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गोल्जू देवता: वह राजा जिसने लिखा हुआ संकल्प ही सच्चा उपाय बताया

उत्तराखंड की ऊँची पहाड़ियों में, देवदार और बांज के वृक्षों के बीच, एक विशेष मंदिर है — गोल्जू देवता का चिट्ठी वाला मंदिर। इस मंदिर में भक्त फूल और नारियल से नहीं, बल्कि लिखी हुई चिट्ठियों से अपनी प्रार्थना करते हैं।

गोल्जू देवता केवल एक लोकदेवता नहीं हैं। लोककथाओं में वह एक न्यायप्रिय राजा थे — वीर, तपस्वी और लोगों के रक्षक। लेकिन उनकी सबसे अनोखी बात यह है कि वह शायद पहले ऐसे आत्मज्ञानी थे जिन्होंने इंसानों को “लिखकर मांगने” की शक्ति सिखाई — जो आज की भाषा में manifestation कहा जाता है।

चिट्ठियों का मंदिर — आस्था की अभिव्यक्ति
अल्मोड़ा के पास स्थित चिटई मंदिर में आप हजारों चिट्ठियाँ दीवारों पर टंगी हुई, रजिस्टरों में बंधी हुई और धागों से लटकी हुई देख सकते हैं। हर एक चिट्ठी में किसी भक्त की मनोकामना, न्याय की प्रार्थना, या जीवन की एक सच्ची माँग छिपी होती है।

यह केवल परंपरा नहीं है — यह इरादे की अभिव्यक्ति है।
और जब इरादा लिखा जाए, तो वह ऊर्जा का रूप ले लेता है।

आज के समय में लोग कहते हैं —
👉 जो चाहिए, वह लिखो।
👉 अपने मन की बात साफ़ करो।
👉 ब्रह्मांड को संदेश दो।
लेकिन गोल्जू देवता ने यह बात सदियों पहले सिखाई थी —
“मुझसे पत्र के माध्यम से कहो, मैं सुनूंगा।”

ये रीति नहीं, आत्म-जिम्मेदारी है
गोल्जू देवता को चिट्ठी लिखने के लिए भक्त को पहले मनन करना पड़ता है — मैं क्या चाहता हूँ? क्यों चाहता हूँ? यह लिखने से मस्तिष्क और आत्मा दोनों स्पष्ट होते हैं।

शायद यही उनका असली संदेश था —
“जब तुम स्वयं जान लोगे कि तुम्हें क्या चाहिए, तब ब्रह्मांड भी तुम्हारी सहायता करेगा।”

परंपरा बदली हो सकती है, भावना नहीं
समय के साथ पंडितों ने दान-दक्षिणा और अनुष्ठानों को जोड़ दिया होगा। लेकिन मूल भावना आज भी वैसी ही है —
“मन की सच्ची बात, शब्दों में लिखकर कहो। विश्वास रखो।”

आज भी लाखों लोग गवाही देते हैं —
उनकी मुराद पूरी हुई।
कोर्ट का फैसला आया।
रोज़गार मिला।
बीमारी ठीक हुई।

यह चमत्कार नहीं — यह है विश्वास, लेखन और ब्रह्मांड की गति का मेल।

आधुनिक युग से पहले का आत्मज्ञान
आज जब पूरी दुनिया “जर्नलिंग”, “विज़न बोर्ड”, और “मैनिफेस्टेशन” की बात करती है, गोल्जू देवता का यह तरीका उससे कहीं आगे था।
सादा, सच्चा, और शक्तिशाली।

👉 न डर।
👉 न दिखावा।
👉 न भारी अनुष्ठान।
सिर्फ —
“लिखो, भरोसा रखो, और भेज दो उस राजा के पास जो अब भगवान बन गया है।”

अंतिम विचार: एक राजा जो बना न्याय का देवता
गोल्जू देवता सिर्फ पहाड़ों के नहीं हैं —
वह हैं हर उस इंसान के देवता, जो न्याय चाहता है,
जो मन की बात स्पष्ट रूप से कहना चाहता है,
जो श्रद्धा से लिखे हुए शब्दों में चमत्कार की शक्ति देखता है।

हर चिट्ठी में एक सपना है।
हर अक्षर में एक आस्था।
और शायद यही कारण है कि वह राजा — आज सच्चे देवता हैं।

7 months ago | [YT] | 0

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*आपको बालाजी महाराज के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभामनाऐ बालाजी महाराज की कृपा आप पर आपके परिवार पर सदैव बनी रहे*🙏🎂🙏

1 year ago | [YT] | 2

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राम नवमी की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभ कामनाएँ! प्रभु श्री राम जी की कृपा और आशीर्वाद आप पर और आपके परिवार पर सदैव बना रहे ।

1 year ago | [YT] | 1

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प्रिय वर,
आज दिनांक 9 अप्रैल को चैत्र माह को शुरू होने वाले हिन्दू नव-वर्ष ओर नया सम्वत्सर विक्रम संवत 2081 को शुरू होने वाले नवरात्रि पर्व की सभी निवासियों को असीम शुभकामनाएं। परमपिता परमेश्वर ओर मां जगदम्बे आपके ओर आपके पूरे परिवार के सम्पूर्ण कष्टों को हर कर सुख शांति और समृद्धि की आपके घर आंगन में बरसात करैं साथ ही शुभकामनाएं स्वरूप आपको

रिद्धि दै
सिद्धिदै
वंश मैं वृद्धि दैं
हृदय मैं ज्ञान दैं
चित्त मैं ध्यान दैं
अभय वरदान दैं
दु:ख को दूर कर
सुख भरपूर कर
आशा को संपूर्ण कर
सज्जन जो हित दे
कुटुंब में प्रीत दे
जग में जीत दे
माया दे
साया दे
और
निरोगी काया दे
मान दे
सम्मान दे
सुख समृद्धि और ज्ञान दे
शान्ति दे
शक्ति दे
भक्ति भरपूर दें...
इन्हीं सब शुभकामनाओं के साथ आप सभी को पुनः हिन्दू नव वर्ष‌और नये संवत्सर 2081 और नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनाएं ओर बधाई

1 year ago | [YT] | 0

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*दर्द और खुशी दोनों ही बहुत अच्छे शिक्षक है, क्युकि ये दोनों ही अपनी-अपनी परिस्थितियों में हमे बहुत कुछ सीखा जाते है।*

1 year ago | [YT] | 1

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शुभ प्रभात ॐ नमो नारायणी भगवते वासुदेवाय नमः

1 year ago | [YT] | 2

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होली का पर्व बहुआयामी है। इस दिन समाज से ऊंच-नीच, धनी-निर्धन जैसी विभाजक भावनाएं विलुप्त हो जाती हैं। यह पर्व खेती-किसानी से भी जुड़ा है इसीलिए तो जलती होली में गेहूं की बालियों को भूनने का महत्व है।
होली दहन विधि : होली उत्साह और उमंग से भरा त्योहार और उत्सव है। विष्णु भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं। होलिका दहन के लिए लोग महीने भर पहले से तैयारी में जुटे रहते हैं। सामूहिक रूप से लोग लकड़ी, उपले आदि इकट्ठा करते हैं और फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन संध्या काल में भद्रा दोषरहित समय में होलिका दहन किया जाता है। होली जलाने से पूर्व उसकी विधि-विधान सहित पूजा की जाती है और अग्नि एवं विष्णु के नाम से आहुति दी जाती है।

होलिका दहन के दिन पवित्र अग्नि के चारों ओर लोग नृत्य करते हैं और लोकगीत का आनंद लेते हैं। इस दिन राधा-कृष्ण की लीलाओं एवं ब्रज की होली की धुन गलियों में गूंजती रहती है और लोग आनंद-विभोर रहते हैं। होलिका दहन के दिन लोग अपने-अपने घरों में खीर और मालपुआ बनाकर अपनी कुलदेवी और देवता को भोग लगाते हैं।

प्राचीन कथा : होली की पूर्व संध्या में होलिका दहन किया जाता है। इसके पीछे एक प्राचीन कथा है कि दीति का पुत्र हिरण्यकश्यपु भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था। इसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर स्वयं को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में केवल उसी की पूजा की जाएगी। उसने अपने राज्य में यज्ञ और आहुति बंद करवा दी और भगवान के भक्तों को सताना शुरू कर दिया।

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के लाख कहने के बाद प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति करता रहा। असुराधिपति हिरण्यकश्यपु ने अपने पुत्र को मारने का भी कई बार प्रयास किया, परंतु भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ।

असुर राजा की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसी चादर मिली थी कि जिसे ओढ़ने पर अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। होलिका उस चादर को प्रहलाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। दैवयोग से वह चादर उड़कर प्रहलाद के ऊपर आ गई जिससे प्रहलाद की जान बच गई और होलिका जल गई। होलिका दहन के दिन होली जलाकर 'होलिका' नामक दुर्भावना का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का उत्सव मनाया जाता है।

होली रंगोत्सव : होली का त्योहार प्रेम और सद्भावना से जुड़ा त्योहार है जिसमें अध्यात्म का अनोखा रूप झलकता है। इस त्योहार को रंग और गुलाल के साथ मनाने की परंपरा है। इस त्योहार के साथ कई पौराणिक कथाएं एवं मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

होली पौराणिक तथ्य : होली का त्योहार भारतवर्ष में अति प्राचीनकाल से मनाया जाता आ रहा है। इतिहास की दृष्टि से देखें तो यह वैदिक काल से मनाया जाता आ रहा है। हिन्दू मास के अनुसार होली के दिन चैत्र कृष्ण प्रतिप्रदा के दिन धरती पर प्रथम मानव मनु का जन्म हुआ था। इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था। इन सभी खुशियों को व्यक्त करने के लिए रंगोत्सव मनाया जाता है। नृसिंह रूप में भगवान इसी दिन प्रकट हुए थे और हिरण्यकश्यपु नामक महासुर का वध कर भक्त प्रह्लाद को दर्शन दिए थे।

होली का पर्व यह सन्देश भी देता है कि बुराई कितनी भी व्यापक एवं शक्तिशाली हो जाये अंततः विजय सत्य एवं अच्छाई की ही होती है।

आप सभी को होली के इस पावन पर्व की शुभेच्छा 🙏🏼

1 year ago | [YT] | 0

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My prediction for 2024 elections

BJP :0
Congress :0
Others : 0
AAP: 543 seats from Chaddha tent house
😂😂

2 years ago | [YT] | 0

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इस ऐतिहासिक क्षण को अपनाते हुए, 'जय श्री राम' की गूँज हमारे दिलों में गूंजे, हमें 500 वर्षों के बाद गर्व और भावना से एकजुट करें। विश्वास और दृढ़ता की पराकाष्ठा का साक्षी, सभी भारतीयों के लिए एक साझा उत्सव। 🚩🙏 #राममंदिर #जयश्रीराम" Embracing the historic moment, let the echoes of 'Jai Shree Ram' resonate through our hearts, uniting us in pride and emotion after 500 years. Witnessing the culmination of faith and perseverance, a shared celebration for all Indians. 🚩🙏 #RamMandir #JaiShreeRam"

2 years ago | [YT] | 3

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समयसूचक AM और PM का उद्गगम भारत ही था, लेकिन हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :
AM : Ante Meridian PM : Post Meridian
एंटे यानि पहले, लेकिन किसके? पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?
यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।काफ़ी अध्ययन करने के पश्चात ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को साफ-साफ दृष्टिगत किया है। कैसे? देखिये...
AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya
PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya
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सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसी को गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस वास्तविक ‘मतलब' को इंगित नहीं करते।
आरोहणम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।
पतनम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का ढलाव।
बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।
पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।

हम अपनी हजारों साल की समृद्ध विरासत, परंपराओं और संस्कृति का पालन करते हुए भी आधुनिक और उन्नत हो सकते हैं।इस से शर्मिंदा न हों बल्कि इस पर गौरव की अनुभूति करें और केवल नकली सुधारवादी बनने के लिए इसे नीचा न दिखाएं।समय निकालें और इसके बारे में पढ़ें / समझें / बात करें / जानने की कोशिश करें।
अपने “सनातनी" होने पर गौरवान्वित महसूस करें।
#सनातनी #सनातनभारत #सनातन #सनातनहमारीपहचान

2 years ago | [YT] | 2