चमत्कारिक तंत्र शास्त्र ,अलौकिक शक्तियों से युक्त और सार्वभौमिक ज्ञान से सम्बद्ध एक प्रकार की विद्या की पद्धति है,जो महान ज्ञान का भंडार है,तंत्र शास्त्र में गुरू की उपासना एवं उन पर श्रद्धा विश्वास को सिद्धि का मूल द्योतक माना है,,मंत्र जपते समय तत्संबंधी देवता के स्वरूप एवं मंत्रार्थ तथा अभीष्ट कार्य तीनों का मंथन साथ चलता है तभी साधना का फल मिलता है इस चैनल के माध्यम से मैं गुरू के द्वारा प्राप्त ज्ञान ही प्रकट करूँगा आप सभी के सामने दुर्लभ ग्यान जिन साधनाओं के बारे मे बताऊँगा सभी अनुभूत एवं प्रमाणिक होंगी।"हर हर महादेव"
आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
*तंत्र शिरोमणि आचार्य विपिन*
*दिनाई निकालना*
छत्तीसगढ़ की तरफ सबसे ज्यादा टोना किया जाता है
वही पर सबसे ज्यादा दिनाई दी जाती है और निकाली जाती है
दिनाई का मतलब है कि मरीज की हालत खराब हो जाती है बीमार रहता है काम धंधा नही करता है
सबसे जरूरी उसके मुंह से सिन्दूर , रोली , बाल , चावल , दाल के दाने , पत्थर , कंकड , लोहे की कीले , कॉटे ये सब निकलते है
शमशानी दिनाई मे हड्डी और समसान की राख मुंह से निकलती है
दिनाई ज्यादातर किसी खाने पीने की चीजो मे मिलाकर व्यक्ति को खिला दी जाती है
ये काम परिवार का ही कोई सदस्य करता है
या कोई खास दोस्त जिसके साथ खाना पीना होता हो वो ये सब करता है
*दिनाई निकालना*
दिनाई निकालने के लिये मरीज को अपने सामने बिठा लें और सबसे पहले गंगाजल दिनाई काटने के मंत्र से अभिमंत्रित करके पिलाये
फिर 11 या 21 काली मिर्च लेले उने मंत्र से अभिमंत्रित करे और मरीज को खिला दे
दिनाई मुंह से बाहर निकल जायेगी
या मरीज को उल्टी होगी या दस्त हो जायेगे जिससे दिनाई या टोना बाहर निकल जायेगे
मरीज हल्का महसूस करेगा
राहत महसूस करेगा
ऐसा लगेगा कि जैसे कुछ वजन कम हो गया हो
उसके बाद दुबारा से कवच कीलन से गंगाजल पिला दें
मरीज के निम्न सामग्री से उतारा करे और सामग्री हवन कुंड या ज्योत मे डाल दें
काली पीली सरसो
काले तिल
काले उडद साबुत
लौग
लौग लगे बताशे
सादा बताशे
पॉच नीबू उसार कर काटकर निचोड दे
जायफल एक दो या पॉच जरूरत के हिसाब से
बूंदी का लड्डू एक
बरफी एक पीस
पानी का नारियल
कपूर एक टिक्की
ये सभी सामग्री लेकर रख ले
फिर एक एक सामग्री को मुट्ठी मे लेकर मंत्र पढते हुये मरीज के ऊपर से उसारते रहे और ज्योत या हवन मे डालते रहें
कवच कीलन कर दें
बस पूरा इलाज हो जायेगा
दिनाई काटने के मंत्र को पहले से सिद्ध करके रख लें फिर प्रयोग मे लें
1 month ago | [YT] | 6
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
15 AUGUST INDIA
Happy independence day
1 month ago | [YT] | 10
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
धन प्राप्ति स्वर विज्ञान प्रयोग
नित्य सुबह उठकर पता करें कौन सा स्वर चल रहा है, जो स्वर चल रहा हो ,वही पैर जमीन पर पहले रखे मन ही मन जपे २७ बार गं हस्तिपिशाचिलिखे स्वाहा बहुत फायदा होगा दिन प्रतिदिन उन्नति होना शुरू हो जाएगी।
हर हर महादेव
1 month ago | [YT] | 6
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
🔱 पर्चा बनवाएँ – अपने जीवन के बारे में विस्तृत मार्गदर्शन प्राप्त करें 🔱
यदि आप अपने जीवन के आने वाले वर्षों, समस्याओं, बाधाओं, कार्य, धन, परिवार, विवाह, संतान, स्वास्थ्य या आध्यात्मिक विषयों के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं, तो अपना व्यक्तिगत पर्चा बनवा सकते हैं।
पर्चे में क्या बताया जाएगा?
आपके जीवन में आने वाली संभावनाएँ एवं महत्वपूर्ण समय। वर्तमान में चल रही बाधाएँ एवं उनके कारण। यदि किसी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, तांत्रिक प्रभाव, भूत-प्रेत, जिन्न या अन्य अदृश्य बाधा के संकेत हों, तो उसके विषय में मार्गदर्शन। जीवन की प्रमुख समस्याओं से मुक्ति के उपाय। वैदिक एवं तांत्रिक उपाय। यदि आवश्यक हुआ तो उपयुक्त साधना एवं उसकी विधि-विधान सहित मार्गदर्शन।
महत्वपूर्ण सूचना
किसी व्यक्ति का नाम नहीं बताया जाएगा, हां यह बताया जाएगा इसके ऊपर क्या हुआ है तांत्रिक किया कराया होगा तो बताया जाएगा क्या चीज़ है ऊपर में ।नाम बताने से अनावश्यक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। कृपया अपना नाम, पिता का नाम या ऐसी बातें पूछकर समय व्यर्थ न करें। इस सेवा का उद्देश्य आपके जीवन से जुड़े प्रश्नों का मार्गदर्शन करना है।
पर्चा बनवाने के लिए यह विवरण भेजें:
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अगर यह सब डीटेल्स नहीं होंगी तब भी पर्चा बना दिया जाएगा। लेकिन हो तो जरूर भेजें।
इसके बाद आप अपने जीवन से संबंधित जो भी प्रश्न पूछना चाहें, पूछ सकते हैं।
एक पर्चे का सेवा-शुल्क: ₹1100
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2 months ago | [YT] | 8
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2 months ago (edited) | [YT] | 8
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
मां बगलामुखी
माँ बगलामुखी देवी को दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माना जाता है। इन्हें शत्रु स्तंभन, वाणी नियंत्रण, विजय, तंत्र शक्ति और अद्भुत संरक्षण की देवी कहा जाता है। पीतवर्ण धारण करने के कारण इन्हें “पीताम्बरा माता” भी कहा जाता है। साधक मानते हैं कि इनके मंत्रों में इतनी शक्ति होती है कि विपरीत परिस्थितियाँ भी अनुकूल होने लगती हैं। रात्रि में दीपक और पीले पुष्पों के साथ इनकी साधना विशेष फलदायी मानी जाती है।
सबसे प्रसिद्ध बीज मंत्र
॥ ह्लीं ॥
यह “ह्लीं” बीज अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली माना जाता है। तांत्रिक साधनाओं में इसे स्तंभन, रक्षा और विजय का मूल बीज कहा गया है।
माँ बगलामुखी का मूल मंत्र
॥ ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ॥
मान्यता है कि इस मंत्र के जप से विरोधियों की नकारात्मकता शांत होती है और साधक को आत्मबल प्राप्त होता है।
बगलामुखी गायत्री मंत्र
॥ ॐ बगलामुख्यै विद्महे
स्तम्भिन्यै धीमहि
तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
इस गायत्री मंत्र का जाप मानसिक दृढ़ता, वाणी सिद्धि और भय नाश हेतु किया जाता है।
माँ का अत्यंत प्रभावशाली श्लोक —
॥ चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलीं
लसत्कनकचम्पकद्युतिमदिन्दुविश्वाननाम् ।
गदाहतविपक्षकां कलितलोलजिह्वांचलां
स्मरामि बगलामुखीं विमुखसन्मनः स्तम्भिनीम् ॥
इस श्लोक में देवी के विराट स्वरूप का वर्णन है, जहाँ वे शत्रुओं के अहंकार और दुष्टता का नाश करती हैं।
बगलामुखी कवच और स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से न्यायालय, वाद-विवाद, शत्रु बाधा और तांत्रिक सुरक्षा के लिए किया जाता है। कई साधक आधी रात में पीले आसन पर बैठकर “ह्लीं” बीज का जप करते हैं
मान्यता है कि जब देवताओं को असुरों से अत्यधिक कष्ट हुआ तब देवी ने पीत प्रकाश से प्रकट होकर दुष्ट शक्तियों का स्तंभन किया। इसी कारण इनकी साधना को “अचल विजय” की साधना भी कहा जाता है।
माँ बगलामुखी की उपासना सदैव गुरु मार्गदर्शन में और शुद्ध भाव से करनी चाहिए, क्योंकि इनके मंत्र अत्यंत तेजस्वी और प्रभावकारी माने गए हैं।
4 months ago | [YT] | 37
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
#सनातन_परंपरा_में_प्रेतसंवाद_और_सूक्ष्म_जगत
(चेतना के अदृश्य आयाम)
सनातन परंपरा केवल दृश्य जगत की परंपरा नहीं है। उसका आधार ही इस समझ पर टिका है कि अस्तित्व केवल वही नहीं है जिसे आँखें देख सकें, कान सुन सकें या इंद्रियाँ पकड़ सकें। मनुष्य का स्थूल शरीर इस व्यापक चेतना-सृष्टि का केवल एक बाहरी आवरण है। इसके भीतर मन, प्राण, चित्त, संस्कार और सूक्ष्म ऊर्जा के अनेक स्तर कार्य करते हैं। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में जीवन और मृत्यु को दो अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि चेतना की एक निरंतर यात्रा माना गया है।
मृत्यु के विषय में सनातन दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म है। यहाँ मृत्यु को “समाप्ति” नहीं कहा गया, बल्कि “देहांत” कहा गया; अर्थात केवल शरीर का अंत। आत्मा नष्ट नहीं होती; वह केवल एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करती है। यही कारण है कि वैदिक, आगमिक और तांत्रिक परंपराओं में मृत्यु के बाद की गति, पितृलोक, प्रेतभाव, पुनर्जन्म और सूक्ष्म अस्तित्व के विषय में विस्तृत विचार मिलता है।
सनातन चिंतन के अनुसार प्रत्येक मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसके भीतर संस्कारों, इच्छाओं, स्मृतियों और कर्मों का एक सूक्ष्म संचय भी होता है। जब शरीर समाप्त होता है, तब भी यह सूक्ष्म संचय तुरंत समाप्त नहीं होता। सामान्यतः जीव अपने कर्मानुसार आगे की यात्रा पर अग्रसर हो जाता है, किन्तु कुछ अवस्थाएँ ऐसी मानी गई हैं जहाँ चेतना किसी कारणवश स्थिर या बंधित हो जाती है। यही स्थिति प्रेतभाव की मानी गई।
प्रेत शब्द का अर्थ केवल भयावह आत्मा नहीं है। संस्कृत में “प्रेत” का एक अर्थ है, “जो आगे चला गया”। किन्तु लोकमानस में यह शब्द उन सूक्ष्म अवस्थाओं के लिए अधिक प्रयोग हुआ है, जहाँ जीव अभी पूर्ण गति प्राप्त नहीं कर पाया हो। आगमिक परंपराएँ मानती हैं कि अत्यधिक आसक्ति, हिंसक मृत्यु, अकाल मृत्यु, अपूर्ण इच्छाएँ, तीव्र मोह या अत्यधिक मानसिक क्लेश किसी चेतना को कुछ समय तक स्थूल जगत के निकट रोके रख सकते हैं।
इसी आधार पर सनातन परंपरा में श्राद्ध, तर्पण और पितृकर्म का विकास हुआ। इन कर्मों का उद्देश्य केवल सामाजिक परंपरा निभाना नहीं था, बल्कि मृतात्मा के प्रति करुणा और उसकी आगे की गति के लिए शुभ संकल्प प्रकट करना था। यहाँ मृतकों को पकड़कर रखने की नहीं, उन्हें मुक्त करने की भावना प्रमुख थी। यही कारण है कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने “पितृऋण” की बात जरूर कही, पर साथ ही यह भी कहा कि मृत चेतना को बार-बार पृथ्वीगत भावों में बांधना उचित नहीं है ।
तंत्र और आगम इस विषय को और भी गहराई से देखते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि चेतना के अनेक स्तर हैं और मनुष्य का मन कभी-कभी उन सूक्ष्म तरंगों के संपर्क में आ सकता है। कुछ साधना-पद्धतियों में सूक्ष्म सत्ता, यक्ष, यक्षिणी, पिशाच अथवा प्रेतभाव से संबंधित उल्लेख मिलते हैं, किन्तु इन्हें सामान्य धार्मिक अभ्यास नहीं माना गया। यह क्षेत्र अत्यंत नियंत्रित, अनुशासित और गुरु-आश्रित माना गया। कारण यह था कि सूक्ष्म जगत उतना सरल नहीं जितना लोककथाएँ उसे बना देती हैं।
आगमिक दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म जगत में केवल एक प्रकार की चेतना नहीं होती। वहाँ विभिन्न स्तरों की ऊर्जाएँ, संस्कार और चेतन प्रवाह सक्रिय हो सकते हैं। कुछ सहायक, कुछ तटस्थ और कुछ भ्रमकारी। इसलिए तंत्र में बार-बार कहा गया कि सूक्ष्म अनुभवों को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं। साधक का अपना मन, उसका भय, उसकी इच्छाएँ और उसका अवचेतन भी सूक्ष्म अनुभूतियों का निर्माण कर सकता है। यही कारण है कि तांत्रिक परंपराएँ “विवेक” को “सिद्धि” से अधिक महत्व देती हैं।
वास्तव में सूक्ष्म जगत का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वह केवल बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। मनुष्य का अवचेतन स्वयं एक विशाल सूक्ष्म संसार है। स्मृतियाँ, दबी हुई इच्छाएँ, भय, संस्कार और भावनात्मक ऊर्जा अनेक बार ऐसे अनुभव उत्पन्न करती हैं जिन्हें व्यक्ति बाहरी सत्ता का प्रभाव समझ बैठता है। इसीलिए मनोविज्ञान में (जिसे योग और तंत्र ने हजारों वर्षों पूर्व समझा) बार-बार उल्लेख आता है कि जब तक मनुष्य अपने ही मन को नहीं समझता, तब तक सूक्ष्म जगत की कोई भी अनुभूति भ्रम और सत्य के मिश्रण से अलग नहीं की जा सकती।
सनातन साधना का उच्च उद्देश्य कभी भी केवल अदृश्य शक्तियों का अनुभव करना नहीं रहा है। ऋषियों ने चेतना को प्रेतभाव से ऊपर उठाकर देवभाव, ऋषिभाव और अंततः ब्रह्मभाव तक ले जाने की बात की है। तंत्र का वास्तविक लक्ष्य भी निम्न सूक्ष्म स्तरों में उलझना नहीं, बल्कि शक्ति के माध्यम से शिव-चेतना तक पहुँचना है। इसीलिए उच्च साधना परंपराओं में भी यह कहा गया है कि जो साधक सूक्ष्म चमत्कारों में ही अटक जाता है, वह अंतिम सत्य से दूर रह जाता है।
प्रामाणिक सनातन दृष्टि हमें भय नहीं, संतुलन सिखाती है। वह सूक्ष्म जगत के अस्तित्व को पूर्णतः नकारती भी नहीं है और न ही अंधविश्वासपूर्ण आकर्षण को स्वीकारती ही है। वह कहती है कि चेतना का संसार अत्यंत व्यापक है, किन्तु उसकी यात्रा का उद्देश्य निम्न सूक्ष्म बंधनों में उलझना नहीं, बल्कि उनसे ऊपर उठना है।
सनातन दर्शन मृत्यु के विषय में भी एक गहरी शांति की बात करता है। यहाँ स्थापना है कि जो चला जाता है वह पूर्णतः नष्ट नहीं होता है, केवल यात्रा के अगले चरण में प्रवेश कर जाता है। मृतात्मा के प्रति सर्वोच्च करुणा यही है कि उसके लिए प्रकाश, शांति और मुक्त गति की कामना की जाए। सनातन परंपरा का अंतिम संदेश भय नहीं, मुक्ति है; बंधन नहीं, चेतना का विस्तार है।
4 months ago | [YT] | 6
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
🌿 चिरचिटा (अपामार्ग) - बुद्धि, वाणी और व्यापार वृद्धि का प्राकृतिक उपाय 🌿
🙏 नमस्ते दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसे अद्भुत पौधे के बारे में बताने जा रहा हूँ जो हमारे आसपास ही पाया जाता है, लेकिन इसके गुणों से बहुत कम लोग वाकिफ हैं। यह है चिरचिटा, जिसे अपामार्ग भी कहते हैं। यह कोई साधारण पौधा नहीं है, यह प्रकृति का एक अनमोल उपहार है जो आपकी बुद्धि, वाणी और व्यापार में अद्भुत वृद्धि कर सकता है। यह उपाय रवि पुष्य योग में करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
🌱 क्या है चिरचिटा (अपामार्ग)?
चिरचिटा एक औषधीय पौधा है जो आमतौर पर खाली जगहों पर, सड़कों के किनारे या बंजर जमीन पर उगता है। इसे संस्कृत में अपामार्ग कहते हैं। आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व है। इसकी पत्तियां, बीज और जड़ सभी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। आज हम बात करेंगे इसकी जड़ के बारे में। इसकी जड़ में वह शक्ति है जो आपको बुद्धि प्रदान कर सकती है, आपकी वाणी को तेज कर सकती है और आपके व्यापार में वृद्धि कर सकती है।
💎 बुद्ध के रत्न पन्ना का विकल्प
आपने पन्ना रत्न के बारे में सुना होगा जो बुद्धि और ज्ञान के लिए जाना जाता है। लेकिन चिरचिटा की जड़ उसका एक प्राकृतिक विकल्प है। यह उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो रत्न नहीं पहन सकते या नहीं पहनना चाहते। चिरचिटा की जड़ को सही विधि से लाने और उपयोग करने पर यह आपके लिए पन्ना रत्न से कम नहीं है। यह आपकी बुद्धि को तेज करती है, आपकी वाणी में प्रभाव लाती है और आपके व्यापार में वृद्धि करती है। इस उपाय को रवि पुष्य योग में करने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
🪷 चिरचिटा की जड़ लाने की विधि (रवि पुष्य योग के लिए)
चिरचिटा की जड़ को लाने की अपनी एक विधि है। इसे बिना विधि के नहीं लाना चाहिए। अगर आपको कहीं चिरचिटा का पेड़ दिख जाए, तो इसे लाने के लिए यह करें -
पहला दिन - न्योता देना
जहां चिरचिटा का पेड़ है, वहां जाएं। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर जाएं। पेड़ के पास जाकर उसे प्रणाम करें। अब वहां एक दीपक जलाएं। थोड़े से चावल और थोड़ी सी मिठाई पेड़ के पास रखें। गुड़ का भोग लगाएं। अब हाथ जोड़कर प्रार्थना करें - "हे दिव्य पेड़! मैं कल आपको लेने आऊंगा। आपकी जड़ को मैं अपने पास रखूंगा। कृपया मुझे बुद्धि प्रदान करें, मेरी वाणी को तेज करें और मेरे व्यापार में वृद्धि करें।" यह प्रार्थना करने के बाद वहां से लौट जाएं। यह न्योता देने की विधि है।
अगले दिन (रवि पुष्य योग के दिन) - जड़ लाना
रवि पुष्य योग के दिन सुबह जल्दी उठें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। अब अकेले उस पेड़ के पास जाएं। जाते समय किसी से बात न करें। चुपचाप जाएं। पेड़ के पास पहुंचकर उसे प्रणाम करें और फिर उसकी जड़ को उखाड़ लें। जड़ निकालते समय ध्यान रखें कि जड़ को नुकसान न पहुंचे। पूरी जड़ सही-सलामत निकाले। जड़ निकालने के बाद वापस लौटते समय पीछे मुड़कर न देखें। चाहे कोई आवाज आए, चाहे कुछ भी हो, पीछे मत देखें। सीधे घर लौट आएं।
🏠 घर लाकर क्या करें
जड़ घर लाने के बाद उसकी पूजा करें -
स्नान कराएं - सबसे पहले जड़ को स्नान कराएं। पहले साफ पानी से, फिर दूध से, फिर गुड़ के पानी से, फिर शहद से। इस तरह जड़ को पवित्र करें।
पूजा करें - अब जड़ को किसी साफ स्थान पर रखें। उसके सामने दीपक जलाएं। उस पर अक्षत (चावल) चढ़ाएं। उस पर टीका लगाएं। धूप दिखाएं। फूल चढ़ाएं।
प्रार्थना करें - अब हाथ जोड़कर प्रार्थना करें - "हे चिरचिटा देव! मुझे बुद्धि प्रदान करो। मेरी वाणी में तेज लाओ। मेरे व्यापार में वृद्धि करो। मैं आपको अपने पास रखूंगा और नियमित रूप से पूजा करूंगा।"
💪 जड़ को धारण करने की विधि
पूजा के बाद जड़ के थोड़े बड़े टुकड़े कर लें। बहुत छोटा न पीसें, थोड़ा बड़ा रखें ताकि उसकी ऊर्जा बनी रहे। इन टुकड़ों को आप दो तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं -
बाहों में धारण करना - जड़ के टुकड़ों को लाल कपड़े में लपेटकर बांध लें। पुरुष दाएं हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में धारण करें। इसे बाजू में बांध सकते हैं या फिर हाथ में कपड़े से लपेटकर रख सकते हैं। यह आपकी बुद्धि और व्यापार में वृद्धि करेगा।
दातुन के रूप में उपयोग - जड़ के एक टुकड़े को रोज सुबह दातुन की तरह उपयोग करें। इससे दांतों की पूजा तो होगी ही, सबसे बड़ी बात यह है कि आपकी वाणी बहुत तेजी से प्रभावशाली होगी। जो व्यक्ति इस जड़ से दातुन करता है, उसकी बातों में असर आता है। लोग उसकी बात मानने लगते हैं। उसकी वाणी में एक अलग ही तेज और शक्ति आ जाती है।
🌟 चिरचिटा की जड़ के फायदे
✅ बुद्धि में वृद्धि - इससे बुद्धि तेज होती है। पढ़ाई में मन लगता है। विद्यार्थियों के लिए बहुत लाभकारी है।
✅ वाणी में तेज - रोज दातुन करने से वाणी में अद्भुत प्रभाव आता है। बोली हुई बात का असर होता है।
✅ व्यापार में वृद्धि - व्यापारियों के लिए यह बहुत लाभकारी है। व्यापार बढ़ता है, ग्राहक आते हैं, मुनाफा होता है।
✅ आत्मविश्वास में वृद्धि - इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। मन में सकारात्मकता आती है।
✅ निर्णय क्षमता में सुधार - सही-गलत का फैसला करने की क्षमता बढ़ती है।
✅ नेतृत्व क्षमता में वृद्धि - लोग आपकी बात मानने लगते हैं, आपके पीछे चलने लगते हैं।
🌿 ध्यान रखने योग्य बातें
✅ जड़ को हमेशा साफ और सुरक्षित रखें।
✅ नियमित रूप से उसकी पूजा करें, कम से कम दीपक तो जलाएं।
✅ जड़ को कभी गिराएं नहीं, सम्मान से रखें।
✅ किसी और को यह जड़ न दें। यह आपके लिए है।
✅ अगर जड़ टूट-फूट जाए, तो उसे बहते पानी में प्रवाहित कर दें।
दोस्तों, चिरचिटा (अपामार्ग) के अलावा और भी कई बांदे होते हैं जिनके अपने-अपने अद्भुत उपयोग हैं। हर बांदे की अपनी अलग खासियत होती है, अपने अलग गुण होते हैं।
दोस्तों, चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ प्रकृति का अनमोल उपहार है। यह आपकी बुद्धि, वाणी और व्यापार में वृद्धि कर सकती है। बस जरूरत है सही विधि से लाने और सच्चे मन से उपयोग करने की। अगर आपके आसपास कहीं चिरचिटा का पेड़ दिखे, तो इसका उपयोग जरूर करें। यह आपके जीवन को बदल सकता है.
7 months ago | [YT] | 13
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
सभी देवताओं और देवियों की गायत्री होती है इसके जाप से अद्भुत अनुभव और कृपा मिलती है ।
7 months ago | [YT] | 13
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आचार्य विपिन मंत्र विज्ञान
व्यापार वृद्धि प्रयोग
धां धीं धूं धूर्जटे पत्नीं वां वीं वुं वागधीश्वरी
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देव्ये शां शीं शुं में शुभम कुरु ॥
विधी :-
उपरोक्त मन्त्र सिद्ध #कुंजिका स्तोत्र में से हैं । कुछ शुद्ध गुलाब में से बनी अगरबत्ती लेकर उपरोक्त मन्त्र 108 बार जप
कर अगरबत्ती अभिमंत्रित कर लीजिए । उसके बाद उन अगरबत्ती में से 5 अगरबत्ती लेकर प्रज्वलित करे ।
उसके बाद अपने पुरे व्यवसाय स्थल में एंटी क्लोक वाइस (घडी की उलटी दिशा में) घुमाले और एक जगह लगादे और फिर देखे आपका व्यापार कैसे नहीं चलता ।
यह प्रयोग पूर्ण प्रामाणिक एवं कई बार परिक्षीत हैं ।
8 months ago | [YT] | 20
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