"घमंड न करना कभी जिंदगी में, तकदीर बदलती रहती है, आईना वही रहता है, तस्वीर बदलती रहती है।"


PK7000

‪@PK7000‬

🙏"जिंदगी कुछ और नहीं तेरी मेरी कहानी है 🙏------------------
यह नहीं, वो नहीं, पास नहीं, दूर नहीं। कई नौकरियां बदलने के बाद एक स्थिरता वाली नौकरी मिलती है। पहली तनख्वाह का चेक जैसे ही हाथ में आता है,

उसे बैंक में जमा करवा दिया जाता है और फिर शून्यों का खेल शुरू हो जाता है। कुछ और साल बीत जाते हैं, और बैंक में शून्य बढ़ने लगते हैं।

25 की उम्र में शादी हो जाती है और जीवन की एक नई शुरुआत होती है। शुरुआती साल गुलाबी सपनों से भरे होते हैं—हाथों में हाथ डालकर चलना, सपनों की दुनिया में खो जाना। फिर बच्चे की आहट होती है और पालना झूलने लगता है। अब पूरा ध्यान बच्चे की देखभाल पर केंद्रित हो जाता है—उठाना, खिलाना, सुलाना। समय का पता ही नहीं चलता।

इसी बीच, हाथ छूट जाते हैं, बातें और घूमना बंद हो जाता है। वह बच्चे में व्यस्त हो जाती है, और मैं काम में। घर, गाड़ी की किस्तें, बच्चे की शिक्षा, भविष्य की चिंता, और बैंक में शून्य बढ़ने का चक्र चलने लगता है।

35 की उम्र में, सब कुछ होते हुए भी मन में एक खालीपन महसूस होता है। चिड़चिड़ाहट बढ़ती है, और मैं खुद में खोया रहने लगता हूँ। बच्चा बड़ा होता जाता है, और कब 10वीं की परीक्षा आकर चली जाती है, पता ही नहीं चलता।

40 की उम्र तक आते-आते बैंक में शून्य बढ़ते रहते हैं। एक दिन, पुरानी यादों में खोकर मैंने कहा, आओ, पास बैठो, कहीं घूमने चलते हैं। उसने मुझे अजीब नजरों से देखा और कहा,

अब इस उम्र में बातें सूझ रही हैं, यहाँ कितना काम पड़ा है।" फिर वह अपने पल्लू को खोंसकर चली गई।

45 की उम्र में चश्मा चढ़ जाता है, बाल सफेद होने लगते हैं और जिंदगी उलझनों में घिर जाती है। बेटा कॉलेज में चला जाता है और बैंक में शून्य बढ़ते रहते हैं।

50 की उम्र आते-आते, बाहर निकलने के प्लान बंद हो जाते हैं। दवाइयों का समय तय हो जाता है। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं।

एक दिन, बेटे ने फोन पर बताया कि उसने विदेश में शादी कर ली है और अब वहीं रहेगा। उसने सलाह दी कि बैंक के शून्यों को वृद्धाश्रम में खर्च कर देना।

मैंने सोफे पर बैठकर ठंडी हवा का आनंद लिया, जबकि वह पूजा में व्यस्त थी। मैंने कहा, चलो, आज फिर हाथ में हाथ डालकर बातें करते हैं। उसने जवाब दिया,

अभी आई।" मेरे चेहरे पर खुशी की झलक आई, आंखें भर आईं। लेकिन फिर अचानक आंखों की चमक फीकी पड़ गई, और मैं हमेशा के लिए शांत हो गया।

उसने पूजा खत्म की और मेरे पास आई। क्या कह रहे थे?उसने पूछा, लेकिन मैं कुछ नहीं बोल पाया। उसने मेरे शरीर को छूकर देखा—मैं ठंडा पड़ चुका था। उसने एक क्षण के लिए शून्य में देखा, फिर उठकर पूजा घर में एक अगरबत्ती जलाई,

और वापस सोफे पर आकर बैठ गई। मेरा ठंडा हाथ पकड़े हुए बोली, चलो, कहां घूमने चलना है तुम्हें? क्या बातें करनी हैं?उसकी आँखों में आँसू भर आए। वह मुझे निहारती रही, आँसुओं की धारा बहती रही।

मेरे सिर का भार उसके कंधे पर गिर गया। ठंडी हवा अब भी चल रही थी। क्या यही जीवन है?

❤️सीख ❤️
इस कहानी से हमें यह समझना चाहिए कि जीवन की असली ख़ुशी धन-दौलत में नहीं, बल्कि प्यार, समझदारी और साथ बिताए गए पलों में होती है।

23 hours ago | [YT] | 1

PK7000

‪@PK7000‬

किसी ने खूब कहा है—
ज़मीर ज़िंदा रख, कबीर ज़िंदा रख,
सुल्तान भी बन जाएँ तो दिल में फ़क़ीर ज़िंदा रख।
हौसलों के तरकश में उम्मीद के तीर ज़िंदा रख,
ज़िंदगी में हार जाएँ सब कुछ, फिर भी जीतने की उम्मीद ज़िंदा रख।
बहना है तो बेशक बह जा,
मगर सागर से मिलने की चाह ज़िंदा रख।
मिटना हो तो आज मिट जा तू,
लेकिन मिटने के बाद भी इंसानियत ज़िंदा रख।
वक्त चाहे जितना बदल जाए,
अपने भीतर का इंसान ज़िंदा रख।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

1 day ago | [YT] | 2

PK7000

किसी ने खूब कहा है—
ज़मीर ज़िंदा रख, कबीर ज़िंदा रख,
सुल्तान भी बन जाएँ तो दिल में फ़क़ीर ज़िंदा रख।
हौसलों के तरकश में उम्मीद के तीर ज़िंदा रख,
ज़िंदगी में हार जाएँ सब कुछ, फिर भी जीतने की उम्मीद ज़िंदा रख।
बहना है तो बेशक बह जा,
मगर सागर से मिलने की चाह ज़िंदा रख।
मिटना हो तो आज मिट जा तू,
लेकिन मिटने के बाद भी इंसानियत ज़िंदा रख।
वक्त चाहे जितना बदल जाए,
अपने भीतर का इंसान ज़िंदा रख।

1 day ago | [YT] | 0

PK7000

नेपाल
‪@PK7000‬

5 days ago | [YT] | 0

PK7000

#PramodKumarSahani
‪@PK7000‬

प्रमोद कुमार सहनी जी: --हाजीपुर (वैशाली), बिहार के सामाजिक व साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में विशिष्ट योगदान
वैशाली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हमेशा से सामाजिक चेतना, ज्ञान और साहित्य की उर्वर भूमि रही है। इसी पावन धरा—हाजीपुर (वैशाली), बिहार—से संबंध रखने वाले प्रमोद कुमार सहनी जी एक ऐसे समर्पित व्यक्तित्व के रूप में पहचान रखते हैं, जिनका जीवन समाज, शिक्षा और साहित्य के समन्वय का सुंदर उदाहरण है।
1. सामाजिक सरोकार और जमीनी नेतृत्व
प्रमोद कुमार सहनी जी का जुड़ाव समाज के हर वर्ग से गहराई से रहा है। हाजीपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में सामाजिक चेतना जगाने में उनकी भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है:
* नागरिक व मतदाता जागरूकता अभियान: - लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए वे जन-जागरूकता रैलियों और कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाते रहे हैं, जिससे ग्रामीण व युवा वर्ग अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो सके।
* युवा मार्गदर्शन व स्काउट-गाइड गतिविधियाँ: -- वैशाली क्षेत्र में युवाओं और विद्यार्थियों में अनुशासन, सेवा-भाव और पर्यावरण संरक्षण (जैसे प्लास्टिक-मुक्त अभियान और कपड़े के थैलों का उपयोग) के प्रति अलख जगाने में वे निरंतर प्रयासरत रहे हैं।
* सामाजिक समरसता: -- समाज के वंचित और सामान्य वर्ग की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए एक सेतु का कार्य करना उनके स्वभाव का मुख्य अंग है।
2. साहित्यिक दृष्टि और वैचारिक अभिव्यक्ति---
साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और दिशा-निर्देशक होता है। प्रमोद कुमार सहनी जी का साहित्यिक दृष्टिकोण इसी विचार पर आधारित है:--
* सरल और मर्मस्पर्शी भाषा: --- उनकी रचनाओं और विचारों में आडंबर के स्थान पर सहजता, सच्चाई और जन-जीवन का यथार्थ झलकता है।
* सकारात्मक बदलाव की प्रेरणा:-- वे अपनी लेखनी और कविताओं के माध्यम से समाज में आशा, संघर्ष करने की शक्ति और नैतिक मूल्यों का संदेश देते हैं।
* संस्कृति और लोक-चेतना का संरक्षण:-- बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक-जीवन और मानवीय संवेदनाओं को वे अपने शब्दों में संजोकर नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं।
3. व्यक्तित्व एवं जीवन मूल्य
* सादगी और विनम्रता:-- उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका सौम्य व्यवहार और सादा जीवन है। बड़े मंचों के दिखावे से दूर, वे ज़मीन से जुड़कर कार्य करने में विश्वास रखते हैं।
* प्रेरक दृष्टि:-- अपने मित्रों, सहकर्मियों और युवाओं के लिए वे सदैव एक मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत की भूमिका निभाते हैं।
निष्कर्ष:----
हाजीपुर (वैशाली) की माटी से जुड़े प्रमोद कुमार सहनी जी का जीवन यह दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति समाज सेवा और साहित्य को एक साथ आत्मसात करता है, तो वह समाज के लिए एक प्रेरणापुंज बन जाता है। उनका यह साहित्यिक व सामाजिक सफर निरंतर नई ऊंचाइयों को छुए और आने वाली पीढ़ी को प्रेरित करता रहे, यही उनके कार्यों का वास्तविक संदेश है।

6 days ago | [YT] | 1

PK7000

‪@PK7000‬

#PramodKumarSahani

सेवा, संवेदना और संकल्प: कोविड-19 काल में प्रमोद कुमार सहनी जी का अप्रतिम योगदान----
संकट के क्षण ही मनुष्य के वास्तविक चरित्र, संवेदना और नेतृत्व की परीक्षा लेते हैं। जब पूरी दुनिया और हमारा देश कोविड-19 वैश्विक महामारी के अभूतपूर्व संकट, भय और अनिश्चितता से जूझ रहा था, उस दौर में हाजीपुर (वैशाली), बिहार की पावन भूमि पर प्रमोद कुमार सहनी जी ने जनसेवा की जो मिसाल पेश की, वह आज भी जनमानस के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
संकटकाल में अडिग समर्पण: 'सेवा परमो धर्मः'
लॉकडाउन के कठिन समय में, जब लोग घरों में कैद होने को मजबूर थे और रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करना आम आदमी के लिए चुनौती बन गया था, प्रमोद कुमार सहनी जी ने भय और संकोच को पीछे छोड़ते हुए ज़मीनी स्तर पर राहत कार्यों का बीड़ा उठाया। उनका यह प्रयास केवल औपचारिक मदद नहीं, बल्कि हर ज़रूरतमंद तक संबल पहुँचाने का जीवंत प्रयास था।
* राशन व आवश्यक सामग्रियों का वितरण: दिहाड़ी मज़दूरों, असहाय परिवारों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के वंचित वर्गों तक सूखा राशन, भोजन के पैकेट और आवश्यक दैनिक सामग्री पहुँचाने में उन्होंने दिन-रात एक किया।
* स्वास्थ्य सुरक्षा व जागरूकता अभियान: संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए मास्क, सैनिटाइज़र और साबुन का व्यापक वितरण करने के साथ-साथ उन्होंने ग्रामीण स्तर पर स्वच्छता और सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर निरंतर जन-जागरूकता फैलाई।
* भय और भ्रांतियों का निवारण: महामारी के शुरुआती दौर में वैक्सीन और बीमारी को लेकर समाज में फैली अफ़वाहों को दूर करने तथा लोगों में वैज्ञानिक सोच व आत्मविश्वास जगाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
साहित्यिक चेतना और मानवीय संवेदना का संगम
प्रमोद कुमार सहनी जी केवल एक समाजसेवी के रूप में ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में भी समाज के साथ खड़े रहे। आपदा के उस दौर में जहाँ शारीरिक सहायता आवश्यक थी, वहीं मानसिक और आत्मिक संबल भी उतना ही ज़रूरी था:
* उन्होंने अपनी लेखनी और विचारों के माध्यम से लोगों में उम्मीद, धैर्य और एकजुटता की भावना का संचार किया।
* उनकी कविताओं और संदेशों ने महामारी से उपजी निराशा के अंधकार में उम्मीद की किरण जगाने का कार्य किया।
ज़मीनी नायक की पहचान
कोविड-19 के दौरान किया गया उनका निस्वार्थ कार्य यह सिद्ध करता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो विपरीत परिस्थितियों में बिना किसी प्रचार की लालसा के समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़ा हो। वैशाली जिले में उनके इस निस्वार्थ सेवाभाव ने न केवल सैकड़ों परिवारों को उस भयानक संकट से उबारा, बल्कि समाज में मानवीय मूल्यों और नागरिक कर्तव्य की एक नई परिभाषा गढ़ी।
प्रमोद कुमार सहनी जी का यह अद्वितीय योगदान हाजीपुर और पूरे वैशाली क्षेत्र के सामाजिक इतिहास में हमेशा श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाएगा।

6 days ago | [YT] | 2