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भोपाल में किन्नर समुदाय का प्रदर्शन, सुरक्षा व जांच की मांग
जेहादी किन्नरों पर लगाए जबरन धर्मांतरण व उत्पीड़न के आरोप, कलेक्टर को आज सौपेंगे ज्ञापन
भोपाल। भोपाल जिले में किन्नर समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर सोमवार को किन्नरों ने राहुल नगर क्षेत्र में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन का नेतृत्व किन्नर अखाड़ा के संस्थापक ऋषि अजयदास ने किया। इस दौरान प्रदर्शनकारी किन्नरों ने आरोप लगाया कि मंगलवारा क्षेत्र में विशेष किन्नर समुदाय के कुछ सदस्यो द्वारा अन्य किन्नरों पर दबाव, धमकी, उत्पीड़न कर धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिससे वे भय के माहौल में जीवन यापन को मजबूर हैं। किन्नर अखाडा के संस्थापक ऋषि अजय दास ने आरोप लगाते हुए कहा कि देश में बडे स्तर पर लव जिहाद की ही तरह किन्नर जिहाद चल रहा है उन्होने आरोप लगाते हुए कहा कि होली, दीवाली सहित अन्य हिन्दूओँ के पर्वों पर बधाईयां लेकर जिहादी किन्नर उस राशि का दुरुपयोग कर रहे है साथ ही वे अन्य किन्नरों पर धर्म परिवर्तन का दबाव भी बना रहे है
प्रदर्शनकारी किन्नरों का कहना था कि समुदाय विशेष के किन्नरों द्वारा डेरे के अन्य किन्नरों पर जबरन धार्मिक आस्था परिवर्तन, मारपीट, धमकी और मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। प्रदर्शन के बाद अब मंगलवार को किन्नर समुदाय का प्रतिनिधिमंडल दिनांक 10/02/2026 दिन मंगलवार को दोपहर 12 बजे कलेक्टर महोदय को एक ज्ञापन सौंपकर मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग करेगा। किन्नर अखाड़ा के संस्थापक ऋषि अजयदास ने कहा कि, “किन्नर समाज संविधान के तहत सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार रखता है। यदि किसी भी प्रकार का दबाव या हिंसा होती है तो प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप कर न्याय सुनिश्चित कर दोषी किन्नरों के खिलाफ कडी कार्यवाही करनी चाहिए।” वहीं, प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से यह भी मांग की कि किन्नर समुदाय के पीडित प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाए। इस मौके पर ऋषि अजयदास संस्थापक किन्नर अखाडा, शिवकुमार भार्गव, भगवा पार्टी, किन्नर काजल, प्रभा, आरोही, सनम, सिवी, काव्या सिंदी, नकशा, सिमरन, सनम, जूली, मेघा, अर्पिता, भवानी, रोजी, गुंजा, सबाना, मनीषा, शिवांगी, बिजली, कोमल, भैरवी, सारीका, राधा, प्रीति, काव्या, सिमा भी मौजूद रही।
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राष्ट्रीय अध्यक्ष जयनारायण चौकसे ‘शिक्षा शिरोमणि’ उपाधि से सम्मानित
कलचुरी महिला इकाई ने गरिमामय ढंग से किया कुलदेवता पूजन व सम्मान समारोह
इंदौर। अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरी महासभा की महिला इकाई द्वारा इंदौर (मध्यप्रदेश) में कुलदेवता पूजन, हल्दी-कुमकुम, गुरु पूजन एवं स्वागत-सम्मान समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कलचुरी समाज की बहनों की सहभागिता रही।
कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरी महासभा की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष पूनम चौधरी (दिल्ली) एवं नीलम शिवहरे के मार्गदर्शन में किया गया। सर्वप्रथम राजराजेश्वर सहस्त्रबाहु भगवान के चित्र पर मुख्य अतिथि महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जयनारायण चौकसे, श्रीमती अर्चना जायसवाल, एम.एल. राय, श्रीमती सुमित्रा चौकसे सहित अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा विधिवत पूजन-अर्चन एवं दीप प्रज्वलन किया गया। इसके पश्चात श्रीमती कमलेश राय, रंजना सूर्यवंशी एवं मनीष राय द्वारा उपस्थित महिलाओं का हल्दी-कुमकुम लगाकर एवं माल्यार्पण कर आत्मीय स्वागत किया गया।
स्वागत भाषण में राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष पूनम चौधरी ने कहा कि महिला इकाई का मुख्य उद्देश्य कलचुरी समाज की महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ते हुए उन्हें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर प्रयास करने से महिलाएं हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकती हैं।
इस अवसर पर महिला इकाई द्वारा समाज सेवा, शिक्षा एवं सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए श्री जयनारायण चौकसे को शिक्षा शिरोमणि उपाधि से सम्मानित किया गया। साथ ही कलचुरी समाज की वरिष्ठ समाजसेविका श्रीमती अर्चना जायसवाल को शाल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के दौरान श्री चौकसे एवं श्रीमती जायसवाल ने महेश्वर में भगवान राजराजेश्वर सहस्त्रबाहु अर्जुन की प्रस्तावित 100 फीट ऊँची प्रतिमा एवं स्थल से जुड़ी विस्तृत जानकारी भी साझा की।
कार्यक्रम में संत एवं मोटिवेशनल स्पीकर श्री ओमप्रकाश जी का अभिनंदन किया गया। श्रीमती अर्चना जायसवाल ने सभी महिलाओं को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाने का आह्वान किया। वहीं नव नियुक्त जिला अध्यक्ष सुश्री शिवानी शिवहरे के सम्मान के साथ महेश्वर में शीघ्र मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ होने की जानकारी भी दी गई।
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मकर संक्रांति पर पत्रकार पतंग उत्सव, सौहार्द और संस्कृति का दिया संदेश
भोपाल। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर सनातन प्रेस क्लब, मध्यप्रदेश एवं प्रेस मीडिया कर्मियों के संयुक्त तत्वावधान में एलएनसीटी विश्वविद्यालय परिसर में “मकर संक्रांति पत्रकार पतंग उत्सव” का आयोजन किया गया। आयोजन में पत्रकारों, कैमरामैन एवं फोटोग्राफरों ने पतंग उड़ाकर आपसी सौहार्द, संवाद और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का संदेश दिया। सनातन प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष अजय मिश्रा ने बताया कि महोत्सव का उद्देश्य मीडिया साथियों के बीच मेल-जोल, मनोरंजन और पारंपरिक पर्वों के महत्व को बढ़ावा देना है। इस दौरान पत्रकारों तथा विश्वविद्यालय के छात्रों व कर्मचारियों के बीच पतंगबाजी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मुख्य अतिथि महापौर श्रीमती मालती राय ने मकर संक्रांति को सामाजिक समरसता और नई ऊर्जा का पर्व बताया। एलएनसीटी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. (प्रो.) एन.के. थापक ने भारतीय संस्कृति से युवाओं को जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। कथावाचक धर्मपथिक शैलेन्द्र कृष्ण महाराज जी एवं आचार्य शशांक शेखर महाराज जी ने मकर संक्रांति के धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। महोत्सव के अंतर्गत विभिन्न रोचक श्रेणियों में प्रतिभागियों को सम्मान पट्टिका (अंगवस्त्र), स्मृति चिन्ह एवं सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकारों सहित विभिन्न समाचार पत्रों, टीवी चैनलों एवं डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकार, कैमरामैन व फोटोग्राफर बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
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19 JAN 2026
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने NDRF जवानों को बल के स्थापना दिवस पर शुभकामनाएं दी
आपदा प्रतिरोधी भारत बनाने के मोदी सरकार के संकल्प को साकार करने में NDRF महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा
NDRF आज आपदाओं में विश्वास का स्तंभ बन गया है
दूसरों की सुरक्षा के लिए अपना बलिदान देने वाले NDRF के शहीदों को नमन
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के जवानों को बल के स्थापना दिवस पर शुभकामनाएं दी है।
X पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा, “NDRF के कर्मियों को स्थापना दिवस की शुभकामनाएं। आपदा-प्रतिरोधी भारत बनाने के मोदी सरकार के संकल्प को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के जरिए NDRF आज विश्वास का वह स्तंभ बन गया है जिस पर देश आपदाओं के दौरान भरोसा करता है। दूसरों की सुरक्षा के लिए अपना बलिदान देने वाले शहीदों को नमन।”
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1 month ago | [YT] | 0
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"भारत की नई पिनाका मिसाइल (120km रेंज) के सफल टेस्ट पर आपकी क्या राय है?
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बेटी बचाओ, बेटी बढाओ संदेश के साथ बेटियो ने किया रैंप वाक
भोपाल- शहर के ईगल वेलफेयर सोसायटी द्वारा महिला सशक्तिकरण को लेकर बेटी बचाओ, बेटी बढाओ फैशन शो का आयोजन किया गया। इस शौ में शहर की उभरती 15 माडलो ने रेंप वाक किया। जिसमें मराठी, मद्रासी, गुजराती, पंजाबी, एयर होस्टेस्ट, पुलिस, आर्मी, डॉक्टर, वर्किंग वूमेन की ड्रेस पहन कर माडल ने वाक किया। इस शो का शुभारंभ पूर्व महापौर कृष्णा गौर ने किया । शो के आयोजकर नवीन वर्मा और मोनू गौर का कहना है कि इस शो के उद्देश्य से वे समाज के लोगो को बेटी बचाने का संदेश देना चाहते है जो बेटियो को कोख में मार देते है। उन्होने यहा भी कहा कि देश और समाज प्रगति कर रहा है और बेटिया हर स्तर पर अपने आपको साबित कर रही है। इसलिए उन्हें सम्मान मिलना चाहिये और बेटियो को भी बेटे के समान अधिकार मिलना चाहिये.. आयोजको का यह भी कहना है कि लगातार वे इस तरह का शो कर बेटी बचाओ के लिए मुहिम चलाते रहेंगे। कार्यक्रम मं इस मौके पर नवीन वर्मा, मौनू गौर, आयुष पाहरिया, नेहा राय, दीपिका राणा सहित बडी संख्या में दर्शक मौजूद थे।
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70 देशों की भागीदारी के साथ विश्वरंग अंतरराष्ट्रीय शोध सम्मेलन सम्पन्न
कला–साहित्य से ‘विकसित भारत’ की राह पर गहन विमर्श
भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (आरएनटीयू) में विश्वरंग के सातवें संस्करण के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “स्थानीय से वैश्विक : भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में साहित्य और कलाओं की भूमिका” गरिमामयी ढंग से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संयोजन मानविकी एवं उदार कला संकाय की डीन डॉ. रुचि मिश्र तिवारी द्वारा किया गया।
श्रीलंका के दृश्य व प्रदर्शन कलाएँ विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संबंध निदेशक डॉ. कमानी समरसिंघे ने कहा कि विश्वरंग ने कला और संस्कृति के माध्यम से 70 देशों को जोड़ते हुए एक अनूठा सांस्कृतिक–शैक्षणिक सेतु निर्मित किया है।
मानवता, साहित्य और वैश्विक भाषा–विस्तार पर गहन संवाद
प्रथम सत्र में पंजाब विश्वविद्यालय की डीन डॉ. योजना रावत ने मानव को वस्तु की तरह देखने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए भारतीय साहित्य–कला को मानवता के उत्थान का आधार बताया। उन्होंने हिंदी के वैश्विक प्रसार के लिए “हमें हिंदी से प्यार है” जैसे अभियानों को आवश्यक बताया।
पीईटीसी इंदौर की प्राचार्य डॉ. अल्का भार्गव ने भवानी प्रसाद मिश्र और अटल बिहारी वाजपेयी की रचनाओं के उदाहरणों द्वारा राष्ट्र निर्माण में महिलाओं और युवाओं की निर्णायक भूमिका को रेखांकित किया।
आरएनटीयू के कुलपति प्रो. रवि प्रकाश दुबे ने क्षेत्रीय भाषाओं, लोककला और रंगमंच को सामाजिक परिवर्तन और मानसिक मुक्ति का प्रभावी माध्यम बताया।
वेदों से एआई तक—विकसित भारत की वैज्ञानिक दृष्टि
दूसरे दिन डॉ. रोली शुक्ला का बहुचर्चित व्याख्यान “वेद से तरंगों तक : ॐ से स्वचालन तक” केंद्र में रहा। उन्होंने वेदों के वैज्ञानिक मूल्यों से आगे बढ़ते हुए एआई, नैतिकता और पर्यावरणीय संतुलन को 2047 तक विकसित भारत का आधार बताया।
डॉ. विजय शर्मा ने भारतीय संस्कृति में अनुशासन, साधना और अध्यात्म की अनिवार्यता समझाई।
दो दिनों में 40 शोध पत्र, शोध आधारित कला प्रस्तुतियों ने बाँधा मन
पहले दिन डॉ. मुकेश पचौरी और डॉ. सीमा रैजादा की अध्यक्षता में करीब 40 शोध–पत्र प्रस्तुत हुए—
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सामाजिक प्रभाव
• हिंदी सिनेमा में ऐतिहासिक स्थलों की प्रस्तुति
• आधुनिक कथन–शैली में एनीमे की भूमिका
दूसरे दिन पारंपरिक अकादमिक प्रस्तुतियों के साथ गीत, संगीत और नृत्य पर आधारित शोध–प्रस्तुतियाँ विशेष आकर्षण रहीं।
सम्मेलन की समृद्ध शोध सामग्री के आधार पर दो पुस्तकों के प्रकाशन की घोषणा की गई।
भारत–श्रीलंका शैक्षणिक सहयोग को नई दिशा
कार्यक्रम में आरएनटीयू और श्रीलंका विश्वविद्यालय के बीच शैक्षणिक सहयोग हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे भारत–श्रीलंका संबंधों के महत्वपूर्ण शैक्षणिक अध्याय के रूप में देखा गया।
पुरुस्कार वितरण
शोध–पत्र श्रेणी :
प्रथम – विश्नु कुमार
द्वितीय – विकास जैन
तृतीय – नूपुर तिवारी
सांत्वना – अशोक गुप्ता
प्रदर्शन कला श्रेणी :
प्रथम – साक्षी शर्मा
द्वितीय – अखिलेश अहिरवार
तृतीय – अमित राय
समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. प्रमोद कुमार नायक, कुलपति (एसेक्ट विश्वविद्यालय, हज़ारीबाग) ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि कला–साहित्य का संरक्षण ही विकसित भारत के सांस्कृतिक भविष्य की नींव है।
सम्मेलन का सार डॉ. रुचि मिश्रा तिवारी ने प्रस्तुत किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अंजलि तिवारी द्वारा दिया गया।
2 months ago | [YT] | 2
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*“भारत को जाने, भारत को माने, भारत के बने और फिर भारत को बनाएं” – डॉ. मनमोहन वैद्य*
आठ वर्षों के अनुभव का संग्रह है 'हम और यह विश्व' - श्री जगदीप धनखड़
भोपाल। सुरुचि प्रकाशन की ओर से रवींद्र भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डॉ. मनमोहन वैद्य की पुस्तक 'हम और यह विश्व' का विमोचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की मूल अवधारणा, आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और अध्ययनशील परंपरा पर व्यापक चर्चा हुई। इस अवसर पर श्री आनंदम धाम आश्रम, वृंदावन के पीठाधीश्वर श्री ऋतेश्वर जी महाराज, पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़, जागरण के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी, सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष श्री राजीव तुली और लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने अपने विचार प्रकट किए।
पुस्तक के लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारतीयता, अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता पर अपना उद्बोधन दिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत को बनाने से पहले आवश्यक है कि हम पहले भारत को माने, उसके बाद भारत को जाने, फिर भारत के बने और उसके बाद भारत को बनाएं। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत उस अनुभव से की जिसने उन्हें लेखन की ओर प्रेरित किया। संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग में जब श्री प्रणब मुखर्जी को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया था, तब कुछ लोगों ने बिना कारण विरोध किया। इस एक घटना ने मनमोहन जी को लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में केवल 1 से 6 जून के बीच 378 लोगों ने उनसे मिलने का अनुरोध किया था, जो यह दर्शाता है कि संघ को लेकर समाज में संवाद की गहरी उत्सुकता है।
उन्होंने बताया कि संघ पर बेवजह किया गया विरोध कई बार संघ की स्वीकार्यता को और बढ़ा देता है। जॉइन आरएसएस वेबसाइट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सिर्फ उस वर्ष अक्टूबर माह में ही 48,890 लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में जुड़ने का अनुरोध किया। यह भारत के सामाजिक परिवर्तन और संगठन के प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।
भारत की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें उन कथनों को समझना होगा जो हमारी सोच को प्रभावित करते हैं। उन्होंने लोकप्रिय गीत “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” की पंक्ति “हम बुलबुले हैं इसके” पर बताया कि ऐसे भाव हमें अपनी मूल चेतना से दूर करते हैं। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि भारत में सांस्कृतिक विविधता है। अपितु यह कहना अधिक सही है कि भारत की संस्कृति एक ही है जो विविध रूपों में प्रकट होती है। भारत में विविधता मूल संस्कृति की शाखाएं हैं, उसका विकल्प नहीं।
उन्होंने कहा कि वेलफेयर स्टेट की अवधारणा भारत की अपनी अवधारणा नहीं है, बल्कि पश्चिम से आयातित विचार है। भारत की परंपरा समाज-आधारित दायित्व पर आधारित रही है। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक चार महत्वपूर्ण खंडों में विभाजित है और प्रत्येक खंड भारत के विमर्शों पर नई दृष्टि प्रदान करता है।
*अध्ययन ही भारत की परंपरा का मूल – विष्णु त्रिपाठी*
जागरण समूह के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि यह पुस्तक सिर्फ घर या पुस्तकालय में संग्रह के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि इसके अध्ययन, मनन और भाष्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा किसी एक पुस्तक या एक मत पर आधारित नहीं है। यहाँ ज्ञान की अनेक धाराएँ हैं। हमारी आध्यात्मिकता भी अध्ययन और चिंतन से ही जन्म लेती है। उन्होंने भारत की पहचान पर उठने वाले प्रश्नों पर स्पष्ट कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है या नहीं जैसी बहसें अध्ययन के अभाव से उत्पन्न होती हैं। जब भारत और भारतीयता पर गौरव का भाव स्थापित हो जाता है, तो ऐसे प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने गुरुनानक देव जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे रामनाम के परम उपासक थे और बाबर की आलोचना सीधे अपने भजनों में करते हैं। इसी रामनाम के प्रसार के साथ वे बगदाद तक पहुँचे थे। यह उदाहरण भारतीय अध्यात्म की गहराई और व्यापकता दोनों को दिखाता है।
*“यह पुस्तक सोए हुए को जगा देगी” – पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़*
पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने कहा कि भोपाल आकर इस पुस्तक पर बोलने का अवसर उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि हम और यह विश्व सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत का दर्पण और भविष्य निर्माण की दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। श्री धनखड़ ने कहा कि यह पुस्तक आठ वर्षों के अनुभवों का संग्रह है, जिसमें श्री प्रणब मुखर्जी पर दो महत्त्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं।
वे अंग्रेजी में वक्तव्य देते हुए बोले कि मैं अंग्रेजी में इसलिए बोल रहा हूँ ताकि जो लोग देश की सकारात्मक छवि को समझना नहीं चाहते, वे भी स्पष्ट और सीधे शब्दों में भारत के वास्तविक स्वरूप से परिचित हों। उन्होंने यह भी कहा कि आज का भारत तेजी से बदल रहा है, हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और विश्व मंच पर एक मजबूत, आत्मविश्वासी और निर्णायक देश के रूप में उभर रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत में श्री राजीव तुली ने सुरुचि प्रकाशन की परंपरा और भविष्य की दिशा का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि सुरुचि प्रकाशन समाज जीवन के विविध महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार पुस्तकों, शोध कृतियों और विचारपरक सामग्री का प्रकाशन कर रहा है।
उन्होंने बताया कि आने वाले महीनों में वॉकिज़्म, पंच परिवर्तन और अन्य बौद्धिक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण प्रकाशन सामने आने वाले हैं। राजीव तुली ने कहा कि “हम और यह विश्व” पुस्तक के पाठन के दौरान ऐसा महसूस होता है जैसे पाठक और पुस्तक के बीच सीधा संवाद स्थापित हो रहा हो।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण पहले प्रकाशित हुआ था, लेकिन वर्तमान संस्करण में कई महत्त्वपूर्ण और विस्तृत जानकारियाँ जोड़ी गई हैं। यह पुस्तक आज के समाज के बड़े विमर्शों को पढ़ने, समझने और उनके भाष्य लिखने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
कार्यक्रम में गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बौद्धिक जगत से जुड़े अनेक प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे ने किया। अंकुर पाठक ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उपस्थित सभी अतिथियों, गणमान्यजनों और पुस्तक प्रेमियों का धन्यवाद किया। वंदे मातरम् के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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श्रीमद्भगवद्गीता है ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वित विज्ञान
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान-परंपरा का वह अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें मानव जीवन के सभी स्तरों व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व को सशक्त, संतुलित तथा कल्याणकारी बनाने की क्षमता निहित है। यह धार्मिक अनुश्रुति के साथ ही ज्ञान, भक्ति और कर्म के त्रिवेणी-संगम से निर्मित एक ऐसा शाश्वत दर्शन है जिसकी प्रतिध्वनि हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को दिशा प्रदान करती रही है। इसकी महत्ता का प्रमाण यह तथ्य भी है कि ‘गीता’ को भारत समेत विश्व भर में सर्वाधिक वितरित किया जाने वाला ग्रंथ माना जाता है, जिसकी मान्यता न्यायिक प्रक्रियाओं से लेकर संविधान तक में परिलक्षित होती है। संविधान की मूल प्रति में अर्जुन को उपदेश देते श्रीकृष्ण का चित्र इसी सांस्कृतिक-दार्शनिक स्वीकार्यता का प्रतीक है। इसलिए भारत में गीता पर जितने भाष्य लिखे गए हैं, उतने शायद किसी अन्य ग्रंथ पर नहीं।
वस्तुत: यहीं इसकी बहुअर्थी शक्ति है; शंकराचार्य ने इसे अद्वैत-ब्रह्म का दार्शनिक आधार बताया, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत के रूप में भक्तिपरक व्याख्या की, लोकमान्य तिलक ने इसे समाज-क्रांति और कर्मयोग का आधार बनाया, गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और कर्तव्य-निष्ठा की दिशा में इसका उपयोग किया और बिनोबा भावे ने इसे सामाजिक न्याय और भूदान आंदोलन के लिए प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया। यह विविधता यह संकेत देती है कि गीता सार्वभौमिक है।
वर्तमान समय में केंद्र सरकार ने गीता को वैश्विक सांस्कृतिक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है। कुरुक्षेत्र में आरंभ हुआ अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव इसका उदाहरण है। इस वर्ष चालीस देशों में गीता जयंती का आयोजन होना यह संकेत देता है कि गीता का सनातन संदेश भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे मानवता को जोड़ने वाला सार्वभौमिक ज्ञान है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गीता की प्रासंगिकता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसका अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, उर्दू, अरबी और फारसी सहित अनेक भाषाओं में किया गया है। पश्चिमी देशों के कई विश्वविद्यालय गीता को दर्शन और धार्मिक अध्ययन में पाठ्य सामग्री के रूप में पढ़ाते हैं। 19वीं और 20वीं शताब्दी के अनेक पश्चिमी दार्शनिकों ने गीता की तुलना ग्रीक, रोमन और ईसाई ग्रंथों से करते हुए इसे अधिक समन्वित और मानव-हितकारी बताया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गीता महाभारत के युद्धभूमि पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में प्रस्तुत होती है। उत्खनन, समुद्र तल अनुसंधान तथा खगोल-आधारित शोधों के आधार पर महाभारत का काल लगभग ईसा से 3100 वर्ष पूर्व माना जाता है। अत: इस आधार पर गीता का उपदेश मानव जाति को कम से कम पाँच हजार वर्ष पूर्व प्राप्त हुआ। गीता के 700 श्लोकों में 573 श्लोक स्वयं श्रीकृष्ण के वचन हैं, जबकि 84 श्लोक अर्जुन के, 42 संजय के और एक धृतराष्ट्र से जुड़ा हुआ है।
कह सकते हैं कि पिछले पांच हजार सालों से लगातार श्रीमद्भगवद्गीता एक दार्शनिक ग्रंथ होने के साथ ही संवादात्मक साहित्य का संभवतः सबसे प्रभावी उदाहरण बना हुआ है। इसमें 18 अध्याय हैं, जिनमें से प्रत्येक को “योग” नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि वे जीवन के किसी विशिष्ट आयाम के साथ मन को जोड़ने (युज) के उपदेश देते हैं; विषाद, सांख्य, कर्म, ध्यान, भक्ति, संन्यास से लेकर मोक्ष तक की संवाद यात्रा आपको मन की अनेक अवस्थाओं में ले जाते हुए अंत में परम शांति में स्थापित कर देती है, जहां न राग है, न मोह है, न लोभ है और न ही किसी प्रकार का हर्ष या शोक है।
वस्तुत: गीता का मूल उद्देश्य मनुष्य को समस्या से पलायन से मुक्त करते हुए समाधान के लिए बौद्धिक, मानसिक और नैतिक शक्ति प्रदान करना है। अर्जुन का विषाद पूरे मानव समाज का प्रतिनिधि है; जब कर्तव्य और भावनाएँ टकराती हैं, जब नैतिकता और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष होता है। श्रीकृष्ण का उपदेश बताता है कि समस्या की जड़ अज्ञान और मोह में है। जब व्यक्ति वास्तविकता के ज्ञान से दीप्त होता है तो असमंजस स्वतः दूर हो जाता है। यही कारण है कि गीता ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों मार्गों को समन्वित करती है और बताती है कि जीवन की समग्रता इन तीनों के संतुलन में है।
अध्ययन के स्तर पर गीता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका बहु-स्तरीय ज्ञान-तंत्र है। इसमें मनोविज्ञान भी है, अध्यात्म भी; समाजशास्त्र भी है और नैतिक दार्शनिकता भी। गीता मनुष्य की इंद्रियों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की कार्यप्रणाली पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह एक प्रकार से उस काल का “कॉग्निटिव साइंस” कहा जा सकता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोधों में जो बातें विवेक, एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और मानसिक दृढ़ता के संदर्भ में कही जाती हैं, गीता हजारों वर्ष पूर्व उन सभी तत्वों को सूत्रबद्ध कर चुकी है।
प्रकृति के पाँच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के साथ मनुष्य की चेतना का संबंध समझाने का दृष्टिकोण गीता को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही कहना होगा कि ब्रह्मांडीय विज्ञान के रूप में भी स्थापित करता है। इसमें दृश्य जगत से लेकर अदृश्य चेतना तक का विश्लेषण मिलता है। गीता का यह दृष्टिकोण आधुनिक "क्वांटम चेतना" और "कॉस्मिक एनर्जी" संबंधी शोधों से अद्भुत रूप से मेल खाता है। दूसरी ओर गीता का सामाजिक दर्शन कहता है कि यदि व्यक्ति का चरित्र आदर्श, सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, संयमी और दृढ़ संकल्प वाला हो, तो परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण सुनिश्चित है। गीता मूलतः व्यक्तित्व निर्माण का ग्रंथ है, क्योंकि वही व्यापक सामाजिक निर्माण का प्रारंभिक आधार है। शक्ति, विनम्रता, दया, साहस, भक्ति, विवेक, समत्व ये सब गीता में वर्णित वे गुण हैं जो किसी भी राष्ट्र को स्थिरता और प्रगति की ओर ले जाते हैं।
समाजशास्त्रीय स्तर पर गीता यह भी स्पष्ट करती है कि मनुष्य की सफलता का मूल कारण उसका दृष्टिकोण है। समत्व, अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान में संतुलित रहना, आधुनिक तनाव-प्रबंधन और "इमोशनल इंटेलिजेंस" की अवधारणाओं का मूल स्रोत माना जा सकता है। इसी प्रकार निष्काम कर्म अर्थात फल की चिंता से मुक्त होकर कर्तव्य पालन आज के प्रबंधन विज्ञान में “फ्लो स्टेट” और “गोल-डिटैच्ड एफिशियेंसी” जैसे सिद्धांतों से तुलनीय है। गीता का अंतिम और सबसे विशिष्ट संदेश यह है कि मनुष्य को विवेक, वैराग्य और कर्म इन तीनों को साथ लेकर चलना चाहिए। यह संयोजन मनुष्य को सक्रिय रखते हुए भी मानसिक शांति प्रदान करता है। इसलिए गीता युद्धक्षेत्र में जन्मी, परन्तु युद्ध का नहीं कर्तव्य, ज्ञान और भक्ति की समन्वित चेतना का संदेश देती है।
2 months ago | [YT] | 0
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