चक्षुदर्शी

सम सामयिक विषयों पर बेबाक टिप्पणी. न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर.


चक्षुदर्शी

BRICS में कुछ तो है! दिन में मोदी-जिनपिंग की गर्मजोशी, रात में डिनर से जिनपिंग गायब!कहते हैं कूटनीति में जो दिखता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह होता है जो दिखता नहीं!भारत में BRICS का महाकुंभ लगा। दुनिया भर के नेता दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई। करीब पचास मिनट तक बातचीत हुई। दोनों तरफ से रिश्ते सुधारने और सहयोग बढ़ाने के संकेत भी मिले।
लेकिन फिर शाम हुई...प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS नेताओं के लिए गाला डिनर दिया और तस्वीरें सामने आने लगीं।लेकिन इन तस्वीरों में जिनपिंग कहां हैं?

4 hours ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

BRICS में कुछ तो है! दिन में मोदी-जिनपिंग की गर्मजोशी, रात में डिनर से जिनपिंग गायब!कहते हैं कूटनीति में जो दिखता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह होता है जो दिखता नहीं!भारत में BRICS का महाकुंभ लगा। दुनिया भर के नेता दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई। करीब पचास मिनट तक बातचीत हुई। दोनों तरफ से रिश्ते सुधारने और सहयोग बढ़ाने के संकेत भी मिले।
लेकिन फिर शाम हुई...प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS नेताओं के लिए गाला डिनर दिया और तस्वीरें सामने आने लगीं।लेकिन इन तस्वीरों में जिनपिंग कहां हैं? देखना न भूलें. 🙏

13 hours ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

लद्दाख को राज्य नहीं मिलेगा... तो फिर क्या मिलेगा?
लद्दाख वालों की सबसे बड़ी मांग थी—राज्य का दर्जा।
लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि लद्दाख को न तो राज्य बनाया जाएगा और न ही ऐसा केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा जिसके पास पारंपरिक अर्थों में विधानसभा हो।
यानी राज्य नहीं, विधानसभा नहीं... लेकिन एक 'अद्वितीय मॉडल' जरूर!

23 hours ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

भारत एक तरफ ब्रिक्स के जरिये अपनी ताकत बढाने में लगा है दूसरी तरफ भारत से खफा अमेरिका H-1B वीजा धारकों के लिए अपने दरवाजे बंद करने की तैयारी कर रहा है. अमेरिका ने H-1B वीजा धारकों के लिए नौकरी जाने के बाद मिलने वाली 60 दिन ग्रेस की सुविधा समाप करने की तैयारी शुरू कर दी है. यदि ऐसा हुआ तो क्या भारत अमेरिका से खदेडे जाने वाले लाखों भारतीयों को देश में या ब्रिक्स देशों में रोजगार दिलवा सकेगा?

1 day ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

कल 12 सितंबर से दिल्ली में ब्रिक्स सम्मिट होने जा रही है. इस आयोजन के जरिए भारत दुनिया की ईंट से ईंट बजाएगा या फिर भारत की अर्थव्यवस्था की ईंटें बजेंगी?

2 days ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

राहुल मियां—यूपी चुनाव से पहले ध्रुवीकरण का बिस्मिल्लाह?
चुनाव अभी दूर है…लेकिन लगता है भाजपा ने उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण का बिस्मिल्लाह पहले ही कर दिया है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को कहा—“राहुल मियां।”अब सवाल यह है कि राहुल गांधी के नाम के साथ अचानक “मियां” लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?

3 days ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

आज रात 9 बजे देखना न भूलें🙏

4 days ago | [YT] | 0

चक्षुदर्शी

लाल किले की होम्योपैथी गोली का ' साइड इफेक्ट!'
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क्या स्वतंत्र भारद्वाज जो कह रहे थे, उसकी पुष्टि अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर दी है?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में अपने 15 अगस्त के भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने लाल किले से देश को ‘दिमागी नक्सल’ की होम्योपैथी की गोली दी थी।
प्रधानमंत्री के मुताबिक होम्योपैथी की दवा शुरू में बीमारी के लक्षण बढ़ा देती है। उन्होंने कहा कि गोली देने के बाद सारे ‘दिमागी नक्सल’ निकल-निकलकर बाहर आने लगे।उन्होंने कहा, "ये मोदी है. जो 'माई-बाप' कल्चर के हिमायती हैं, उनके सामने चट्टान बनकर खड़ा है। मेरे अंदर हिम्मत है, इसलिए उस दिन जो कहा था, आज उसकी याद भी दिला रहा हूं। मैं अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आपके सामने आया हूं।"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "दिमागी नक्सल" कहे जाने वाले लोगों पर हमला तेज़ करते हुए कहा कि देश उन लोगों पर नज़र रख रहा है, जिन्होंने यह शब्द अपनाया है और जो एक खास एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं। पहले इस्तेमाल किए गए इस शब्द का ज़िक्र करते हुए माननीय मोदी ने कहा, "मैंने आज़ादी के दिन 'दिमागी नक्सल' शब्द गढ़ा था। दिमागी नक्सल एजेंडे को मंच दे रहे हैं।"
हमेशा की तरह मोदीजी ने विपक्ष पर करारा हमला बोला।वे भूल गए कि वे एक शैक्षणिक संस्थान के शताब्दी समारोह में हैं न कि किसी चुनावी सभा में.विपक्षी पार्टियों को मोदी जी ने नाराज फूफा बता दिया और कहा, ये लोग हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाते हैं। पूछते रहते हैं-इसकी क्या जरूरत थी, उसकी क्या जरूरत थी, वैसे ही जैसे शादी में नाराज फूफा सवाल करते रहते हैं।
अब सवाल यही है—अगर प्रधानमंत्री की बात को उसी अर्थ में लिया जाए, तो क्या स्वतंत्र भारद्वाज, दक्ष चौधरी जैसे लोगों का आक्रामक आचरण भी उसी गोली का साइड इफेक्ट है?
स्वतंत्र भारद्वाज पर जंतर-मंतर की घटना में एक प्रदर्शनकारी के पिता से मारपीट के आरोप लगे। मामला पुलिस और अदालत तक पहुंच चुका है।दक्ष चौधरी की ओर से स्वतंत्र भारद्वाज के समर्थन में प्रदर्शन भी किया गया है।तो क्या यह सिर्फ कुछ युवाओं की व्यक्तिगत गुंडागर्दी है?या इसके पीछे एक ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार हो चुका है जिसमें विरोध करने वाला देशद्रोही, सवाल पूछने वाला ‘दिमागी नक्सल’ और असहमति जताने वाला दुश्मन समझ लिया जाता है?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि लोकतंत्र में असहमति कोई बीमारी नहीं होती।पत्रकार सवाल पूछेगा।बुद्धिजीवी सरकार की आलोचना करेगा।नागरिक विरोध करेगा।और सरकार से असहमति रखने वाले को जवाब तर्क से देना होगा, डंडे से नहीं।
लेकिन जब सत्ता की भाषा में ही विरोधियों के लिए ‘दिमागी नक्सल’ जैसा शब्द आ जाए, तो क्या उसके नीचे के समर्थकों को यह संदेश नहीं मिलता कि विरोधियों के खिलाफ आक्रामक होना जायज है?
यही असली सवाल है।मैं यह नहीं कह रहा कि प्रधानमंत्री ने किसी को हिंसा करने के लिए कहा।ऐसा कहना तथ्यहीन होगा।
लेकिन राजनीति में शब्दों का असर होता है।सत्ता के शीर्ष से इस्तेमाल की गई भाषा समाज के नीचे तक जाती है।इसलिए सवाल प्रधानमंत्री से भी है—क्या लाल किले से दी गई ‘होम्योपैथी की गोली’ सचमुच लोकतंत्र को मजबूत करेगी, या उसके साइड इफेक्ट में असहमति के खिलाफ और ज्यादा आक्रामक समाज पैदा होगा?और अगर प्रधानमंत्री खुद कह रहे हैं कि गोली के बाद ‘सारे दिमागी नक्सल बाहर निकल आए’, तो फिर देश यह पूछने का हकदार है—
ये निकलकर बाहर आए लोग कौन हैं?और सबसे बड़ा सवाल—
क्या हम ऐसे भारत की तरफ बढ़ रहे हैं जहां विचार से लड़ने के बजाय व्यक्ति का सिर फोड़ना आसान समझा जाने लगे?
अगर ऐसा है तो बीमारी सिर्फ कुछ लोगों में नहीं है।
फिर इलाज पूरे राजनीतिक माहौल का होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में असहमति को दबाना इलाज नहीं है।
असहमति को सुनना ही लोकतंत्र की असली दवा है।
मुझे देश की राजनीति के लक्षण अच्छे नही लग रहे है.
मुझे नहीं लग रहा कि स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी के बाद मामले का पटाक्षेप हो गया है. मुझे लगता है कि दिमागी नक्सलो के इलाज के लिए मोदीजी की होम्योपैथिक गोली और कहर ढाएगी.
@ राकेश अचल

1 week ago | [YT] | 1

चक्षुदर्शी

देश को स्वतंत्रो के हवाले मत कीजिए
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धर्म की रक्षा के लिए समर्पित, दक्ष लोग चाहिए, लेकिन धर्म की रक्षा का ठेका उन युवाओं को नहीं दिया जा सकता जो स्वतंत्र भारद्वाज जैसे हैं. स्वतंत्र भारद्वाज एक चावल है उस खिचडी का जो दिल्ली में पिछले बारह साल से पक रही है.
मैं पिछले कुछ दिनों से स्वतंत्र के बारे में लिखने से अपने आपको रोके हुए था, लेकिन जब अति हो गई तो मुझे लिखने पर विवश होना ही पडा. सब जानते हैं कि मैं एक गैर सर्टिफाइड सनातनी हिन्दू हूँ. मेरा आचरण सांप्रदायिक नही है. मैं किसी को न अस्पर्श्य मानता हूँ, न किसी से घृणा करता हूँ. क्योंकि मेरी घुट्टी या ग्राइप वाटर में सांप्रदायिकता, संकीर्णता घोली ही नही गई. भारत में मेरे जैसे असंख्य हिन्दू होंगे जिन्हे न मुसलमानों से दिक्कत है और न दलितों, पददलितों से. सभी से हमारे मुंहबोले, दादा, चाचा, मामा, भाई, बुआ, भाभी और बहन के रिश्ते हुआ करते थे.
पिछले सौ साल में धर्म का स्वयंभू ठेकेदार बने आर एस एस की जनी भाजपा जबसे सत्ता में आई है ने इन तमाम सामाजिक रिश्तों का सत्यानाश कर दिया है. धर्म की रक्षा के लिए भाजपा और संघ ने स्वतंत्र भारद्वाज और दारा सिंह जैसे लोगों के न जाने कितने अनुषांगिक संगठन बना दिए जो गैर हिंदुओं को जिंदा जला सकते हैँ, सिर फोड सकते हैं. बाग बगीचों में बैठे प्रेमी युगलों की वाट लगा सकते हैं.
स्वतंत्र भारद्वाज एक नमूना है जो सार्वजनिक रूप से सत्ता और संगठन से जुड़े लोगों को अपना संरक्षक और भाई बताता है. जिसे प्रधानमंत्री की लालकिले की तकदीर धर्मादेश लगती है और वो चुन-चुनकर दिमागी नक्सली खोजकर उनके ऊपर हमले करने को ही धर्म की रक्षा और देशभक्ति समझता है.तकलीफ तो ये है कि देश का गोदी मीडिया ऐसे लोगों को स्टूडियो में बुलाकर साक्षात्कार लेता है. ऐसे तत्वो के पाडकास्ट जारी होते हैं.
सवाल ये नही है कि एक स्वतंत्र भारद्वाज को जंतर -मंतर पर धरने के बाद गिरफ्तार कर लिया जाता है, मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है. सरकार के मंत्री स्वतंत्र जैसे लोगों से अपने रिश्तों को नकार कर बचने की बेशर्म कोशिश करते है. जबकि तमाम आडिओ, वीडियो छात्र प्रमाणित करते हैं कि स्वतंत्र जैसे लोग ही सत्तारूढ दल और संगठन की असली ताकत हैं.
जिस देश में कानून के राज के नाम पर नकली रामराज की स्थापना की कोशिश की जाती हैं वहाँ जेन-जी नहीं, जेन स्वतंत्र भारद्वाज पीढी पैदा होती है. ये पीढी विज्ञानं, प्रगति, सदभाव का न अर्थ जानती है और न इसकी जरुरत महसूस करती है. इस पूरी अराजकता के लिए मैं जेन स्वतंत्र को दोषी नही मानता. दोषी तो वे लोग हैं जो ये पीढी तैयार करते हैं.
मैंने दुनिया के तमाम छोटे-बडे, विकसित और विकासशील देशों की यात्रा है लेकिन भारत जैसा माहौल कहीं नहीं देखा. जिस देश को हम सारे जहाँ से अच्छा कहते नही थकते उस देश को इन कूढमगज राजनीतिक दलों और उनके सहयोगियों ने बर्बाद कर दिया है. सत्तारुढ दल और उनके पितृ संगठन देश को विश्व की प्रतिस्पर्धा में खडे होने लायक बनाने की जगह दुर्बल बना रहे हैं.
देश की प्रगति बिना नैतिकता, नागरिकता बोध और अनुशासन के संभव नहीं. हम जेन अल्फा और जेन बीटा पीढी को भी बिगाड़ रहे हैं. शिक्षा की जो स्थिति है वो किसी से छिपी नहीं. जो पब्लिक के स्कूल होने चाहिए वे अभिजात्य के स्कूल हैं और पब्लिक यानि सरकारी स्कूल बूचडखाने हैं. मुफ्त शिक्षा और शिक्षा का अधिकार ढकोसला है. हमारे बच्चे रैलियों की सामग्री बनकर रह गए हैं.
बातें बहुत सी हैं ज्यादातर कडवी हैं. कोई सुनन, समझने को तैयार नहीं. सरकार प्रचारक चला रहे हैं. उनकी शिक्षा- दीक्षा के प्रमाण नही मिलते, मिलते भी हैं तो वे संदिग्ध हैं. ऐसे में देश को विश्व गुरु बनाने की कोशिश हास्यास्पद है.
बहरहाल सरकार और सरकारी पार्टी की कोशिश के सामने आप अपने बच्चों को स्वतंत्र भारद्वाज बनने से बचाइए, अन्यथा उनका भविष बर्बाद हो जाएगा. बच्चों का भविष्य बर्बाद हुआ तो देश का भविष्य सबसे पहले बर्बाद होगा. ये तमाम बातें मैं एआई से पूछकर नहीं लिख रहा. अपने अनुभव से लिख रहा हूँ. इसलिए इन पर गौर कीजिए.
@ राकेश अचल

1 week ago | [YT] | 0