चक्षुदर्शी

सम सामयिक विषयों पर बेबाक टिप्पणी. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर.


चक्षुदर्शी

नीट आंदोलन: साज़िश, राजनीति या सरकार की घेराबंदी
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नीट पेपर लीक कांड विवाद अब केवल परीक्षा या पेपर लीक का मामला नहीं रह गया है. यह राजनीतिक संघर्ष का बड़ा केंद्र बन चुका है। आज चार सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, सबसे बडा सवाल अचानक कोकरोच बने सोनम वांग्चुक पर आंदोलन के साथ भीतरघात यानि सेबोटेज करने का है.
पहला सवाल इसलिए उठा क्योंकि सोनम वांग्चुक ने पहले तो लंबा आमरण अनशन किया और फिर मांगे पूरी होने से पहले सरकार के मंत्री के हाथ फलरस पीकर अनशन समाप्त कर दिया.जबकि आंदोलन की आग पूरे देश में फैल चुकी है और ये आंदोलन अब कोकरोच जनता पार्टी का न होकर सबका बन गया है. खासकर समूचे विपक्ष का हो चुका है.
अब सवाल ये है कि क्या सोनम वांग्चुक का आंदोलन और नीट आंदोलन एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं? कुछ लोगों का मानना है कि समानांतर आंदोलनों से जनध्यान बंटता है, जबकि दूसरे इसे लोकतांत्रिक विरोध का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं. मजे की बात ये है कि इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है कि सोनम वांग्चुक ने जानबूझकर आंदोलन को "सेबोटेज" किया है,लेकिन परिस्थिति सोनम को संदिग्ध बना रही है.इसलिए आरोप और तथ्य में फर्क करना जरूरी है।
दूसरा सवाल है कि क्या केंद्र सरकार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बढ़ते राजनीतिक दबाव को कम करने की कोशिश कर रही है?क्या इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोबाइल पर संदेश देने को मजबूर हुए. मोदीजी के संदेश के बाद एन टी ए के 47 कारिंदों की बर्खास्तगी और फास्ट ट्रेक कोर्ट बनने लगे.यदि जांच एजेंसियां एनटीए के अधिकारियों पर कार्रवाई करती हैं, तो विपक्ष इसे "बलि का बकरा" बनाने की रणनीति कह रहा है, जबकि सरकार का पक्ष है कि जवाबदेही तय की जा रही है.अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध तथ्यों पर ही तो निर्भर करेगा.
तीसरा और महत्वपूर्ण सवाल ये है कि —क्या संसद में इस मुद्दे पर सोमवार को बहस होगी? क्योंकि अभी पांच दिन से संसद में बहस के बजाय हंगा हुआ है.विपक्ष लगातार चर्चा की मांग कर रहा है. यदि सरकार बहस के लिए तैयार होती है तो वह अपना पक्ष रखेगी, और यदि टालती है तो विपक्ष इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाएगा.सबकी नजर संसद की कार्यवाही पर है.
महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि क्या यह मुद्दा अब कोकरोचों छात्र दायरे से निकलकर पूरे इंडिया गठबंधन के प्रमुख राजनीतिक अभियान में बदल चुका है? विपक्ष जिस तरह इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना रहा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में संसद और सड़क—दोनों जगह यह विवाद जारी रह सकता है.कांग्रेस ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय और व्यापक बनाने के लिए अपना पूरा संगठन लगा दिया है.
सोनम वांग्चुक अपने जीवन की दूसरी लडाई हारे भी हैं और संदिग्ध भी बने हैं. लद्दाख का आंदोलन सोनम की गिरफ्तारी और रिहाई के बाद ठप्प पड गया है. कोकरोच पार्टी का आंदोलन भी सोनम ने पहले संजीदा बनाया और फिर बीच में ही इसे संदिग्ध बनाकर अलग खडे नजर रहे हैं.सोनम कोकरोच पार्टी का उत्पाद है. इसी तरह अन्ना आंदोलन का उत्पाद आम आदमी पार्टी थी. जेपी आंदोलन से जनता दल बना था. यानि हर आंदोलन कुछ न कुछ देकर जाता है.
@ राकेश अचल

13 hours ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

ँभाजपा ने विधानसभा को मजाक बना दिया
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भाजपा शायद देश का पहला राजनीतिक दल है जो संवैधानिक संस्थाओं को लगातार कमजोर कर रहा है. भाजपा को न संसद चाहिए न विधानसभाएं. उसे तो विपक्ष भी नहीं चाहिए. केंद्र सरकार संसद नहीं चला पा रही है और मप्र में भाजपा ने पहले विधानसभा में पांच दिन काम करने की घोषणा की लेकिन बाद में भाजपा दो दिन पहले ही सत्रावसान कर चली गई.
पूरे देश की विधानसभाऐ अब केवल वेतन भत्ते के लिए आयोजित होती हैं. सरकार सरकारी काम चुटकियां बजाकर पूरा कर लेती है. जनता की समस्याओं पर बहस- मुबाहिसे केलिए किसी के पास वक्त नहीं है.मप्र विधानसभा का मानसून सत्र 20 से 24 जुलाई तक चलने वाला था.5 दिवसीय सत्र तीसरे दिन 22 जुलाई को ही अनिश्चितकाल के लिए समाप्त कर दिया गया. यानी निर्धारित पांच दिनों की बजाय केवल तीन दिन ही कार्यवाही चली. कारण विपक्ष का हंगामा. किंतुहकीकत ये है कि सरकार जनता के मुद्दों पर विमर्ष नहीं चाती थी और उसे दतिया विधानसभा उप चुनाव के लिए भी समय चाहिए था.

मध्यप्रदेश उन राज्यों में है जहाँ विधानसभा के बैठक-दिवसों में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है। पीआर एस के अनुसार 2016–2022 के बीच केरल (48 दिन/वर्ष), ओडिशा (41) और कर्नाटक (35) सबसे आगे रहे, जबकि मध्यप्रदेश में बैठकें लगातार कम हुईं और वह राष्ट्रीय औसत (लगभग 25 दिन/वर्ष) से भी नीचे खिसक गया.
पिछले दो दशकों में मध्यप्रदेश विधानसभा ने सबसे अधिक बैठकें शुरुआती वर्षों (लगभग 2005–2008) में कीं.इसके बाद बैठकों की संख्या में लगातार गिरावट का रुझान देखा गया. 2020 में कोविड के कारण स्थिति और खराब हुई.
विधानसभा को मजाक बनाने में अनुभवी विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और मुख्यमंत्री डा मोहन यादव सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं. प्रतिपक्ष के हाथ में कुछ है नहीं सिवाय हां में हाँ मिलाने के. विधानसभा की कार्रवाई समेटने की जल्दी सभी को है. कभी चुनाव, कभी त्यौहार, कभी शादी समारोह.
एक जानकारी के मुताबिक वर्ष 2023 में मप्र विधानसभा का पहला सत्र मात्र 7 दिन का था. विधानसभा नयी थी लेकिन वर्ष नई थी लेकिन वर्ष 2024 में भी विधानसभा की कार्रावाई कोई 16 दिन ही चली. वर्ष 2025 में लगभग 23 दिन और वर्ष 2026 में
अभी तक लगभग 10 दिन ही विधानसभा काम कर सकी. हालांकि अभी साल समाप्त होनने में पांच महीने शेष हैं.आंकडे बताते हैं कि वर्ष 2023–25 में सबसे अधिक बैठकें 2025 (लगभग 23 दिन) हुईं.इसके बावजूद 20–25 दिन सालाना बैठकें भी लोकतांत्रिक मानक के लिहाज से कम मानी जाती हैं, क्योंकि विधानसभा का मुख्य काम कानून बनाना, सरकार से जवाब मांगना और जनसमस्याओं पर चर्चा करना है.
एक जमाना था जब सरकारी काम निबटाने के साथ ही जनहित के मुद्दों पर बहस के लिए विधानसभा का सत्र बढाया जाता था और आज हर सत्र में कटौती करने की परंपरा बन गई है.कभी-कभी लगता है कि सभी ने मिलकर विधानसभा को मजाक समझ लिया है.वैसे भी नरेंद्र सिंह तोमर बेमन से विधानसभा अध्यक्ष बने थे. वे तो मुख्यमंत्री बनने का सपना लेकर दिल्ली से मप्र वापस लौटे थे.
मप्र विधानसभा के अब तक बने 19 विधानसभा अध्यक्षों में से कम से कम एक दर्जन के कामकाज मैंने देखा है. यहाँ तक कि भाजपा के ही ईश्वर रोहाणी के समय मे भी विधानसभा की गरिमा को इतना नुक्सान नहीं पहुंचा जितना कि आज हो रहा है.

@ राकेश अचल

1 day ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

दिल्ली की सियासत में गुरुवार का दिन बेहद गर्म रहा। नीट पेपर लीक को लेकर चल रहा आंदोलन अब केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। विपक्ष ने इसे देशव्यापी मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है।लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के सांसद गांधी स्मृति की ओर मार्च कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि वहां नीट प्रश्नपत्र लीक के बाद जान गंवाने वाले छात्रों और आंदोलन के दौरान घायल हुए छात्रों को श्रद्धांजलि दी जाएगी. पूरी खबर के लिए वीडियो देखिए 🙏
youtube.com/live/7fg9AxqDGgQ?is=BHBphWnRa80HUHfU

1 day ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

कोकरोचों की याचिका सुप्रीमकोर्ट क्यों सुने?
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भारत के सुप्रीम कोर्ट और भारत की संसद जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियो के सवाल पर सहोदर नजर आती हैं. सरकार इस मुद्दे पर संसद में बहस से बच रही है वहीँ सुप्रीमकोर्ट ने उस याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का मुद्दा उठाया गया था.
यह प्रदर्शन परीक्षा के पेपर लीक के मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर किया गया था.मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक वकील की याचिका पर कहा, "अपना समय बर्बाद मत कीजिए और हमारा समय भी बर्बाद मत कीजिए."
मैं बार एंड बेंच पर यकीन करता हूँ.इसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने पेश हुए वकील ने मामले को अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की.
मेरे खयाल से सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो उसे करना चाहिए. देश का कोई वकील माननीय सुप्रीमकोर्ट को इस मामले में डिक्टेट नहीं कर सकता. मुझे पता है कि ये कोकरोच जन्मे ही माननीय मुख्य न्यायाधीश के श्रीमुख से ही हैं. हमारे यहाँ जन्म के असंख्य स्रोत हैं. तमाम आख्यान हैं. कहीं आंसू से, कहीं पसीने से, कहीं कान से, कहीं भूमि से भी जन्म की घटननाएं दर्ज हैं. इसी फेहरिस्त में कोकरोच के जन्म की नयी कहानी जुड गई है.अब कोई,कैसे अपने ही बच्चों के खिलाफ या पक्ष में सुनवाई कर सकता है. ऐसे मामले किसी तीसरे पक्ष को ही सुनना चाहिए.
दरअसल, 15 मई को भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था, "समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं. क्या आप भी उनके साथ जुड़ना चाहते हैं? कुछ युवा ऐसे हैं, जो रोज़गार नहीं मिलने और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं.''
जस्टिस सूर्यकांत की इस टिप्पणी की बहुत आलोचना हुई. हालांकि इस आलोचना के बाद जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्टीकरण दिया और कहा था कि उनकी टिप्पणी को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है.बाद में स्पष्टीकरण देते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था, "मुझे यह देखकर दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने एक निरर्थक मामले की सुनवाई के दौरान की गई मेरी मौखिक टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया. मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी, जिन्होंने फर्ज़ी और नकली डिग्रियों की मदद से बार कानूनी पेशे जैसे क्षेत्रों में प्रवेश किया है. ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य सम्मानित पेशों में भी घुस आए हैं, इसलिए वे परजीवियों की तरह हैं."
लेकिन कहते हैं कि बंदूक से निकली गोली और मुँह से निकली बोली कभी वापस नहीं लौटती. माननीय के मुँह से जन्मे कोकरोच संभवतः माननीय मुख्य न्यायाधीश के प्रति पिता जैसा आदर भाव रखते हैं और इसीलिए बार-बार माननीय अदालत से संरक्षण की अपेक्षा करते हैं किंतु उन्हे हर बार निराश होना पडता है.
वैसे भी सुप्रीमकोर्ट में न्यायधीशोओ के 6 पद खाली हैं. सुप्रीमकोर्ट को 38 जज चाहिए हैं 32 ही..सुप्रीमकोर्ट में रोजा सिंगल, डबल, ट्रिपल बैंचों के अलावा संवैधानिक बैंच रोजाना कम से कम डेढ दर्जन मामले सुनती हैं फिर भी काम नही निबटता. सर्वोच्च न्यायालय में इस समय लगभग 94,000 मामले लंबित हैं. नीचे से लेकर ऊपर तक लंबित मामले तो 5.6 करोड होंगे. ऐसे में हमारे मुख्य न्यायधीश जंतर-मंतर पर हुई बर्बरता के वीडियो देखने का समय कहाँ से निकाले?
मेरी मुख्य न्यायाधीश से पूरी सहानुभूति है. उन्हे काम बाढ को देखते हुए या तो जजों की संख्या बढवाना चाहिए या सरकार दूसरे विषयों की तरह न्याय प्रणाली को भी अडानी -अंबानी के साथ ही विदेशों के लिए खोल दे. क्या फर्क पडेगा, जब हमने शिक्षा, चिकित्सा और रक्षा के क्षेत्र विदेशियों के लिए खोल दिए हैं तो न्याय को खोलने में क्या हर्ज है? जंतर-मंतर पर जिसे कुटना, पिटना हो कुटे, पिटे. न्यायालय को इससे क्या?
@ राकेश अचल

2 days ago | [YT] | 1

चक्षुदर्शी

आप और भाजपा का सरगम और राहुल का धरना
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शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का विरोध प्रदर्शन के बीच कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर धरने से भाजपा की तिलमिलाहट स्वाभाविक है लेकिन आम आदमी पार्टी का इस मुद्दे पर भाजपा के सुर में सुर मिलाना बहुत कुछ कह गया.
धरने के बाद गिरफ्तारी के समय लहू लुहान राहुल गांधी को देखकर युवाओं का गुस्सा देखने लायक है.आपको याद है कि जंतर-मंतर पर 20 दिन के आमरण अनशन के बाद अस्पताल में आराम फरमा रहे सोनम वांग्चुक के आमंत्रण पर काकरोचों के आंदोलन से दूर रहे राहुल के अचानक प्रधानमंत्री आवास घेरने से काकरोचों के साथ ही आम आदमी पार्टी को मिर्ची लग गई. क्योंकि काकरोच आम आदमी पार्टी के खुले समर्थन के बावजूद जंतर-मंतर पर पिटते रहे लेकिन संसद तक नही पहुंच पाए थे.
. कांग्रेस सांसदों ने राहुल गांधी के नेतृत्व में मंगलवार दोपहर प्रधानमंत्री आवास 7 लोक कल्याण मार्ग के बाहर धरना प्रदर्शन के बाद गिरफ्तारी भी दी. पुलिस के दुर्वयवहार से राहुल के चेहरे से खून छलछलाने लगा.कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा मांग रही थी.
राहुल गांधी की गिरफ्तारी से पहले पीएम आवास के पास धरना दे रहे राहुल गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं से मिलने केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह पहुँचे थे. जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी वादा करके अपनी बात से मुकर गए.
सरकार काकरोचों के संसद मार्च को तो कुचलने में कामयाब रही, किंतु कांग्रेस को प्रधानमंत्री का आवास घैरने से नहीं रोक सकी. कांग्रेस के धरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार नीट पेपर लीक मामले को लेकर एक बयान केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू के ज़रिए सार्वजनिक किया.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का आरोप है कि"सरकार कोई जवाबदेही नहीं लेना चाहती या संसद में इस पर बहस नहीं चाहती. भारत के युवाओं का भविष्य बर्बाद करने के लिए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी धरना स्थल पर पार्टी सांसदों के साथ थे.
आज की राजनीति के सबसे बडे खलनायक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर संसद के मॉनसून सत्र में छात्रों का राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने का आरोप लगाया है.प्रधान ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि वे (राहुल गांधी) संसद के मॉनसून सत्र में रुकावट और बाधाएं डालने के लिए छात्रों का राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
राहुल के धरने पर सबसे बचकानी प्रतिक्रिया आम आदमी पार्टी के बडबोले सांसद संजय सिंह की आई है.संजय सिंह ने आरोप लगाया, काकरोच जनता पार्टी के धरने को कमजोर करने के लिए मोदी जी ने राहुल गांधी को अपने आवास पर धरने पर बिठा दिया."उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक महीने से आंदोलन को गाली दे रही है, अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि जंतर मंतर नहीं हमारे धरने में शामिल हों. कांग्रेस आख़िर युवाओं के आंदोलन को क्यों कमज़ोर करना चाहती है? कांग्रेस जंतर मंतर के आंदोलन में शामिल होने की अपील क्यों नहीं करती?''
संसद के मानसून सत्र का हिडन एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने की भाजपा की योजना पर राहुल के धरने और गिरफ्तारी के बाद पानी फिर गया है. अब देखना ये है कि ये राजनीतिक घटनाक्रम आगे कितना नीट एंड क्लीन रहता है?
@ राकेश अचल

3 days ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

जंतर-मंतर आंदोलन का अंत का मध्यांतर ?
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सिस्टम के खिलाफ जंतर-मंतर पर खडे हुए काकरोचों का आंदोलन बिना नतीजा समाप्त हो गया. सवाल ये है कि ये इस असंगठित, प्रायोजित आंदोलन का मध्यांतर है या अंत?
काकरोचों के आंदोलन के हीरो सोनम वांग्चुक ने जिस तरीके से जेपी नढ्ढा के आश्वासन के बाद अपना आमरण अनशन समाप्त करने का ऐलान किया है, इससे उन आरोपों की आंशिक पुष्टि हो गई है कि ये आंदोलन प्रायोजित था और युवाओं के गु्स्से की हवा निकालने के लिए किया गया था.
हमारे बुंदेलखंड में ही क्या पूरी हिंदी पट्टी में एक कहावत है -' हलुआ मिला न मांडे, दोऊ दीन से गए पांडे'. मैं इस कहावत को अब यूँ कहना चाहता हूँ कि -'रबडी मिली न चमचम, दोनों दीन से गए सोनम'.ये इसलिए क्योंकि नीट की नाकामियों के खलनायक केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा नही हुआ और न सरकार काकरोचों के प्रति संवेदनशील बनी रही. संसद मार्च के लिए बढ रहे काकरोचों को पुलिस ने जमकर धुना.
भारत के जेन-जी के साथ ये दूसरा छल है. पहली बार छलिया अन्ना हजारे थे, इस बार ये भूमिका सोनम वांग्चुक ने शानदार ढंग से निभाई.सोनम युवाओं की आशाओं के प्रतीक बन गए थे. वे युवाओं को प्रभावित करने वाले देश के दूसरे नेता हैं. पहले नायक राहुल गांधी हैं. उनके पास राजनीति दल भी है, लेकिन सोनम के पास कुछ नहीं है.
मैं सोनम वांग्चुक का बहुत सम्मान करता हूँ. अभी भी इसमें कोई कमी नहीं आई है. बावजूद इसके मुझे लगता है कि सोनम वांग्चुक दूसरी बार गच्चा खा गए. पहली बार तब चार महीने जेल में रखने के बाद सरकार ने उन्हे अचानक रिहाकर लद्दाख के लाखों लोगों की उम्मीद के आंदोलन को समाप्त कर दिया. वे कुछ हासिल नहीं कर पाए.
सोनम को दूसरा गच्चा जंतर-मंतर पर मिला. वे किसी लाट साहब के कहने पर काकरोचों के मंच पर आए थे. उन्होने 20 दिन का आमरण अनशन किया और उस आदमी के आश्वासन पर तोड दिया जो उस मंडली का हिस्सा है जो जन विरोधी है, फासिस्ट है अशिष्ट है.
काकरोच लडाई हारे लेकिन मुझे खुशी है कि उनकी एकजुटता की वजह से कुछ देर के लिए ही सही लेकिन देश की सडकों को जाग्रत किया. संसद को डराया. मुझे लगता है कि कोकरोची आंदोलन के दमन के बावजूद ये आंदोलन का अंत नहीं बल्कि मध्यांतर ही माना जाएगा. ऐसे आंदोलन और खडे होंगे भले ही उनमें सोनम वांग्चुक जैसे लोग न हों.
निश्चित रूप से यदि सोनम वांग्चुक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक रुक जाते तो इस कामयाबी का सेहरा उनके सिर बंधता. लेकिन वे नाकाम रहे इसलिए अब नाकामी का सेहरा भी उन्ही के माथे पर बंधेगा. देश के प्रधानमंत्री ने संसद के मानसून सत्र से ठीक कुछ घंटे पहले जिस ठंग से अपने संदेश में युवाओं का मजाक बनाया उससे जाहिर है कि वे तो नहीं सुधरने वाले नही हैं. उन्हे जनता ही आम चुनाव में सुधार सकती है.
@ राकेश अचल

4 days ago | [YT] | 1

चक्षुदर्शी

नतोप चोरों का गढ मध्यप्रदेश
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मध्य प्रदेश में केवल सरकारें ही नहीं चुरायी जातीं तोपें भी चोरी की जाती हैं. सूबे के शिवपुरी के नरवर किले से पूर्व सिंधिया रियासत की 400 साल पुरानी तोप चोरी हो गई। बदमाश किले की कचहरी से 16वीं शताब्दी की करीब 3500 किलो वजनी तोप के साथ एक प्रामाणिक इतिहास भी चुराकर ले गए। अंतर्राष्ट्रीय चोर बाजार में इसकी कीमत करोड़ों रुपए की होगी.
मध्यप्रदेश में चारों तरफ पुरा संपदा बिखरी पडी है. गढियों और किलों में आज भी शताब्दियों पुरानी टनों वजनीं तोपें खुले आसमान के नीचे खुली पडी हैं. चोरी गई तोपें भी इन्ही में से थीं.ये तमाम तोपें मुगलों, अंग्रेजों और मराठों की होंगी. ये तोपें या तो भारतीय पुरातत्व सर्वै के पास हैं या फिर राज्य पुरातत्व विभाग के पास हैं. जिनके पास न तो इस अनमोल धरोहर को सम्हालने के लिए बजट है और न सुरक्षा का बाजिब प्रबंध.
नरवर किले का इतिहास जानना हो तो गूगल खंखाल लीजिये मैं तो इस चोरी के बहाने मप्र सरकार की पुरा संपदा के प्रति लापरवाही को रेखांकित करना चाहता हूँ. यही तोपें यदि आज अमेरिका के पास होतीं तो न सिर्फ इनका तेल-पानी ढंग से हो रहा होता बल्कि ये सामग्री सरकार और समाज के लिए गर्व का विषय होती.
चोरों ने वारदात को पूरी योजना बनाकर अंजाम दिया. तोप को पहले गद्दों में लपेटा, फिर बैरिंग लगी लोहे की ट्रॉली की मदद से करीब 3 हजार फीट नीचे उतारा.इसके बाद लोडिंग गाड़ी में लादकर चोर फरार हो गए.ये वारदात 15 जुलाई की रात की है.वारदात के वक्त किले में सुरक्षाकर्मी ड्यूटी से गायब थे.चोरों ने इसी का फायदा उठाया.
पुलिस अब लकीर पीट रही है. पुलिस को अब पता चल रहा है कि चोरों ने इस चोरी की पूरी तैयारी पहले से कर रखी थी। एक पखवाड़ा पहले ही बदमाशों ने इसी तोप को उसके मूल स्थान से नीचे गिरा दिया था, लेकिन अत्यधिक वजन होने के कारण उसे वहां से ले नहीं जा सके.
तोप चोरी की सूचना भी ड्यूटी से नदारद सुरक्षा गार्डों ने नरवर थाने में खुद दी.इससे पहले भी ऐसी कोशिश की शिकायत भी दर्ज कराई थी, लेकिन मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया, इसके बाद 15-16 जुलाई की रात आरोपी पूरी तैयारी के साथ दोबारा लौटे. इस बार वे बैरिंग लगी लोहे की ट्रॉली लेकर आए और उसी की मदद से तोप को नीचे उतारकर वाहन में भरकर फरार हो गए.
मैंने वर्षों पहले नरवर किले की कचहरी में सिंधिया राजवंश काल की कुल 14 दुर्लभ ऐतिहासिक तोपें देखी थीं. कचहरी महल का निर्माण 16वीं शताब्दी में कछवाह राजाओं ने कराया था।साल 1925 में महाराजा माधवराव सिंधिया के आदेश पर इसका जीर्णोद्धार कराया गया.यहां रखी गई सभी तोपें पीतल, तांबा, कांसा और अष्टधातु जैसी मिश्रित धातुओं से बनी हैं.इन पर फारसी और देवनागरी लिपि में शिलालेख भी अंकित हैं।
नरवर किले की सुरक्षा के लिए कुल छह गार्ड तैनात हैं। इनमें चार गार्ड दिन और दो गार्ड रात की ड्यूटी करते हैं. घटना वाली रात दोनों रात के गार्ड ड्यूटी छोड़कर घर चले गए थे.इसी वजह से चोरों को ऐतिहासिक तोप चोरी करने का मौका मिल गया.दुर्भाग्य की बात ये है कि मप्र पुलिस के लिए तोप चोरी का मामला आम चोरियो जैसा ही है इसीलिए इस वारदात के बाद न पुलिस मुख्यालय से कोई नरवर आया और न सचिवालय से, जबकि इस वारदात से दुनिया भर में मप्र में कानून और व्यवस्था को लेकर मप्र की नाक कट गई है.
मप्र के विदिशा में सबस बडी तोप हुआ करती थी जो बाद में कहावत बन गई. लोग किसी को भी ताना मारते तो कहते-'कोई भेलसा की तोप हो'. मेरी तफ्तीश के मुताबिक मध्य प्रदेश में प्रमुख और छोटे-बड़े किलों और गढियों की संख्या 200 से अधिक हैं. इनमें आज भी लगभग 90–130 ऐतिहासिक तोपें विभिन्न किलों, संग्रहालयों और संरक्षित परिसरों में मौजूद हैं लेकिन चोर इन्हे कब, कहाँ से उठा ले जाएं? कोई नहीं जानता.
@ राकेश अचलन

6 days ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

सोनम न संथारा कर रहे हैं न संलेखना
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संथारा नीट परीक्षा में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर डटे प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरण वैज्ञानिक सोनम वांगचुक के अनशन के अनशन के 20वां दिन पूरे हो गए हैं.वे न संलेखना कर रहे हैं और न संथारा. वे नौजवानों के लिए लड रहे हैं लेकिन न सरकार जाग रही है और न नौजवान.
सोनम न जैन है न सनातन हिंदू, वे बौद्ध हैं और तिब्बती बौद्ध परंपरा से आते हैं लेकिन लगता है हमारी सनातन सरकार सोनम वांग्चुक के आमरण अनशन को संथारा समझ बैठी है. इसीलिए 20 दिन से आंखें बंद किए बैठी हुई है. सोनम वांग्चुक दो दिन और कौमा में न गए तो वे 20 जुलाई को संसद मार्च का नेतृत्व करेंगे.
सोनम वांग्चुक ने लगातार गिरते स्वास्थ्य के बीच ने बीती रात एक बेहद भावुक और तीखा वीडियो संदेश जारी कर कहा कि अनशन के कारण मेरे शरीर का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो चुका है, लेकिन मेरा हौसला और मानसिक हौसला अब भी डिगा नहीं है.
सोनम वांग्चुक देश की जनता से सीधे सवाल किया है कि अगर इस देश में प्याज की कीमतों पर सरकारें गिर सकती हैं, तो देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य और शिक्षा के लिए राजनीतिक जवाबदेही क्यों तय नहीं हो सकती?
सोनम वांगचुक ने कहा है कि "जी हां, मैं अभी भी ज़िंदा हूं. मेरे शरीर का लगभग 20 फीसदी हिस्सा चला गया है. शरीर के फैट्स के बाद अब मांसपेशियां भी जा चुके हैं. इसके बाद अंदरूनी अंग जाएंगे और आखिर में दिमाग... लेकिन अभी वो नौबत नहीं आई है. आज 20वां दिन खत्म हो रहा है और मैं साबित कर सकता हूं कि मेरा दिमाग अभी भी बिल्कुल ठीक काम कर रहा है."
देश में हर तरह के लोग हैं. गांधीवादी भी और गोडसेवादी भी. कुछ लोग सोनम के अनशन को नाटक कह रहे हैं. कुछ का कहना है कि वे हठधर्मी पर आमादा हैं. जबकि हकीकत ये है कि हठधर्मी पर सरकार आमादा है. उसके लिए सोनम का अनशन, अनशशन के मुद्दे जैसे कोई मुद्दा हैं ही नहीं. सरकार का मुद्दा कुर्सी है, केवल कुर्सी.
आपको याद होगा कि केंद्र सरकार ने सोनम वांग्चुक के अननशशन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट को भी जो हलफनामा दिया है वो भी एक नाटक है. अदालत भी पता नहीं कैसे सरकार के हलफनामे पर यकीन कर बैठी है. लगता है कि अदालत ने सोनम वांग्चुक को एन एस ए से रिहाई का फैसला पेशेनजर रखा होगा.
बहरहाल मामला न अदालत का रह गया है और न सरकार का. मामला अब देश की जनता के विवेक का है. लगता है कि देश की जनता अपने सरोकारों के लिए लडना भूल ही गई है. जनता को इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि नेतृत्व करने वाला राहुल गांधी हो या सोनम वांग्चुक. जनता ममता बनर्जी को भी ठुकरा दिया, उद्धव ठाकरे को ठुकरा दिया. राहुल गांधी भी देश की जनता के लिए अभी तक भरोसे के लायक नहीं हैं.
मैं उम्मीद करता हूँ कि लोकतंत्र की देवी या देवता यदि कहीं है तो सोनम वांग्चुक के प्राणों की, जनता के सरोकारों और लोकतंत्र की रक्षा जरूर होगी. हमारे हिस्से में सिर्फ इंतजार है, क्योंकि हम में से कोई जंतर-मंतर तक जाना नहीं चाहता. सबके पैरों में मेंहदी लगी है.
@ राकेश अचल
#SonamWangchuk#

1 week ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

अब सोनम से बडा मुद्दा विपक्षी एकता है कांग्रेस के लिए
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संसद के मानसून सत्र  20 जुलाई से शुरू हो रहा है लेकिन ये सत्र  जंतर -मंतर पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांग्चुक की मांगों पर  विचार के लिए नहीं भाजपा के एजेंडे  पर  विचार मंथन को लेकर कमर कस रही है.जबकि वांग्चुक ने 20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान किया है.
केंद्र सरकार तो सोनम वांग्चुक के अनशन और संसद मार्च को लेकर बेपरवाह है ही कांग्रेस भी दूसरे मुद्दों को लेकर अपनी रणनीति बनाने में व्यस्त है क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि भाजपा का असल इरादा सोनम की जान बचाना नहीं अपननी इज्जत और विपक्षी एकता को बचाना है. भाजपा विपक्षी एकता को छिन्न-भिन्न कर परिसीमन विधेयक पारित करा के पिछले सत्र में हुई हार का बदला लेना चाहती है.
मजे की बात ये कि कांग्रेस ने कुछ छिपाया भी नही. सत्र से पहले ही अपनी  प्राथमिकता और रणनीति साफ कर दी. पार्टी की संसदीय रणनीति कमेटी की मैराथन बैठक के बाद महासचिव जयराम रमेश और सांसद नासिर हुसैन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि सरकार जिन प्रमुख विधेयकों को लाने की तैयारी में है, कांग्रेस उनका विरोध करेगी. पार्टी ने परिसीमन, संविधान संशोधन, 'वन नेशन, वन इलेक्शन', एफसीआरए संशोधन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में प्रस्तावित बदलावों का विरोध करने का ऐलान किया है.
जयराम रमेश ने कहा कि सरकार ने अभी तक औपचारिक रूप से यह नहीं बताया है कि मानसून सत्र में कौन-कौन से विधेयक पेश किए जाएंगे. इसी वजह से संभावित विधेयकों पर विस्तार से चर्चा की गई. उन्होंने कहा कि 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में सरकार से इस संबंध में जानकारी मांगी जाएगी.
कांग्रेस ने सोँम वांग्चुक के अनशन  और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा भी मांग को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे आखिर में रखा है.कांग्रेस ने सर्वदलीय बैठक को लेकर भी आशान्वित नही है. कांग्रेस के मुताबिक, वहां कई नेता अपनी बात रखते हैं, लेकिन आखिर में फैसले कुछ ही लोग लेते हैं.  विपक्ष की राय को गंभीरता से नहीं लिया जाता.
रणनीति के मुताबिक कांग्रेस  परिसीमन  विधेयक का पूरी ताकत से विरोध करेगी. पार्टी इस मुद्दे पर पूरे विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश करेगी. साथ ही संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी प्रस्ताव का भी विरोध किया जाएगा. जयराम रमेश का आरोप है कि भाजपा राजनीतिक दलों को तोड़कर और अन्य तरीकों से लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है.
आपको याद होगा कि मोदी सरकार वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे प्रस्ताव  आगे बढाना चाहती है. कांग्रेस की बैठक में   इस बाबद गठित संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट पर भी चर्चा की. कांग्रेस ने कहा कि वह इस प्रस्ताव का भी विरोध करेगी. इसके अलावा सांसदों, विधायकों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री के चुनाव एक साथ कराने से जुड़े किसी भी विधेयक का समर्थन नहीं किया जाएगा.
कांग्रेस उन सभी विपक्षी दलों के संपर्क में है, जिन्होंने पहले भी परिसीमन का विरोध किया था. गौरतलब है कि मोदी सरकार तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस और डीएमके के रिश्तों में आई कडवाहट का लाभ लेना चाहती है और कुछ संशोधनों के साथ परिसीमन विधेयक पर डीएमके को भी साथ लाने की रणनीति बना चुकी है.
अब देखना ये है कि संसद के भीतर और संसद के भीतर होने वाली गतिविधियों का देश के भविष्य पर क्या प्रभाव पडता है. सोनम वांग्चुक की जान बचती है या वे प्रोफेसर  जीडी अग्रवाल की तरह शहीद होते हैं.
@ राकेश अचल

1 week ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

लोकतान्त्रिक सरकार की संगदिली
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दुनिया में चाहे किसी भी तरह की सत्ता हो, संगदिली  सत्ता का मुख्य चरित्र होता है. सामाजिक कार्यकर्ता सोनमवांग्चुक के जंतर मंतर पर चल रहे आमरण अनशन को लेकर कें्र सरकार की संगदिली इसका ताजा उदाहरण हैं.सोनम का आमरण अनशन 16 दिन का हो चुका है.
जंतर-मंतर पर पहले काकरोच जनता पार्टी को सभा करने की अनुमति देने के बाद काकरोचों के लिए जंतर-मंतर खोलने वाली दिल्ली सरकार ही नहीं बल्कि देश की केंद्र सरकार भी संगदिली दिखा रही है. एक पखवाडे बाद भी अनशनकारियों से किसी भी तरह का संवाद न करने वाली  मोदीजी की सरकार आखिर चाहती क्या है?
मोदी सरकार का काकरोचों के आंदोलन के प्रति क्या नजरिया है, ये तो सरकार जाने. किंतु आंदोलन के प्रति सरकार के रवैये से जाहिर है कि सरकार के लिए युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नही है. भले ही युवाओं की अगुवाई कर रहे सोनम वांग्चुक की जान भी खतरे में क्यों न हो.
आमरण अनशन लोकतंत्र में सरकार का ध्यान आकर्षित कर फैसले बदलवाने का सबसे बडा गांधीवादी अस्त्र है. अनशन में न कोई हिंसा हो रही है और न आगजनी. अनशनकारी सोनम वांग्चुक अपने आपको पीडा दे रहे हैं.इस आंदोलन की अनदेखी कर सरकार लोकतंत्र की, महात्मा गांधी की अवमानना कर रही है. इससे जाहिर हो गया है कि हमारी सरकार का लोकतान्त्रिक मूल्यों, तौर-तरीकों और गांधीवाद में कोई यकीन नहीं है.
यदि आप आमरण अनशन के आंदोलनों का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि अनशनकारियों ने अपने प्राण दे दिए लेकिन वे न दबे न झुके और न टूटे. फिर चाहे अनशन अंग्रेजों के विरुद्ध किया गया हो या आजाद भारत की स्वदेशी सरकारों के खिलाफ किया गया हो.
जंतर-मंतर पर सोनम वांग्चुक की अगुवाई में चल रहा आमरण अनशन अभी तक अराजनीतिक है किंतु उसे राजनीतिक दलों के नैतिक समर्दन की सख्त जरूरत है. कुछ राजनीतिक दलों ने इस आंदोलन का समर्थन किया भी है, लेकिन गैर भापा दलों की चुप्पी अनशनकारियों को निराश कर रही है.
हमारे प्रधानमंत्री जी देश के इतिहास के सबसे बडे किसान आंदोलन के खिलाफ ऐसी ही हठधर्मी का प्रदर्शन कर चुके हैं. इस कारण 700  किसानों को शहीद होना पडा था. सरकार को पहली बार झुकना पडा था.विवादास्पद कानून वापस लेना पडे थे.इस बार भी इतिहास फिर करवट लेता दिखाई दे रहा है. 20 जुलाई से पहले तस्वीर साफ हो जाएगी.
भारत की सरकार भले ही बैशाखियों के सहारे चल रही हो लेकिन है तो लोकतान्त्रिक सरकार इसलिए उसमें चीन की वामपंथी सरकार की तरह जंतर-मंतर को थ्यान-म्यान चौक में बदलने की तथा नहीं है. किंतु सरकार के इरादे क्रूर जरूर हैं. हम उम्मीद करते हैं कि सोनम वांग्चुक का संघर्ष अकारथ नहीं जाएगा.आज नहीं तो कल तमाम राजनीतिक दलों को जंतर मंतर पर आना ही पडेगा.
@ राकेश अचल

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