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विरार चंदनसार तांदूळ बाजार क्षेत्र में नशे में धुत दो युवकों ने फैलाई दहशत, खुद को बताया विरार पुलिस के थ्री-स्टार अफसरों का बेटा!

विरार (पालघर), 17 नवंबर 2025 – विरार पूर्व के चंदनसार तांदूळ बाजार इलाके में कल सुबह करीब 4 बजे एक चौंकाने वाली घटना घटी, जब दो नशे में धुत युवक क्षेत्र में घूम-घूमकर लोगों को डराने और पीछा करने लगे। इन युवकों ने खुद को विरार पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ थ्री-स्टार रैंक के अधिकारियों का बेटा बताते हुए सार्वजनिक रूप से धौंस जमाई, जिससे इलाके में दहशत का माहौल बन गया। यह घटना स्थानीय निवासियों के लिए एक डरावना अनुभव साबित हुई, और अब पुलिस इस मामले की जांच कर रही है।


घटना का विस्तृत विवरण
घटना कल, 16 नवंबर 2025 को सुबह 4:00 बजे की है। चंदनसार तांदूळ बाजार, जो विरार पूर्व का एक व्यस्त क्षेत्र है, रात के समय अपेक्षाकृत शांत रहता है, लेकिन देर रात ड्यूटी वाले कुछ लोग बाहर निकलते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दो युवक (उम्र लगभग 25-30 वर्ष) पूरी तरह शराब के नशे में थे। वे लड़खड़ाते हुए चल रहे थे, जोर-जोर से चिल्ला रहे थे और राहगीरों को गालियां दे रहे थे।


आरोपियों का व्यवहार: युवकों ने कई लोगों का पीछा किया, उन्हें डराया-धमकाया और बार-बार कहा, "हमारे पापा विरार थाने के थ्री-स्टार अफसर हैं। तुम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन हम तुम्हें ठिकाने लगा देंगे।" रात के अंधेरे से घर जा रहे लोगों को धमका रहे थे।


प्रभावित लोग:  एक स्थानीय निवासी ने बताया, "वे इतने नशे में थे कि कुछ भी कर सकते थे। हमने तुरंत पुलिस को फोन किया।"


स्थान की विशेषता: चंदनसार तांदूळ बाजार विरार का एक प्रमुख क्षेत्र है, जहां चावल और अन्य अनाज की थोक बिक्री होती है। यह क्षेत्र रात में कम रोशनी वाला होता है, जो ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देता है।




पुलिस की प्रतिक्रिया
सूचना मिलते ही विरार पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची, लेकिन तब तक दोनों युवक फरार हो चुके थे। पुलिस ने इलाके के CCTV फुटेज की जांच शुरू कर दी है और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। विरार पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने कहा, "यह मामला गंभीर है। अगर आरोपियों का पुलिस से कोई संबंध साबित हुआ तो आंतरिक जांच होगी, लेकिन प्रारंभिक जानकारी से लगता है कि यह झूठा दावा हो सकता है। हम जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार करेंगे।"


विस्तृत विश्लेषण: सामाजिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलू
यह घटना महाराष्ट्र में बढ़ते नशे और पुलिस के नाम के दुरुपयोग की समस्या को उजागर करती है।


आइए इसे विस्तार से समझें: नशे की समस्या और सार्वजनिक सुरक्षा: महाराष्ट्र में शराबबंदी नहीं है, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर नशा करना और उपद्रव मचाना गैरकानूनी है। हाल के महीनों में विरार जैसे उपनगरीय क्षेत्रों में नशे से जुड़ी घटनाएं बढ़ी हैं।


उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में सूरत (गुजरात) में एक समान घटना घटी थी, जहां एक व्यापारी के बेटे ने शराब पार्टी के दौरान पुलिस पर हमला किया। वहां भी आरोपी ने अपनी 'पहुंच' का दावा किया था। विरार में यह घटना बताती है कि नशा न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि सार्वजनिक शांति को भी भंग करता है।


विश्लेषण: ऐसे मामलों में युवा वर्ग अक्सर 'प्रभावशाली' पृष्ठभूमि का दावा करके बचने की कोशिश करता है। इससे समाज में असमानता की भावना बढ़ती है।


पुलिस के नाम का दुरुपयोग: थ्री-स्टार रैंक आमतौर पर डिप्टी कमिश्नर या समकक्ष स्तर के अधिकारी को संदर्भित करता है। अगर आरोप सही हैं, तो यह पुलिस विभाग की छवि पर सवाल उठाता है। लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसे दावे झूठे साबित होते हैं। विरार पुलिस स्टेशन, जो पालघर जिले का हिस्सा है, पहले भी ऐसी शिकायतों से जूझ चुका है।


कानूनी पहलू: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 506 (आपराधिक धमकी), धारा 509 (महिलाओं/लोगों का अपमान), और महाराष्ट्र मद्य निषेध अधिनियम की धारा 85 (सार्वजनिक नशा) के तहत आरोप लग सकते हैं। अगर पुलिस अधिकारी का नाम दुरुपयोग साबित हुआ, तो IPC 170/171 (सरकारी कर्मचारी होने का झूठा दावा) भी लागू हो सकती है। सजा: 2-7 वर्ष तक की कैद और जुर्माना।


क्षेत्रीय संदर्भ और रोकथाम के उपाय: विरार एक तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र है, जहां मुंबई से आने वाले प्रवासी बढ़ रहे हैं। चंदनसार तांडूल बाजार जैसे इलाकों में रात की गश्त कम होने से अपराध बढ़ते हैं। स्थानीय निवासियों की शिकायत है कि CCTV कैमरे अपर्याप्त हैं और पुलिस रिस्पॉन्स टाइम 15-20 मिनट का होता है।


सुझाव: पुलिस को रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक गश्त बढ़ानी चाहिए। साथ ही, नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाए जाएं। समान घटनाओं से सीखते हुए (जैसे सूरत मामला), विरार पुलिस को VIP संस्कृति पर अंकुश लगाना चाहिए।


सामाजिक प्रभाव: यह घटना महिलाओं और बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि स्टॉकिंग (पीछा करना) एक गंभीर अपराध है। POSCO या अन्य कानूनों के तहत अगर नाबालिग प्रभावित हुए तो मामला और गंभीर हो सकता है। समाज में 'पावर' का दुरुपयोग युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाता है।

निष्कर्ष और अपील
यह घटना एक चेतावनी है कि कानून सबके लिए समान है। विरार पुलिस से अपील है कि आरोपियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए और मामले की निष्पक्ष जांच हो। स्थानीय निवासी सतर्क रहें और ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट तुरंत करें। अगर आपके पास कोई जानकारी है, तो 100 या 112 पर संपर्क करें।

2 months ago | [YT] | 0

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केरल IT प्रोफेशनल की आत्महत्या: RSS पर गंभीर यौन शोषण के आरोप, विस्तृत विश्लेषणकेरल से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसमें एक 26 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर आनंदु अजी (Anandu Aji) ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। यह घटना 9 अक्टूबर 2025 को थिरुवनंतपुरम के थंपानूर इलाके के एक लॉज में हुई, जहां उनका शव लटका मिला। मृत्यु से पहले उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक शेड्यूल्ड पोस्ट (जिसे 'मरणोन्मुखी घोषणा' कहा गया) साझा किया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्यों द्वारा बचपन से लगातार यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए। यह पोस्ट उनकी मौत के बाद वायरल हो गया, जिसने पूरे देश में सियासी और सामाजिक हंगामा मचा दिया। आइए इस घटना का विस्तृत विश्लेषण करते हैं, जिसमें तथ्य, आरोप, प्रतिक्रियाएं और संभावित प्रभाव शामिल हैं।घटना का पृष्ठभूमि और समयरेखापीड़ित का परिचय: आनंदु अजी कोट्टायम जिले के थंपलाकड़ (Thampalakad) के निवासी थे। वे एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम करते थे और परिवार के इकलौते बेटे थे। बचपन में उनके पिता ने उन्हें RSS की 'बाल शाखा' में शामिल कराया था। वे ITC (इंटरमीडिएट ट्रेनिंग कैंप) और OTC (ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप) जैसे RSS के प्रशिक्षण शिविरों में सक्रिय थे।
आत्महत्या की घटना: 8 अक्टूबर को वे एक रिश्तेदार के घर से लापता हो गए। 9 अक्टूबर को थंपानूर के एक लॉज में उनका शव फंदे पर लटका मिला। पुलिस ने इसे 'अनैसर्गिक मौत' का मामला दर्ज किया और पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार को सौंप दिया।
सुसाइड नोट का खुलासा: इंस्टाग्राम पर शेड्यूल्ड पोस्ट में आनंदु ने लिखा कि वे लंबे समय से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे डिप्रेशन और PTSD) से जूझ रहे थे, जो RSS में हुए कथित शोषण का नतीजा था। उन्होंने खुद को 'रेप विक्टिम' बताया और कहा, "मैं जानता हूं कि मैं अकेला शिकार नहीं हूं। RSS कैंपों में कई अन्य बच्चे भी पीड़ित हुए हैं। इन बच्चों को उचित देखभाल और काउंसलिंग की जरूरत है।"

आरोपों का विस्तारआनंदु के पोस्ट के अनुसार, शोषण की शुरुआत उनके बचपन में हुई:बचपन का शोषण: 3-4 साल की उम्र में उनके पड़ोसी 'एनएम' (एक RSS सदस्य और BJP से जुड़े व्यक्ति) ने लगातार यौन शोषण किया। आनंदु ने इसे 'परिवार के करीबी' का रूप दिया गया बताया।
RSS कैंपों में शोषण: ITC और OTC जैसे कैंपों में कई RSS सदस्यों ने उन्हें यौन शोषण का शिकार बनाया। उन्होंने शारीरिक हिंसा (जैसे लाठियों से पीटना) का भी जिक्र किया। पोस्ट में कहा गया कि RSS की 'चरित्र निर्माण' की आड़ में ऐसे अपराध छिपाए जाते हैं।
अन्य पीड़ितों का जिक्र: आनंदु ने स्पष्ट कहा कि वे अकेले नहीं हैं; RSS शाखाओं और कैंपों में 'व्यापक यौन शोषण' होता है, जहां लाखों बच्चे भाग लेते हैं। उन्होंने माता-पिता से अपील की कि बच्चों को सेक्स एजुकेशन दें और RSS जैसे संगठनों से सावधान रहें।
मानसिक प्रभाव: शोषण के कारण वे वर्षों से आइसोलेटेड महसूस कर रहे थे। हाल के महीनों में दोस्तों ने उनसे दूरी बना ली, जो उनकी निराशा को बढ़ा गया।

यह आरोप RSS की छवि पर सीधा सवाल उठाते हैं, जो खुद को 'हिंदू राष्ट्रवाद' और 'चरित्र निर्माण' का संगठन बताता है।राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएंयह घटना तुरंत राजनीतिक रंग ले चुकी है, खासकर केरल की सियासत में जहां RSS का प्रभाव सीमित लेकिन मौजूद है:कांग्रेस की प्रतिक्रिया: प्रियंका गांधी वाड्रा ने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, "यह बेहद भयावह है। आनंदु ने अपनी सुसाइड नोट में RSS के कई सदस्यों द्वारा बार-बार शोषण का आरोप लगाया। वे अकेले नहीं थे; RSS कैंपों में व्यापक यौन शोषण हो रहा है। सरकार को स्वतंत्र जांच करनी चाहिए।" कांग्रेस नेता सुप्रिया श्राइनेटे खेरा ने इसे 'BJP-RSS का काला चेहरा' बताया।
CPI(M) और DYFI: केरल की सत्ताधारी पार्टी CPI(M) के यूथ विंग DYFI ने पुलिस को लिखित शिकायत दी। DYFI स्टेट सेक्रेटरी वीके सनोज ने कहा, "यह RSS का अमानवीय चेहरा उजागर करता है। आनंदु की मौत एक चेतावनी है। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।" उन्होंने RSS कैंपों में 'रेप कल्चर' का आरोप लगाया।
यूथ कांग्रेस: उन्होंने भी जांच की मांग की और कहा, "RSS की शाखाओं में बच्चों का शोषण बर्दाश्त नहीं।"
RSS का रुख: RSS ने अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "पोस्ट में किसी का नाम नहीं लिया गया। वे RSS छोड़ चुके थे, इसलिए संगठन इससे जुड़ा नहीं।" हालांकि, प्रांत प्रचारक एस सुधर्शन ने कॉल्स का जवाब नहीं दिया।
सोशल मीडिया पर हंगामा: X पर #RSS100YearsExposed, #JusticeForAnandu जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कर्नाटक कांग्रेस ने पोस्ट किया, "बाल शाखा से रेप तक, यही RSS का चरित्र निर्माण?" कई यूजर्स ने इसे 'संघ का कलंक' कहा, जबकि कुछ ने मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस करने की अपील की।

पक्ष
मुख्य मांग/बयान
कांग्रेस
स्वतंत्र जांच, RSS कैंपों में शोषण की सच्चाई उजागर
CPI(M)/DYFI
पुलिस जांच, दोषियों पर कार्रवाई, RSS का 'अमानवीय चेहरा' उजागर
RSS
कोई आधिकारिक बयान नहीं; 'नाम न लेने' का हवाला
सोशल मीडिया
#JusticeForAnandu ट्रेंडिंग; पीड़ितों के लिए काउंसलिंग की अपील

पुलिस जांच और कानूनी स्थितिथिरुवनंतपुरम पुलिस ने मामला 'अनैसर्गिक मौत' के रूप में दर्ज किया है। पोस्ट को 'सुसाइड नोट' मानते हुए जांच शुरू की गई, लेकिन अब तक कोई आरोपी नामित नहीं।
पोंकुन्नम पुलिस (कोट्टायम) ने कहा कि वे आरोपों से अवगत हैं, लेकिन 'जल्दबाजी में निष्कर्ष नहीं निकालेंगे।' आनंदु मानसिक स्वास्थ्य उपचार ले रहे थे, जो जांच का हिस्सा बनेगा।
DYFI और CPI(M) की शिकायत पर ब्रॉडर जांच की मांग है, जिसमें RSS कैंपों की भूमिका शामिल हो। अगर आरोप साबित हुए, तो IPC की धारा 376 (रेप), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और POCSO एक्ट लागू हो सकता है।
विशेषज्ञों का मत: मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि बचपन के ट्रॉमा से PTSD हो सकता है, जो आत्महत्या का कारण बनता है। केरल में हेल्पलाइन (जैसे 104) की अपील की जा रही है।

संभावित प्रभाव और निष्कर्षयह घटना RSS की 'बाल शाखा' और कैंपों पर सवाल उठाती है, जहां लाखों बच्चे भाग लेते हैं। अगर जांच से और पीड़ित सामने आए, तो यह संगठन की छवि को गहरा झटका दे सकता है। राजनीतिक रूप से, यह केरल में BJP-RSS के खिलाफ विपक्ष को मजबूती देगा। साथ ही, यह बच्चों के यौन शोषण और मानसिक स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय बहस छेड़ सकता है।

आनंदु की मौत दुखद है—एक होनहार युवा, जिसकी जिंदगी ट्रॉमा ने छीन ली। यह हमें याद दिलाता है कि 'चरित्र निर्माण' के नाम पर अपराध छिपाना अस्वीकार्य है। जांच पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए, ताकि न्याय मिले और अन्य पीड़ितों को आवाज मिले।

3 months ago (edited) | [YT] | 0

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मोहित कंबोज का मायानगरी में धोखाधडी का मायाजाल

क्या है पूरा मामला?

मुंबई, 13 अक्टूबर 2025: बीजेपी के प्रमुख नेता और व्यवसायी मोहित कंबोज (उर्फ मोहित कबोज/भारतीया) एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी (SRA) घोटाले और वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों ने महाराष्ट्र की सियासत में हलचल मचा दी है।

विपक्षी नेताओं, जैसे कांग्रेस की सांसद वर्षा गायकवाड, शिवसेना (UBT) की सुश्मा अंधारे और संजय राउत, ने कंबोज और उनकी पत्नी की कंपनी पर 30 SRA प्रोजेक्ट्स अनुचित रूप से हासिल करने का आरोप लगाया है। साथ ही, उनके पुराने बैंक लोन धोखाधड़ी के मामले भी चर्चा में हैं।

कंबोज ने इन आरोपों का खंडन करते हुए विपक्ष को सबूत पेश करने या इस्तीफा देने की चुनौती दी है।

आइए, इस मामले का विस्तृत विश्लेषण देखें।

SRA घोटाले का विवरण
सितंबर 2025 में, SRA से जुड़ा विवाद तब सुर्खियों में आया, जब वर्षा गायकवाड ने दावा किया कि कंबोज की पत्नी की कंपनी को मुंबई में 30 SRA प्रोजेक्ट्स बिना उचित प्रक्रिया के आवंटित किए गए। SRA योजना का उद्देश्य झोपड़पट्टीवासियों को पक्के मकान देना है, जिसमें डेवलपर्स को फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) का लाभ मिलता है।

आरोप है कि कंबोज ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के करीबी होने का फायदा उठाकर ये प्रोजेक्ट्स हासिल किए। अनुमान है कि इनकी कुल वैल्यू ₹1000 करोड़ से अधिक हो सकती है।इसके अलावा, जुहू गल्ली में पालिका के सफाई कर्मचारियों के घरों को SRA प्रोजेक्ट में शामिल करने का मामला सामने आया।

विपक्ष का दावा है कि ये कर्मचारी योग्य नहीं थे, और फर्जी दस्तावेजों के जरिए उन्हें फायदा पहुंचाया गया। इससे 100 से अधिक परिवार प्रभावित हुए।

शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने इसे "राजनीतिक संरक्षण का दुरुपयोग" करार दिया और फडणवीस सरकार पर सवाल उठाए।BMC ने इस मामले की जांच शुरू की है, लेकिन अक्टूबर 2025 तक कोई अपडेट उपलब्ध नहीं है।

कंबोज ने एक वीडियो बयान में कहा, "मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है। विपक्ष झूठ फैला रहा है। पुरावा दो, वरना राजीनामा दो।" कोई औपचारिक FIR दर्ज नहीं हुई, लेकिन विपक्ष CBI या EOW जांच की मांग कर रहा है।

वित्तीय धोखाधड़ी के पुराने मामले

SRA विवाद से पहले, कंबोज पर बैंक लोन धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगे थे। उनके प्रमुख मामलों में शामिल हैं:

बैंक ऑफ इंडिया धोखाधड़ी (2013-2018): कंबोज की कंपनी अवयान ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड और KBJ होटल्स गोवा प्राइवेट लिमिटेड ने फर्जी निर्यात दस्तावेजों के जरिए ₹57.26 करोड़ का लोन लिया।

जांच में पाया गया कि फंड का इस्तेमाल व्यक्तिगत संपत्तियों (होटल, ज्वेलरी) में किया गया। CBI ने 2020 में छापे मारे, लेकिन 2023 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर केस बंद कर दिया गया। विपक्ष ने इसे "राजनीतिक दबाव" का नतीजा बताया।


इंडियन ओवरसीज बैंक धोखाधड़ी (2022): EOW ने ₹52 करोड़ के फर्जी लोन मामले में FIR दर्ज की। यह जांच अभी लंबित है।

KBJ ज्वेलर्स विवाद: कंबोज की कंपनी KBJ ज्वेलर्स पर संपत्ति खरीद और टैक्स चोरी के आरोप लगे। CBI ने 2020 में छापे मारे, लेकिन कोई नया केस दर्ज नहीं हुआ।

इन मामलों में कंबोज का मोडस ऑपरेंडी निरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे घोटालों से मिलता-जुलता रहा, जहां SWIFT सिस्टम और बैंक अधिकारियों की सांठगांठ से फंड डायवर्ट किए गए।

कुल मिलाकर, बैंकों को ₹100 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ, जिसका असर छोटे निवेशकों और टैक्सपेयर्स पर पड़ा।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव :कंबोज का बीजेपी से गहरा नाता है।

वे 2016-2019 तक मुंबई युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे और 2014 में दिंडोशी से विधानसभा चुनाव लड़े।
2024 में उन्होंने कांग्रेस जॉइन करने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में बीजेपी में लौट आए।

विपक्ष का दावा है कि फडणवीस का समर्थन होने से कंबोज को जांच से "बचाव" मिलता है।

SRA घोटाले से मुंबई के लाखों स्लम ड्वेलर्स प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि प्रोजेक्ट्स में देरी और भ्रष्टाचार से गरीबों को घर नहीं मिल रहे।

आर्थिक रूप से, SRA प्रोजेक्ट्स और बैंक फ्रॉड का कुल नुकसान हजारों करोड़ में हो सकता है। अगर ये आरोप साबित हुए, तो यह कंबोज के करियर का सबसे बड़ा स्कैंडल बन सकता है।

कानूनी स्थिति और कंबोज का उत्तर: SRA मामले में अभी कोई आपराधिक केस दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत जांच हो सकती है। बैंक फ्रॉड मामलों में एक केस (2023) बंद हो चुका है, जबकि अन्य लंबित हैं।

कंबोज ने कहा, "मैंने सभी दस्तावेज जांच एजेंसियों को सौंपे हैं। मैं निर्दोष हूं।" वे बीजेपी में सक्रिय हैं और पार्टी के आंतरिक चुनावों में हिस्सा ले रहे हैं।निष्कर्षमोहित कंबोज पर लगे SRA और वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप महाराष्ट्र की सियासत और SRA की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं।

विपक्ष इसे बीजेपी सरकार के खिलाफ हथियार बना रहा है, जबकि कंबोज इसे "बदनामी का षड्यंत्र" बता रहे हैं।

जनता और जांच एजेंसियों की नजर अब इस मामले पर टिकी है। क्या यह सिर्फ राजनीतिक ड्रामा है, या सच्चाई सामने आएगी? अधिक जानकारी के लिए SRA की आधिकारिक वेबसाइट और कोर्ट रिकॉर्ड्स की जांच करें।

(यह लेख सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है।)

3 months ago | [YT] | 0

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हरियाणा कैडर के आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार, वही अधिकारी, जिसने जातिगत भेदभाव और प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, अब हमारे बीच नहीं हैं।

पूरन कुमार ने बताया था कि कैसे उनके साथ लगातार भेदभाव और उत्पीड़न होता रहा। 1997 बैच के अधिकारियों को जल्दी प्रमोशन और वेतनवृद्धि मिली, लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हुआ सिर्फ इसलिए कि वे अनुसूचित जाति (SC) से आते थे।उन्होंने मात्र दो महीनों में पाँच शिकायतें दर्ज कराईं, एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी द्वारा लगातार अपमान और मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ।

यहां तक कि जब एक जांच समिति बनी, तो उसमें कोई भी SC सदस्य शामिल नहीं था, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई।उनकी आखिरी तैनाती “आईजीपी होम गार्ड्स” के रूप में की गई एक गैर-कैडर पद, जिसे उन्होंने “सार्वजनिक अपमान और पद के दुरुपयोग” बताया।और अब वह अधिकारी मृत पाए गए। एक ऐसे सिस्टम में, जो न्याय देने के बजाय सत्य बोलने वालों को तोड़ देता है।पूरन कुमार की मौत सिर्फ एक अफसर की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की भी है जो समानता और संविधान में विश्वास रखती थी।यह घटना जातिगत भेदभाव की क्रूर सच्चाई को उजागर करती है।अब सवाल यह है क्या इस देश में समानता के लिए आवाज उठाना अपराध है?

आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार की मौत: एक विस्तृत विश्लेषण परिचय और घटना का संक्षिप्त विवरण

हरियाणा कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार (52 वर्ष), जो 2001 बैच के थे और अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से संबंधित थे, 7 अक्टूबर 2025 को चंडीगढ़ के सेक्टर-11 स्थित अपने आधिकारिक आवास में मृत पाए गए।

प्रारंभिक जांच में यह आत्महत्या का मामला माना गया है, जिसमें उन्होंने अपनी सर्विस रिवॉल्वर से खुद को गोली मारी। घटना के समय उनकी पत्नी, जो 2001 बैच की आईएएस अधिकारी अमनीत पी. कुमार हैं, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में जापान की आधिकारिक यात्रा पर थीं। पुलिस ने एक 9-पेज का सुसाइड नोट बरामद किया है, जिसमें नौकरी से जुड़े मुद्दे, जातिगत भेदभाव और प्रशासनिक उत्पीड़न का जिक्र है। यह घटना न केवल एक अधिकारी की त्रासदी है, बल्कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त जातिवाद और अन्याय की गहरी सच्चाई को उजागर करती है।

पूरन कुमार का पृष्ठभूमि और योगदान

वाई. पूरन कुमार आंध्र प्रदेश के मूल निवासी थे और इंजीनियरिंग (बी.ई. कंप्यूटर साइंस) तथा आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र थे। उन्होंने हरियाणा पुलिस में महत्वपूर्ण पदों पर सेवा की, जिनमें अंबाला और कुरुक्षेत्र जिले, आईजीपी (अंबाला और रोहतक रेंज), होम गार्ड्स, टेलीकॉम और अन्य विभाग शामिल हैं। वे एक ईमानदार, साहसी और पारदर्शी अधिकारी के रूप में जाने जाते थे, जिन्होंने हमेशा प्रशासनिक अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और अधिकारियों के अधिकारों के खिलाफ आवाज उठाई।

उन्होंने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के दौरान गैरकानूनी प्रमोशन, वाहन आवंटन में भेदभाव और हाउसिंग पॉलिसी के उल्लंघन जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और निर्वाचन आयोग को पत्र लिखे। उनकी पत्नी अमनीत कुमार हरियाणा कैडर की आईएएस अधिकारी हैं और विदेश सहयोग विभाग में कमिश्नर एवं सचिव के पद पर तैनात हैं।

जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की कालानुक्रमिक घटनाएंपूरन कुमार ने वर्षों से जाति-आधारित भेदभाव का शिकार होने का आरोप लगाया। उनकी शिकायतें दर्शाती हैं कि एससी अधिकारियों के साथ चुनिंदा व्यवहार किया जाता था, जबकि सामान्य बैच के अधिकारियों को लाभ मिलते रहे।

नीचे एक तालिका में प्रमुख घटनाओं का सारांश दिया गया है:

वर्ष/तिथिघटना का विवरणप्रभाव/कार्रवाई

2020 (जुलाई)तत्कालीन डीजीपी मनोज यादव पर जातिगत भेदभाव और व्यक्तिगत vendetta का आरोप।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में पुलिस पोस्ट और हाउसिंग आवंटन के खिलाफ याचिका दायर।हाईकोर्ट में चुनौती; एनसीएससी (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग) से एफआईआर की मांग।

(अगस्त)शाहजादपुर थाने के मंदिर में प्रार्थना पर डीजीपी मनोज यादव द्वारा पत्र।सरकारी अनुमति की जांच; कुमार ने इसे जातिगत पूर्वाग्रह बताया।

एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ 5 शिकायतें (दो महीनों में), अपमान और मानसिक प्रताड़ना के लिए।एनसीएससी से एफआईआर की मांग; जांच समिति बनी लेकिन कोई एससी सदस्य नहीं, जिस पर आपत्ति।

1अप्रैल 2024आधिकारिक वाहन लौटाया; आईपीएस अधिकारियों में जातिगत भेदभाव का आरोप। मुख्य सचिव टी.वी.एस.एन. प्रसाद को पत्र।वाहन आवंटन में चयनात्मकता का मुद्दा उठाया।

मध्य 2024मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को पत्र: 1991, 1996, 1997 और 2005 बैच के प्रमोशन अवैध; वित्त विभाग द्वारा होम मिनिस्ट्री नियमों का उल्लंघन। एससी बैच को नजरअंदाज करने का आरोप।प्रमोशन में जातिगत पूर्वाग्रह का दावा।

फरवरी 2024पूर्व डीजीपी यादव के खिलाफ एनसीएससी में शिकायत; परिवार की सुरक्षा चिंता व्यक्त।होम मिनिस्टर अनिल विज को पत्र; क्राइम जांच विभाग से खतरे की जांच।

सितंबर 2024स्क्रीनिंग कमिटी मीटिंग पर शिकायत; 2011 बैच को सिलेक्शन ग्रेड देने का विरोध।मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट उल्लंघन का आरोप।

29 सितंबर 2025रोहतक के सुन्नारिया पोलिस ट्रेनिंग सेंटर (पीटीसी) में ट्रांसफर; पूर्व में एडीजी रोहतक।गैर-कैडर पद “आईजीपी होम गार्ड्स” को सार्वजनिक अपमान बताया।

ये घटनाएं दर्शाती हैं कि 1997 बैच के अधिकारियों को अग्रिम वेतन वृद्धि और प्रमोशन मिले, जबकि पूरन कुमार जैसे एससी अधिकारियों को विलंब का सामना करना पड़ा। उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से जातिगत पूर्वाग्रह से जोड़ा।

प्रशासनिक अन्याय और अंतिम तैनातीपूरन कुमार की अंतिम तैनाती रोहतक के सुन्नारिया पीटीसी में आईजीपी के रूप में हुई, जो एक गैर-कैडर पद था। उन्होंने इसे “सार्वजनिक अपमान और पद का दुरुपयोग” करार दिया।

इससे पहले, उन्होंने “वन ऑफिसर, वन हाउस” पॉलिसी के उल्लंघन पर शिकायत की, जिसमें कई आईपीएस अधिकारियों पर एक से अधिक सरकारी आवास कब्जे का आरोप लगाया। रोहतक में एक भ्रष्टाचार मामले (एक एएसआई द्वारा रिश्वत की मांग, जिसमें कुमार का नाम जोड़ा गया) ने भी विवाद बढ़ाया, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह उनकी मौत का प्रत्यक्ष कारण था। सुसाइड नोट में नौकरी से जुड़े दबाव, प्रमोशन विवाद और जातिगत उत्पीड़न का उल्लेख है।

जांच और वर्तमान स्थितिचंडीगढ़ पुलिस ने सीएफएसएल (सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैब) की मदद से जांच शुरू की है। सुसाइड नोट और वसीयत बरामद हुई है, लेकिन गोपनीयता के कारण विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए। हरियाणा सरकार ने तीन सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों की एक समिति गठित की थी, लेकिन इसमें एससी सदस्यों की कमी पर कुमार ने आपत्ति जताई।

सोशल मीडिया पर (एक्स पर) यह घटना वायरल हो रही है, जहां उपयोगकर्ता जातिवाद के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, जैसे “कास्ट किल्स” और “दलितों के लिए यह दैनिक सच्चाई है”।

निहितार्थ और व्यापक संदर्भयह घटना भारतीय प्रशासन में जातिगत भेदभाव की क्रूर सच्चाई को उजागर करती है। संविधान की प्रस्तावना में समानता का वादा है, लेकिन एससी/एसटी अधिकारियों को प्रमोशन, पोस्टिंग और सम्मान में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पूरन कुमार की मौत न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि उस आशा का अंत है जो संवैधानिक मूल्यों पर आधारित थी।

यह सवाल उठाता है: क्या समानता के लिए आवाज उठाना अपराध हो गया है? यह मामला मानसिक स्वास्थ्य, नौकरशाही दबाव और आरक्षण विरोधी मानसिकता पर भी बहस छेड़ता है। यदि ऐसे ईमानदार अधिकारी सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिक का क्या?

निष्कर्ष :वाई. पूरन कुमार की मौत एक सिस्टम की विफलता का प्रतीक है, जो न्याय देने के बजाय सत्य बोलने वालों को कुचल देता है। सरकार को न केवल जांच तेज करनी चाहिए, बल्कि जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नीतिगत सुधार लाने चाहिए। यह घटना हमें याद दिलाती है कि समानता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में होनी चाहिए। उनकी स्मृति में, हमें जातिवाद के खिलाफ एकजुट होना होगा। जय भीम, जय संविधान।

Atish Ashok Chafe.
(Editor in chief)
IOB News Network.

3 months ago | [YT] | 1

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भक्तों का वकील हीरो जिसने दलित न्यायाधीश को जूता फेका वो अपने अपार्टमेंट में भी एक बड़ी समस्या है। लोगों को धमकाने और हाथापाई की शिकायत है। उनके विषय सभी पड़ोसियों ने पुलिस को लिखित शिकायत तक दी है ।

क्या ये भी भगवान के कहने पर करता है ?

ये बददिमाग़ लोगों को इसी तरह इस्तेमाल करते हैं । ना तो ये कोई बड़े वकील हैं , ना ही कोई अच्छे नागरिक।

राकेश किशोर ने पूछताछ के दौरान कहा कि यह “परमात्मा का आदेश” था। उनका गुस्सा CJI गवई की 8 सितंबर 2025 की एक टिप्पणी से उपजा, जो खजुराहो मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापना से जुड़ी याचिका पर था।

CJI ने कथित तौर पर कहा था, “यह विष्णु भगवान की मूर्ति है या कुछ और?” कुछ समूहों ने इसे “सनातन धर्म का अपमान” बताया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। किशोर ने इसे धार्मिक भावनाओं के खिलाफ माना और अपनी हरकत को “रिएक्शन” कहा।

उन्होंने कहा, “मुझे अफसोस नहीं, न किसी का डर है।”जातिगत कोण: CJI बीआर गवई दलित समुदाय से आते हैं, जो भारत के पहले दलित CJI हैं। यह घटना सवाल उठाती है कि क्या यह धार्मिक आड़ में जातिगत नफरत का प्रदर्शन था?

सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स में इसे “दलित जज पर हमला” कहा गया, जबकि कुछ ने इसे “सनातन विरोधी जज” पर प्रतिक्रिया बताया। वकील किशोर का बैकग्राउंड सामान्य वकील का है—वह सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से प्रैक्टिस कर रहे हैं, लेकिन कोई बड़ा नाम नहीं।

पड़ोसी शिकायतें: अपार्टमेंट में ‘समस्या’ का खुलासा

राकेश किशोर के मयूर विहार (दिल्ली) स्थित अपार्टमेंट के पड़ोसियों द्वारा पुलिस को दी गई लिखित शिकायत|

शिकायतों का सार: पड़ोसी आरोप लगाते हैं कि किशोर अक्सर लोगों को धमकाते हैं, हाथापाई करते हैं और अपार्टमेंट में झगड़े पैदा करते हैं। सभी पड़ोसियों ने संयुक्त रूप से पुलिस को शिकायत दी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। “क्या ये भी भगवान के कहने पर करता है?”

विश्लेषण: यह खुलासा किशोर के चरित्र पर सवाल उठाता है। एक वकील होने के नाते, जो कानून की रक्षा का दावा करता है, वह निजी जीवन में हिंसक और असामाजिक व्यवहार करता है। यह दर्शाता है कि उनकी हरकतें आवेगी और अनियंत्रित हैं, न कि किसी ‘उच्च उद्देश्य’ से प्रेरित। भारद्वाज ने इसे बीजेपी सरकार के “संरक्षण” से जोड़ा, क्योंकि सोशल मीडिया ट्रोल्स इस घटना को सेलिब्रेट कर रहे हैं।

निहितार्थ: व्यापक प्रभावन्यायिक सुरक्षा पर सवाल: सुप्रीम कोर्ट जैसी जगह पर यह घटना सुरक्षा चूक दर्शाती है। CJI ने सही कहा—वाणी में संयम जरूरी है, लेकिन वकीलों और जजों दोनों के लिए। यह घटना जजों को धमकाने का संदेश देती है, खासकर अल्पसंख्यक या दलित पृष्ठभूमि वालों को।

जाति vs धर्म का टकराव: —धार्मिक नारों की आड़ में जातिगत नफरत फैलाई जा रही है। CJI गवई जैसे जज, जो मेहनत से शीर्ष पर पहुंचे, को “दलित बेटा” कहकर ट्रोल करना सामाजिक विष का प्रमाण है।

यह 2024-25 के अन्य घटनाओं (जैसे इंदौर जज पर जूते की माला) से जुड़ता है।

राजनीतिक उपयोग: AAP और अन्य विपक्ष इसे बीजेपी के खिलाफ हथियार बना रहे हैं, जबकि समर्थक इसे “धार्मिक रक्षा” बता रहे। परिणाम? समाज का ध्रुवीकरण बढ़ेगा।

कानूनी परिणाम: लाइसेंस सस्पेंशन के बावजूद, पुलिस की नरमी सवाल उठाती है। पड़ोसी शिकायतों पर कार्रवाई होनी चाहिए, वरना यह “अच्छे नागरिक” बनने का दावा खोखला साबित होगा।

निष्कर्ष : यह घटना न केवल राकेश किशोर की व्यक्तिगत असफलता है, बल्कि एक ऐसे समाज की पोल खोलती है जहां धार्मिक भावनाएं जातिगत पूर्वाग्रहों का बहाना बन जाती हैं।

CJI गवई का संयम प्रेरणादायक है, लेकिन सिस्टम को मजबूत बनाने की जरूरत है—सुरक्षा, संवेदनशीलता और कार्रवाई में।

यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा लोकतंत्र ऐसी घटनाओं से ऊपर उठ पाएगा? स्रोतों से साफ है कि यह “भगवान के कहने पर” नहीं, बल्कि नफरत और अज्ञान पर आधारित था। अधिक अपडेट्स के लिए हमसे जुड़े रहें ।

3 months ago (edited) | [YT] | 0

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मोदी और आरएसएस ने भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कैसे नष्ट किया: एक विस्तृत विश्लेषण

भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता था, आज एक "संकर शासन" (हाइब्रिड रिजीम) की ओर बढ़ रहा है। यह गिरावट मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार और उसके वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की नीतियों से जुड़ी हुई है।

2014 से शुरू हुए इस दौर में, लोकतांत्रिक संस्थाएं—जैसे न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव आयोग, संसद और नागरिक स्वतंत्रताएं—केंद्रीकृत कार्यकारी शक्ति के दबाव में कमजोर हुई हैं। यह विश्लेषण विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों, विशेषज्ञों के आकलनों और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है, जो दिखाते हैं कि कैसे आरएसएस की हिंदुत्व विचारधारा ने लोकतंत्र को "कानूनी रूप से" कुचला है, बिना किसी तख्तापलट के।

1. आरएसएस का ऐतिहासिक संदर्भ: लोकतंत्र-विरोधी जड़ेंआरएसएस की स्थापना 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, जो हिंदू राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) पर आधारित एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन इसके संस्थापक दस्तावेजों और नेताओं के बयानों से साफ है कि यह लोकतंत्र के खिलाफ था। एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी), आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक, ने अपनी किताब बंच ऑफ थॉट्स में लोकतंत्र को "पश्चिमी आयात" कहा और हिंदू राष्ट्र की वकालत की, जहां अल्पसंख्यकों को "दूसरे दर्जे" का नागरिक बनाया जाए।

1940 के दशक में, आरएसएस ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों (जैसे भारत छोड़ो आंदोलन) का विरोध किया और स्वतंत्र भारत के संविधान को भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।मोदी खुद आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं, और उनकी राजनीतिक यात्रा आरएसएस की गोद में ही पली-बढ़ी।

भाजपा, जो आरएसएस की राजनीतिक शाखा है, ने 2014 और 2019 के चुनावों में आरएसएस की संगठनात्मक ताकत का इस्तेमाल किया। परिणामस्वरूप, आरएसएस के सदस्यों को विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सरकारी निकायों में प्रमुख पद सौंपे गए, जैसे भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) का चेयरमैन। यह नियुक्तियां वैचारिक एकरूपता लाने के लिए की गईं, जो लोकतांत्रिक बहुलवाद को कमजोर करती हैं।

2. न्यायपालिका पर हमला: स्वतंत्रता का क्षरणन्यायपालिका भारत की लोकतांत्रिक रीढ़ है, लेकिन मोदी सरकार ने इसे कार्यकारी के अधीन करने की कोशिश की। नियुक्तियों में हस्तक्षेप: कॉलेजियम सिस्टम को कमजोर करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लाया गया, जो असंवैधानिक घोषित हुआ। फिर भी, आरएसएस से जुड़े वकीलों को जज बनाया गया।

महत्वपूर्ण मामलों में दबाव: अयोध्या राम मंदिर, CAA-NRC और किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसले दिए, जिसे "सरकारी दबाव" का परिणाम माना गया। 2023 में, विपक्षी नेता राहुल गांधी को मानहानि मामले में अयोग्य घोषित किया गया, जो चुनाव लड़ने से रोक दिया|

आरएसएस का प्रभाव: आरएसएस ने न्यायिक सुधारों की मांग की, लेकिन इसका मतलब न्यायपालिका को हिंदुत्व एजेंडे के अनुरूप ढालना था। जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह "कानूनी उत्पीड़न" का रूप है, जहां विपक्ष को जेलों में डाला जाता है।

3. मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमनमोदी के आने के बाद, भारत का मीडिया "भगवा" हो गया। स्वामित्व पर कब्जा: बड़े मीडिया हाउस (जैसे Zee, NDTV) पर भाजपा समर्थक पूंजीपतियों का नियंत्रण हो गया। 2023 तक, 90% मीडिया सरकार के प्रचार का माध्यम बन चुका था।

सेंसरशिप और IT नियम: 2021 के IT नियमों से सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा। पत्रकारों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम) के तहत मुकदमे चले, जैसे राना अयूब और सिद्धार्थ वरदराजन पर।
आरएसएस की भूमिका: संगठन ने "फेक न्यूज" के नाम पर आलोचनात्मक पत्रकारिता को निशाना बनाया। V-Dem इंस्टीट्यूट की 2021 रिपोर्ट में भारत को "चुनावी तानाशाही" कहा गया, जहां अभिव्यक्ति की आजादी पाकिस्तान से भी बदतर हो गई। फ्रीडम हाउस ने भारत को "आंशिक रूप से स्वतंत्र" करार दिया, क्योंकि अल्पसंख्यकों (मुस्लिम, ईसाई) के खिलाफ हिंसा को कवरेज न देने का दबाव है।

4. चुनाव आयोग और संसदीय लोकतंत्र का अपहरणचुनाव आयोग (ECI), जो स्वतंत्र चुनावों की गारंटी था, अब "भाजपा का उपकरण" लगता है। EVM विवाद और ECI का पूर्वाग्रह: 2019 और 2024 चुनावों में विपक्ष ने EVM मैनिपुलेशन के आरोप लगाए, लेकिन ECI ने जांच नहीं की। 2024 में, लोकसभा चुनावों के दौरान ECI ने भाजपा के पक्ष में फैसले लिए।

संसद का अपमान: मोदी सरकार ने 38 विधेयक बिना बहस के पास किए, जैसे UAPA संशोधन और NIA संशोधन, जो नागरिक अधिकारों को कुचलते हैं। विपक्ष को सस्पेंड किया गया (2023 में 146 सांसद)।

आरएसएस का संगठनात्मक हस्तक्षेप: आरएसएस ने चुनावों में "बूथ कैप्चरिंग" के लिए स्वयंसेवकों को तैनात किया। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 53वें स्थान पर खिसक गया, क्योंकि "लोकतांत्रिक बैकस्लाइडिंग" हो रही है।

5. अन्य संस्थाओं का केंद्रीकरण: RBI से CBI तकआरबीआई पर दबाव: 2018 में, डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने सरकार पर केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर हमले का आरोप लगाया। नोटबंदी और कृषि कानूनों ने आर्थिक संस्थाओं को राजनीतिक हथियार बना दिया।
CBI का दुरुपयोग: "सीबीआई बनाम CBI" मामले में एजेंसी को विपक्ष के खिलाफ इस्तेमाल किया गया।
शैक्षणिक संस्थान: आरएसएस सदस्यों को UGC, JNU जैसे संस्थानों में वीसी बनाया गया, जहां इतिहास को हिंदुत्व के अनुरूप बदला गया। NCERT की किताबों से गांधी-नेहरू को हटाकर आरएसएस विचारकों को शामिल किया।

नागरिक स्वतंत्रताएं: CAA-NRC ने मुस्लिमों को निशाना बनाया, और किसान आंदोलन (2020-21) पर दमन से साबित हुआ कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाया जाता है। फ्रीडम हाउस की 2024 रिपोर्ट में भारत का स्कोर 66/100 हो गया, जो 2014 के 77 से गिरावट दर्शाता है।

6. आरएसएस-मोदी गठजोड़ का प्रभाव: हिंदुत्व का राजआरएसएस मोदी को अपना "हिंदू हृदय सम्राट" मानता है। गुजरात दंगों (2002) से लेकर अयोध्या मंदिर तक, मोदी की नीतियां आरएसएस की हिंदुत्व एजेंडा को लागू करती हैं।

परिणाम: लिंचिंग, गौ-रक्षा हिंसा और अल्पसंख्यक-विरोधी कानून। यह "चुपचाप तानाशाही" है, जहां संस्थाएं बरकरार हैं लेकिन उनका सार नष्ट हो गया। जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी (2024) कहता है: "लोकतंत्र मरते हैं नाटकीय तख्तापलट से नहीं, बल्कि विपक्ष के उत्पीड़न, मीडिया के भयभीत करने और कार्यकारी की केंद्रीकरण से।"निष्कर्ष: क्या कोई उम्मीद बाकी है?मोदी-आरएसएस ने भारत को "चुनावी तानाशाही" की ओर धकेल दिया, जहां 1.4 अरब लोगों का भविष्य दांव पर है।

लेकिन 2024 चुनावों में भाजपा की सीटें कम होना और छात्र-किसान आंदोलन सकारात्मक संकेत हैं। लोकतंत्र को बचाने के लिए सिविल सोसाइटी, स्वतंत्र मीडिया और मजबूत विपक्ष की जरूरत है। यदि यह जारी रहा, तो भारत "लोकतंत्र केवल नाम का" बन जाएगा। यह विश्लेषण तथ्यों पर आधारित है, और सभी पक्षों (जैसे आरएसएस के सकारात्मक योगदान के दावे) को ध्यान में रखा गया, लेकिन सबूत गिरावट की ओर इशारा करते हैं।


स्रोतों के लिए नीचे देखें।संस्था
गिरावट का उदाहरण
प्रभाव

न्यायपालिका
NJAC, विपक्षी नेताओं पर मुकदमे
स्वतंत्र फैसलों में कमी

मीडिया
IT नियम, स्वामित्व पर कब्जा
सेंसरशिप, प्रोपेगैंडा

चुनाव आयोग
EVM विवाद, पूर्वाग्रही फैसले
चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल

संसद
बिना बहस विधेयक, सांसद सस्पेंशन
विधायी प्रक्रिया का अपमान

RBI/CBI
दबाव, दुरुपयोग
आर्थिक/जांच एजेंसियों का राजनीतिकरण

संदर्भ: यह विश्लेषण JOD (2024), V-Dem (2021), Freedom House (2024), EIU Democracy Index (2023) और अन्य स्रोतों पर आधारित है।
journalofdemocracy.org +7

Atish Ashok Chafe
(Editor in chief)
IOB News Network.

3 months ago (edited) | [YT] | 0

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सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट्स को पर्यावरण मंजूरी से छूट, अडाणी समूह को बड़ी राहत; विशेषज्ञों ने जताई चिंता

केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हाल ही में एक नया मसौदा अधिसूचना जारी किया है, जिसमें प्रस्ताव रखा गया है कि जिन सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट्स में कैप्टिव पावर प्लांट नहीं है, उन्हें अब पर्यावरणीय मंजूरी लेने की जरुरत नहीं होगी। इस प्रस्ताव के लागू होने से अडाणी समूह की कल्याण क्षेत्र में 1,400 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली 6 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाली सीमेंट ग्राइंडिंग प्लांट परियोजना को बड़ी राहत मिल सकती है।

यह प्लांट अंबुजा सीमेंट लिमिटेड का है, जो अडाणी समूह की एक इकाई है। स्थानीय लोग, विशेषकर मोहने गांव और आसपास के दस गांवों के निवासियों ने शुरू से ही इस परियोजना का विरोध किया है। उनका कहना है कि यह प्लांट घनी आबादी वाले इलाके में प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ा सकता है। हाल ही में महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आयोजित जनसुनवाई में नागरिकों ने इस परियोजना पर कड़ी आपत्ति जताई थी और पूछा था कि सरकार कैसे रिहायशी क्षेत्र में ऐसे बड़े औद्योगिक संयंत्र को अनुमति दे सकती है।

स्थानीय लोगों की मुख्य चिंता धूल और गैस उत्सर्जन को लेकर है, जिसमें पार्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड शामिल हैं। लेकिन केंद्र का तर्क है कि स्टैंडअलोन सीमेंट ग्राइंडिंग यूनिट्स में कैल्सिनेशन और क्लिंकराइजेशन जैसी ऊर्जा-गहन और प्रदूषणकारी प्रक्रियाएं नहीं होतीं, इसलिए इनके लिए विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और जनसुनवाई जैसी जटिल प्रक्रियाएं जरूरी नहीं हैं।

सरकार का कहना है कि इन यूनिट्स में कार्बन उत्सर्जन, अपशिष्ट और ऊर्जा की खपत कम होती है। साथ ही, यदि कच्चा माल और तैयार उत्पाद रेलवे या इलेक्ट्रिक वाहनों से परिवहन किए जाएं, तो प्रदूषण और कम होगा। मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है और इसे “ग्रीन लॉजिस्टिक्स” को बढ़ावा देने वाला कदम बताया है।

हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञ और स्थानीय संगठन इस कदम को लेकर चिंतित हैं। मोहने कोलिवाड़ा ग्रामस्थ मंडल के अध्यक्ष सुभाष पाटिल ने कहा कि उन्हें इस अधिसूचना की जानकारी नहीं थी और इसे समझकर आगे की रणनीति तय करेंगे।

जानकारी के अनुसार, प्रस्तावित प्लांट का स्थल पहले नेशनल रेयान कंपनी (NRC) का परिसर था, जिसे 2020 में अडाणी समूह ने अधिग्रहित किया। अब इस जमीन पर लगभग 26 हेक्टेयर क्षेत्र में नया प्लांट बनाया जाएगा, जिसमें से 9.67 हेक्टेयर हरित पट्टी के विकास के लिए तय किया गया है। जनता इस मसौदे पर अपनी आपत्तियां या सुझाव अधिसूचना जारी होने के 60 दिनों के भीतर दे सकती है।

यदि यह अधिसूचना लागू होती है, तो पूरे देश में कई निजी कंपनियों के लिए औद्योगिक परियोजनाएं शुरू करना आसान हो जाएगा, जिससे पर्यावरण सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों पर नई बहस हो सकती है।

3 months ago | [YT] | 1

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नेपाल-बांग्लादेश के बाद जॉर्जिया में बवाल, 'चुनाव में धांधली', भड़के प्रदर्शनकारी, राष्ट्रपति भवन घेरा, आगजनी-तोड़फोड़

नेपाल-बांग्लादेश के बाद जॉर्जिया में बवाल, 'चुनाव में धांधली', भड़के प्रदर्शनकारी, राष्ट्रपति भवन घेरा, आगजनी-तोड़फोड़
जॉर्जिया की राजधानी त्बिलिसी में शनिवार को हजारों सरकार-विरोधी प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन (ओर्बेलियानी पैलेस) पर धावा बोलने की कोशिश की, जिससे पुलिस और प्रदर्शकों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन, आंसू गैस और पेपर स्प्रे का सहारा लिया। कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ी और राष्ट्रपति भवन के परिसर में घुसने की कोशिश की।

चुनाव में धांधली का आरोप
यह प्रदर्शन जॉर्जिया में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर हो रहा है, जिनका अधिकांश विपक्ष दलों ने बहिष्कार किया है।

विरोधियों का आरोप है कि सत्तारूढ़ पार्टी जॉर्जियन ड्रीम ने 2024 के संसदीय चुनावों में धांधली की, और इसके बाद सरकार ने EU (यूरोपीय संघ) के साथ देश की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।

प्रधानमंत्री इराकली कोबाखिद्जे ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने EU के झंडे के साथ बैरिकेड्स में आग लगाई। उन्होंने EU के राजदूत पर आरोप लगाया कि वे “संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ने” की कोशिशों में प्रदर्शनकारियों को मदद कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों की रणनीति और मांगें
प्रदर्शनकारियों ने त्बिलिसी के फ्रीडम स्क्वायर और रुस्तवेली एवेन्यू से मार्च किया। वे जॉर्जिया और EU के झंडे लहराते दिखे।

प्रसिद्ध ओपेरा गायक पाता बरचुलाद्जे ने घोषणा पढ़ी, जिसमें उन्होंने गृह मंत्रालय कर्मचारियों को जनता की इच्छा मानने और जॉर्जियन ड्रीम पार्टी के 6 वरिष्ठ नेताओं, जिनमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की।

विरोधी दलों की मांग है कि लोकतंत्र को पुनर्स्थापित करने के लिए देश में नए सिरे से संसदीय चुनाव हों और करीब 60 राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए।

संघर्ष की शुरुआत
नकाबपोश प्रदर्शनकारियों की एक टीम ने राष्ट्रपति भवन के पास बैरिकेड तोड़ दिए और अंदर प्रवेश करने की कोशिश की, जिससे पुलिस को कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी।

पुलिस ने वाटर कैनन, आंसू गैस और पेपर स्प्रे का उपयोग किया।

इस दौरान कई प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए।

पांच प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें पाता बरचुलाद्जे और विपक्षी दलों के अन्य नेता शामिल हैं। उन्हें “राज्य व्यवस्था उखाड़ने” जैसे आरोपों का सामना करना पड़ रहा है।

चुनाव का बहिष्कार और विवाद
इन चुनावों में विपक्षी दलों ने भागीदार न बनकर बहिष्कार किया था, और सत्तारूढ़ पार्टी ने अधिकांश नगरपालिकाओं में भारी बहुमत से जीत का दावा किया।

आलोचकों का कहना है कि यह चुनाव विरोधियों को दबाने और लोकतंत्र को कमजोर करने की रणनीति रही है।

अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इन चुनावों को “न्यायसंगत नहीं” करार दिया है और नए चुनावों की मांग की है।

जॉर्जिया की विदेश नीति और EU का झुकाव
जॉर्जियन ड्रीम पार्टी ने पिछले वर्ष ईयू बातचीत को स्थगित कर दिया था, जिससे देश की पश्चिमोन्मुखी छवि पर प्रश्नचिन्ह लग गया।

विरोधियों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह रूस-समर्थक रुख अख्तियार कर रही है।

प्रदर्शन अब न सिर्फ स्थानीय चुनाव का विरोध है, बल्कि जॉर्जिया की दिशा और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।

3 months ago | [YT] | 0

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एअर इंडिया की फ्लाइट का इमरजेंसी सिस्टम अचानक हुआ एक्टिव, अमृतसर से बर्मिंघम जा रहा था विमान, सुरक्षित लैंडिंग|

एअर इंडिया की AI117 फ्लाइट, जो अमृतसर से बर्मिंघम जा रही थी, लैंडिंग से ठीक पहले तकनीकी अलर्ट की वजह से RAT (Ram Air Turbine) अपने आप सक्रिय हो गया। घटना फाइनल अप्रोच के दौरान हुई, लेकिन विमान ने सुरक्षित लैंडिंग की और सभी यात्री और क्रू सुरक्षित हैं।

एअर इंडिया का बयान
एअर इंडिया ने बताया कि 4 अक्टूबर 2025 को अमृतसर से बर्मिंघम जा रही फ्लाइट AI117 के ऑपरेटिंग क्रू को लैंडिंग से ठीक पहले RAT के डिप्लॉय होने का पता चला। जांच में सभी इलेक्ट्रिकल और हाइड्रॉलिक सिस्टम सामान्य पाए गए, और विमान ने सुरक्षित लैंडिंग की।

कंपनी ने कहा कि मानक प्रक्रिया (SOP) के तहत विमान को फिलहाल ग्राउंड कर दिया गया है ताकि इसकी विस्तृत जांच की जा सके। ऐसे में बर्मिंघम से दिल्ली लौटने वाली फ्लाइट AI114 को रद्द कर दिया गया। प्रभावित यात्रियों के लिए वैकल्पिक इंतजाम किए जा रहे हैं।

एअर इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, “हमारे यात्रियों और क्रू की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। सभी सिस्टम सामान्य पाए गए हैं, फिर भी विस्तृत निरीक्षण किया जा रहा है।”

RAT (राम एयर टर्बाइन) क्या है?
RAT विमान में तब अपने आप सक्रिय होता है जब मुख्य बिजली या हाइड्रॉलिक सिस्टम में आपात स्थिति आती है। यह इंजन से बाहर निकलकर हवा की ताकत से आपातकालीन बिजली या हाइड्रॉलिक शक्ति प्रदान करता है, जिससे विमान के अनिवार्य नियंत्रण और सिस्टम सुरक्षित रहते हैं।

एअर इंडिया ने स्पष्ट किया कि इस घटना में किसी भी सिस्टम में वास्तविक खराबी नहीं पाई गई है। यानी RAT की सक्रियता केवल तकनीकी अलर्ट या संवेदनशीलता की वजह से हो सकती है।

यात्रियों के लिए वैकल्पिक इंतजाम
एयरलाइन ने प्रभावित यात्रियों के लिए वैकल्पिक फ्लाइट व्यवस्था की घोषणा की।

विमान का विस्तृत निरीक्षण जारी है और जांच पूरी होने तक इसे सेवा में नहीं डाला जाएगा।

एयर इंडिया ने सुनिश्चित किया है कि सभी यात्री और क्रू पूरी तरह सुरक्षित हैं।

विशेषज्ञ टिप्पणी
विमानन विशेषज्ञों के अनुसार, RAT का सक्रिय होना विमान सुरक्षा का एक मानक फेल‑सेफ मैकेनिज्म है। यह विमान के नियंत्रण में मदद करता है और गंभीर परिस्थितियों में सिस्टम को सुरक्षित बनाए रखता है।

इस घटना के बावजूद, एअर इंडिया की तत्परता और SOP पालन ने यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की।

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Iob News Network

जानलेवा कफ सिरप! 14 बच्चों की मौत के बाद 6 राज्यों में जांच, तमिलनाडु-केरल में बैन|

देशभर में जहरीली कफ सिरप के कारण बच्चों की मौतों का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 11 और राजस्थान में 3 बच्चों की मौत के बाद प्रशासन और केंद्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों ने सख्त कदम उठाए हैं। मामला मुख्य रूप से कोल्ड्रिफ कफ सिरप से जुड़ा है, जिसे तमिलनाडु की श्रीसन फार्मास्युटिकल बनाती है।

CDSCO ने तमिलनाडु FDA को लिखा पत्र
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने तमिलनाडु फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को पत्र लिखकर निर्माता कंपनी के खिलाफ ‘सबसे गंभीर अपराधों’ के तहत सख्त कार्रवाई करने को कहा है। इसके साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुख अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस कर कफ सिरप के तर्कसंगत उपयोग और दवाओं की क्वालिटी पर चर्चा करेंगे।

मध्य प्रदेश में 11 मौतें, डॉक्टर गिरफ्तार
छिंदवाड़ा में 11 बच्चों की मौत के बाद प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की। डॉक्टर प्रवीण सोनी को गिरफ्तार किया गया, जिन्होंने मृत बच्चों को यह सिरप लिखा था। इसके अलावा श्रीसन फार्मास्युटिकल के संचालकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। केस ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 27(A), बीएनएस की धारा 105 और 276 के तहत दर्ज किया गया।

लैब रिपोर्ट में पाया गया कि कोल्ड्रिफ सिरप में 48.6% डायएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) था, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक है। छिंदवाड़ा कलेक्टर हरेंद्र नारायण ने कहा कि कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और दवा की बिक्री पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया गया।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने X पर कहा, “छिंदवाड़ा में बच्चों की मौतें अत्यंत दुखद हैं। इस सिरप की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”

राजस्थान में 3 बच्चों की मौत
राजस्थान के जयपुर में छह वर्षीय बच्चे अंश की मौत हुई। बच्चे को घर पर कफ सिरप दिया गया था, जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ गई। इसके अलावा चूरू और सीकर में 2 और बच्चों की मौत हुई, जिनमें सरकारी मुफ्त दवा योजना के तहत डेक्सट्रोमेथोर्फन हाइड्रोब्रोमाइड सिरप आईपी दिया गया।

राज्य स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खिमसर ने कहा कि जांच में यह सिरप सुरक्षित पाया गया, लेकिन मौतें संदिग्ध बैच से जुड़ी हो सकती हैं।

तेलंगाना और केरल में सतर्कता
तेलंगाना ड्रग्स कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन ने कोलड्रिफ सिरप (बैच SR-13) पर ‘पब्लिक अलर्ट-स्टॉप यूज नोटिस’ जारी किया। केरल में भी बिक्री निलंबित कर दी गई। स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने कहा कि फ्लैग्ड बैच केरल में बिका नहीं, लेकिन जांच के लिए भेजा गया है।

CDSCO ने 6 राज्यों में फैक्ट्री का निरीक्षण शुरू किया
केंद्रीय औषधि नियामक CDSCO ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में दवा फैक्ट्री का निरीक्षण शुरू किया है। अब तक 19 सैंपल लिए गए हैं, जिनमें कफ सिरप, एंटीपायरेटिक्स और एंटीबायोटिक्स शामिल हैं। इसका उद्देश्य दवा क्वालिटी में कमियों का पता लगाना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है।

राष्ट्रीय स्तर पर जांच और विश्लेषण
संबंधित बच्चों की मौतों के कारणों का विश्लेषण नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, ICMR, नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, CDSCO और IIMS-नागपुर के विशेषज्ञ कर रहे हैं। 7 सितंबर से अब तक छिंदवाड़ा क्षेत्र में 11 बच्चे किडनी फेलियर के कारण मारे गए हैं, जबकि 13 बच्चे अभी इलाजरत हैं।

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