी के ? #मुनिश्री१०८ उत्तमसागरजी महाराजजी #हायकू सुत्र २०२४ वर्षायोग #कुंडल #सिध्दक्षेत्र #गिरिपार्श्वनाथ समोर मुनि #श्रीधरगिरी पूर्व पायथा कुभांरगावरोड कुंडल#प्राचिनसिध्दक्षेत्र

1 year ago (edited) | [YT] | 105

Pradip Patil

भा र त इन तीन अक्षरों का सही अर्थ

1 year ago | [YT] | 105

Pradip Patil

आषाढ शुक्ल पौर्णिमा 💠गुरू पौर्णिमा 🙏🙏🙏🦚 श्री १००८महावीर भगवान केवल ज्ञान प्राप्त💫 होऊन अरिहंत पद प्राप्त✳️ झाले नंतर याच दिवशी इंद्रभूती गौतम यांना प्रथम शिष्य बनवले अशाप्रकारे गुरू झाले तो दिवस गुरू पौर्णिमा🙏🙏🙏

1 year ago (edited) | [YT] | 114