#वैशाख अमावस्या जिसे हल्ली #अमावस्या भी कहते हैं #पितरों की शांति तर्पण और दान पुण्य के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है यह वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है इस दिन पवित्र नदी स्नान पूर्वजों के लिए पिंडदान और निर्धनों को दान जैसे जल और वस्त्र चप्पल करने से पितृ प्रसन्न होते हैं
#वैदिक पंचांग के अनुसार #वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की #अष्टमी तिथि की शुरुआत 9 अप्रैल 2026 को रात 9:18 पर होगी वहीं इसका समापन 10 अप्रैल को रात 11:14 पर होगा इसे मैं निशा कल को देखते हुए कालाष्टमी का व्रत 9 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा
5 अप्रैल को विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत करने का भी विधान है। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और संपन्नता बनी रहती है। प्रत्येक महीने के कृष्ण और शुक्ल और दोनों पक्षों की चतुर्थी को भगवान गणेश की विधान है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी श्री गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। #विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_की_तिथि_और_शुभ_मुहूर्त: पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 5 अप्रैल 2026 को सुबह 11 बजकर 59 मिनट पर होगा। चतुर्थी तिथि का समापन 6 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 10 मिनट पर होगा। विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त 04:56 ए एम से 05:43 ए एम तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त 12:16 पी एम से 01:06 पी एम तक रहेगा।
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_चंद्रोदय_का_समय: विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय का समय रात 9 बजकर 54 मिनट पर रहेगा। आपको बता दें कि संकष्टी चतुर्थी व्रत का पारण चंद्रोदय के समय ही किया जाता है।
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_का_महत्व: भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में से एक विकट रूप भी है। समस्त प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, रोग, शोक एवं दुर्घटनाओं से मुक्ति हेतु भगवान विकट की पूजा की जाती है। भगवान विकट अपने भक्तों को अपराजेयता एवं निर्भयता प्रदान करते हैं और घोर से घोर महासंकटों में भक्तों की रक्षा करते हैं।
#गणेश_जी_पूजा_मंत्र: श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥ ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये। वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नमः॥ ॐ वक्रतुण्डाय हुम्॥ ॐ गं गणपतये नमः॥
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_की_पूजा_विधि: ●जो भक्त संकष्टी चतुर्थी व्रत रखते हैं, वे सुबह जल्दी उठकर सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करके नए या स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। ●इस दिन भक्त पूर्ण उपवास या आंशिक उपवास रखते हैं। ●भगवान गणेश की मूर्ति को एक स्वच्छ स्थान पर स्थापित किया जाता है और दुर्वा घास, ताजे फूलों, घी के दीपक आदि पूजा में शामिल करें। ●भगवान गणेश को मोदक और लड्डू भोग में अर्पित किए जाते हैं। ●पूजा की शुरुआत मंत्रों के जाप और व्रत कथा के पाठ से होती है। ●संध्या में पूजा और आरती के साथ यह विधि संपन्न होती है। ●चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का समापन करें।
वैसाख महीने मे सत्तू महादेव पर वैशाख महीने (माधव मास) में भगवान शिव को सत्तू का भोग लगाना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है, जो मुख्य रूप से गर्मी से राहत और शिव कृपा के लिए किया जाता है। पंडित प्रदीप मिश्रा के अनुसार, इसमें तीन तरह के अनाजों का मिश्रण (अक्षत सत्तू) प्रयोग किया जाता है, जो शिव के तीन नेत्रों व त्रिशूल को समर्पित है। यह भोग वैशाख अमावस्या (8 मई 2026) या वैशाख शिवरात्रि पर लगाया जाता है🙏🙏 #motivational#mahadev#facebookpost
रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य। पूरी के पास एक छोटे से गांव में एक गरीब की लाश पड़ी है। लेकिन कोई भी उसकी अर्थी को कंधा देने नहीं आ रहा। लेकिन तभी दो रहस्यमय नौजवान लड़के यानी एक सांवला और एक गोरा अचानक वहां आते हैं और आगे बढ़कर उस अर्थी को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। गांव वाले दूर खड़े हैरान है और सबसे बड़ी बात उन अनजान लड़कों के शरीर से पूरी मंदिर के पवित्र चंदन, तुलसी और कपूर की तेज महक क्यों आ रही है? आखिर कौन है यह दोनों और एक अछूत की अर्थी उठाने यह कहां से आए हैं? आइए देखते हैं इस रुला देने वाली कथा के पहले भाग में। कहानी शुरू होती है एक बेहद गरीब भक्त से जिसका नाम था दास। दास समाज की नज़रों में एक नीची जाति का अछूत इंसान था। उसके पास ना तो धन था ना पहनने को अच्छे कपड़े। लेकिन उसके पास एक ऐसी दौलत थी जो बड़े-बड़े सेठों के पास भी नहीं थी और वह थी जगन्नाथ जी की अटूट भक्ति। दास के दिन की शुरुआत जय जगन्नाथ से होती और रात भी उसी नाम के साथ। लेकिन उसकी जाति छोटी होने के कारण उसे कभी मंदिर के अंदर जाने की इजाजत नहीं मिली। वो रोज मीलों पैदल चलकर पूरी आता। मंदिर के सिंह द्वार के बाहर खड़ा होता और दूर से ही मंदिर के शिखर पर लगे नील चक्र को देखकर आंसुओं से रोता हुआ वापस लौट जाता। दास कहता था मेरे कालिया ठाकुर मुझे अंदर नहीं बुलाते तो क्या हुआ? वो वहीं से मेरा प्रणाम स्वीकार कर लेते हैं। दिन बीतते गए। दास बूढ़ा हो गया और एक दिन अचानक एक भयानक बीमारी से दास की मौत हो गई। उसकी टूटी हुई झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। उसकी बूढ़ी पत्नी अकेले लाश के पास बैठकर दहाड़े मार मार कर रो रही थी। पत्नी रोते हुए गांव के सरपंच और बड़े पंडितों के पास गई। उसने हाथ जोड़कर उनके पैरों में गिरकर भीख मांगी। मेरे पति की अर्थी उठवा दो मालिक। घर में कोई आदमी नहीं है। इन्हें श्मशान तक पहुंचा दो वरना इनकी आत्मा भटकती रहेगी। लेकिन गांव वालों का दिल पत्थर का था। सरपंच ने उसे धक्का देकर कहा, दूर हट अछूत। तेरा पति नीची जाति का था। हम उसकी लाश को कंधा देकर अपना धर्म और अपना शरीर अपवित्र नहीं करेंगे। पड़ी रहने दे उसकी लाश को। वही झोपड़ी में चील कौवों के लिए। बेचारी बूढ़ी औरत टूट गई। शाम होने वाली थी। सूरज ढल रहा था। गांव का एक भी आदमी उस अर्थी को उठाने नहीं आया। औरत वापस झोपड़ी में आई। उसने अपने पति की लाश देखी और रोते-रोते उसकी नजर पूरी मंदिर की दिशा में गई। उसने आसमान की तरफ हाथ उठाए और चीख कर कहा। हे कालिया ठाकुर मेरे पति ने जिंदगी भर तेरे नाम की माला झपी। उसे दुनिया ने दुत्कारा। लेकिन उसने कभी तुझे नहीं छोड़ा। और आज आज उसके अंतिम सफर में उसे कंधा देने वाला कोई नहीं। क्या यही सिला दिया तूने उसकी सच्ची भक्ति का? अगर तू सच में है तो भेज किसी को मेरे पति की अर्थी उठाने के लिए। उस औरत के गर्म आंसू अभी जमीन पर गिरे ही थे। कि अचानक झोपड़ी के बाहर किसी के कदमों की आहट हुई। घुंघरूओं की हल्की-हल्की झंकार सुनाई दी। औरत ने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा। वहां दो बेहद ही सुंदर और नौजवान लड़के खड़े थे। एक का रंग एकदम सांवला था और दूसरे का रंग एकदम गोरा। उन्होंने पीले और नीले रंग के रेशमी कपड़े पहने हुए थे और उनकी झोपड़ी में कदम रखते ही वहां की बदबू गायब हो गई। और पूरी झोपड़ी पारिजात के फूलों और चंदन की खुशबू से महक उठी। एक का रंग एकदम सांवला यानी काला था और दूसरे का रंग एकदम गोरा। उनके कपड़े किसी राजा महाराजा जैसे थे। औरत ने कांपते हुए हाथ जोड़कर पूछा, "कौन-कौन हो बेटा? इतने सुंदर और इतने अमीर घर के लग रहे हो? इस गरीब अछूत के घर क्या करने आए हो? उस सांवले लड़के के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और ब्रह्मांड को मोह लेने वाली मुस्कान थी। उसकी बड़ी-बड़ी गोल आंखों में आंसू थे। उसने आगे बढ़कर उस बूढ़ी औरत के आंसू पोंछे और कहा माईदास काका ने जिंदगी भर मुझे का लिया और मेरे बड़े भाई को प्यार से पुकारा है। पूरी दुनिया ने उन्हें अछूत कहा लेकिन उन्होंने हमेशा अपना बेटा माना और जब एक पिता दुनिया से जाता है तो उसका बेटा उसे कंधा देने जरूर आता है। हम अपने पिता की अर्थी उठाने आए हैं। माई औरत सन्न रह गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन दोनों लड़कों ने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर उस अछूत माने जाने वाले दास की अर्थी को अपने कोमल कंधों पर उठा लिया। सांवला लड़का आगे की तरफ और गोरा लड़का पीछे की तरफ। जैसे ही वह अर्थी लेकर झोपड़ी से बाहर निकले, गांव के सरपंच और पंडित जो दूर खड़े तमाशा देख रहे थे, उनके होश उड़ गए। सरपंच चिल्लाया। अरे ए लड़कों, तुम कौन हो? पागल हो गए हो क्या? यह एक नीची जाति का आदमी है। इसकी अर्थी को छुओगे तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। कौन हो तुम? गोरे लड़के यानी बलराम जी के रूप ने पलट कर सरपंच को ऐसी तेज और क्रोधित नजरों से देखा कि सरपंच के पैर वहीं जमीन पर जम गए। उसके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। वो दोनों लड़के अर्थी लेकर गांव की सड़कों से श्मशान की तरफ बढ़ने लगे। और सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि जिस रास्ते से वह अर्थी गुजर रही थी वहां लाश की कोई बदबू नहीं बल्कि स्वर्ग के पारिजात के फूलों और भगवान के श्री अंग यानी शरीर की सुगंध फैल रही थी। गांव वाले पागलों की तरह उस खुशबू को सूंघ रहे थे। शशान पहुंचकर उन दोनों भाइयों ने अपने हाथों से उस लकड़ी की चिता को सजाया। उस सांवले लड़के ने दास के माथे को चूमा और अपने हाथों से उसकी चिता को मुखाग्नि दी। दास का अंतिम संस्कार हो गया। उसकी बूढ़ी पत्नी रोते-रोते उनके पैरों में गिर पड़ी। लेकिन जैसे ही उसने नजर उठाई, वहां कोई नहीं था। वो दोनों लड़के हवा में गायब हो चुके थे। लेकिन असली हड़कंप तो अगली सुबह पूरी के मंदिर में मचने वाला था। जब अगली सुबह पूरी के मंदिर के मुख्य पुजारी ने महाप्रभु को जगाने के लिए गर्भ गृह के कपाट खोले यानी दरवाजे खोले तो अंदर का नजारा देखकर उनके हाथ से आरती की थाली छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। पुजारी जोर-जोर से रोने और चीखने लगे। अनर्थ अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह क्या हो गया? साक्षात भगवान जगन्नाथ और बड़े भाई बलराम जी की पवित्र लकड़ी की मूर्तियों पर श्मशान की राख लगी हुई थी। उनके पीले और नीले रेशमी कपड़ों पर कालिक पुती थी और उनसे चिता के जलने की गंध आ रही थी। और सबसे ज्यादा रुला देने वाली बात यह कि भगवान की वो बड़ी-बड़ी गोल आंखें रोने की वजह से एकदम लाल हो गई थी। मानो वो रात भर किसी के लिए फूट-फूट कर रोए हो। पुजारी दहाड़ मार मार कर रोने लगे। अनर्थ अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह कि क्या हो गया? जल्दी से महा स्नान की तैयारी करो। भगवान को नहलाओ। पुजारी दौड़े-दौड़े पानी लाने गए। लेकिन तभी मुख्य पुजारी वहीं जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़े। बेहोशी में मुख्य पुजारी को एक सपना आया। सपने में साक्षात जगन्नाथ जी आए। उनके चेहरे पर वही राख लगी थी। लेकिन उनके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। भगवान ने कहा पुजारी रुक जाओ मेरे शरीर पर लगी इस राख को मत धोना। यह कोई साधारण राख नहीं बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र चंदन से भी ज्यादा कीमती है। पुजारी ने रोते हुए पूछा। प्रभु यह किस चीज की राख है? आप रात को कहां गए थे? जगन्नाथ जी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर पुजारी की रूह कांप गई। पुजारी जिसे तुम सब लोग नीची जाति का और अछूत कहते थे। वह दास मेरा सबसे प्यारा भक्त था। कल रात जब उस गरीब की अर्थी उठाने वाला कोई नहीं था। जब पूरी दुनिया ने उसे दुत्कार दिया था। तब मैं और मेरा बड़ा भाई बलराम उसके बेटी बनकर उसकी अर्थी उठाने गए थे। यह उसी दास की चिता की राख है जो मुझे प्रेम से पुकारता है। मैं उसके हर सफर में उसके साथ खड़ा होता हूं। मेरे लिए कोई जातपात नहीं है। पुजारी की अचानक आंख खुली। वो पसीने से भीगे हुए थे। वो जोरजोर से रोने लगे। हे प्रभु हम कितने मूर्ख हैं। हम दिन रात आपकी पूजा करते हैं। लेकिन आपके असली रूप को वो अछूत दास पहचान गया। पुजारी उसी वक्त नंगे पैर दौड़ते हुए उस गांव की तरफ भागे जहां दास की झोपड़ी थी। जब वो वहां पहुंचे। पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दास की बूढ़ी पत्नी उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रही थी और रोते हुए कह रही थी मेरे कालिया ठाकुर तूने मेरे पति की लाज रख ली पुजारियों ने उस बूढ़ी औरत के पैर पकड़ ली और पूरे गांव वालों को दास की सच्ची भक्ति की कहानी बताई जो सरपंच कल तक दास को अछूत कहता था। आज वो उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रहा था। तो दोस्तों यह है हमारे जगन्नाथ जी का असली रूप। वो महलों के छप्पन भोग के भूखे नहीं है। वह तो बस एक गरीब की झोपड़ी के सच्चे प्रेम के भूखे हैं। उनके दरबार में ना कोई राजा है ना कोई रंक ना कोई ऊंची जाति है ना नीची। अगर इस कहानी ने आपके दिल को छू लिया है और आपकी आंखों में आंसू ला दिए हैं तो कमेंट में पूरी श्रद्धा के साथ जय जगन्नाथ जरूर लिखें और ऐसी ही अद्भुत कथाओं के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें। न
पूरी में जगन्नाथ जी..राम के भक्त को जंजीर में बांधकर अपराधी की तरह क्यों रखा है? जब राजा इंद्रदुम्न ने पुरुषोत्तम क्षेत्र यानी पूरी में भगवान जगन्नाथ के भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण किया तो समुद्र के अधिपति वरुण देव के मन में अपने प्रभु के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी। वे जानते थे कि साक्षात नारायण अब उनके तट पर निवास कर रहे हैं। अपनी इसी भक्ति के वशीभूत होकर वरुण देव ने मंदिर की ओर प्रस्थान किया। क्योंकि वरुण देव जल के स्वामी हैं। उनके आगमन के साथ ही समुद्र की प्रचंड लहरें भी नगर की सीमाओं को लांघ कर भीतर प्रवेश कर गई। देखते ही देखते पूरी का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और मंदिर के प्रांगण तक पानी पहुंच गया। यह कोई साधारण प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक भक्त का अपने आराध्य से मिलने का आवेग था जिसने अनजाने में पूरी धाम के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था। यह स्थिति नगरवासियों के लिए अत्यंत चिंताजनक थी। लोगों के घर बहने लगे और खेती नष्ट होने लगी। तब समस्त नगरवासी अपनी करुण पुकार लेकर श्री जगन्नाथ धाम पहुंचे। उन्होंने महाप्रभु के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा हे प्रभु यदि आप इस नीलांचल धाम में निवास करना चाहते हैं और चाहते हैं आपकी सेवा करें तो कृपा कर हमें इस संकट से बचाएं। वरुण देव बार-बार आपके दर्शन के बहाने हमारे नगर को डूबा रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो यह सुंदर नगर और आपकी सेवा करने वाले भक्त कैसे जीवित रहेंगे? हे जगत के स्वामी इस विनाशकारी बाण को रोकिए। तब महाप्रभु के मन में एक गहरा विचार चला। वरुण देव का यह प्रेम अब मर्यादा तोड़ रहा है। मेरे दर्शन की उनकी यह प्यास मेरे अन्य भक्तों के लिए संकट बन गई है। इसे रोकने के लिए मुझे एक ऐसे रक्षक की आवश्यकता है जिसके भीतर अथाह शक्ति भी हो और अटूट धैर्य भी। जिसने माता सीता की खोज कर मेरे हृदय के संताप को हरा था वही आज मेरे नगरवासियों के भय को भी हर सकता है। भगवान ने विचार किया कि वरुण देव का जल तत्व है और हनुमान पवन पुत्र है। पवन ही जल की लहरों को नियंत्रित करती है। इसलिए भगवान ने हनुमान जी को बुलाया क्योंकि वे जानते थे कि जो समुद्र को लांघ सकता है वही समुद्र को बांध भी सकता है। यह तुच्छ सेवक धन्य हुआ कि आपने एक बार फिर इस दास को अपनी सेवा के योग्य समझा। हे महावीर तुम इस नीली जलराशि के सम्मुख एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े हो जाओ। वरुण देव की एक बूंद भी मेरे भक्तों के आंगन तक नहीं पहुंचनी चाहिए। प्रभु आपके आदेश की गुरुता को मैं समझता हूं। समुद्र की गर्जना मेरे राम नाम के उद्घोष के सामने मौन हो जाएगी। आपकी आज्ञा मेरे लिए अमिट रेखा है। जिसे लांघने का साहस स्वयं वरुण देव भी नहीं कर पाएंगे। जय श्री जगन्नाथ। हे पवन पुत्र मेरा उद्देश्य प्रभु के भक्तों को कष्ट देना नहीं था। मैं तो बस अपने स्वामी के उन नूतन विग्रहों के दर्शन करना चाहता था जो इस भव्य मंदिर में विराजे हैं। लहरों का उफान मेरी भक्ति का आवेग था। हे वरुण भक्ति वही श्रेष्ठ है जो संसार का कल्याण करे विनाश नहीं। प्रभु का आदेश है कि तुम अपनी मर्यादा में रहो। यदि तुमने इस रेखा को लांघा तो मेरी गदा और प्रभु का सुदर्शन चक्र तुम्हारा मार्ग रोक देंगे। यस। उस समय भगवान जगन्नाथ को भोग में केवल खिचड़ी अर्पित की जाती थी जो चावल और दाल से बनी होती थी। वही भोग हनुमान जी को भी दिया जाता था। लेकिन हनुमान जी को अयोध्या में रहते हुए अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों का अनुभव था। अच्छा खिचड़ी। धीरे-धीरे वे केवल खिचड़ी खाते-खाते ऊब गए। हनुमान जी के मन में यह विचार आने लगा। प्रभु की महिमा अपरंपार है और यह खिचड़ी भी दिव्य है। मैं तो वानर सेना का सेनापति हूं। मुझे तो मीठे फल और लड्डुओं का स्वाद प्रिय है। क्या प्रभु को मेरी पसंद याद नहीं? क्या मुझे युगों युगों तक बस इसी खिचड़ी पर गुजारा करना होगा। खिचड़ी से ऊबकर और मीठे व्यंजनों की लालसा में हनुमान जी ने एक युक्ति निकाली। वे जानते थे कि प्रभु जगन्नाथ जो राम ही हैं के बास अयोध्या और अन्य स्थानों पर आज भी उनके मनपसंद भोग लगते हैं। जब भी वरुण देव यानी समुद्र शांत होते हनुमान जी चुपके से अपना पहरा छोड़ते और आकाश मार्ग से उड़कर अयोध्या या वाराणसी पहुंच जाते। वहां वे भरपेट लड्डू, मालपुआ और ताजे फलों का भोग पाते। वे सोचते प्रभु तो भीतर ध्यान मग्न है। उन्हें क्या पता चलेगा? मैं जल्दी से प्रसाद खाकर वापस लौट आऊंगा। लेकिन जैसे ही हनुमान जी वहां से हटते वरुण देव को मौका मिल जाता। समुद्र की लहरें फिर से मंदिर की दीवारों को छूने लगती और पूरी में बाढ़ का खतरा मंडराने लगता। जब यह बार-बार होने लगा तो भगवान जगन्नाथ समझ गए कि हनुमान जी का मन इस खिचड़ी प्रसाद से भर गया है और वे स्वाद के चक्कर में अपनी ड्यूटी छोड़ रहे हैं। हनुमान तुम अपनी जगह क्यों छोड़ रहे हो? क्या तुम्हें मेरी दी हुई खिचड़ी पसंद नहीं? प्रभु आपकी खिचड़ी अमृत है। पर इस वानर को कभी-कभी लड्डुओं की भी याद आती है। हे महावीर तुम तो जानते हो कि मेरे लिए भक्तों के कल्याण से बड़ा कुछ नहीं है। तुम्हारी शक्ति और तुम्हारी भूख दोनों ही असीमित हैं। मुझे प्रसन्नता है कि तुमने अपने मन की बात मुझसे छिपाई नहीं। पर हनुमान पुरी धाम की रक्षा का भार केवल तुम्हारे सबल कंधों पर है। यदि तुम स्वाद के वश में होकर तट छोड़ोगे तो वरुण देव मर्यादा का उल्लंघन करेंगे और मेरे हजारों भक्त जलमग्न हो जाएंगे। हनुमान तुम स्वयं को वश में नहीं कर पा रहे हो। इसलिए अब मैं तुम्हें प्रेम और कर्तव्य की इन स्वर्ण जंजीरों में बांधता हूं। यह जंजीरें तुम्हें दंड देने के लिए नहीं बल्कि इस स्थान पर तुम्हारे अडिग होने का प्रमाण होंगी। जब तक तुम बंधे रहोगे वरुण देव की शक्ति तुम्हें पार नहीं कर पाएगी और ना ही तुम विचलित हो पाओगे। हनुमान जी ने देखा कि वे जंजीरें केवल स्वर्ण की निर्जीव वस्तु नहीं थी। जब उन्होंने जंजीर के हर एक कड़े को ध्यान से देखा तो उन्हें प्रत्येक कड़े पर राम नाम अंकित दिखाई दिया। इतना ही नहीं उन जंजीरों से वही मधुर ध्वनि निकल रही थी जो हनुमान जी के हृदय में सदैव गूंजती रहती है। राम राम राम हे महाप्रभु मैं कितना अज्ञानी था जो इसे दंड समझ रहा था। आपने तो मुझे दंड नहीं बल्कि अपना साक्षात नाम पहना दिया है। यह भेड़ियां स्वर्ण की नहीं है। यह तो आपके नाम की शक्ति है। प्रभु इस संसार में हनुमान के लिए राम नाम के बंधन से बड़ा कोई मोक्ष नहीं है। हे अंजनी पुत्र संसार तुम्हें अनेक नामों से जानता है। किंतु यहां तुम्हारी ख्याति बेड़ी हनुमान के रूप में होगी। जो भी भक्त जगन्नाथ धाम आएगा वो तुम्हारे इस स्वरूप का दर्शन कर यह सीखेगा कि भगवान का नाम राम नाम की बेड़ी ही जीव को भटकने से रोकता है। तुम इसी तट पर दरिया महावीर बनकर मेरे धाम की रक्षा करोगे। हनुमान सुनो आज से मैं इस पूरी धाम की मर्यादा और तुम्हारी तुष्टि के लिए एक नई परंपरा का आरंभ करता हूं। आज से इस मंदिर की रसोई साक्षात महालक्ष्मी के संरक्षण में होगी। अब से यहां केवल खिचड़ी नहीं बल्कि छप्पन भोग का विधान होगा। इसमें तुम्हारे प्रिय लड्डू भी होंगे, मालपुआ भी होगा और वह दिव्य पोड़ा पीठा भी होगा। जिसकी सुगंध पाकर स्वयं देवता भी स्वर्ग छोड़कर यहां दौड़े आएंगे। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि 56 प्रकार के इन व्यंजनों का विस्तार इतना विशाल हो कि मेरे भक्त को कभी किसी और द्वार की ओर न ताकना पड़े। हनुमान यह 56 भोग मेरे और तुम्हारे प्रेम का प्रतीक होंगे। आज से जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद दुनिया का सबसे पवित्र अन्न होगा। जिसे पाकर मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाएगा। नील माधव हे नील माधव मैं केवल मुट्ठी भर लड्डुओं के मोह में भटक रहा था। पर आपने तो मेरे बहाने समस्त चराचर जगत के लिए अमृत का द्वार ही खोल दिया। आज इस हनुमान ने जान लिया कि आपके चरणों को छोड़कर कहीं और सुख खोजना केवल मृत तृष्णा है। प्रभु आपकी जय हो। आपके इस महाप्रसाद की जय हो। हनुमान जी ने एक हाथ में अपनी गदा संभाली और दूसरे हाथ से अपनी बेड़ियों को माथे से लगाया। भगवान जगन्नाथ मंदमंद मुस्कुराते हुए मंदिर के गर्भगृह की ओर लौट गए। उसी दिन से पूरी में महाप्रसाद और छप्पन भोग की परंपरा शुरू हुई। वरुण देव ने अपना सिर झुका लिया और हनुमान जी दरिया महावीर बनकर अनंत काल के लिए पहरे पर बैठ गए। आज भी पूरी जाने वाला हर भक्त जानता है कि मंदिर के भीतर जो शांति है वो बाहर खड़े उसी महावीर की पहरेदारी का फल है जिसे भगवान ने खुद राम नाम की बेड़ियों में बांधा था। जय जगन्नाथ जय दरिया महावीर। यदि आपको यह पौराणिक कथा और महाप्रभु की लीला अच्छी लगी हो तो लाइक करें ताकि प्रभु की यह महिमा और लोगों तक पहुंचे। और फॉलो करें। ऐसी ही अनसुनी पौराणिक कहानियों और आध्यात्मिक रहस्यों से जुड़े रहने के लिए कमेंट में जय जगन्नाथ लिखना ना भूलें।
🍁🛕🌺👏🕉️👏🌺🛕🍁 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 🌈 *दिनांक - 02 अप्रैल 2026* 🌈 *दिन - गुरूवार* 🌈 *विक्रम संवत 2083 (गुजरात अनुसार 2082)* 🌈 *शक संवत -1948* 🌈 *अयन - उत्तरायण* 🌈 *ऋतु - वसंत ॠतु* 🌈 *मास - चैत्र* 🌈 *पक्ष - शुक्ल* 🌈 *तिथि - पूर्णिमा सुबह 07:41 तक तत्पश्चात प्रतिपदा* 🌈 *नक्षत्र - हस्त शाम 05:38 तक तत्पश्चात चित्रा* 🌈 *योग - ध्रुव दोपहर 02:20 तक तत्पश्चात व्याघात* 🌈*राहुकाल - दोपहर 02:15 से शाम 03:48 तक* 🌈 *सूर्योदय - 06:32* 🌈 *सूर्यास्त - 06:52* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 🕉️⏭️ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा मे* 🚩 *व्रत पर्व विवरण- व्रत पूर्णिमा,चैत्री पूर्णिमा,वैशाख स्नान आरम्भ, श्रीहनुमाजी का प्राकट्य दिवस* ✨ *विशेष - पूर्णिमा एवं व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🍁 *हनुमान जन्मोत्सव* 🍁 🙏🏻 *जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी कोई विरोधी परेशान करता है तो कभी घर के किसी सदस्य को बीमारी घेर लेती है। इनके अलावा भी जीवन में परेशानियों का आना-जाना लगा ही रहता है। ऐसे में हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है। इस बार 02 अप्रैल, गुरुवार को हनुमान जन्मोत्सव है। हनुमानजी की कृपा पाने का यह बहुत ही उचित अवसर है। यदि आप चाहते हैं कि आपके जीवन में कोई संकट न आए तो नीचे लिखे मंत्र का जप हनुमान जन्मोत्सव के दिन करें। प्रति मंगलवार या शनिवार को भी इस मंत्र का जप कर सकते हैं।* ⚜️ *मंत्र* *ऊँ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा* 🙏🏻 *जप विधि* 🕉️⏭️ *- सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें।* 🕉️⏭️ *- इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें।* 🕉️⏭️ *- पारद हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करेंगे तो विशेष फल मिलता है।* 🕉️⏭️ *- जप के लिए लाल मूँगे की माला का प्रयोग करें।* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🍁 *वैशाख मास स्नान आरंभ* 🍁 🙏🏻 *चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से वैशाख मास स्नान आरंभ हो जाता है। यह स्नान पूरे वैशाख मास तक चलता है। इस बार वैशाख स्नान 02 अप्रैल गुरुवार से प्रारंभ होगा जो की 01 मई, शुक्रवार तक रहेगा। (गुजरात-महाराष्ट्र के अनुसार अभी चैत्र मास चल रहा है वहा पर दिनांक 18 अप्रैल से वैशाख मास प्रारंभ होगा)* 🙏🏻 *स्कंदपुराण में वैशाख मास को सभी मासों में उत्तम बताया गया है। पुराणों में कहा गया है कि वैशाख मास में सूर्योदय से पहले जो व्यक्ति स्नान करता है तथा व्रत रखता है, वह भगवान विष्णु का कृपापात्र होता है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नामक राजा ने केवल वैशाख स्नान से ही वैकुण्ठधाम प्राप्त किया था। इसमें व्रती को प्रतिदिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी तीर्थस्थान, सरोवर, नदी या कुएं पर जाकर अथवा घर पर ही स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद सूर्योदय के समय अर्ध्र्य देते समय नीचे लिखा मंत्र बोलना चाहिए-* ⚜️ *वैशाखे मेषगे भानौ प्रात: स्नानपरायण:।* *अध्र्यं तेहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।* 🙏🏻 *वैशाख व्रत महात्म्य की कथा सुनना चाहिए तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए। व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। वैशाख मास में जलदान का विशेष महत्व है। इस मास में प्याऊ की स्थापना करवानी चाहिए। पंखा, खरबूजा एवं अन्य फल, अन्न आदि का दान करना चाहिए।* 🙏🏻 *स्कंदपुराण के अनुसार इस मास में तेल लगाना, दिन में सोना, कांसे के बर्तन में भोजन करना, दो बार भोजन करना, रात में खाना आदि वर्जित माना गया है। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं।* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 ☀🏯!! श्री हरि: शरणम् !!🏯☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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#वैशाख अमावस्या जिसे हल्ली #अमावस्या भी कहते हैं #पितरों की शांति तर्पण और दान पुण्य के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है यह वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है इस दिन पवित्र नदी स्नान पूर्वजों के लिए पिंडदान और निर्धनों को दान जैसे जल और वस्त्र चप्पल करने से पितृ प्रसन्न होते हैं
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#वैदिक पंचांग के अनुसार #वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की #अष्टमी तिथि की शुरुआत 9 अप्रैल 2026 को रात 9:18 पर होगी वहीं इसका समापन 10 अप्रैल को रात 11:14 पर होगा इसे मैं निशा कल को देखते हुए कालाष्टमी का व्रत 9 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा
10 hours ago | [YT] | 1
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🙏🙏
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5 अप्रैल को विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत करने का भी विधान है। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और संपन्नता बनी रहती है। प्रत्येक महीने के कृष्ण और शुक्ल और दोनों पक्षों की चतुर्थी को भगवान गणेश की विधान है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी श्री गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है।
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_की_तिथि_और_शुभ_मुहूर्त:
पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 5 अप्रैल 2026 को सुबह 11 बजकर 59 मिनट पर होगा। चतुर्थी तिथि का समापन 6 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 10 मिनट पर होगा। विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त 04:56 ए एम से 05:43 ए एम तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त 12:16 पी एम से 01:06 पी एम तक रहेगा।
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_चंद्रोदय_का_समय:
विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय का समय रात 9 बजकर 54 मिनट पर रहेगा। आपको बता दें कि संकष्टी चतुर्थी व्रत का पारण चंद्रोदय के समय ही किया जाता है।
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_का_महत्व:
भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में से एक विकट रूप भी है। समस्त प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, रोग, शोक एवं दुर्घटनाओं से मुक्ति हेतु भगवान विकट की पूजा की जाती है। भगवान विकट अपने भक्तों को अपराजेयता एवं निर्भयता प्रदान करते हैं और घोर से घोर महासंकटों में भक्तों की रक्षा करते हैं।
#गणेश_जी_पूजा_मंत्र:
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये। वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नमः॥
ॐ वक्रतुण्डाय हुम्॥
ॐ गं गणपतये नमः॥
#विकट_संकष्टी_चतुर्थी_व्रत_की_पूजा_विधि:
●जो भक्त संकष्टी चतुर्थी व्रत रखते हैं, वे सुबह जल्दी उठकर सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करके नए या स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं।
●इस दिन भक्त पूर्ण उपवास या आंशिक उपवास रखते हैं।
●भगवान गणेश की मूर्ति को एक स्वच्छ स्थान पर स्थापित किया जाता है और दुर्वा घास, ताजे फूलों, घी के दीपक आदि पूजा में शामिल करें।
●भगवान गणेश को मोदक और लड्डू भोग में अर्पित किए जाते हैं।
●पूजा की शुरुआत मंत्रों के जाप और व्रत कथा के पाठ से होती है।
●संध्या में पूजा और आरती के साथ यह विधि संपन्न होती है।
●चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का समापन करें।
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वैसाख महीने मे सत्तू महादेव पर वैशाख महीने (माधव मास) में भगवान शिव को सत्तू का भोग लगाना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है, जो मुख्य रूप से गर्मी से राहत और शिव कृपा के लिए किया जाता है। पंडित प्रदीप मिश्रा के अनुसार, इसमें तीन तरह के अनाजों का मिश्रण (अक्षत सत्तू) प्रयोग किया जाता है, जो शिव के तीन नेत्रों व त्रिशूल को समर्पित है। यह भोग वैशाख अमावस्या (8 मई 2026) या वैशाख शिवरात्रि पर लगाया जाता है🙏🙏 #motivational #mahadev #facebookpost
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रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य। पूरी के पास एक छोटे से गांव में एक गरीब की लाश पड़ी है। लेकिन कोई भी उसकी अर्थी को कंधा देने नहीं आ रहा। लेकिन तभी दो रहस्यमय नौजवान लड़के यानी एक सांवला और एक गोरा अचानक वहां आते हैं और आगे बढ़कर उस अर्थी को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। गांव वाले दूर खड़े हैरान है और सबसे बड़ी बात उन अनजान लड़कों के शरीर से पूरी मंदिर के पवित्र चंदन, तुलसी और कपूर की तेज महक क्यों आ रही है? आखिर कौन है यह दोनों और एक अछूत की अर्थी उठाने यह कहां से आए हैं? आइए देखते हैं इस रुला देने वाली कथा के पहले भाग में। कहानी शुरू होती है एक बेहद गरीब भक्त से जिसका नाम था दास। दास समाज की नज़रों में एक नीची जाति का अछूत इंसान था। उसके पास ना तो धन था ना पहनने को अच्छे कपड़े। लेकिन उसके पास एक ऐसी दौलत थी जो बड़े-बड़े सेठों के पास भी नहीं थी और वह थी जगन्नाथ जी की अटूट भक्ति। दास के दिन की शुरुआत जय जगन्नाथ से होती और रात भी उसी नाम के साथ। लेकिन उसकी जाति छोटी होने के कारण उसे कभी मंदिर के अंदर जाने की इजाजत नहीं मिली। वो रोज मीलों पैदल चलकर पूरी आता। मंदिर के सिंह द्वार के बाहर खड़ा होता और दूर से ही मंदिर के शिखर पर लगे नील चक्र को देखकर आंसुओं से रोता हुआ वापस लौट जाता। दास कहता था मेरे कालिया ठाकुर मुझे अंदर नहीं बुलाते तो क्या हुआ? वो वहीं से मेरा प्रणाम स्वीकार कर लेते हैं। दिन बीतते गए। दास बूढ़ा हो गया और एक दिन अचानक एक भयानक बीमारी से दास की मौत हो गई। उसकी टूटी हुई झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। उसकी बूढ़ी पत्नी अकेले लाश के पास बैठकर दहाड़े मार मार कर रो रही थी। पत्नी रोते हुए गांव के सरपंच और बड़े पंडितों के पास गई। उसने हाथ जोड़कर उनके पैरों में गिरकर भीख मांगी। मेरे पति की अर्थी उठवा दो मालिक। घर में कोई आदमी नहीं है। इन्हें श्मशान तक पहुंचा दो वरना इनकी आत्मा भटकती रहेगी। लेकिन गांव वालों का दिल पत्थर का था। सरपंच ने उसे धक्का देकर कहा, दूर हट अछूत। तेरा पति नीची जाति का था। हम उसकी लाश को कंधा देकर अपना धर्म और अपना शरीर अपवित्र नहीं करेंगे। पड़ी रहने दे उसकी लाश को। वही झोपड़ी में चील कौवों के लिए। बेचारी बूढ़ी औरत टूट गई। शाम होने वाली थी। सूरज ढल रहा था। गांव का एक भी आदमी उस अर्थी को उठाने नहीं आया। औरत वापस झोपड़ी में आई। उसने अपने पति की लाश देखी और रोते-रोते उसकी नजर पूरी मंदिर की दिशा में गई। उसने आसमान की तरफ हाथ उठाए और चीख कर कहा। हे कालिया ठाकुर मेरे पति ने जिंदगी भर तेरे नाम की माला झपी। उसे दुनिया ने दुत्कारा। लेकिन उसने कभी तुझे नहीं छोड़ा। और आज आज उसके अंतिम सफर में उसे कंधा देने वाला कोई नहीं। क्या यही सिला दिया तूने उसकी सच्ची भक्ति का? अगर तू सच में है तो भेज किसी को मेरे पति की अर्थी उठाने के लिए। उस औरत के गर्म आंसू अभी जमीन पर गिरे ही थे। कि अचानक झोपड़ी के बाहर किसी के कदमों की आहट हुई। घुंघरूओं की हल्की-हल्की झंकार सुनाई दी। औरत ने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा। वहां दो बेहद ही सुंदर और नौजवान लड़के खड़े थे। एक का रंग एकदम सांवला था और दूसरे का रंग एकदम गोरा। उन्होंने पीले और नीले रंग के रेशमी कपड़े पहने हुए थे और उनकी झोपड़ी में कदम रखते ही वहां की बदबू गायब हो गई। और पूरी झोपड़ी पारिजात के फूलों और चंदन की खुशबू से महक उठी। एक का रंग एकदम सांवला यानी काला था और दूसरे का रंग एकदम गोरा। उनके कपड़े किसी राजा महाराजा जैसे थे। औरत ने कांपते हुए हाथ जोड़कर पूछा, "कौन-कौन हो बेटा? इतने सुंदर और इतने अमीर घर के लग रहे हो? इस गरीब अछूत के घर क्या करने आए हो? उस सांवले लड़के के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और ब्रह्मांड को मोह लेने वाली मुस्कान थी। उसकी बड़ी-बड़ी गोल आंखों में आंसू थे। उसने आगे बढ़कर उस बूढ़ी औरत के आंसू पोंछे और कहा माईदास काका ने जिंदगी भर मुझे का लिया और मेरे बड़े भाई को प्यार से पुकारा है। पूरी दुनिया ने उन्हें अछूत कहा लेकिन उन्होंने हमेशा अपना बेटा माना और जब एक पिता दुनिया से जाता है तो उसका बेटा उसे कंधा देने जरूर आता है। हम अपने पिता की अर्थी उठाने आए हैं। माई औरत सन्न रह गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन दोनों लड़कों ने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर उस अछूत माने जाने वाले दास की अर्थी को अपने कोमल कंधों पर उठा लिया। सांवला लड़का आगे की तरफ और गोरा लड़का पीछे की तरफ। जैसे ही वह अर्थी लेकर झोपड़ी से बाहर निकले, गांव के सरपंच और पंडित जो दूर खड़े तमाशा देख रहे थे, उनके होश उड़ गए। सरपंच चिल्लाया। अरे ए लड़कों, तुम कौन हो? पागल हो गए हो क्या? यह एक नीची जाति का आदमी है। इसकी अर्थी को छुओगे तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। कौन हो तुम? गोरे लड़के यानी बलराम जी के रूप ने पलट कर सरपंच को ऐसी तेज और क्रोधित नजरों से देखा कि सरपंच के पैर वहीं जमीन पर जम गए। उसके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। वो दोनों लड़के अर्थी लेकर गांव की सड़कों से श्मशान की तरफ बढ़ने लगे। और सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि जिस रास्ते से वह अर्थी गुजर रही थी वहां लाश की कोई बदबू नहीं बल्कि स्वर्ग के पारिजात के फूलों और भगवान के श्री अंग यानी शरीर की सुगंध फैल रही थी। गांव वाले पागलों की तरह उस खुशबू को सूंघ रहे थे। शशान पहुंचकर उन दोनों भाइयों ने अपने हाथों से उस लकड़ी की चिता को सजाया। उस सांवले लड़के ने दास के माथे को चूमा और अपने हाथों से उसकी चिता को मुखाग्नि दी। दास का अंतिम संस्कार हो गया। उसकी बूढ़ी पत्नी रोते-रोते उनके पैरों में गिर पड़ी। लेकिन जैसे ही उसने नजर उठाई, वहां कोई नहीं था। वो दोनों लड़के हवा में गायब हो चुके थे। लेकिन असली हड़कंप तो अगली सुबह पूरी के मंदिर में मचने वाला था। जब अगली सुबह पूरी के मंदिर के मुख्य पुजारी ने महाप्रभु को जगाने के लिए गर्भ गृह के कपाट खोले यानी दरवाजे खोले तो अंदर का नजारा देखकर उनके हाथ से आरती की थाली छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। पुजारी जोर-जोर से रोने और चीखने लगे। अनर्थ अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह क्या हो गया? साक्षात भगवान जगन्नाथ और बड़े भाई बलराम जी की पवित्र लकड़ी की मूर्तियों पर श्मशान की राख लगी हुई थी। उनके पीले और नीले रेशमी कपड़ों पर कालिक पुती थी और उनसे चिता के जलने की गंध आ रही थी। और सबसे ज्यादा रुला देने वाली बात यह कि भगवान की वो बड़ी-बड़ी गोल आंखें रोने की वजह से एकदम लाल हो गई थी। मानो वो रात भर किसी के लिए फूट-फूट कर रोए हो। पुजारी दहाड़ मार मार कर रोने लगे। अनर्थ अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह कि क्या हो गया? जल्दी से महा स्नान की तैयारी करो। भगवान को नहलाओ। पुजारी दौड़े-दौड़े पानी लाने गए। लेकिन तभी मुख्य पुजारी वहीं जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़े। बेहोशी में मुख्य पुजारी को एक सपना आया। सपने में साक्षात जगन्नाथ जी आए। उनके चेहरे पर वही राख लगी थी। लेकिन उनके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। भगवान ने कहा पुजारी रुक जाओ मेरे शरीर पर लगी इस राख को मत धोना। यह कोई साधारण राख नहीं बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र चंदन से भी ज्यादा कीमती है। पुजारी ने रोते हुए पूछा। प्रभु यह किस चीज की राख है? आप रात को कहां गए थे? जगन्नाथ जी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर पुजारी की रूह कांप गई। पुजारी जिसे तुम सब लोग नीची जाति का और अछूत कहते थे। वह दास मेरा सबसे प्यारा भक्त था। कल रात जब उस गरीब की अर्थी उठाने वाला कोई नहीं था। जब पूरी दुनिया ने उसे दुत्कार दिया था। तब मैं और मेरा बड़ा भाई बलराम उसके बेटी बनकर उसकी अर्थी उठाने गए थे। यह उसी दास की चिता की राख है जो मुझे प्रेम से पुकारता है। मैं उसके हर सफर में उसके साथ खड़ा होता हूं। मेरे लिए कोई जातपात नहीं है। पुजारी की अचानक आंख खुली। वो पसीने से भीगे हुए थे। वो जोरजोर से रोने लगे। हे प्रभु हम कितने मूर्ख हैं। हम दिन रात आपकी पूजा करते हैं। लेकिन आपके असली रूप को वो अछूत दास पहचान गया। पुजारी उसी वक्त नंगे पैर दौड़ते हुए उस गांव की तरफ भागे जहां दास की झोपड़ी थी। जब वो वहां पहुंचे। पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दास की बूढ़ी पत्नी उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रही थी और रोते हुए कह रही थी मेरे कालिया ठाकुर तूने मेरे पति की लाज रख ली पुजारियों ने उस बूढ़ी औरत के पैर पकड़ ली और पूरे गांव वालों को दास की सच्ची भक्ति की कहानी बताई जो सरपंच कल तक दास को अछूत कहता था। आज वो उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रहा था। तो दोस्तों यह है हमारे जगन्नाथ जी का असली रूप। वो महलों के छप्पन भोग के भूखे नहीं है। वह तो बस एक गरीब की झोपड़ी के सच्चे प्रेम के भूखे हैं। उनके दरबार में ना कोई राजा है ना कोई रंक ना कोई ऊंची जाति है ना नीची। अगर इस कहानी ने आपके दिल को छू लिया है और आपकी आंखों में आंसू ला दिए हैं तो कमेंट में पूरी श्रद्धा के साथ जय जगन्नाथ जरूर लिखें और ऐसी ही अद्भुत कथाओं के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें। न
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।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।
।। वैशाख मास ।।
वैशाख मास 03 अप्रैल 2026 से 01 मई 2026 तक है।
हिंदू पंचांग का अत्यंत पुण्य महीना धर्म, दान, तप और शुद्ध जीवन के लिए विशेष माना जाता है।
इसे भगवान विष्णु और माधव का प्रिय मास कहा गया है। इस महीने में किए गए पुण्य कार्य कई गुना फल देते हैं।
।। वैशाख मास का धार्मिक महत्व ।।
शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास में स्नान, दान और जप करने से पापों का नाश होता है
इस महीने में गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है
अक्षय तृतीया इसी मास में आती है, जिसे अत्यंत शुभ दिन माना जाता है
यह महीना मोक्ष और पुण्य प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ बताया गया है
।। वैशाख मास में क्या करें ।।
1. प्रातः स्नान (विशेषकर नदी स्नान)
रोज सूर्योदय से पहले स्नान करें
यदि संभव हो तो गंगा या पवित्र नदी में स्नान करें
2. भगवान विष्णु की पूजा
प्रतिदिन भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पित करें
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें
3. दान-पुण्य करें
जल से भरा घड़ा, छाता, चप्पल, वस्त्र, अनाज का दान करें
गर्मी में प्यासे लोगों को पानी पिलाना अत्यंत पुण्यकारी है
4. व्रत और संयम
एकादशी व्रत रखें
सात्विक भोजन करें और क्रोध, झूठ से दूर रहें
5. तुलसी सेवा
तुलसी जी को जल दें और दीपक जलाएं
घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है
।। वैशाख मास में क्या न करें ।।
1. तामसिक भोजन से बचें
मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन न करें
2. क्रोध और विवाद से दूर रहें
किसी का अपमान या कटु वचन न बोलें
3. जल का अपमान न करें
पानी बर्बाद करना इस महीने में विशेष रूप से अशुभ माना गया है
4. पेड़-पौधों को नुकसान न पहुँचाएं
यह प्रकृति सेवा का महीना है
विशेष दिन (महत्वपूर्ण तिथियां)
अक्षय तृतीया – सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
एकादशी – व्रत और भक्ति के लिए उत्तम
पूर्णिमा – दान और पूजा का विशेष फल
।। सरल निष्कर्ष ।।
वैशाख मास आत्मशुद्धि, सेवा और पुण्य का महीना है।
यदि आप इस दौरान स्नान, दान, जप और संयम का पालन करते हैं, तो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
जय श्री हरि।
3 days ago | [YT] | 3
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वैशाख मास कब से शुरू होगा 🙏
3 days ago | [YT] | 4
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पूरी में जगन्नाथ जी..राम के भक्त को जंजीर में बांधकर अपराधी की तरह क्यों रखा है?
जब राजा इंद्रदुम्न ने पुरुषोत्तम क्षेत्र यानी पूरी में भगवान जगन्नाथ के भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण किया तो समुद्र के अधिपति वरुण देव के मन में अपने प्रभु के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी। वे जानते थे कि साक्षात नारायण अब उनके तट पर निवास कर रहे हैं। अपनी इसी भक्ति के वशीभूत होकर वरुण देव ने मंदिर की ओर प्रस्थान किया। क्योंकि वरुण देव जल के स्वामी हैं। उनके आगमन के साथ ही समुद्र की प्रचंड लहरें भी नगर की सीमाओं को लांघ कर भीतर प्रवेश कर गई। देखते ही देखते पूरी का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और मंदिर के प्रांगण तक पानी पहुंच गया। यह कोई साधारण प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक भक्त का अपने आराध्य से मिलने का आवेग था जिसने अनजाने में पूरी धाम के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था। यह स्थिति नगरवासियों के लिए अत्यंत चिंताजनक थी। लोगों के घर बहने लगे और खेती नष्ट होने लगी। तब समस्त नगरवासी अपनी करुण पुकार लेकर श्री जगन्नाथ धाम पहुंचे। उन्होंने महाप्रभु के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा हे प्रभु यदि आप इस नीलांचल धाम में निवास करना चाहते हैं और चाहते हैं आपकी सेवा करें तो कृपा कर हमें इस संकट से बचाएं। वरुण देव बार-बार आपके दर्शन के बहाने हमारे नगर को डूबा रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो यह सुंदर नगर और आपकी सेवा करने वाले भक्त कैसे जीवित रहेंगे? हे जगत के स्वामी इस विनाशकारी बाण को रोकिए। तब महाप्रभु के मन में एक गहरा विचार चला। वरुण देव का यह प्रेम अब मर्यादा तोड़ रहा है। मेरे दर्शन की उनकी यह प्यास मेरे अन्य भक्तों के लिए संकट बन गई है। इसे रोकने के लिए मुझे एक ऐसे रक्षक की आवश्यकता है जिसके भीतर अथाह शक्ति भी हो और अटूट धैर्य भी। जिसने माता सीता की खोज कर मेरे हृदय के संताप को हरा था वही आज मेरे नगरवासियों के भय को भी हर सकता है। भगवान ने विचार किया कि वरुण देव का जल तत्व है और हनुमान पवन पुत्र है। पवन ही जल की लहरों को नियंत्रित करती है। इसलिए भगवान ने हनुमान जी को बुलाया क्योंकि वे जानते थे कि जो समुद्र को लांघ सकता है वही समुद्र को बांध भी सकता है। यह तुच्छ सेवक धन्य हुआ कि आपने एक बार फिर इस दास को अपनी सेवा के योग्य समझा। हे महावीर तुम इस नीली जलराशि के सम्मुख एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े हो जाओ। वरुण देव की एक बूंद भी मेरे भक्तों के आंगन तक नहीं पहुंचनी चाहिए। प्रभु आपके आदेश की गुरुता को मैं समझता हूं। समुद्र की गर्जना मेरे राम नाम के उद्घोष के सामने मौन हो जाएगी। आपकी आज्ञा मेरे लिए अमिट रेखा है। जिसे लांघने का साहस स्वयं वरुण देव भी नहीं कर पाएंगे। जय श्री जगन्नाथ। हे पवन पुत्र मेरा उद्देश्य प्रभु के भक्तों को कष्ट देना नहीं था। मैं तो बस अपने स्वामी के उन नूतन विग्रहों के दर्शन करना चाहता था जो इस भव्य मंदिर में विराजे हैं। लहरों का उफान मेरी भक्ति का आवेग था। हे वरुण भक्ति वही श्रेष्ठ है जो संसार का कल्याण करे विनाश नहीं। प्रभु का आदेश है कि तुम अपनी मर्यादा में रहो। यदि तुमने इस रेखा को लांघा तो मेरी गदा और प्रभु का सुदर्शन चक्र तुम्हारा मार्ग रोक देंगे। यस। उस समय भगवान जगन्नाथ को भोग में केवल खिचड़ी अर्पित की जाती थी जो चावल और दाल से बनी होती थी। वही भोग हनुमान जी को भी दिया जाता था। लेकिन हनुमान जी को अयोध्या में रहते हुए अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों का अनुभव था। अच्छा खिचड़ी। धीरे-धीरे वे केवल खिचड़ी खाते-खाते ऊब गए। हनुमान जी के मन में यह विचार आने लगा। प्रभु की महिमा अपरंपार है और यह खिचड़ी भी दिव्य है। मैं तो वानर सेना का सेनापति हूं। मुझे तो मीठे फल और लड्डुओं का स्वाद प्रिय है। क्या प्रभु को मेरी पसंद याद नहीं? क्या मुझे युगों युगों तक बस इसी खिचड़ी पर गुजारा करना होगा। खिचड़ी से ऊबकर और मीठे व्यंजनों की लालसा में हनुमान जी ने एक युक्ति निकाली। वे जानते थे कि प्रभु जगन्नाथ जो राम ही हैं के बास अयोध्या और अन्य स्थानों पर आज भी उनके मनपसंद भोग लगते हैं। जब भी वरुण देव यानी समुद्र शांत होते हनुमान जी चुपके से अपना पहरा छोड़ते और आकाश मार्ग से उड़कर अयोध्या या वाराणसी पहुंच जाते। वहां वे भरपेट लड्डू, मालपुआ और ताजे फलों का भोग पाते। वे सोचते प्रभु तो भीतर ध्यान मग्न है। उन्हें क्या पता चलेगा? मैं जल्दी से प्रसाद खाकर वापस लौट आऊंगा। लेकिन जैसे ही हनुमान जी वहां से हटते वरुण देव को मौका मिल जाता। समुद्र की लहरें फिर से मंदिर की दीवारों को छूने लगती और पूरी में बाढ़ का खतरा मंडराने लगता। जब यह बार-बार होने लगा तो भगवान जगन्नाथ समझ गए कि हनुमान जी का मन इस खिचड़ी प्रसाद से भर गया है और वे स्वाद के चक्कर में अपनी ड्यूटी छोड़ रहे हैं। हनुमान तुम अपनी जगह क्यों छोड़ रहे हो? क्या तुम्हें मेरी दी हुई खिचड़ी पसंद नहीं? प्रभु आपकी खिचड़ी अमृत है। पर इस वानर को कभी-कभी लड्डुओं की भी याद आती है। हे महावीर तुम तो जानते हो कि मेरे लिए भक्तों के कल्याण से बड़ा कुछ नहीं है। तुम्हारी शक्ति और तुम्हारी भूख दोनों ही असीमित हैं। मुझे प्रसन्नता है कि तुमने अपने मन की बात मुझसे छिपाई नहीं। पर हनुमान पुरी धाम की रक्षा का भार केवल तुम्हारे सबल कंधों पर है। यदि तुम स्वाद के वश में होकर तट छोड़ोगे तो वरुण देव मर्यादा का उल्लंघन करेंगे और मेरे हजारों भक्त जलमग्न हो जाएंगे। हनुमान तुम स्वयं को वश में नहीं कर पा रहे हो। इसलिए अब मैं तुम्हें प्रेम और कर्तव्य की इन स्वर्ण जंजीरों में बांधता हूं। यह जंजीरें तुम्हें दंड देने के लिए नहीं बल्कि इस स्थान पर तुम्हारे अडिग होने का प्रमाण होंगी। जब तक तुम बंधे रहोगे वरुण देव की शक्ति तुम्हें पार नहीं कर पाएगी और ना ही तुम विचलित हो पाओगे। हनुमान जी ने देखा कि वे जंजीरें केवल स्वर्ण की निर्जीव वस्तु नहीं थी। जब उन्होंने जंजीर के हर एक कड़े को ध्यान से देखा तो उन्हें प्रत्येक कड़े पर राम नाम अंकित दिखाई दिया। इतना ही नहीं उन जंजीरों से वही मधुर ध्वनि निकल रही थी जो हनुमान जी के हृदय में सदैव गूंजती रहती है। राम राम राम हे महाप्रभु मैं कितना अज्ञानी था जो इसे दंड समझ रहा था। आपने तो मुझे दंड नहीं बल्कि अपना साक्षात नाम पहना दिया है। यह भेड़ियां स्वर्ण की नहीं है। यह तो आपके नाम की शक्ति है। प्रभु इस संसार में हनुमान के लिए राम नाम के बंधन से बड़ा कोई मोक्ष नहीं है। हे अंजनी पुत्र संसार तुम्हें अनेक नामों से जानता है। किंतु यहां तुम्हारी ख्याति बेड़ी हनुमान के रूप में होगी। जो भी भक्त जगन्नाथ धाम आएगा वो तुम्हारे इस स्वरूप का दर्शन कर यह सीखेगा कि भगवान का नाम राम नाम की बेड़ी ही जीव को भटकने से रोकता है। तुम इसी तट पर दरिया महावीर बनकर मेरे धाम की रक्षा करोगे। हनुमान सुनो आज से मैं इस पूरी धाम की मर्यादा और तुम्हारी तुष्टि के लिए एक नई परंपरा का आरंभ करता हूं। आज से इस मंदिर की रसोई साक्षात महालक्ष्मी के संरक्षण में होगी। अब से यहां केवल खिचड़ी नहीं बल्कि छप्पन भोग का विधान होगा। इसमें तुम्हारे प्रिय लड्डू भी होंगे, मालपुआ भी होगा और वह दिव्य पोड़ा पीठा भी होगा। जिसकी सुगंध पाकर स्वयं देवता भी स्वर्ग छोड़कर यहां दौड़े आएंगे। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि 56 प्रकार के इन व्यंजनों का विस्तार इतना विशाल हो कि मेरे भक्त को कभी किसी और द्वार की ओर न ताकना पड़े। हनुमान यह 56 भोग मेरे और तुम्हारे प्रेम का प्रतीक होंगे। आज से जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद दुनिया का सबसे पवित्र अन्न होगा। जिसे पाकर मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाएगा। नील माधव हे नील माधव मैं केवल मुट्ठी भर लड्डुओं के मोह में भटक रहा था। पर आपने तो मेरे बहाने समस्त चराचर जगत के लिए अमृत का द्वार ही खोल दिया। आज इस हनुमान ने जान लिया कि आपके चरणों को छोड़कर कहीं और सुख खोजना केवल मृत तृष्णा है। प्रभु आपकी जय हो। आपके इस महाप्रसाद की जय हो। हनुमान जी ने एक हाथ में अपनी गदा संभाली और दूसरे हाथ से अपनी बेड़ियों को माथे से लगाया। भगवान जगन्नाथ मंदमंद मुस्कुराते हुए मंदिर के गर्भगृह की ओर लौट गए। उसी दिन से पूरी में महाप्रसाद और छप्पन भोग की परंपरा शुरू हुई। वरुण देव ने अपना सिर झुका लिया और हनुमान जी दरिया महावीर बनकर अनंत काल के लिए पहरे पर बैठ गए। आज भी पूरी जाने वाला हर भक्त जानता है कि मंदिर के भीतर जो शांति है वो बाहर खड़े उसी महावीर की पहरेदारी का फल है जिसे भगवान ने खुद राम नाम की बेड़ियों में बांधा था। जय जगन्नाथ जय दरिया महावीर। यदि आपको यह पौराणिक कथा और महाप्रभु की लीला अच्छी लगी हो तो लाइक करें ताकि प्रभु की यह महिमा और लोगों तक पहुंचे। और फॉलो करें। ऐसी ही अनसुनी पौराणिक कहानियों और आध्यात्मिक रहस्यों से जुड़े रहने के लिए कमेंट में जय जगन्नाथ लिखना ना भूलें।
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Sapna Kanwar Vlogs
🍁🛕🌺👏🕉️👏🌺🛕🍁
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🌈 *दिनांक - 02 अप्रैल 2026*
🌈 *दिन - गुरूवार*
🌈 *विक्रम संवत 2083 (गुजरात अनुसार 2082)*
🌈 *शक संवत -1948*
🌈 *अयन - उत्तरायण*
🌈 *ऋतु - वसंत ॠतु*
🌈 *मास - चैत्र*
🌈 *पक्ष - शुक्ल*
🌈 *तिथि - पूर्णिमा सुबह 07:41 तक तत्पश्चात प्रतिपदा*
🌈 *नक्षत्र - हस्त शाम 05:38 तक तत्पश्चात चित्रा*
🌈 *योग - ध्रुव दोपहर 02:20 तक तत्पश्चात व्याघात*
🌈*राहुकाल - दोपहर 02:15 से शाम 03:48 तक*
🌈 *सूर्योदय - 06:32*
🌈 *सूर्यास्त - 06:52*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🕉️⏭️ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण- व्रत पूर्णिमा,चैत्री पूर्णिमा,वैशाख स्नान आरम्भ, श्रीहनुमाजी का प्राकट्य दिवस*
✨ *विशेष - पूर्णिमा एवं व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🍁 *हनुमान जन्मोत्सव* 🍁
🙏🏻 *जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी कोई विरोधी परेशान करता है तो कभी घर के किसी सदस्य को बीमारी घेर लेती है। इनके अलावा भी जीवन में परेशानियों का आना-जाना लगा ही रहता है। ऐसे में हनुमानजी की आराधना करना ही सबसे श्रेष्ठ है। इस बार 02 अप्रैल, गुरुवार को हनुमान जन्मोत्सव है। हनुमानजी की कृपा पाने का यह बहुत ही उचित अवसर है। यदि आप चाहते हैं कि आपके जीवन में कोई संकट न आए तो नीचे लिखे मंत्र का जप हनुमान जन्मोत्सव के दिन करें। प्रति मंगलवार या शनिवार को भी इस मंत्र का जप कर सकते हैं।*
⚜️ *मंत्र*
*ऊँ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा*
🙏🏻 *जप विधि*
🕉️⏭️ *- सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें।*
🕉️⏭️ *- इसके बाद अपने माता-पिता, गुरु, इष्ट व कुल देवता को नमन कर कुश का आसन ग्रहण करें।*
🕉️⏭️ *- पारद हनुमान प्रतिमा के सामने इस मंत्र का जप करेंगे तो विशेष फल मिलता है।*
🕉️⏭️ *- जप के लिए लाल मूँगे की माला का प्रयोग करें।*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🍁 *वैशाख मास स्नान आरंभ* 🍁
🙏🏻 *चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से वैशाख मास स्नान आरंभ हो जाता है। यह स्नान पूरे वैशाख मास तक चलता है। इस बार वैशाख स्नान 02 अप्रैल गुरुवार से प्रारंभ होगा जो की 01 मई, शुक्रवार तक रहेगा। (गुजरात-महाराष्ट्र के अनुसार अभी चैत्र मास चल रहा है वहा पर दिनांक 18 अप्रैल से वैशाख मास प्रारंभ होगा)*
🙏🏻 *स्कंदपुराण में वैशाख मास को सभी मासों में उत्तम बताया गया है। पुराणों में कहा गया है कि वैशाख मास में सूर्योदय से पहले जो व्यक्ति स्नान करता है तथा व्रत रखता है, वह भगवान विष्णु का कृपापात्र होता है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नामक राजा ने केवल वैशाख स्नान से ही वैकुण्ठधाम प्राप्त किया था। इसमें व्रती को प्रतिदिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी तीर्थस्थान, सरोवर, नदी या कुएं पर जाकर अथवा घर पर ही स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद सूर्योदय के समय अर्ध्र्य देते समय नीचे लिखा मंत्र बोलना चाहिए-*
⚜️ *वैशाखे मेषगे भानौ प्रात: स्नानपरायण:।*
*अध्र्यं तेहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।*
🙏🏻 *वैशाख व्रत महात्म्य की कथा सुनना चाहिए तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए। व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। वैशाख मास में जलदान का विशेष महत्व है। इस मास में प्याऊ की स्थापना करवानी चाहिए। पंखा, खरबूजा एवं अन्य फल, अन्न आदि का दान करना चाहिए।*
🙏🏻 *स्कंदपुराण के अनुसार इस मास में तेल लगाना, दिन में सोना, कांसे के बर्तन में भोजन करना, दो बार भोजन करना, रात में खाना आदि वर्जित माना गया है। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं।*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
☀🏯!! श्री हरि: शरणम् !!🏯☀
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4 days ago | [YT] | 7
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