जन्मदिन के साथ उम्र के कैलेंडर में आज, एक और साल जुड़ गया। पहाड़ों में जन्म लेने की वजह से
जन्मदिन को लेकर मन में कोई ख़ास एहसास रहा नहीं बचपन से, लेकिन कहते हैं आपकी ज़िंदगी को आपके आस पास के लोग बनाते हैं। रात बारह बजे से जो संदेशों का सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक जारी है
कुछ को जवाब दे सका कुछ के बाक़ी हैं जिनको जवाब नहीं दे पाया उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी।
माँ के हाथों बनी पूड़ी सब्ज़ी पिताजी का प्रेम भाई का दिया तोहफ़ा
सुखी पाजी का पहले कॉल से लेकर प्रेम के बाहर चलने की ज़िद को न कहकर
यह जन्मदिन बहुत ख़ास हो गया। फिर दोस्त यार भाई परिवार और हर एक सुनने वाले पढ़ने वाले ने इसे बहुत ही ख़ास बना दिया।
बहुत से फ़ोन कॉल आए बहुत से msg आए सबको बस इतना ही कहना है
मैं एक बहुत आम इंसान हूँ लेकिन आपने मुझे सर आँखों पर बिठा कर रखा है, बस एक ही प्रार्थना है, प्यार बनाये रखना।
मैं हमेशा साथ हूँ एक दोस्त, भाई और अपने की भूमिका में।
और हाँ एक और बात
अगले महीने से हम अपने लाइव शो शुरू कर रहे हैं तो शायद इस बार हम बैठ कर बहुत सी बातें कर सकेंगे।
दिसंबर की इकत्तीस तारीख़ थी सुबह के नौ बजे थे, प्रेम और मैं तैयार थे अपनी यात्रा के लिए। यह हिमांचल का हमारा पहला ट्रैक था।
सफ़र एस्केप के पूरे ग्रुप के साथ हम त्रियुंड ट्रैक करने जा रहे थे। होटल की बालकनी से दिख रहे पहाड़ बहुत सुंदर लग रहे थे। पिछले दो दिन बस की यात्राओं में निकले थे इसलिए आज की सुबह सुंदर थी। ठण्डियों के मौसम में समय का पता नहीं चलता इसलिए सुबह के नौ बजे भी ज़्यादा नहीं लग रहे थे।
पहला बैच रवाना हुआ बीस लोगों का फिर दूसरा और आख़िर में गए हम।
आदतों से पहाड़ी हैं तो हमसे हल्के चलना हो ही नहीं पाता। प्रेम वैसे तो सतना का है लेकिन अब पहाड़ में रहते हुए वह मुझसे ज़्यादा पहाड़ी हो गया है।
हम बहुत तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे
हमारे आस पास वालों के हिसाब से हम उड़ कर जा रहे थे।
इस ट्रैक में हमनें बेहिसाब शोर्ट रास्ते इस्तेमाल किए और कब पहाड़ की ऊंचाइयों पर पहुंच गए पता नहीं चला। एक दो बार साँस ज़रूर फूल रही थी लेकिन थोड़ी देर रुक कर ठीक हो जा रही थी।
चले थे सबसे आख़िर में और पहुँचे सबसे पहले। मैं प्रेम और थका हुआ प्रियांशु हमारे साथ था।
वहाँ से पहाड़ों का दृश्य बहुत सुंदर था ऐसा लगा जैसे हिमाल नज़र भर दूर है और हम उसे छू लेंगे।
इस नज़ारे ने हर थकान उतार दी।
हमारा कैम्प नाग देवता के मंदिर के पास था इसलिए हम वापस नीचे उतरे कैम्प में आते ही नींद आ गई।
अगली सुबह चार बजे आँख खुली बाहर बहुत सुंदर आसमान था।
शुभांकर, प्रियांशी, प्रेम और मैं दोबारा से ऊपर चढ़ना शुरू किए। अंधेरे में पहाड़ चढ़ने का मज़ा ही कुछ और था। हमने टोर्च बुझा ली और चाँद की रौशनी में आगे बढ़ने लगे।
सुबह पहाड़ों को उठते हुए देखना बहुत प्यारा एहसास था। आज सूर्योदय बादलों से ढका हुआ था दिन तक बर्फ पड़ने के आसार थे। त्रियुंड के बोर्ड के बाद हम आगे बढ़ते गए और वहाँ पहुँचे जहाँ इंसानों के निशान नहीं थे एक प्यारा साथी (शेरू) उस सफ़र में हमारे साथ चलने लगा हमने उसे भोलू नाम दिया। पहाड़ी के सबसे ऊँचे स्थान पर प्रेम मैं और शेरू ही थे।
हमने तस्वीर निकाली और नीचे उतर आए। त्रियुंड बहुत सुंदर है लेकिन मेरी शिकायत है हिमांचल वालों से
इस ट्रैक में कूड़े को एक जगह पर इकट्ठा करने को क्यों नहीं कहते आप ज़ोर देकर। यहाँ जाने वाला टूरिस्ट या ट्रैवलर ख़ुद अपनी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं समझता क्यों यहाँ इतना प्लास्टिक और कूड़ा फेंका हुआ है।
समय है एक ज़िम्मेदार मुसाफ़िर बनकर इन पहाड़ों को बचाये रखने का नहीं तो आने वाले समय में त्रियुंड ट्रैक भी प्लास्टिक और कूड़े से घिरा हुआ सफ़र मात्र रह जाएगा।
उम्मीद है ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी निभायेंगे और एक दिन ऐसा ज़रूर होगा जब पहाड़ों पर प्लास्टिक का नामोनिशान नहीं होगा।
कुछ तस्वीरें इस ट्रैक की जो यादगार रही थी। - पंकज जीना
बनारस को मैं कैसे कहूँ कि, यह सिर्फ़ शहर है। बीते दिनों से बस दौड़ भाग में, शहरों से मिल रहे हैं, ऐसे में इस शहर से मिलना, ठहर जाने जैसा था। कुछ दिनों पहले जब @banjara_banarsi का फ़ोन आया बनारस आने के लिए तो हमारे लिए मुश्किल था बहुत, ज़िंदगी व्यस्त चल रही थी और सच कहें तो हमारा मन भी नहीं था बनारस आने का।
पर बनारस आने के लिए आपका मन नहीं बुलावा चाहिए होता है। महादेव की आज्ञा हुई और हम चले आए।
@abhimonk7 ने पहले ही कह दिया था, भैया बनारस आयेंगे तो बता दीजियेगा, अभिषेक का तो जैसे हक़ है हम पर।
फिर बरेली से ट्रेन में बैठकर @premsomvanshi17 और हम चले आए बनारस। कैंट पर उतरकर सबसे पहले हमने कहा महादेव, यहाँ की धरती को।
उसके बाद आ गए हम @banjara_banarsi के होमस्टे @kashi.niwasi में।
यह नानी के घर जैसा लगता है, यहाँ एक बाग़ीचा है प्यारा सा, जो मुझे बनारस में भी गाँव का एहसास कराता है। फिर Sid की बातें इस गेस्ट हाउस को चौपाल बना देती हैं। शाम यहीं हो गई थी, फिर हम घाट पर चले गए। एक नेटवर्क नहीं था फ़ोन पर, और भीड़ हद से ज़्यादा छोटे भाई सत्यम की नाव ढूँढने में एक घंटा लग गया।
पर वह इंतज़ार बेहतर था, नाव से बनारस देखना स्वर्ग देखने जैसा था। पहली बार ऐसी रौशनी मैंने इलाहाबाद में देखी थी, माघ मेला और महाकुंभ के समय।
तब सुखी पाजी ने कहा था - चलो तुमको तारें दिखाते हैं।
कल सुखी की बहुत याद आई, बनारस देखते हुए।
आसमान में पटाखों की रौशनी देखी, लेज़र शो देखा और नावों की टक्कर देखी। सब एकदम मज़ेदार था।
फिर देखते ही देखते रात हो आई और होमस्टे आने तक रात के एक बज गए थे। मुश्किल से दो घंटा सोए होंगे कि @premsomvanshi17 को उठा कर मैं, सुबह ए बनारस देखने चला गया। घाट वाक करते हुए अस्सी से हम दशाश्वमेध गए फिर अभिषेक के साथ हम पुराने बनारस से मिले। बनारस में भीड़ बहुत है लेकिन यहाँ यह भीड़ भी सुंदर है अगर आपको इस शहर से प्यार है। बस कुछ लोग हॉर्न बहुत बजाते हैं, इधर उधर थूक देते हैं, कुल मिलाकर बनारस से प्यार करने वाले, बनारस का ख़याल रखना शुरू कर दें तो बनारस को सुकून का शहर बनने से, कोई नहीं रोक सकता।
फिलहाल बनारस से बहुत सारा प्रेम आपको।
आप किस शहर में हैं, यह ज़रूर बताइयेगा। क्या आप कभी बनारस आए हैं ? यह भी बताइए।
मैं उज्जैन से लौटते हुए, इस सफ़र के बारे में ही सोच रहा था।
एक दिन हुआ है घर आए हुए दिमाग़ में अभी भी, वह शहर घूम रहा है।
ग़ज़ब शहर है उज्जैन। महाकाल की नगरी की सबसे ख़ास बात यह है कि यहाँ लोग मन के बहुत साफ़ हैं।
मेरे उज्जैन होने की ख़बर कम लोगों को थी लेकिन जितने भी लोगों से मिलना हुआ। मैं मन में बसा लाया उनकी यादों को।
शाम के वक़्त शिप्रा जी के किनारे जब आरती हो रही थी मुझे बनारस याद आ रहा था। लोग कम थे लेकिन फ़ील वही था।
शाम ढलने पर जब हम कालभैरव मंदिर पहुंचे तो उस मंदिर की ऊर्जा ही अलग थी।
वैसे भी महाकाल जहाँ के राजा हों वहाँ मन किसका ना लगे।
महाराज विक्रमादित्य की कहानी बचपन से पढ़ी थी लेकिन महसूस इसी मिट्टी पर जाकर की।
उज्जैन के लोगों ने बताया यहाँ इतने मंदिर हैं कि आप चावल की बोरी लेकर चलेंगे और एक दाना हर मंदिर में डालेंगे, तो चावल कम पड़ जाएँगे लेकिन मंदिर कम नहीं होंगे।
मैं बहुत ज़्यादा तो नहीं देख पाया यहाँ के चौक बाज़ारों को लेकिन एक मेहमान की तरह इस शहर में जाकर मैंने यहाँ घर जैसा महसूस किया।
बहुत ज़्यादा तस्वीरें भी नहीं ली मैंने लेकिन बहुत कुछ बटोर लाया मैं उस शहर से।
बहुत सुंदर है यह नगरी, शिव से जुड़ाव हो तो और प्यारी लगती है। पिछले दिनों और जागती रातों में जो यात्रायें की उसका हासिल रहा उज्जैन। महाकाल से जब नज़रें मिलती हैं ऐसा लगता है जैसे आपके मन का सारा बोझ हल्का हो गया हो।
Pankaj Jeena
13 January 2026,
जन्मदिन के साथ उम्र के कैलेंडर में आज,
एक और साल जुड़ गया।
पहाड़ों में जन्म लेने की वजह से
जन्मदिन को लेकर
मन में
कोई ख़ास एहसास रहा नहीं
बचपन से,
लेकिन कहते हैं
आपकी ज़िंदगी को
आपके आस पास के लोग बनाते हैं।
रात बारह बजे से
जो संदेशों का सिलसिला शुरू हुआ
वह अब तक जारी है
कुछ को जवाब दे सका
कुछ के बाक़ी हैं
जिनको जवाब नहीं दे पाया
उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी।
माँ के हाथों बनी पूड़ी सब्ज़ी
पिताजी का प्रेम
भाई का दिया तोहफ़ा
सुखी पाजी का पहले कॉल से
लेकर
प्रेम के बाहर चलने की ज़िद को न कहकर
यह जन्मदिन
बहुत ख़ास हो गया।
फिर दोस्त यार भाई परिवार
और हर एक सुनने वाले
पढ़ने वाले ने
इसे बहुत ही ख़ास बना दिया।
बहुत से फ़ोन कॉल आए
बहुत से msg आए
सबको बस इतना ही कहना है
मैं एक बहुत आम इंसान हूँ
लेकिन आपने
मुझे सर आँखों पर बिठा कर रखा है,
बस एक ही प्रार्थना है,
प्यार बनाये रखना।
मैं हमेशा साथ हूँ
एक दोस्त,
भाई
और अपने की भूमिका में।
और हाँ एक और बात
अगले महीने से
हम अपने लाइव शो शुरू कर रहे हैं
तो शायद इस बार हम
बैठ कर बहुत सी बातें कर सकेंगे।
हमेशा प्यार देने के लिए आभार।
तुम्हारा
- पंकज जीना
6 days ago | [YT] | 1,059
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Pankaj Jeena
दिसंबर की इकत्तीस तारीख़ थी
सुबह के नौ बजे थे,
प्रेम और मैं
तैयार थे अपनी यात्रा के लिए।
यह हिमांचल का हमारा
पहला ट्रैक था।
सफ़र एस्केप के पूरे ग्रुप के साथ
हम त्रियुंड ट्रैक करने जा रहे थे।
होटल की बालकनी से दिख रहे पहाड़ बहुत
सुंदर लग रहे थे।
पिछले दो दिन बस की यात्राओं में निकले थे
इसलिए आज की सुबह सुंदर थी।
ठण्डियों के मौसम में
समय का पता नहीं चलता
इसलिए सुबह के नौ बजे भी
ज़्यादा नहीं लग रहे थे।
पहला बैच रवाना हुआ बीस लोगों का
फिर दूसरा और आख़िर में गए हम।
आदतों से पहाड़ी हैं
तो हमसे हल्के चलना हो ही नहीं पाता।
प्रेम वैसे तो सतना का है
लेकिन अब पहाड़ में रहते हुए
वह मुझसे ज़्यादा पहाड़ी हो गया है।
हम बहुत तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे
हमारे आस पास वालों के हिसाब से
हम उड़ कर जा रहे थे।
इस ट्रैक में हमनें बेहिसाब शोर्ट रास्ते इस्तेमाल किए
और कब पहाड़ की ऊंचाइयों पर पहुंच गए पता नहीं चला।
एक दो बार साँस ज़रूर फूल रही थी
लेकिन थोड़ी देर रुक कर
ठीक हो जा रही थी।
चले थे सबसे आख़िर में
और पहुँचे सबसे पहले।
मैं प्रेम और थका हुआ प्रियांशु हमारे साथ था।
वहाँ से पहाड़ों का दृश्य
बहुत सुंदर था
ऐसा लगा जैसे हिमाल
नज़र भर दूर है और हम
उसे छू लेंगे।
इस नज़ारे ने हर थकान उतार दी।
हमारा कैम्प नाग देवता के मंदिर के पास था
इसलिए हम वापस नीचे उतरे
कैम्प में आते ही नींद आ गई।
अगली सुबह चार बजे आँख खुली
बाहर बहुत सुंदर आसमान था।
शुभांकर, प्रियांशी, प्रेम और मैं
दोबारा से ऊपर चढ़ना शुरू किए।
अंधेरे में पहाड़ चढ़ने का मज़ा ही कुछ और था।
हमने टोर्च बुझा ली
और चाँद की रौशनी में आगे बढ़ने लगे।
सुबह पहाड़ों को उठते हुए देखना
बहुत प्यारा एहसास था।
आज सूर्योदय बादलों से ढका हुआ था
दिन तक बर्फ पड़ने के आसार थे।
त्रियुंड के बोर्ड के बाद हम आगे बढ़ते गए
और वहाँ पहुँचे
जहाँ इंसानों के निशान नहीं थे
एक प्यारा साथी (शेरू)
उस सफ़र में हमारे साथ चलने लगा
हमने उसे भोलू नाम दिया।
पहाड़ी के सबसे ऊँचे स्थान पर
प्रेम मैं और शेरू ही थे।
हमने तस्वीर निकाली
और नीचे उतर आए।
त्रियुंड बहुत सुंदर है
लेकिन मेरी शिकायत है
हिमांचल वालों से
इस ट्रैक में कूड़े को एक जगह पर इकट्ठा करने को
क्यों नहीं कहते आप ज़ोर देकर।
यहाँ जाने वाला टूरिस्ट या ट्रैवलर
ख़ुद अपनी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं समझता
क्यों यहाँ इतना प्लास्टिक और कूड़ा फेंका हुआ है।
समय है
एक ज़िम्मेदार मुसाफ़िर बनकर
इन पहाड़ों को बचाये रखने का
नहीं तो आने वाले समय में
त्रियुंड ट्रैक भी
प्लास्टिक और कूड़े से घिरा हुआ
सफ़र मात्र रह जाएगा।
उम्मीद है
ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी निभायेंगे
और एक दिन ऐसा ज़रूर होगा
जब पहाड़ों पर प्लास्टिक का नामोनिशान नहीं होगा।
कुछ तस्वीरें इस ट्रैक की
जो यादगार रही थी।
- पंकज जीना
1 week ago | [YT] | 377
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Pankaj Jeena
बनारस को मैं कैसे कहूँ कि,
यह सिर्फ़ शहर है।
बीते दिनों से बस दौड़ भाग में,
शहरों से मिल रहे हैं,
ऐसे में इस शहर से मिलना,
ठहर जाने जैसा था।
कुछ दिनों पहले जब
@banjara_banarsi का फ़ोन आया
बनारस आने के लिए
तो हमारे लिए मुश्किल था बहुत,
ज़िंदगी व्यस्त चल रही थी
और सच कहें तो
हमारा मन भी नहीं था
बनारस आने का।
पर बनारस आने के लिए आपका मन नहीं
बुलावा चाहिए होता है।
महादेव की आज्ञा हुई और हम चले आए।
@abhimonk7 ने पहले ही कह दिया था,
भैया बनारस आयेंगे तो बता दीजियेगा,
अभिषेक का तो जैसे हक़ है हम पर।
फिर बरेली से ट्रेन में बैठकर
@premsomvanshi17 और
हम चले आए बनारस।
कैंट पर उतरकर सबसे पहले हमने कहा महादेव,
यहाँ की धरती को।
उसके बाद आ गए हम @banjara_banarsi के होमस्टे @kashi.niwasi में।
यह नानी के घर जैसा लगता है,
यहाँ एक बाग़ीचा है प्यारा सा,
जो मुझे बनारस में भी गाँव का एहसास कराता है।
फिर Sid की बातें इस गेस्ट हाउस को चौपाल बना देती हैं।
शाम यहीं हो गई थी, फिर हम घाट पर चले गए।
एक नेटवर्क नहीं था फ़ोन पर, और भीड़ हद से ज़्यादा
छोटे भाई सत्यम की नाव ढूँढने में एक घंटा लग गया।
पर वह इंतज़ार बेहतर था, नाव से बनारस देखना
स्वर्ग देखने जैसा था।
पहली बार ऐसी रौशनी मैंने
इलाहाबाद में देखी थी,
माघ मेला और
महाकुंभ के समय।
तब सुखी पाजी ने कहा था
- चलो तुमको तारें दिखाते हैं।
कल सुखी की बहुत याद आई, बनारस देखते हुए।
आसमान में पटाखों की रौशनी देखी, लेज़र शो देखा
और नावों की टक्कर देखी।
सब एकदम मज़ेदार था।
फिर देखते ही देखते रात हो आई और होमस्टे आने तक रात के एक बज गए थे।
मुश्किल से दो घंटा सोए होंगे कि @premsomvanshi17 को उठा कर मैं,
सुबह ए बनारस देखने चला गया।
घाट वाक करते हुए अस्सी से हम दशाश्वमेध गए
फिर अभिषेक के साथ हम
पुराने बनारस से मिले।
बनारस में भीड़ बहुत है
लेकिन यहाँ यह भीड़ भी सुंदर है अगर आपको इस शहर से प्यार है।
बस कुछ लोग हॉर्न बहुत बजाते हैं,
इधर उधर थूक देते हैं,
कुल मिलाकर बनारस से प्यार करने वाले,
बनारस का ख़याल रखना शुरू कर दें
तो बनारस को सुकून का शहर बनने से, कोई नहीं रोक सकता।
फिलहाल बनारस से बहुत सारा प्रेम आपको।
आप किस शहर में हैं, यह ज़रूर बताइयेगा।
क्या आप कभी बनारस आए हैं ?
यह भी बताइए।
2 months ago | [YT] | 342
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Pankaj Jeena
मैं उज्जैन से लौटते हुए,
इस सफ़र के बारे में ही सोच रहा था।
एक दिन हुआ है
घर आए हुए
दिमाग़ में अभी भी,
वह शहर घूम रहा है।
ग़ज़ब शहर है उज्जैन।
महाकाल की नगरी की
सबसे ख़ास बात यह है
कि यहाँ लोग मन के बहुत साफ़ हैं।
मेरे उज्जैन होने की ख़बर
कम लोगों को थी
लेकिन जितने भी लोगों से मिलना हुआ।
मैं मन में बसा लाया उनकी यादों को।
शाम के वक़्त शिप्रा जी के किनारे
जब आरती हो रही थी
मुझे बनारस याद आ रहा था।
लोग कम थे लेकिन फ़ील वही था।
शाम ढलने पर जब हम
कालभैरव मंदिर पहुंचे
तो उस मंदिर की ऊर्जा ही अलग थी।
वैसे भी महाकाल जहाँ के राजा हों
वहाँ मन किसका ना लगे।
महाराज विक्रमादित्य की कहानी बचपन से पढ़ी थी
लेकिन
महसूस इसी मिट्टी पर जाकर की।
उज्जैन के लोगों ने बताया
यहाँ इतने मंदिर हैं कि आप चावल की बोरी लेकर चलेंगे
और एक दाना हर मंदिर में डालेंगे, तो चावल कम पड़ जाएँगे
लेकिन मंदिर कम नहीं होंगे।
मैं बहुत ज़्यादा तो नहीं देख पाया
यहाँ के चौक बाज़ारों को
लेकिन एक मेहमान की तरह
इस शहर में जाकर
मैंने यहाँ घर जैसा महसूस किया।
बहुत ज़्यादा तस्वीरें भी नहीं ली मैंने
लेकिन
बहुत कुछ बटोर लाया मैं
उस शहर से।
बहुत प्रेम उज्जैन
फिर बुलावा भेजना।
तुम्हारा अपना
पंकज जीना
जय श्री महाकाल
3 months ago | [YT] | 1,089
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Pankaj Jeena
महाकाल की नगरी उज्जैन
बहुत सुंदर है यह नगरी, शिव से जुड़ाव हो
तो और प्यारी लगती है।
पिछले दिनों
और जागती रातों में
जो यात्रायें की
उसका हासिल रहा उज्जैन।
महाकाल से जब नज़रें मिलती हैं
ऐसा लगता है जैसे
आपके मन का सारा बोझ हल्का हो गया हो।
महाकाल चाहेंगे
तो कभी
उज्जैन आइएगा
आपको अच्छा लगेगा यहाँ।
अगर पहले कभी आए हैं
तो अपना अनुभव बताइयेगा।
जय श्री महाकाल 🙏
3 months ago | [YT] | 875
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Pankaj Jeena
दोस्तों
हमारा नया गाना आ चुका है,
इस गीत में
आपको एक यात्रा मिलेगी
जो बहुत पसंद आएगी
देखिए
और बताइए
कैसा लगा यह गीत??
3 months ago | [YT] | 27
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Pankaj Jeena
@TheAsstag ❣️🙌
4 months ago | [YT] | 31
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Pankaj Jeena
तो देखिए
हमारा नया गीत
शायद
आपको
पसंद आयेगा ❣️
6 months ago | [YT] | 44
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Pankaj Jeena
कल आयेगा यह गाना
आज टीजर देख लो 🙂
6 months ago | [YT] | 37
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