Pawan Giri Goswami

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जंगल में चुनाव

एक घने जंगल में एक शेर का राज था। जंगल के सारे जानवर शेर से बहुत परेशान थे। शेर का डर ऐसा था कि कोई भी जानवर उसके सामने अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं करता था।

एक दिन खरगोश, हिरण, भालू, हाथी और दूसरे जानवर आपस में इकट्ठा हुए।

खरगोश बोला,
“आखिर कब तक हम शेर के डर में जीते रहेंगे? क्यों न जंगल में चुनाव करवाया जाए और एक नया सरपंच चुना जाए?”

सभी जानवरों को बात पसंद आई। एक बड़ी सभा बुलाई गई। शेर को भी बुलाया गया।

सभा में तय हुआ कि जंगल में चुनाव होगा।

अब सवाल आया कि शेर के सामने चुनाव कौन लड़ेगा?

तभी बंदर आगे आया और बोला,
“अगर आप सब चाहें तो मैं सरपंच का चुनाव लड़ सकता हूँ।”

सभी जानवरों ने उसका समर्थन किया।

चुनाव हुआ।

जंगल के जानवरों ने बंदर को अपना सरपंच चुन लिया।

बंदर की जीत से सारे जानवर खुश थे, लेकिन शेर बहुत नाराज़ हुआ। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई कि जंगल के जानवरों ने उसके सामने किसी और को अपना नेता चुन लिया।

कुछ दिन बाद शेर ने एक हिरण के छोटे बच्चे को पकड़ लिया और उसे जंगल के अंदर ले गया।

हिरणी रोती-बिलखती हुई बंदर के पास पहुँची।

“सरपंच साहब! मेरे बच्चे को शेर उठा ले गया है। आप ही उसे बचाइए।”

धीरे-धीरे बाकी सारे जानवर भी बंदर के पास पहुँच गए।

“सरपंच जी, अब आपकी जिम्मेदारी है। हमारे बच्चे को शेर से बचाइए।”

बंदर ने इधर-उधर देखा।

शेर से लड़ने की उसकी हिम्मत नहीं थी।

लेकिन अब वह सरपंच था। उसे कुछ तो करना ही था।

वह अचानक एक पेड़ पर चढ़ गया।

फिर दूसरे पेड़ पर छलांग लगाई।

फिर तीसरे पेड़ पर।

कभी इस पेड़ से उस पेड़, कभी उस पेड़ से तीसरे पेड़ तक...

वह पूरे दिन जंगल में इधर-उधर कूदता रहा।

सभी जानवर नीचे खड़े होकर देखते रहे।

शाम हो गई।

बंदर थका हुआ नीचे उतरा और बड़े आत्मविश्वास से जानवरों के सामने बोला—

“आप लोगों ने देखा न, मैंने कितनी मेहनत की?”

जानवर चुप रहे।

बंदर फिर बोला—

“मैंने पूरा दिन उस बच्चे को बचाने के लिए भाग-दौड़ की। कभी इस पेड़ पर गया, कभी उस पेड़ पर गया। मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी।”

फिर वह बोला—

“हाँ, मैं उस बच्चे को बचा नहीं पाया... लेकिन मेरी मेहनत तो आपने देखी है!”

“अगर आपको मेरी मेहनत में कहीं कोई कमी दिखाई देती हो, तो आप मुझे बताइए।”

जंगल के सारे जानवर एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

तभी बूढ़े हाथी ने धीरे से कहा—

“सरपंच जी, हमें आपकी मेहनत देखने में कोई कमी नहीं लगी...”

“लेकिन हमें उस बच्चे की जरूरत थी, आपकी मेहनत के प्रदर्शन की नहीं।”

पूरा जंगल शांत हो गया।

सीख

सिर्फ व्यस्त दिखाई देना, मेहनत करने के बराबर नहीं होता।

नेता की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसने कितना दिखाया कि वह काम कर रहा है, बल्कि इस बात से होती है कि उसकी जिम्मेदारी का परिणाम क्या निकला।

क्योंकि—

दिखावे की मेहनत से तालियाँ तो मिल सकती हैं,
लेकिन समस्या का समाधान नहीं होता।

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Please tell me the correct logo of the Chrome browser.

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