BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

ब्रह्मणि योगः समाधिः ब्रह्मयोगः
Hariom
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति । ऋ. 1.164.46
Ekam Sad Vipra Bahudha Vadanti

एक ही सत्य को विद्वान अलग अलग रूपों में व्यक्त करते हैं।
Scholars express the same truth in different forms.

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BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

ये दोनों श्लोक भी 108 गीता श्लोक माला में रखने के लिए उपयुक्त है। इनका अर्थ बहुत सुंदर और अटल सत्य को दर्शाने वाला है। मृत्य अटल है ,जिसका जन्म है उसकी मृत्यु निश्चित है।ये बात सब जानते है लेकिन भूल जाते है ,मृत्यु निश्चित है यदि ये खयाल मन में बन रहे तो शायद व्यक्ति और सुंदर जीवन जी पाए।व्यर्थ के झगड़े में न उलझे, जीवन का लक्ष्य पहचाने ।परीक्षित जी को पता चल गया कि सात दिन में मृत्यु निश्चित है तो उन्होंने जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाला उपाय किया और परम विरक्त गुरु शुकदेव जी के चरणों में बैठकर बिना कुछ खाए पिए भागवत महापुराण अमृत पान किया और केवल सात दिन में ही मोक्ष पा लिया। सोचो क्या awareness रही होगी कि श्रीमद् भागवत महापुराण के 18000 श्लोक केवल सात दिन में सुन लिए। आजकल के बड़े से बड़े भागवत कथाकार केवल 500 श्लोक ही सात दिन में बोल पाते है वो भी कोई कोई वक्ता।बाकी सब कथाकार तो 100 श्लोक में ही सिमट जाते है। लेकिन जिसको अपनी मृत्यु की निश्चितता और मनुष्य जन्म को दुर्लभता ठीक से पक्की हो गई वो ही 18000 श्लोक सुन सकता है वो भी केवल सात दिन में,बिना कुछ खाए पिए।

आज के श्लोक गीता में वही अटल मृत्यु सत्य को अर्जुन को समझा रहे है और अर्जुन के बहाने हम सबको भी।काव्य भाव भी आप लोगो के सात्विक सुख , आनंद के लिए दे रहे है।

जो जन्मा है, उसका अंत सुनिश्चित,
जो अंत को पहुँचा, जन्म भी पुनः निश्चित।
अटल विधान से बँधा है यह संसार,
फिर क्यों व्याकुल हो, क्यों इतना विकार?
जो टल नहीं सकता, जो शाश्वत सत्य,
उस पर अश्रु बहाना कैसा अनर्थ्य?
धैर्य धरो, हे मानव, समझो यह बात,
कर्तव्य-पथ ही है जीवन का सार्थक पाथ।
अव्यक्त थे हम प्रारंभ के पहले,
मध्य में आए—दिखे, हँसे, खेले।
फिर अव्यक्त में लीन हो जाना है,
यही तो प्रकृति का विधान पुराना है।
क्षण भर की इस प्रकट कहानी पर,
क्यों शोक, क्यों करुण-आर्तनाद व्यर्थतर?
जो आया, वह जाएगा—यह जान लो,
विवेक का दीप जलाओ, और शोक त्याग दो।

13 hours ago | [YT] | 3

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

108 श्लोक की माला के लिए 22वा श्लोक भी अति उत्तम जान पड़ता है। ये उस सत्य को कहता हैं जो कभी टाला नहीं जा सकता। जीवात्मा जब तक स्वयं को जीवात्मा समझता है तब तक शरीर वस्त्रों की तरह बदलते रहेंगे। कभी गाय शरीर में रहे कभी बैल कभी ऋषि कभी जाने क्या क्या?? जब तक गुरुज्ञान से स्वयं को अजन्मा नहीं जाना तब तक तो सूक्ष्म शरीर अनेकों स्थूल शरीरों की यात्रा करता ही है। हरियाणा के एक रागनी गायक(लोक गीत) हुए लक्ष्मीचंद,हरियाणा के लोग उनको दादा लखमी कहते थे। दादा इसलिए क्योंकि हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण को दादा बोल देते है। उन्होंने अपनी एक रागनी लिखी, बोल बड़े वैराग्य से भरे हुए है।

*लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए* ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

*बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं* -
बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही।
बहुत सी संतान पैदा की, पर गए उनकी मर्याद नहीं -
बहुत पिताओं से पैदा हुए, पर उनका घर भी याद नहीं॥1॥

शुभ-अशुभ कर्म करे जग में, स्वर्ग-नरक कई बार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

कहीं लिपटे रहे जेर में अपने कर्म करीने से -
कहीं अंडों में बंद रहे कहीं पैदा हुए पसीने से।
कहीं डूबे रहे जल में, कहीं उम्र कटी जल पीने से -
फिर भी कर्म हाथ नहीं आया, मौत भली इस जीने से॥2॥

कभी आर और कभी पार, डूब फिर से मंझधार गए।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए॥

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझा रहे है तू अपने सर पर बेकार का बोझ मत ले तू आत्मा को नाश रहित समझ फिर मारने और मरने वाली बात ही नहीं बचेगी।समझ समझ समझ

जो जाने आत्मा नित्य अमर,
न जन्मे, न मरे, न हो क्षर।
कैसे वह हिंसा कर पाए,
किसे मारे, किसे मरवाए॥
जैसे तन पर पुराने चीर,
त्याग नये धारण करे शरीर।
वैसे ही देही तन त्यागे,
नव देह में फिर जा लागे॥
नाश शरीर का सत्य यही,
आत्मा अचल, अविनाशी सही।
मोह त्याग कर धर्म पथ चल,
यही गीता का अमृत फल॥



बस यही चक्र चलता रहता है लेकिन गुरु जिसके जीवन में आ गए और वो भी ब्रह्मज्ञानी तो बस अब उसका चक्र टूट जाएगा।

3 days ago | [YT] | 6

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

Sanjaya spoke—
Drowned in compassion, eyes filled with tears,
Shaken by sorrow, restrained by fears.
A heart torn by conflict, a mind weighed down,
Arjuna stood still, his resolve unbound.
At that very moment spoke Madhusudana,
Words turned to medicine, voice a sacred mantra.
The Blessed Lord said—
O Partha! What delusion has seized you so,
In this hour where courage alone must glow?
This is not the path that heroes tread,
It grants no heaven, no honor ahead.
Far from noble duty, this weakness stands,
Bearing only disgrace in mortal lands.
Rise! Know the warrior you truly are,
Cast away pity that dims your star.
Let duty in battle be your living God—
Know this alone as life’s final truth, unawed

1 week ago | [YT] | 5

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

संजय बोले—
करुणा में डूबा, नेत्रों में नीर,
शोक से कंपित, विवश, गम्भीर।
हृदय में द्वंद्व, मन में भार,
अर्जुन खड़ा था, टूटे विचार।
उसी क्षण बोले मधुसूदन,
वाणी बनी औषधि, शब्द बने स्पंदन।

श्रीभगवान बोले—
हे पार्थ! यह कैसा मोह तुम्हें
विषम घड़ी में आ घेर गया?
न यह वीरों की राह है,
न इससे स्वर्ग, न यश मिला।
आर्य-धर्म से दूर यह भाव,
केवल लाता है लज्जा, अपयश, अभाव।
उठो! स्वयं को पहचानो,
क्षणिक करुणा को त्यागो।
रण में कर्तव्य ही देव बने,
वही जीवन का अंतिम सत्य जानो॥

1 week ago | [YT] | 4

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

आप प्रतिदिन इन दो श्लोकों के लिए सिर्फ 5 मिनट निकालकर ध्यान से सामान्य हिंदी अर्थ या जो काव्य रूप हम से रहे वो देखिए। आपको सच में प्रतिदिन अर्जुन का विलाप देखकर समझ में आ जाएगा कि वास्तव में अर्जुन विषाद में है भयानक डिप्रैशन में है।लगातार दूसरे अध्याय के दसवें श्लोक तक ऐसे ही अनेकों तरीके से रोएगा और अपने मन के सारे भाव प्रकट करेगा। वैसे भी अपने हृदय के सारे भाव अपने सच्चे हितैषी के सामने ही प्रकट करने चाहिए वरना लोग सुन तो लेंगे लेकिन बाद हंसी उड़ाएंगे और उपाय भी नहीं बताएंगे। अर्जुन भगवान श्री कृष्ण में सखा बुद्धि रखता है इसलिए अपने दिल की बात कहे जा रहा है।देखो आज क्या कह रहा है?


*हे जनार्दन! सुना है शास्त्रों में यह* कठोर विधान,कुल-धर्म ध्वस्त हो जाए तो नरके वास करे इंसान।
मर्यादा टूटे, रीत जले, बिखरें जीवन-संस्कार,पीढ़ी-पीढ़ी तक ढोए मनुज पापों का अंधकार।
अहो! किस घोर पातक को करने को हम आतुर हैं,राज्य-सुख के तुच्छ लोभ में स्वजन-वध को व्याकुल हैं।
जिन्हें कभी प्राणों से बढ़कर स्नेह दिया था हमने,उन्हीं के रक्त से सिंहासन रंगने चले हैं हम ही।
इस श्लोकमें अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि अपने सद्विचारोंका, अपनी जानकारी का आदर करने से ही शास्त्र, गुरुजन आदि की आज्ञा मानी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य अपने सद्विचारोंका निरादर करता है, वह शास्त्रोंकी, गुरुजनों की और सिद्धान्तों की अच्छी-अच्छी बातोंको सुनकर भी उन्हें धारण नहीं कर सकता। अपने सद्विचारोंका बार-बार निरादर, तिरस्कार करनेसे सद्विचारोंकी सृष्टि बंद हो जाती है। फिर मनुष्यको दुर्गुण-दुराचार से रोकनेवाला है ही कौन? ऐसे ही हम भी अपनी जानकारीका आदर नहीं करेंगे, तो फिर हमें अनर्थ-परम्परासे कौन रोक सकता है? अर्थात् कोई नहीं रोक सकता।यहाँ अर्जुनकी दृष्टि युद्धरूपी क्रियाकी तरफ है। वे युद्धरूपी क्रियाको दोषी मानकर उससे हटना चाहते हैं; परन्तु वास्तवमें दोष क्या है--इस तरफ अर्जुनकी दृष्टि नहीं है। युद्धमें कौटुम्बिक मोह, स्वार्थभाव, कामना ही दोष है, पर इधर दृष्टि न जानेके कारण अर्जुन यहाँ आश्चर्य और खेद प्रकट कर रहे हैं, जो कि वास्तवमें किसी भी विचारशील, धर्मात्मा, शूरवीर क्षत्रियके लिये उचित नहीं है।अर्जुनने पहले अड़तीसवें श्लोकमें दुर्योधनादिके युद्धमें प्रवृत्त होनेमें, कुलक्षयके दोषमें और मित्रद्रोहके पापमें लोभको कारण बताया; और यहाँ भी अपनेको राज्य और सुखके लोभके कारण महान् पाप करनेको उद्यत बता रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन पापके होनेमें 'लोभ' को हेतु मानते हैं। फिर भी आगे तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें अर्जुनने 'मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्यों कर बैठता है'--ऐसा प्रश्न क्यों किया? इसका समाधान है कि यहाँ तो कौटुम्बिक मोहके कारण अर्जुन युद्धसे निवृत्त होनेको धर्म और युद्धमें प्रवृत्त होनेको अधर्म मान रहे हैं अर्थात् उनकी शरीर आदिको लेकर केवल लौकिक दृष्टि है, इसलिये वे युद्धमें स्वजनोंको मारनेमें लोभको हेतु मान रहे हैं। परन्तु आगे गीताका उपदेश सुनते-सुनते उनमें अपने श्रेय--कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी (गीता 3। 2)। इसलिये वे कर्तव्यको छोड़कर न करनेयोग्य काममें प्रवृत्त होनेमें कौन कारण है--ऐसा पूछते हैं अर्थात् वहाँ (3। 36 में) अर्जुन कर्तव्यकी दृष्टिसे, साधककी दृष्टिसे पूछते हैं।

2 weeks ago | [YT] | 1

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

कुल-विनाश से उपजता है, वर्णों का विकृत जाल,
नरक-द्वार पर ले जाता है, कुलघाती का यह काल।
लुप्त हो जाते श्राद्ध-तर्पण, सूना पितरों का पथ,
पिण्ड-बूँद बिन तड़प रहे, पूर्वज शोकमय व्यथ।
इन दोषों से ढह जाते हैं, सनातन धर्म-विधान,
जाति-कुल की मर्यादा भी, खो देती पहचान।
जब टूटे कुल, बिखरे नियम, शेष न बचे आधार,
तब मानवता रोती है, धर्म पड़े लाचार।

From clan’s collapse is chaos born, a twisted web of creed,
A darkened gate to hell it forms—this age of murderous deed.
The rites fall silent, offerings fade, the fathers lose their way,
No drops of water, no sacred rice, their souls in grief decay.
By such transgressions ancient laws are shattered, torn apart,
The timeless codes of kin and caste fade from the human heart.
When families break and order dies, no pillar left to stand,
Then humanity weeps in ruin’s dust, and dharma lies unmanned

अब अर्जुन वर्णसंकर के दुष्परिणामों को बताता है। जातियों के वर्णसंकर होने से अन्तर्बाह्य जीवन में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है और फलत परिवारिक व धार्मिक परम्परायें नष्ट हो जाती हैं।हिन्दू धर्म के अनुसार मृत पितरों को पिण्ड और जल अर्पित किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि पितर यह देखना चाहते हैं कि उनके द्वारा अत्यन्त परिश्रम से विकसित की गई और अपने पुत्रों आदि को सौपी गई सांस्कृतिक शुद्धता को वे किस सीमा तक बनाये रखते हैं और उसकी सुरक्षा किस प्रकार करते हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा अथक परिश्रम से निर्मित उच्च संस्कृति को यदि हम नष्ट कर देते हैं तो वास्तव में हम उनका घोर अपमान करते हैं। यह कितनी आकर्षक और काव्यात्मक कल्पना है कि पितरगण अपने स्वर्ग के वातायन से देखते हैं कि उनके पुत्रादि अपनी संस्कृति की रक्षा करते हुये किस प्रकार का जीवन जीते हैं यदि वे यह देखेंगे क उनके द्वारा अत्यन्त श्रम से लगाये हुये उद्यानों को उनके स्वजनों ने उजाड़कर जंगल बना दिया है तो निश्चय ही उन्हें भूखप्यास के कष्ट के समान पीड़ा होगी। इस दृष्टि से अध्ययन करने पर यह श्लोक अत्यन्त उपयुक्त प्रतीत होता है। प्रत्येक पीढ़ी अपनी संस्कृति की आलोकित ज्योति भावी पीढ़ी के हाथों में सौंप देती है। नई पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह इसे सावधानीपूर्वक आलोकित अवस्था में ही अपने आगे आने वाली पीढ़ी को भी सौंपे। संस्कृति की रक्षा एवं विकास करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।ऋषि मुनियों द्वारा निर्मित भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है जिसकी सुरक्षा धार्मिक विधियों पर आश्रित होती है। इसलिये हिन्दुओं के लिए संस्कृति और धर्म एक ही वस्तु है। हमारे प्राचीन साहित्य में संस्कृति शब्द का स्वतन्त्र उल्लेख कम ही मिलता है। उसमें अधिकतर धार्मिक विधियों के अनुष्ठान पर ही बल दिया गया है।वास्तव में हिन्दू धर्म सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक संस्कृति संरक्षण की एक विशेष विधि है। धर्म का अर्थ है उन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना जिनके द्वारा हमारा शुद्ध आत्मस्वरूप स्पष्ट प्रकट हो। अत कुलधर्म का अर्थ परिवार के सदस्यों द्वारा मिलजुलकर अनुशासन और ज्ञान के साथ रहने के नियमों से है। परिवार में नियमपूर्वक रहने से देश के एक योग्य नागरिक के रूप में भी हम आर्य संस्कृति को जी सकते हैं।

2 weeks ago | [YT] | 2

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

अर्जुन का कहना कुछ अंश में ठीक ठहराया जा सकता है लेकिन भगवान कृष्ण की दृष्टि अर्जुन से अधिक व्यापक है और भविष्य को दूर तक देख प रही है।
युद्ध में इतने योद्धा मरेंगे तो उनकी पत्नियां अकेली रह जाएंगी और शायद फिर संतान के लिए वो कोई और जैसा तैसा वर कर लेंगी। फिर जो संतान होगी वो वर्णसंकर होगी ये अर्जुन की चिंता का विषय है ।इसलिए ही पीडयुक्त होकर कह रहा है।


*जब कुल की मर्यादा डोले* ,
मिट जाए धर्म अनूप।
धर्म-विहीन हुआ जब जीवन,
छा जाए अधर्म स्वरूप।
अधर्म बढ़े तो, हे माधव!
कुल की नारी व्याकुल होए।
नारी डगमग हो जाए जब,
वर्ण-संकर जग में बोए।
टूटे श्रद्धा, टूटे संयम,
मौन हो जाए धर्म-पुकार।
हे केशव! तुम ही संभालो,
कुल, संस्कृति, जीवन-सार।
तुम्हीं दीप हो, तुम ही ज्योति,
तुमसे धर्म की पहचान।
शरण तुम्हारी आए जो भी,
पाए जीवन का कल्याण।

अब इसपर अनेकों संतो के अनेकों विचार है। यदि अर्जुन का विचार वास्तव में धर्म संस्कृति बचाव के लिए हो तो बात अलग है लेकिन देखने से ऐसा लगता नहीं है। यहां तो अर्जुन के मन बुद्धि पर मोह ने कब्जा कर लिया है।
जिस प्रकार कोई कथावाचक हर बार पुरानी कथा सुनाते हुए कुछ नई बातें उसमें जोड़ता जाता है इसी प्रकार अर्जुन की सर्जक मोहयुक्त बुद्धि अपनी धारणा को पुष्ट करने के लिए नए नए तर्क निकाल रही है। वह जैसे ही एक तर्क समाप्त करता है वैसे ही उसको एक और नया तर्क सूझता है जिसकी आड़ में वह अपनी दुर्बलता को छिपाना चाहता है। अब उसका तर्क यह है कि युद्ध में अनेक परिवारों के नष्ट हो जाने पर सब प्रकार की सामाजिक एवं धार्मिक परम्परायें समाप्त हो जायेंगी ।

2 weeks ago | [YT] | 3

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

इस दोहा को समझने के लिए दृष्टि थोड़ा व्यापक करनी पड़ेगी। भगवान शिव जी और मां पार्वती के विवाह के समय वो सर्वप्रथम गणपति की पूजा कर रहे है ।तार्किक लोग कहेंगे कि गणपति कहां से आए वो तो स्वयं शिव जी और मां पार्वती के पुत्र है तो विवाह के समय कैसे हो सकते है वो तो बाद में जन्म लेंगे। पंच देव उपासना हमारे वैदिक सनातन में बहुत पुरानी है।
*शिव,शक्ति,विष्णु,गणपति और सूर्य*
ये पांच देव उपासना आदि काल से ही है सृष्टि का आरंभ होता है तो वेद प्रकट होते है और वेदों में ये उपासना पहले से ही मौजूद है फिर बाद में साकार रूप उपासना के लिए प्रत्येक कल्प में व्यास जी होते है वो पहले वेदों का विभाग करते है फिर आम जनमानस के लिए पुराण की भी रचना करते है। पुराणों में बाद में महिमा वर्णन करके सभी देवताओं का साकार रूप का भी वर्णन किया जाता है।लेकिन पुराण की रचना के पहले भी वेद तो मौजूद रहते ही है और उनमें पांचों सनातन देवों की उपासना की विधि में रहती है।जैसे वेद में आप देखेंगे गणपति उपासना मंत्र मौजूद है भले ही उनके साकार रूप का जन्म व्यास जी ने बाद में भगवान शिव और पार्वती के यहां दिखाया हो लेकिन उनका पूजन वैदिक विधि से पहले ही है।
*ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे* " (यजुर्वेद से आह्वान मंत्र),

शास्त्र को समझने के लिए गुरु की दृष्टि से उनके बताए तरीके से समझना पड़ता है नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है

2 weeks ago (edited) | [YT] | 3

BrahmaYoga ब्रह्मयोग:

निसंदेह सत्ता और धन के लालच से अन्धे हुए कौरव यह देखने में असमर्थ थे कि इस युद्ध के कारण सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे का कितना विनाश होने वाला है। उनकी महत्त्वाकांक्षा ने उनके विवेक और भावना को इस प्रकार आच्छादित कर दिया था कि युद्ध में अपने ही बान्धवों की हत्याओं की क्रूरता को भी वे नहीं समझ पा रहे थे।
अर्जुन के कथन से लगता है कि उसने अपना विवेक खोया नहीं था और इस भ्रातृहन्ता युद्ध के द्वारा होने वाले भावी सामाजिक विनाश को वह स्पष्ट देख रहा था। उसका प्रस्तुत तर्क कुछ इस प्रकार का है। यदि हमारा कोई मित्र मद्यपान के कारण स्वयं को भूलकर अभद्र व्यवहार करता है तो उस समय उसका प्रतिकार करना और भी अधिक विचित्र बात होगी। हमको समझना चाहिये कि उस मित्र ने अपना विवेक खो दिया है और वह स्वयं ही नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है। ऐसे समय हमारे लिये उचित है कि उसकी अशिष्टता पर ध्यान न देकर उसे क्षमा कर दें।
इसी प्रकार अर्जुन का तर्क है कि यदि दुर्योधन और उसके मित्र अन्धे होकर अन्यायपूर्ण आक्रमण करते हैं तो क्या पाण्डवों को शान्ति की वेदी पर स्वयं का बलिदान करते हुये युद्ध से विरत हो जाना उचित नहीं है यह धारणा स्वयं में कितनी खतरनाक है इसको हम तब समझेंगे जब गीता के आगामी परिच्छेदों में तत्त्वज्ञान के महत्त्वपूर्ण अंश को देखेंगे जो भारतीय जीवन का सारतत्त्व है। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार ही एक मुख्य सिद्धांत है जिसका भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में प्रतिपादन किया है।
अब अर्जुन अपनी बात कहते हैं कि यद्यपि दुर्योधनादि अपने कुलक्षयसे होनेवाले दोषको और मित्रद्रोहसे होनेवाले पापको नहीं देखते, तो भी हमलोगोंको कुलक्षयसे होनेवाली अनर्थपरम्पराको देखना ही चाहिये [जिसका वर्णन अर्जुन आगे चालीसवें श्लोकसे चौवालीसवें श्लोकतक करेंगे़]; क्योंकि हम कुलक्षयसे होनेवाले दोषोंको भी अच्छी तरहसे जानते हैं और मित्रोंके साथ द्रोह-(वैर, द्वैष-) से
होने वाली पाप को भी अच्छी तरह से जानते हैं। अगर वे मित्र हमें दुःख दें, तो वह दुःख हमारे लिये अनिष्टकारक नहीं है। कारण कि दुःख से तो हमारे पूर्व पापों का ही नाश होगा हमारी शुद्धि ही होगी। परन्तु हमारे मनमें अगर द्रोह--वैरभाव होगा, तो वह मरने के बाद भी हमारे साथ रहेगा और जन्म-जन्मान्तर-तक हमें पाप करनेमें प्रेरित करता रहेगा जिससे हमारा पतन-ही-पतन होगा। ऐसे अनर्थ करनेवाले और मित्रोंके साथ द्रोह पैदा करनेवाले इस युद्धरूपी पापसे बचनेका विचार क्यों नहीं करना चाहिये? अर्थात् विचार करके हमें इस पापसे जरूर ही बचना चाहिये।

2 weeks ago | [YT] | 4