प्राचीन काल में मल्ल महाजनपद हुआ करता था। मल्ल महाजनपद में मल्ल जाति के लोगों का शासन था, और इनका राज्य उत्तर प्रदेश एवं बिहार वाले भूभाग में था। मल्ल महाजनपद नौ गणराज्यों का समूह था, और इसकी दो राजधानियाँ थीं — उत्तरी मल्ल की राजधानी कुशीनगर, और दक्षिणी मल्ल की राजधानी पावापुरी। कुशीनगर में ही गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था, और पावापुरी में ही महावीर की मृत्यु हुई थी। मल्ल महाजनपद को मगध के राजा अजातशत्रु ने जीत लिया था। जब अजातशत्रु का यहाँ अधिकार हो गया, तो मल्ल जाति के लोग यहाँ से भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में जाकर बस गए। वहाँ मल्ल जनपद के लोगों को मालव कहा जाने लगा, और वहाँ उन्होंने एक मालव गणराज्य स्थापित कर लिया। जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तो मालव जाति के लोगों के साथ सिकंदर का युद्ध हुआ। माना जाता है कि इसी जाति से हुए युद्ध के दौरान सिकंदर की छाती पर एक तीर लगा, और उसी तीर के संक्रमण (इनफेक्शन) से आगे चलकर 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हुई थी। सिकंदर के आक्रमण के उपरांत मालव जाति के लोग भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत की जगह राजस्थान और मध्य प्रदेश में आकर बस गए, और इन्हीं के कारण राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र को मालवा कहा जाने लगा। मालव जाति के ही एक राजा हुए — उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य। मालव जाति मूल रूप से मल्लों की वंशज है। मल्ल कौन हैं, इसकी जानकारी रामायण से मिलती है — मल्ल लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु के वंशज हैं। तो लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु के वंशजों को मल्ल कहा गया, और मल्ल जाति को ही आगे चलकर मालव कहा गया। मालव जाति से ही संबंधित थे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य। इतिहास में सामान्यतः यह माना जाता है कि भील लोग कहते हैं कि विक्रमादित्य हमारे वंश के राजा थे, परमार वंश के लोग कहते हैं कि ये हमारे वंश या जाति के थे। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि विक्रमादित्य वास्तव में एक इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय थे — अयोध्या के राजा भगवान राम के वंश के थे। इसीलिए आप देखेंगे कि विक्रमादित्य की जो भी मूर्तियाँ दिखाई देती हैं, उनके पीछे प्रभामंडल में सूर्य बना हुआ है — क्योंकि वे सूर्यवंशी और इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय थे।
यह ब्रह्मांड कहाँ से आया? और एक दिन कहाँ जाएगा? उपनिषद हज़ारों साल पहले कह गए — सब कुछ ब्रह्म से उत्पन्न होता है और अंत में उसी में विलीन हो जाता है। ब्रह्म कोई देवता नहीं — वो वो परम चेतना है जिससे यह सारी सृष्टि बनी है। जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है और टूटने पर वापस मिट्टी बन जाता है — वैसे ही हम सब ब्रह्म के रूप हैं। माया वो शक्ति है जो एक को अनेक दिखाती है। आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं — अहम् ब्रह्मास्मि। और आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है — सब एक बिंदु से आया, एक दिन उसी में समाएगा। सृष्टि, स्थिति, प्रलय — यह चक्र अनंत है। 🙏
क्या ईश्वर पहले किस्मत लिखता है और फिर कर्मों का हिसाब माँगता है? यह सुनने में विरोधाभास लगता है — लेकिन असल में यह एक बेहद सटीक और न्यायपूर्ण व्यवस्था है। इस विषय में समझने वाली ज़रूरी बातें — प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण — तीन तरह के कर्म और उनका फर्क। किस्मत पूरी ज़िंदगी नहीं लिखती, सिर्फ शुरुआती परिस्थिति देती है। ईश्वर का सब जानना हमारी स्वतंत्र इच्छा को नहीं छीनता। हिसाब सिर्फ उसी का होगा जो हमारे हाथ में था। और आज का कर्म ही कल की किस्मत बनता है। सार एक ही है — प्रारब्ध को माथे पर रखो, क्रियमाण को हाथ में रखो। किस्मत और कर्म विरोधी नहीं — एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 🙏
ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस गौतम बुद्ध महावीर स्वामी यहोवा प्रभु सब की रक्षा करें।..✍️✍️ मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूं कि माथे पर चंदन और दिल में रघुनंदन होना चाहिए, साथ ही सिर के ऊपर अंबर और तन पर पीतांबर होना चाहिए..✍️✍️-- @pramodbartala Radhe Radhe🥰🥰
प्रेम रोग लग जाए तो इंसान बदल जाता है, हंसता हुआ चेहरा भी अक्सर संभल जाता है। दिल में एक खालीपन सा बस जाता है, हर खुशी का रंग जैसे फीका पड़ जाता है। वो पास ना हो फिर भी हर जगह दिखता है, उसका नाम ही हर धड़कन में लिखता है। रातें लंबी हो जाती हैं, नींद रूठ जाती है, उसकी याद चुपके से आकर सब लूट जाती है। ये कैसा रिश्ता है जो टूटकर भी जुड़ा रहता है, हर दर्द के बाद भी दिल उसी को चुनता है। ना कोई मरहम काम आता है, ना कोई दवा, ये “प्रेम रोग” है जनाब, बस दिल की ही सजा। आँखों में आंसू हों फिर भी मुस्कुराना पड़ता है, उसके बिना हर पल खुद को समझाना पड़ता है। और सबसे बड़ा सच तो यही है... जिसे हम सबसे ज्यादा चाहते हैं, अक्सर वही सबसे ज्यादा रुलाता है… 💔
एक तरफ परशुराम जयंती की रैली — दूसरी तरफ अंबेडकर जयंती की रैली — और दोनों तरफ से एक-दूसरे के महापुरुषों का अपमान!
आज का विषय सुनने में कड़वा लगेगा, कुछ लोगों को गुस्सा भी आएगा — लेकिन यह सच बोलना ज़रूरी है। क्योंकि जो हो रहा है इस देश में — वो न सिर्फ इतिहास का अपमान है — बल्कि यह भारत माँ के सीने पर चाकू चलाने जैसा है। हमने उन महापुरुषों को — जिन्होंने पूरी मानवता के लिए जीवन दिया — जाति और धर्म की संकरी गलियों में कैद कर दिया। और अब उन्हीं के नाम पर एक-दूसरे को गालियाँ दी जा रही हैं। आइए एक-एक उदाहरण देखते हैं और खुद से पूछते हैं — क्या यही भारत हमारे महापुरुषों ने सोचा था?
डॉ. भीमराव अंबेडकर
बाबासाहेब अंबेडकर — भारतीय संविधान के निर्माता। दुनिया के सबसे बड़े विधिवेत्ताओं में से एक। जिन्होंने करोड़ों वंचितों, महिलाओं, मज़दूरों, किसानों — सबके लिए संविधान में अधिकार सुनिश्चित किए। उनकी लड़ाई सिर्फ दलितों के लिए नहीं थी — उनकी लड़ाई थी हर इंसान की गरिमा के लिए। लेकिन आज उन्हें सिर्फ "दलित नेता" बना दिया गया। और दूसरी तरफ कुछ तथाकथित सवर्ण बाबासाहेब की मूर्तियाँ तोड़ते हैं, उनकी तस्वीरों का अपमान करते हैं। अरे! जिस संविधान की वजह से तुम्हें भी अधिकार मिले — उसके रचयिता का अपमान करते हो? शर्म करो!
भगवान परशुराम
भगवान परशुराम — विष्णु के छठे अवतार। अन्याय के विरुद्ध क्रांति के प्रतीक। उन्होंने अहंकारी और अत्याचारी क्षत्रियों का दमन किया — न्याय की स्थापना के लिए। वो किसी जाति के रक्षक नहीं थे — वो धर्म और न्याय के रक्षक थे। लेकिन आज परशुराम जयंती पर ब्राह्मण समाज की रैलियाँ निकलती हैं — और उन रैलियों में बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान किया जाता है। और जवाब में अंबेडकरवादी रैलियों में परशुराम का अपमान होता है। दोनों गलत हैं। दोनों महापुरुष इस देश के थे। दोनों का अपमान — भारत माँ का अपमान है।
लव-कुश, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य — जिसने 322 ईसा पूर्व में भारत को एकजुट किया। सिकंदर के सेनापतियों को धूल चटाई। पूरे भारत को एक साम्राज्य के रूप में जोड़ा। सम्राट अशोक — जिसने धम्म और अहिंसा का संदेश पूरी दुनिया में फैलाया। जिनका अशोक चक्र आज भी हमारे तिरंगे में है। लव और कुश — भगवान राम और माता सीता के पुत्र — पूरे भारत के आदर्श। लेकिन आज इन्हें कुशवाहा, कोइरी, मौर्य जाति का प्रतीक बनाकर छोड़दिया गया है। जिन्होंने पूरे भारत पर राज किया — उन्हें एक जाति की संपत्ति बना दिया? यह इतिहास का सबसे बड़ा अपमान है!
माता कर्मा बाई
माता कर्मा बाई — निर्मल भक्ति, त्याग और सेवा की प्रतीक। जिनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि भगवान स्वयं उनके घर भोजन करने आए — यह मान्यता है। उनका संदेश था — प्रेम, सेवा और भक्ति यही सबसे बड़ा धर्म है। लेकिन आज उन्हें सिर्फ एक जाति की कुलदेवी बनाकर सीमित कर दिया गया। उनकी जयंती पर सिर्फ एक समाज इकट्ठा होता है। जिनकी भक्ति ने ईश्वर को खींच लिया — उन्हें हमने जाति की सीमा में बाँध दिया? यह भक्ति का अपमान है।
भगवान विश्वकर्मा
भगवान विश्वकर्मा — देवताओं के शिल्पी। जिन्होंने स्वर्ग, द्वारका, लंका — सब बनाया। इंद्र का वज्र, विष्णु का सुदर्शन चक्र — सब उन्हीं की रचना। वो सृष्टि के निर्माण के प्रतीक हैं — हर कारीगर, हर इंजीनियर, हर शिल्पकार के देवता हैं। लेकिन आज उन्हें सिर्फ "विश्वकर्मा समाज" का भगवान बना दिया गया। विश्वकर्मा पूजा पर सिर्फ एक जाति उन्हें याद करती है। जिन्होंने पूरी सृष्टि का निर्माण किया — उन्हें एक जाति की सीमा में बाँध दिया? यह हमारी संकीर्णता है — भगवान की नहीं!
छत्रपति शिवाजी महाराज
छत्रपति शिवाजी महाराज — हिंदवी स्वराज के संस्थापक। जिनकी सेना में हिंदू भी थे, मुसलमान भी थे। जिनके विश्वस्त सेनापति इब्राहिम खान थे। जिन्होंने जाति नहीं — न्याय देखा, योग्यता देखी। वो पूरे भारत के वीर थे। लेकिन आज महाराष्ट्र में उनके नाम पर जाति की राजनीति होती है। मराठा बनाम OBC — शिवाजी के नाम पर लड़ाई! जिस राजा ने जाति तोड़कर राज्य बनाया — उसी के नाम पर जाति की लड़ाई? शिवाजी महाराज की आत्मा रो रही होगी!
संत रविदास
संत रविदास — जिनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में है। जिनकी शिष्या राजपूत रानी मीराबाई थीं। जिन्होंने कहा था — मन चंगा तो कठौती में गंगा। लेकिन आज सिर्फ एक जाति उन्हें अपना बताती है। और जब दूसरी जाति उनका नाम लेती है — तो विवाद शुरू हो जाता है। जिनकी भक्ति ने जाति की दीवार तोड़ी — उन्हें हमने जाति की दीवार में बंद कर दिया!
स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद — जिन्होंने 1893 के शिकागो में पूरी दुनिया को भारत का परिचय दिया। उनका वेदांत हर धर्म, हर इंसान के लिए था। उन्होंने कहा था — गरीब में भगवान देखो, दरिद्र नारायण की सेवा करो। लेकिन आज उन्हें एकतरफा राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक बना दिया गया। उनके सार्वभौमिक संदेश को काट-छाँटकर संकीर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
दोस्तों — अब बात करते हैं सबसे दर्दनाक सच्चाई की। परशुराम जयंती पर कुछ लोग रैली निकालते हैं — और उसी रैली में बाबासाहेब का अपमान होता है। बाबासाहेब की तस्वीरें जलाई जाती हैं। अंबेडकर जयंती पर कुछ लोग रैली निकालते हैं — और उसी रैली में परशुराम का अपमान होता है। परशुराम की मूर्तियाँ तोड़ी जाती हैं। शिवाजी के नाम पर महाराष्ट्र में जातिवादी दंगे होते हैं। चंद्रगुप्त और अशोक के नाम पर जाति सम्मेलन होते हैं — जहाँ दूसरी जातियों को नीचा दिखाया जाता है। मैं पूछता हूँ — क्या बाबासाहेब ने यही चाहा था? क्या परशुराम इसीलिए अवतरित हुए थे? क्या शिवाजी ने इसीलिए तलवार उठाई थी? नहीं! हज़ार बार नहीं! इन महापुरुषों ने इंसानों को जोड़ने के लिए काम किया। और हम उनके नाम पर इंसानों को तोड़ रहे हैं। यह अपमान है — इन महापुरुषों का, इस देश का, और खुद अपना।
अंत में, अंबेडकर सिर्फ दलितों के नहीं — वो पूरे भारत के थे। परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों के नहीं — वो न्याय के प्रतीक थे। चंद्रगुप्त सिर्फ एक जाति के नहीं — वो भारत की एकता के प्रतीक थे। शिवाजी सिर्फ मराठों के नहीं — वो पूरे हिंदुस्तान के थे। विश्वकर्मा सिर्फ एक समाज के नहीं — वो पूरी सृष्टि के शिल्पी थे। जिस दिन हम यह समझ जाएँगे — उस दिन न परशुराम जयंती पर दंगा होगा, न अंबेडकर जयंती पर अपमान होगा। महापुरुषों को जाति-धर्म से आज़ाद करो — तभी भारत आज़ाद होगा।
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प्राचीन काल में मल्ल महाजनपद हुआ करता था। मल्ल महाजनपद में मल्ल जाति के लोगों का शासन था, और इनका राज्य उत्तर प्रदेश एवं बिहार वाले भूभाग में था।
मल्ल महाजनपद नौ गणराज्यों का समूह था, और इसकी दो राजधानियाँ थीं — उत्तरी मल्ल की राजधानी कुशीनगर, और दक्षिणी मल्ल की राजधानी पावापुरी।
कुशीनगर में ही गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था, और पावापुरी में ही महावीर की मृत्यु हुई थी।
मल्ल महाजनपद को मगध के राजा अजातशत्रु ने जीत लिया था। जब अजातशत्रु का यहाँ अधिकार हो गया, तो मल्ल जाति के लोग यहाँ से भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में जाकर बस गए। वहाँ मल्ल जनपद के लोगों को मालव कहा जाने लगा, और वहाँ उन्होंने एक मालव गणराज्य स्थापित कर लिया।
जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तो मालव जाति के लोगों के साथ सिकंदर का युद्ध हुआ। माना जाता है कि इसी जाति से हुए युद्ध के दौरान सिकंदर की छाती पर एक तीर लगा, और उसी तीर के संक्रमण (इनफेक्शन) से आगे चलकर 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु हुई थी।
सिकंदर के आक्रमण के उपरांत मालव जाति के लोग भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत की जगह राजस्थान और मध्य प्रदेश में आकर बस गए, और इन्हीं के कारण राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र को मालवा कहा जाने लगा।
मालव जाति के ही एक राजा हुए — उज्जैन के महान राजा विक्रमादित्य।
मालव जाति मूल रूप से मल्लों की वंशज है। मल्ल कौन हैं, इसकी जानकारी रामायण से मिलती है — मल्ल लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु के वंशज हैं। तो लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु के वंशजों को मल्ल कहा गया, और मल्ल जाति को ही आगे चलकर मालव कहा गया।
मालव जाति से ही संबंधित थे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य। इतिहास में सामान्यतः यह माना जाता है कि भील लोग कहते हैं कि विक्रमादित्य हमारे वंश के राजा थे, परमार वंश के लोग कहते हैं कि ये हमारे वंश या जाति के थे। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि विक्रमादित्य वास्तव में एक इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय थे — अयोध्या के राजा भगवान राम के वंश के थे। इसीलिए आप देखेंगे कि विक्रमादित्य की जो भी मूर्तियाँ दिखाई देती हैं, उनके पीछे प्रभामंडल में सूर्य बना हुआ है — क्योंकि वे सूर्यवंशी और इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय थे।
3 weeks ago | [YT] | 6
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देश को एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है... हे प्रभु कब आओगे 🥹🥰♥️
1 month ago (edited) | [YT] | 5
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यदि मेरे देश की तरफ किसी ने आंख उठाकर देखा तो उन आंखों को निकाल कर कंचा बना देंगे।😎🇮🇳🙏
2 months ago | [YT] | 7
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यह ब्रह्मांड कहाँ से आया? और एक दिन कहाँ जाएगा?
उपनिषद हज़ारों साल पहले कह गए — सब कुछ ब्रह्म से उत्पन्न होता है और अंत में उसी में विलीन हो जाता है।
ब्रह्म कोई देवता नहीं — वो वो परम चेतना है जिससे यह सारी सृष्टि बनी है। जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है और टूटने पर वापस मिट्टी बन जाता है — वैसे ही हम सब ब्रह्म के रूप हैं।
माया वो शक्ति है जो एक को अनेक दिखाती है। आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं — अहम् ब्रह्मास्मि।
और आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है — सब एक बिंदु से आया, एक दिन उसी में समाएगा।
सृष्टि, स्थिति, प्रलय — यह चक्र अनंत है। 🙏
2 months ago | [YT] | 7
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क्या ईश्वर पहले किस्मत लिखता है और फिर कर्मों का हिसाब माँगता है? यह सुनने में विरोधाभास लगता है — लेकिन असल में यह एक बेहद सटीक और न्यायपूर्ण व्यवस्था है।
इस विषय में समझने वाली ज़रूरी बातें —
प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण — तीन तरह के कर्म और उनका फर्क। किस्मत पूरी ज़िंदगी नहीं लिखती, सिर्फ शुरुआती परिस्थिति देती है। ईश्वर का सब जानना हमारी स्वतंत्र इच्छा को नहीं छीनता। हिसाब सिर्फ उसी का होगा जो हमारे हाथ में था। और आज का कर्म ही कल की किस्मत बनता है।
सार एक ही है — प्रारब्ध को माथे पर रखो, क्रियमाण को हाथ में रखो।
किस्मत और कर्म विरोधी नहीं — एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 🙏
2 months ago | [YT] | 11
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Bibliophile❤️❤️🥰🥹📚
:A room without books is like a body without a soul and
A reader lives a thousand lives before he dies.
2 months ago (edited) | [YT] | 9
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ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस गौतम बुद्ध महावीर स्वामी यहोवा प्रभु सब की रक्षा करें।..✍️✍️
मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूं कि माथे पर चंदन और दिल में रघुनंदन होना चाहिए, साथ ही सिर के ऊपर अंबर और तन पर पीतांबर होना चाहिए..✍️✍️-- @pramodbartala
Radhe Radhe🥰🥰
3 months ago | [YT] | 10
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प्रेम रोग लग जाए तो इंसान बदल जाता है,
हंसता हुआ चेहरा भी अक्सर संभल जाता है।
दिल में एक खालीपन सा बस जाता है,
हर खुशी का रंग जैसे फीका पड़ जाता है।
वो पास ना हो फिर भी हर जगह दिखता है,
उसका नाम ही हर धड़कन में लिखता है।
रातें लंबी हो जाती हैं, नींद रूठ जाती है,
उसकी याद चुपके से आकर सब लूट जाती है।
ये कैसा रिश्ता है जो टूटकर भी जुड़ा रहता है,
हर दर्द के बाद भी दिल उसी को चुनता है।
ना कोई मरहम काम आता है, ना कोई दवा,
ये “प्रेम रोग” है जनाब, बस दिल की ही सजा।
आँखों में आंसू हों फिर भी मुस्कुराना पड़ता है,
उसके बिना हर पल खुद को समझाना पड़ता है।
और सबसे बड़ा सच तो यही है...
जिसे हम सबसे ज्यादा चाहते हैं,
अक्सर वही सबसे ज्यादा रुलाता है… 💔
3 months ago | [YT] | 6
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Please पूरा पढ़िएगा🥹🙏
एक तरफ परशुराम जयंती की रैली —
दूसरी तरफ अंबेडकर जयंती की रैली —
और दोनों तरफ से एक-दूसरे के महापुरुषों का अपमान!
आज का विषय सुनने में कड़वा लगेगा, कुछ लोगों को गुस्सा भी आएगा — लेकिन यह सच बोलना ज़रूरी है। क्योंकि जो हो रहा है इस देश में — वो न सिर्फ इतिहास का अपमान है — बल्कि यह भारत माँ के सीने पर चाकू चलाने जैसा है।
हमने उन महापुरुषों को — जिन्होंने पूरी मानवता के लिए जीवन दिया — जाति और धर्म की संकरी गलियों में कैद कर दिया। और अब उन्हीं के नाम पर एक-दूसरे को गालियाँ दी जा रही हैं।
आइए एक-एक उदाहरण देखते हैं और खुद से पूछते हैं — क्या यही भारत हमारे महापुरुषों ने सोचा था?
डॉ. भीमराव अंबेडकर
बाबासाहेब अंबेडकर — भारतीय संविधान के निर्माता। दुनिया के सबसे बड़े विधिवेत्ताओं में से एक। जिन्होंने करोड़ों वंचितों, महिलाओं, मज़दूरों, किसानों — सबके लिए संविधान में अधिकार सुनिश्चित किए। उनकी लड़ाई सिर्फ दलितों के लिए नहीं थी — उनकी लड़ाई थी हर इंसान की गरिमा के लिए।
लेकिन आज उन्हें सिर्फ "दलित नेता" बना दिया गया। और दूसरी तरफ कुछ तथाकथित सवर्ण बाबासाहेब की मूर्तियाँ तोड़ते हैं, उनकी तस्वीरों का अपमान करते हैं।
अरे! जिस संविधान की वजह से तुम्हें भी अधिकार मिले — उसके रचयिता का अपमान करते हो? शर्म करो!
भगवान परशुराम
भगवान परशुराम — विष्णु के छठे अवतार। अन्याय के विरुद्ध क्रांति के प्रतीक। उन्होंने अहंकारी और अत्याचारी क्षत्रियों का दमन किया — न्याय की स्थापना के लिए। वो किसी जाति के रक्षक नहीं थे — वो धर्म और न्याय के रक्षक थे।
लेकिन आज परशुराम जयंती पर ब्राह्मण समाज की रैलियाँ निकलती हैं — और उन रैलियों में बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान किया जाता है। और जवाब में अंबेडकरवादी रैलियों में परशुराम का अपमान होता है।
दोनों गलत हैं। दोनों महापुरुष इस देश के थे। दोनों का अपमान — भारत माँ का अपमान है।
लव-कुश, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य — जिसने 322 ईसा पूर्व में भारत को एकजुट किया। सिकंदर के सेनापतियों को धूल चटाई। पूरे भारत को एक साम्राज्य के रूप में जोड़ा।
सम्राट अशोक — जिसने धम्म और अहिंसा का संदेश पूरी दुनिया में फैलाया। जिनका अशोक चक्र आज भी हमारे तिरंगे में है।
लव और कुश — भगवान राम और माता सीता के पुत्र — पूरे भारत के आदर्श।
लेकिन आज इन्हें कुशवाहा, कोइरी, मौर्य जाति का प्रतीक बनाकर छोड़दिया गया है।
जिन्होंने पूरे भारत पर राज किया — उन्हें एक जाति की संपत्ति बना दिया? यह इतिहास का सबसे बड़ा अपमान है!
माता कर्मा बाई
माता कर्मा बाई — निर्मल भक्ति, त्याग और सेवा की प्रतीक। जिनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि भगवान स्वयं उनके घर भोजन करने आए — यह मान्यता है। उनका संदेश था — प्रेम, सेवा और भक्ति यही सबसे बड़ा धर्म है।
लेकिन आज उन्हें सिर्फ एक जाति की कुलदेवी बनाकर सीमित कर दिया गया। उनकी जयंती पर सिर्फ एक समाज इकट्ठा होता है।
जिनकी भक्ति ने ईश्वर को खींच लिया — उन्हें हमने जाति की सीमा में बाँध दिया? यह भक्ति का अपमान है।
भगवान विश्वकर्मा
भगवान विश्वकर्मा — देवताओं के शिल्पी। जिन्होंने स्वर्ग, द्वारका, लंका — सब बनाया। इंद्र का वज्र, विष्णु का सुदर्शन चक्र — सब उन्हीं की रचना। वो सृष्टि के निर्माण के प्रतीक हैं — हर कारीगर, हर इंजीनियर, हर शिल्पकार के देवता हैं।
लेकिन आज उन्हें सिर्फ "विश्वकर्मा समाज" का भगवान बना दिया गया। विश्वकर्मा पूजा पर सिर्फ एक जाति उन्हें याद करती है।
जिन्होंने पूरी सृष्टि का निर्माण किया — उन्हें एक जाति की सीमा में बाँध दिया? यह हमारी संकीर्णता है — भगवान की नहीं!
छत्रपति शिवाजी महाराज
छत्रपति शिवाजी महाराज — हिंदवी स्वराज के संस्थापक। जिनकी सेना में हिंदू भी थे, मुसलमान भी थे। जिनके विश्वस्त सेनापति इब्राहिम खान थे। जिन्होंने जाति नहीं — न्याय देखा, योग्यता देखी। वो पूरे भारत के वीर थे।
लेकिन आज महाराष्ट्र में उनके नाम पर जाति की राजनीति होती है। मराठा बनाम OBC — शिवाजी के नाम पर लड़ाई!
जिस राजा ने जाति तोड़कर राज्य बनाया — उसी के नाम पर जाति की लड़ाई? शिवाजी महाराज की आत्मा रो रही होगी!
संत रविदास
संत रविदास — जिनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में है। जिनकी शिष्या राजपूत रानी मीराबाई थीं। जिन्होंने कहा था — मन चंगा तो कठौती में गंगा।
लेकिन आज सिर्फ एक जाति उन्हें अपना बताती है। और जब दूसरी जाति उनका नाम लेती है — तो विवाद शुरू हो जाता है।
जिनकी भक्ति ने जाति की दीवार तोड़ी — उन्हें हमने जाति की दीवार में बंद कर दिया!
स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद — जिन्होंने 1893 के शिकागो में पूरी दुनिया को भारत का परिचय दिया। उनका वेदांत हर धर्म, हर इंसान के लिए था। उन्होंने कहा था — गरीब में भगवान देखो, दरिद्र नारायण की सेवा करो।
लेकिन आज उन्हें एकतरफा राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक बना दिया गया। उनके सार्वभौमिक संदेश को काट-छाँटकर संकीर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
दोस्तों — अब बात करते हैं सबसे दर्दनाक सच्चाई की।
परशुराम जयंती पर कुछ लोग रैली निकालते हैं — और उसी रैली में बाबासाहेब का अपमान होता है। बाबासाहेब की तस्वीरें जलाई जाती हैं।
अंबेडकर जयंती पर कुछ लोग रैली निकालते हैं — और उसी रैली में परशुराम का अपमान होता है। परशुराम की मूर्तियाँ तोड़ी जाती हैं।
शिवाजी के नाम पर महाराष्ट्र में जातिवादी दंगे होते हैं। चंद्रगुप्त और अशोक के नाम पर जाति सम्मेलन होते हैं — जहाँ दूसरी जातियों को नीचा दिखाया जाता है।
मैं पूछता हूँ — क्या बाबासाहेब ने यही चाहा था? क्या परशुराम इसीलिए अवतरित हुए थे? क्या शिवाजी ने इसीलिए तलवार उठाई थी?
नहीं! हज़ार बार नहीं!
इन महापुरुषों ने इंसानों को जोड़ने के लिए काम किया। और हम उनके नाम पर इंसानों को तोड़ रहे हैं। यह अपमान है — इन महापुरुषों का, इस देश का, और खुद अपना।
अंत में,
अंबेडकर सिर्फ दलितों के नहीं — वो पूरे भारत के थे।
परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों के नहीं — वो न्याय के प्रतीक थे।
चंद्रगुप्त सिर्फ एक जाति के नहीं — वो भारत की एकता के प्रतीक थे।
शिवाजी सिर्फ मराठों के नहीं — वो पूरे हिंदुस्तान के थे।
विश्वकर्मा सिर्फ एक समाज के नहीं — वो पूरी सृष्टि के शिल्पी थे।
जिस दिन हम यह समझ जाएँगे — उस दिन न परशुराम जयंती पर दंगा होगा, न अंबेडकर जयंती पर अपमान होगा।
महापुरुषों को जाति-धर्म से आज़ाद करो — तभी भारत आज़ाद होगा।
वंदे मातरम जय हिंद जय भारत 🙏🙏🇮🇳🇮🇳@pramodbartala
3 months ago (edited) | [YT] | 6
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