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बन्दर और टोपीवाला (बहुत ही सुन्दर कहानी)

बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में एक मेहनती टोपी बेचने वाला रहता था। वह रोज़ सुबह उठकर अपने टोपी से भरे थैले को उठाता और पास के गाँवों में जाकर टोपियाँ बेचता। उसकी टोपियाँ सुंदर रंग-बिरंगी होती थीं, जिनमें कई डिज़ाइन और प्रकार होते थे। गाँव के लोग उसकी टोपियों को पसंद करते थे, और इसी से उसका गुज़ारा चलता था।

एक बार की बात है। टोपी बेचने वाला एक दूर के गाँव में टोपियाँ बेचने गया था। कई दिन वहाँ रुककर उसने बहुत सी टोपियाँ बेचीं और अब वह अपने गाँव वापस लौट रहा था। उसके थैले में अब भी बहुत सारी टोपियाँ बची थीं। गर्मी का दिन था, सूरज तेज़ चमक रहा था, और रास्ता लम्बा था। थकावट की वजह से उसका शरीर जवाब देने लगा था।

चलते-चलते उसे रास्ते में एक बड़ा सा पेड़ दिखाई दिया। उसकी शाखाएं घनी थीं और नीचे घना छाया बना हुआ था। उसने सोचा, “थोड़ी देर इस पेड़ की छाँव में आराम कर लेता हूँ। फिर ताज़ा होकर गाँव के लिए निकलूंगा।”

उसने अपना टोपी से भरा थैला नीचे रखा और पेड़ की छाया में लेट गया। वह इतना थका हुआ था कि कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गया। दोपहर की गर्मी में चारों ओर शांति थी और पंछियों की आवाजें वातावरण को मधुर बना रही थीं।

कई घंटे बाद उसकी नींद खुली। जैसे ही वह उठा, उसने देखा कि उसका थैला खाली पड़ा है। एक टोपी छोड़कर सारी टोपियाँ गायब थीं! वह घबरा गया और इधर-उधर देखने लगा। उसने चिल्लाते हुए कहा, “अरे! मेरी टोपियाँ कहाँ गईं? किसने ले लीं?”

तभी उसे ऊपर से कुछ अजीब-सी आवाजें सुनाई दीं। जब उसने ऊपर देखा, तो हैरानी से उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। पेड़ की शाखाओं पर बहुत सारे बंदर बैठे हुए थे और उन सब ने उसकी टोपियाँ पहन रखी थीं! कोई लाल टोपी में था, कोई हरी टोपी में, और कोई नीली टोपी में! बंदर खुशी-खुशी उछल-कूद कर रहे थे, जैसे वे इन टोपियों से खेल रहे हों।

टोपीवाला परेशान हो गया। उसने ज़ोर से चिल्लाया, “बंदरों! मेरी टोपियाँ वापस करो!” लेकिन बंदर तो बंदर थे, वे उसकी नकल करने लगे। वह इधर-उधर भागा, हाथ हिलाने लगा, और बंदर भी उसकी हरकतें दोहराने लगे। तभी उसे एक पुरानी बात याद आई — उसके दादा ने कभी उसे बताया था कि बंदर इंसानों की नकल बहुत अच्छे से करते हैं।

उसने तुरंत एक तरकीब सोची। उसने अपने सिर पर पहनी हुई टोपी को धीरे से उतारा और गुस्से से ज़मीन पर पटक दी। जैसे ही उसने ऐसा किया, ऊपर बैठे सभी बंदरों ने भी उसकी नकल की और अपने सिर से टोपी उतारकर नीचे फेंक दी।

टोपी बेचने वाला खुशी से झूम उठा! उसने फुर्ती से सभी टोपियाँ समेट लीं और थैले में भर लीं। इस बार उसने सोचा, “आराम करना भी ज़रूरी है, लेकिन सावधानी हमेशा ज़्यादा ज़रूरी होती है।”

अब वह तेज़ी से अपने गाँव की ओर चल पड़ा — थोड़ा थका हुआ, लेकिन खुश और संतुष्ट, क्योंकि उसकी सारी टोपियाँ वापस मिल गई थीं।

सीख:
इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि संकट की घड़ी में घबराने की बजाय बुद्धिमानी और समझदारी से काम लेना चाहिए। समस्या का समाधान सोच-समझकर किया जाए, तो कठिन परिस्थितियों से भी बाहर निकला जा सकता है।

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