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1 week ago | [YT] | 0
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"भारत की नई पिनाका मिसाइल (120km रेंज) के सफल टेस्ट पर आपकी क्या राय है?
1 week ago | [YT] | 1
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बेटी बचाओ, बेटी बढाओ संदेश के साथ बेटियो ने किया रैंप वाक
भोपाल- शहर के ईगल वेलफेयर सोसायटी द्वारा महिला सशक्तिकरण को लेकर बेटी बचाओ, बेटी बढाओ फैशन शो का आयोजन किया गया। इस शौ में शहर की उभरती 15 माडलो ने रेंप वाक किया। जिसमें मराठी, मद्रासी, गुजराती, पंजाबी, एयर होस्टेस्ट, पुलिस, आर्मी, डॉक्टर, वर्किंग वूमेन की ड्रेस पहन कर माडल ने वाक किया। इस शो का शुभारंभ पूर्व महापौर कृष्णा गौर ने किया । शो के आयोजकर नवीन वर्मा और मोनू गौर का कहना है कि इस शो के उद्देश्य से वे समाज के लोगो को बेटी बचाने का संदेश देना चाहते है जो बेटियो को कोख में मार देते है। उन्होने यहा भी कहा कि देश और समाज प्रगति कर रहा है और बेटिया हर स्तर पर अपने आपको साबित कर रही है। इसलिए उन्हें सम्मान मिलना चाहिये और बेटियो को भी बेटे के समान अधिकार मिलना चाहिये.. आयोजको का यह भी कहना है कि लगातार वे इस तरह का शो कर बेटी बचाओ के लिए मुहिम चलाते रहेंगे। कार्यक्रम मं इस मौके पर नवीन वर्मा, मौनू गौर, आयुष पाहरिया, नेहा राय, दीपिका राणा सहित बडी संख्या में दर्शक मौजूद थे।
2 weeks ago | [YT] | 0
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70 देशों की भागीदारी के साथ विश्वरंग अंतरराष्ट्रीय शोध सम्मेलन सम्पन्न
कला–साहित्य से ‘विकसित भारत’ की राह पर गहन विमर्श
भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (आरएनटीयू) में विश्वरंग के सातवें संस्करण के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “स्थानीय से वैश्विक : भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में साहित्य और कलाओं की भूमिका” गरिमामयी ढंग से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संयोजन मानविकी एवं उदार कला संकाय की डीन डॉ. रुचि मिश्र तिवारी द्वारा किया गया।
श्रीलंका के दृश्य व प्रदर्शन कलाएँ विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संबंध निदेशक डॉ. कमानी समरसिंघे ने कहा कि विश्वरंग ने कला और संस्कृति के माध्यम से 70 देशों को जोड़ते हुए एक अनूठा सांस्कृतिक–शैक्षणिक सेतु निर्मित किया है।
मानवता, साहित्य और वैश्विक भाषा–विस्तार पर गहन संवाद
प्रथम सत्र में पंजाब विश्वविद्यालय की डीन डॉ. योजना रावत ने मानव को वस्तु की तरह देखने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए भारतीय साहित्य–कला को मानवता के उत्थान का आधार बताया। उन्होंने हिंदी के वैश्विक प्रसार के लिए “हमें हिंदी से प्यार है” जैसे अभियानों को आवश्यक बताया।
पीईटीसी इंदौर की प्राचार्य डॉ. अल्का भार्गव ने भवानी प्रसाद मिश्र और अटल बिहारी वाजपेयी की रचनाओं के उदाहरणों द्वारा राष्ट्र निर्माण में महिलाओं और युवाओं की निर्णायक भूमिका को रेखांकित किया।
आरएनटीयू के कुलपति प्रो. रवि प्रकाश दुबे ने क्षेत्रीय भाषाओं, लोककला और रंगमंच को सामाजिक परिवर्तन और मानसिक मुक्ति का प्रभावी माध्यम बताया।
वेदों से एआई तक—विकसित भारत की वैज्ञानिक दृष्टि
दूसरे दिन डॉ. रोली शुक्ला का बहुचर्चित व्याख्यान “वेद से तरंगों तक : ॐ से स्वचालन तक” केंद्र में रहा। उन्होंने वेदों के वैज्ञानिक मूल्यों से आगे बढ़ते हुए एआई, नैतिकता और पर्यावरणीय संतुलन को 2047 तक विकसित भारत का आधार बताया।
डॉ. विजय शर्मा ने भारतीय संस्कृति में अनुशासन, साधना और अध्यात्म की अनिवार्यता समझाई।
दो दिनों में 40 शोध पत्र, शोध आधारित कला प्रस्तुतियों ने बाँधा मन
पहले दिन डॉ. मुकेश पचौरी और डॉ. सीमा रैजादा की अध्यक्षता में करीब 40 शोध–पत्र प्रस्तुत हुए—
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सामाजिक प्रभाव
• हिंदी सिनेमा में ऐतिहासिक स्थलों की प्रस्तुति
• आधुनिक कथन–शैली में एनीमे की भूमिका
दूसरे दिन पारंपरिक अकादमिक प्रस्तुतियों के साथ गीत, संगीत और नृत्य पर आधारित शोध–प्रस्तुतियाँ विशेष आकर्षण रहीं।
सम्मेलन की समृद्ध शोध सामग्री के आधार पर दो पुस्तकों के प्रकाशन की घोषणा की गई।
भारत–श्रीलंका शैक्षणिक सहयोग को नई दिशा
कार्यक्रम में आरएनटीयू और श्रीलंका विश्वविद्यालय के बीच शैक्षणिक सहयोग हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे भारत–श्रीलंका संबंधों के महत्वपूर्ण शैक्षणिक अध्याय के रूप में देखा गया।
पुरुस्कार वितरण
शोध–पत्र श्रेणी :
प्रथम – विश्नु कुमार
द्वितीय – विकास जैन
तृतीय – नूपुर तिवारी
सांत्वना – अशोक गुप्ता
प्रदर्शन कला श्रेणी :
प्रथम – साक्षी शर्मा
द्वितीय – अखिलेश अहिरवार
तृतीय – अमित राय
समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. प्रमोद कुमार नायक, कुलपति (एसेक्ट विश्वविद्यालय, हज़ारीबाग) ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि कला–साहित्य का संरक्षण ही विकसित भारत के सांस्कृतिक भविष्य की नींव है।
सम्मेलन का सार डॉ. रुचि मिश्रा तिवारी ने प्रस्तुत किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अंजलि तिवारी द्वारा दिया गया।
4 weeks ago | [YT] | 1
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*“भारत को जाने, भारत को माने, भारत के बने और फिर भारत को बनाएं” – डॉ. मनमोहन वैद्य*
आठ वर्षों के अनुभव का संग्रह है 'हम और यह विश्व' - श्री जगदीप धनखड़
भोपाल। सुरुचि प्रकाशन की ओर से रवींद्र भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डॉ. मनमोहन वैद्य की पुस्तक 'हम और यह विश्व' का विमोचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की मूल अवधारणा, आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और अध्ययनशील परंपरा पर व्यापक चर्चा हुई। इस अवसर पर श्री आनंदम धाम आश्रम, वृंदावन के पीठाधीश्वर श्री ऋतेश्वर जी महाराज, पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़, जागरण के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी, सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष श्री राजीव तुली और लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने अपने विचार प्रकट किए।
पुस्तक के लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारतीयता, अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता पर अपना उद्बोधन दिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत को बनाने से पहले आवश्यक है कि हम पहले भारत को माने, उसके बाद भारत को जाने, फिर भारत के बने और उसके बाद भारत को बनाएं। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत उस अनुभव से की जिसने उन्हें लेखन की ओर प्रेरित किया। संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग में जब श्री प्रणब मुखर्जी को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया था, तब कुछ लोगों ने बिना कारण विरोध किया। इस एक घटना ने मनमोहन जी को लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में केवल 1 से 6 जून के बीच 378 लोगों ने उनसे मिलने का अनुरोध किया था, जो यह दर्शाता है कि संघ को लेकर समाज में संवाद की गहरी उत्सुकता है।
उन्होंने बताया कि संघ पर बेवजह किया गया विरोध कई बार संघ की स्वीकार्यता को और बढ़ा देता है। जॉइन आरएसएस वेबसाइट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सिर्फ उस वर्ष अक्टूबर माह में ही 48,890 लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में जुड़ने का अनुरोध किया। यह भारत के सामाजिक परिवर्तन और संगठन के प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।
भारत की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें उन कथनों को समझना होगा जो हमारी सोच को प्रभावित करते हैं। उन्होंने लोकप्रिय गीत “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” की पंक्ति “हम बुलबुले हैं इसके” पर बताया कि ऐसे भाव हमें अपनी मूल चेतना से दूर करते हैं। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि भारत में सांस्कृतिक विविधता है। अपितु यह कहना अधिक सही है कि भारत की संस्कृति एक ही है जो विविध रूपों में प्रकट होती है। भारत में विविधता मूल संस्कृति की शाखाएं हैं, उसका विकल्प नहीं।
उन्होंने कहा कि वेलफेयर स्टेट की अवधारणा भारत की अपनी अवधारणा नहीं है, बल्कि पश्चिम से आयातित विचार है। भारत की परंपरा समाज-आधारित दायित्व पर आधारित रही है। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक चार महत्वपूर्ण खंडों में विभाजित है और प्रत्येक खंड भारत के विमर्शों पर नई दृष्टि प्रदान करता है।
*अध्ययन ही भारत की परंपरा का मूल – विष्णु त्रिपाठी*
जागरण समूह के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि यह पुस्तक सिर्फ घर या पुस्तकालय में संग्रह के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि इसके अध्ययन, मनन और भाष्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा किसी एक पुस्तक या एक मत पर आधारित नहीं है। यहाँ ज्ञान की अनेक धाराएँ हैं। हमारी आध्यात्मिकता भी अध्ययन और चिंतन से ही जन्म लेती है। उन्होंने भारत की पहचान पर उठने वाले प्रश्नों पर स्पष्ट कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है या नहीं जैसी बहसें अध्ययन के अभाव से उत्पन्न होती हैं। जब भारत और भारतीयता पर गौरव का भाव स्थापित हो जाता है, तो ऐसे प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने गुरुनानक देव जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे रामनाम के परम उपासक थे और बाबर की आलोचना सीधे अपने भजनों में करते हैं। इसी रामनाम के प्रसार के साथ वे बगदाद तक पहुँचे थे। यह उदाहरण भारतीय अध्यात्म की गहराई और व्यापकता दोनों को दिखाता है।
*“यह पुस्तक सोए हुए को जगा देगी” – पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़*
पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने कहा कि भोपाल आकर इस पुस्तक पर बोलने का अवसर उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि हम और यह विश्व सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत का दर्पण और भविष्य निर्माण की दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। श्री धनखड़ ने कहा कि यह पुस्तक आठ वर्षों के अनुभवों का संग्रह है, जिसमें श्री प्रणब मुखर्जी पर दो महत्त्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं।
वे अंग्रेजी में वक्तव्य देते हुए बोले कि मैं अंग्रेजी में इसलिए बोल रहा हूँ ताकि जो लोग देश की सकारात्मक छवि को समझना नहीं चाहते, वे भी स्पष्ट और सीधे शब्दों में भारत के वास्तविक स्वरूप से परिचित हों। उन्होंने यह भी कहा कि आज का भारत तेजी से बदल रहा है, हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और विश्व मंच पर एक मजबूत, आत्मविश्वासी और निर्णायक देश के रूप में उभर रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत में श्री राजीव तुली ने सुरुचि प्रकाशन की परंपरा और भविष्य की दिशा का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि सुरुचि प्रकाशन समाज जीवन के विविध महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार पुस्तकों, शोध कृतियों और विचारपरक सामग्री का प्रकाशन कर रहा है।
उन्होंने बताया कि आने वाले महीनों में वॉकिज़्म, पंच परिवर्तन और अन्य बौद्धिक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण प्रकाशन सामने आने वाले हैं। राजीव तुली ने कहा कि “हम और यह विश्व” पुस्तक के पाठन के दौरान ऐसा महसूस होता है जैसे पाठक और पुस्तक के बीच सीधा संवाद स्थापित हो रहा हो।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण पहले प्रकाशित हुआ था, लेकिन वर्तमान संस्करण में कई महत्त्वपूर्ण और विस्तृत जानकारियाँ जोड़ी गई हैं। यह पुस्तक आज के समाज के बड़े विमर्शों को पढ़ने, समझने और उनके भाष्य लिखने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
कार्यक्रम में गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बौद्धिक जगत से जुड़े अनेक प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे ने किया। अंकुर पाठक ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उपस्थित सभी अतिथियों, गणमान्यजनों और पुस्तक प्रेमियों का धन्यवाद किया। वंदे मातरम् के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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श्रीमद्भगवद्गीता है ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वित विज्ञान
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञान-परंपरा का वह अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें मानव जीवन के सभी स्तरों व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व को सशक्त, संतुलित तथा कल्याणकारी बनाने की क्षमता निहित है। यह धार्मिक अनुश्रुति के साथ ही ज्ञान, भक्ति और कर्म के त्रिवेणी-संगम से निर्मित एक ऐसा शाश्वत दर्शन है जिसकी प्रतिध्वनि हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को दिशा प्रदान करती रही है। इसकी महत्ता का प्रमाण यह तथ्य भी है कि ‘गीता’ को भारत समेत विश्व भर में सर्वाधिक वितरित किया जाने वाला ग्रंथ माना जाता है, जिसकी मान्यता न्यायिक प्रक्रियाओं से लेकर संविधान तक में परिलक्षित होती है। संविधान की मूल प्रति में अर्जुन को उपदेश देते श्रीकृष्ण का चित्र इसी सांस्कृतिक-दार्शनिक स्वीकार्यता का प्रतीक है। इसलिए भारत में गीता पर जितने भाष्य लिखे गए हैं, उतने शायद किसी अन्य ग्रंथ पर नहीं।
वस्तुत: यहीं इसकी बहुअर्थी शक्ति है; शंकराचार्य ने इसे अद्वैत-ब्रह्म का दार्शनिक आधार बताया, रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत के रूप में भक्तिपरक व्याख्या की, लोकमान्य तिलक ने इसे समाज-क्रांति और कर्मयोग का आधार बनाया, गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और कर्तव्य-निष्ठा की दिशा में इसका उपयोग किया और बिनोबा भावे ने इसे सामाजिक न्याय और भूदान आंदोलन के लिए प्रेरणा के रूप में ग्रहण किया। यह विविधता यह संकेत देती है कि गीता सार्वभौमिक है।
वर्तमान समय में केंद्र सरकार ने गीता को वैश्विक सांस्कृतिक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है। कुरुक्षेत्र में आरंभ हुआ अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव इसका उदाहरण है। इस वर्ष चालीस देशों में गीता जयंती का आयोजन होना यह संकेत देता है कि गीता का सनातन संदेश भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे मानवता को जोड़ने वाला सार्वभौमिक ज्ञान है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गीता की प्रासंगिकता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसका अनुवाद अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, उर्दू, अरबी और फारसी सहित अनेक भाषाओं में किया गया है। पश्चिमी देशों के कई विश्वविद्यालय गीता को दर्शन और धार्मिक अध्ययन में पाठ्य सामग्री के रूप में पढ़ाते हैं। 19वीं और 20वीं शताब्दी के अनेक पश्चिमी दार्शनिकों ने गीता की तुलना ग्रीक, रोमन और ईसाई ग्रंथों से करते हुए इसे अधिक समन्वित और मानव-हितकारी बताया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गीता महाभारत के युद्धभूमि पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में प्रस्तुत होती है। उत्खनन, समुद्र तल अनुसंधान तथा खगोल-आधारित शोधों के आधार पर महाभारत का काल लगभग ईसा से 3100 वर्ष पूर्व माना जाता है। अत: इस आधार पर गीता का उपदेश मानव जाति को कम से कम पाँच हजार वर्ष पूर्व प्राप्त हुआ। गीता के 700 श्लोकों में 573 श्लोक स्वयं श्रीकृष्ण के वचन हैं, जबकि 84 श्लोक अर्जुन के, 42 संजय के और एक धृतराष्ट्र से जुड़ा हुआ है।
कह सकते हैं कि पिछले पांच हजार सालों से लगातार श्रीमद्भगवद्गीता एक दार्शनिक ग्रंथ होने के साथ ही संवादात्मक साहित्य का संभवतः सबसे प्रभावी उदाहरण बना हुआ है। इसमें 18 अध्याय हैं, जिनमें से प्रत्येक को “योग” नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि वे जीवन के किसी विशिष्ट आयाम के साथ मन को जोड़ने (युज) के उपदेश देते हैं; विषाद, सांख्य, कर्म, ध्यान, भक्ति, संन्यास से लेकर मोक्ष तक की संवाद यात्रा आपको मन की अनेक अवस्थाओं में ले जाते हुए अंत में परम शांति में स्थापित कर देती है, जहां न राग है, न मोह है, न लोभ है और न ही किसी प्रकार का हर्ष या शोक है।
वस्तुत: गीता का मूल उद्देश्य मनुष्य को समस्या से पलायन से मुक्त करते हुए समाधान के लिए बौद्धिक, मानसिक और नैतिक शक्ति प्रदान करना है। अर्जुन का विषाद पूरे मानव समाज का प्रतिनिधि है; जब कर्तव्य और भावनाएँ टकराती हैं, जब नैतिकता और व्यवहारिकता के बीच संघर्ष होता है। श्रीकृष्ण का उपदेश बताता है कि समस्या की जड़ अज्ञान और मोह में है। जब व्यक्ति वास्तविकता के ज्ञान से दीप्त होता है तो असमंजस स्वतः दूर हो जाता है। यही कारण है कि गीता ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों मार्गों को समन्वित करती है और बताती है कि जीवन की समग्रता इन तीनों के संतुलन में है।
अध्ययन के स्तर पर गीता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका बहु-स्तरीय ज्ञान-तंत्र है। इसमें मनोविज्ञान भी है, अध्यात्म भी; समाजशास्त्र भी है और नैतिक दार्शनिकता भी। गीता मनुष्य की इंद्रियों, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की कार्यप्रणाली पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह एक प्रकार से उस काल का “कॉग्निटिव साइंस” कहा जा सकता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक शोधों में जो बातें विवेक, एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और मानसिक दृढ़ता के संदर्भ में कही जाती हैं, गीता हजारों वर्ष पूर्व उन सभी तत्वों को सूत्रबद्ध कर चुकी है।
प्रकृति के पाँच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के साथ मनुष्य की चेतना का संबंध समझाने का दृष्टिकोण गीता को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही कहना होगा कि ब्रह्मांडीय विज्ञान के रूप में भी स्थापित करता है। इसमें दृश्य जगत से लेकर अदृश्य चेतना तक का विश्लेषण मिलता है। गीता का यह दृष्टिकोण आधुनिक "क्वांटम चेतना" और "कॉस्मिक एनर्जी" संबंधी शोधों से अद्भुत रूप से मेल खाता है। दूसरी ओर गीता का सामाजिक दर्शन कहता है कि यदि व्यक्ति का चरित्र आदर्श, सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, संयमी और दृढ़ संकल्प वाला हो, तो परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण सुनिश्चित है। गीता मूलतः व्यक्तित्व निर्माण का ग्रंथ है, क्योंकि वही व्यापक सामाजिक निर्माण का प्रारंभिक आधार है। शक्ति, विनम्रता, दया, साहस, भक्ति, विवेक, समत्व ये सब गीता में वर्णित वे गुण हैं जो किसी भी राष्ट्र को स्थिरता और प्रगति की ओर ले जाते हैं।
समाजशास्त्रीय स्तर पर गीता यह भी स्पष्ट करती है कि मनुष्य की सफलता का मूल कारण उसका दृष्टिकोण है। समत्व, अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान में संतुलित रहना, आधुनिक तनाव-प्रबंधन और "इमोशनल इंटेलिजेंस" की अवधारणाओं का मूल स्रोत माना जा सकता है। इसी प्रकार निष्काम कर्म अर्थात फल की चिंता से मुक्त होकर कर्तव्य पालन आज के प्रबंधन विज्ञान में “फ्लो स्टेट” और “गोल-डिटैच्ड एफिशियेंसी” जैसे सिद्धांतों से तुलनीय है। गीता का अंतिम और सबसे विशिष्ट संदेश यह है कि मनुष्य को विवेक, वैराग्य और कर्म इन तीनों को साथ लेकर चलना चाहिए। यह संयोजन मनुष्य को सक्रिय रखते हुए भी मानसिक शांति प्रदान करता है। इसलिए गीता युद्धक्षेत्र में जन्मी, परन्तु युद्ध का नहीं कर्तव्य, ज्ञान और भक्ति की समन्वित चेतना का संदेश देती है।
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कलचुरी समाज का निशुल्क चतुर्थ सामूहिक विवाह सम्मेलन सम्पन्न
परंपरा, आधुनिकता और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम—एक साथ निकली 11 जोड़ों की भव्य सामूहिक बारात
भोपाल। राजधानी के एलएनसीटी विश्वविद्यालय सभागार में रविवार को कलचुरि कलार समाज द्वारा आयोजित निःशुल्क चतुर्थ सामूहिक विवाह सम्मेलन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का अद्वितीय उदाहरण बना। भव्य रथों पर सवार होकर 11 जोड़ों की सामूहिक बारात निकली तो पूरा परिसर ‘एक समाज–एक उत्सव–एक संदेश’ के भाव से गूंज उठा। आयोजन समिति की महिलाओं का पिंक परिधान तथा पुरुषों का सफेद कुर्ता-पायजामा एवं पिंक जैकेट सम्मेलन की ‘एकरूपता की मिसाल’ बना। वहीं दूल्हों ने पिंक कोट-पैंट और दुल्हनों ने लाल पारंपरिक पोशाक धारण कर समूचे वातावरण को वैवाहिक उल्लास से भर दिया।
भगवान सहस्त्रबाहु पूजन से हुई शुरुआत—संतों का मिला मंगल आशीर्वाद
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्री सहस्त्रबाहु जी की पूजा-अर्चना के साथ हुआ। धर्माचार्यों एवं संतों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच नवदंपतियों को आशीर्वाद देते हुए उन्हें धर्म, मर्यादा और सद्भाव के मार्ग पर चलते हुए सुखमय दांपत्य जीवन का संदेश दिया। मीडिया प्रभारी राजेश राय ने बताया कि विवाह के समस्त संस्कार—पाणिग्रहण, भांवर, सप्तपदी—परंपरागत वैदिक विधि से सम्पन्न किए गए। परिसर में स्वागत द्वार, वरमाला मंच, कन्यादान स्थल, मंडप और भोजन शाला को विशेष सांस्कृतिक थीम पर सजाया गया था। सम्मेलन में डॉ. अनुपम चौकसे, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरि महासभा ने कहा कि इस सामूहिक विवाह सम्मेलन ने समाज की उस ऊर्जा और एकता को सामने रखा है जो हमारी असली ताकत है। यहाँ आए परिजन कभी बाराती बनकर तो कभी घराती बनकर उत्सव में शामिल हुए। दूर-दूर से आए समाजजनों ने यह सिद्ध कर दिया कि कलचुरी समाज की यह परंपरा अब एक नए युग का प्रारंभ है। श्रीमती पूनम जय नारायण चौकसे, संरक्षक, वरिष्ठ नागरिक मंच कलार समाज कहा कि सामूहिक विवाह केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोने का श्रेष्ठ और सशक्त माध्यम है। यह आयोजन सामाजिक सद्भाव, परंपरा और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रेरक मॉडल है, जिसे पूरा प्रदेश अपनाने योग्य है। जयनारायण चौकसे, अध्यक्ष, अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरी महासभा ने कहा कि आज मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से संगठन और समाजजन भारी संख्या में पहुंचे, इससे स्पष्ट संदेश गया कि—‘एक कलचुरि सबके लिए, और सब कलचुरि एक के लिए’। इस सम्मेलन की सफलता में युवाओं की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही। कल्पना आई.डी. राय, अध्यक्ष, वरिष्ठ नागरिक मंच कलार समाज आयोजन स्थल पर प्रत्येक जोड़े के लिए अलग-अलग वेदियाँ बनाई गईं, जहाँ सभी वैवाहिक रस्में गरिमामय ढंग से सम्पन्न हुईं। फेरे के बाद सभी नवदंपतियों को विवाह प्रमाणपत्र प्रदान किया गया तथा पौधा रोपण कर उन्हें पर्यावरण संरक्षण का संकल्प दिलाया गया। महापौर मालती राय ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक मंच के आग्रह पर नगर निगम द्वारा 1 लाख रुपये की अनुदान राशि स्वीकृत कराई गई, जिससे नवदंपतियों के लिए उपहार क्रय कर वितरित किए गए। समाज के इस उत्कृष्ट आयोजन की मैं हृदय से सराहना करती हूँ और सभी आयोजकों को शुभकामनाएँ देती हूँ। कौशल राय, अध्यक्ष, कलचुरि सेना ने कहा कि कलचुरि सेना के युवाओं ने अनुशासन, उत्साह और जिम्मेदारी का अद्भुत परिचय दिया। 11 जोड़ों की सामूहिक बारात समाज की गौरवशाली परंपरा का भव्य प्रदर्शन थी। युवाओं की ऐसी सक्रियता ही हर आयोजन की सफलता का मूल है।
निःशुल्क सम्मेलन—पूरी व्यवस्थाएँ एलएनसीटी समूह एवं समाज द्वारा
सम्मेलन पूरी तरह निशुल्क रहा, जिसमें एलएनसीटी समूह द्वारा आवास, चाय-नाश्ता, भोजन, मंडप, विवाह मंच, जलपान, स्वागत प्रबंधन और अन्य व्यवस्थाओं का दायित्व निभाया गया। विवाह सामग्री, उपहार एवं कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ समाजजनों के सहयोग से सम्पन्न हुईं। सम्मेलन का लाइव प्रसारण वरिष्ठ नागरिक मंच कलार समाज के फेसबुक पेज पर किया गया।
परंपरागत विधि और संतों का आशीर्वाद
मीडिया प्रभारी राजेश राय ने बताया कि पूरे विवाह संस्कार वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न हुए। अखिल भारतवर्षीय हैहय कलचुरि महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जय नारायण चौकसे, और मंच की संरक्षक श्रीमती पूनम जय नारायण चौकसे ने धर्माचार्यों और संत स्वामी पगलानंद जी महाराज, स्वामी ओमप्रकाश जी महाराज, स्वामी पूर्णानंद जी महाराज, संत विनोद शास्त्री जी महाराज, और संत रामदास जी महाराज की पादिका पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात संतो ने नवजीवन आरंभ कर रहे वर-वधु को आशीर्वाद दिया। एलएनसीटी परिसर में स्वागत गेट, वरमाला मंच, कन्यादान मंच सप्तपदी स्थल और भोजन शाला, विशेष रूप से सांस्कृतिक थीम पर सजाए गए थे।
ये रहे मौजूद-
सम्मेलन के मुख्य समन्वयक जयनारायण चौकसे, श्रीमती पूनम चौकसे एवं श्रीमती कल्पना आई.डी. राय हैं। आयोजन में मंत्री कैलाश विश्वास सारंग, पूर्व प्रोटेम स्पीकर व हुजूर विधायक रामेश्वर शर्मा, भाजपा जिलाध्यक्ष रविन्द्र यति, महापौर श्रीमती मालती राय, एड. एल.एल. राय, डॉ. अनुपम चौकसे, डॉ, श्वेता चौकसे, पूजा श्री चौकसे, विंग कमांडर वी.के. राय, डॉ. एलएन मालवीय, एलएन मालवीय, कौशल राय, अशोक राय, वीरेन्द्र पप्पू राय, विष्णु जायसवाल, सुशीला चौकसे,राजन सेवईवार, अर्जुन जायसवाल, सुनील मालवीय, राजाराम शिवहरे, पूनम चौधरी दिल्ली, एडीएम निधि चौकसे, डी.पी. गुप्ता, प्रकाश मालवीय, विपिन चौकसे संजय चौकसे, माया मालवीय, कमला राय, डॉली मालवीय, सहायक जनसंपर्क अधिकारी अवंतिका जायसवाल, राजकुसुम राय, नीता राय, हरीश मालवीय, सतीश आर्य, आई.डी. राय, प्रकाश मालवीय, राजेश राय, वीरेन्द्र (पप्पू) राय, हरिराम राय, पी.डी. राय, अमरीश राय, प्रमोद राय, प्रमोद ओम जायसवाल, श्री सुरेश मालवीय, सतीश कुमार आर्य, पीसी मालवीय, आईडी राय, नीता राय, कमलेश राय, गेंदा लाल जी चौकसे, पीडी राय, दीपक राय, सुरेश चौकसे, रमेश प्रसाद ओमरे, रमेश ओमरे, ओमप्रकाश चौकसे, ओम प्रमोद राय, सुधाकर राउत, पवन चौकसे, राजा चौकसे, डॉ. विराट जायसवाल, डॉ. संदीप शिवहरे, डॉ. जगदीश जायसवाल, डॉ. अनुराग एसडी राय, विनोद सूर्यवंशी, अशोक शिवहरे, श्रीमती उषा मालवीय, पीसी मालवीय, दिलीप मालवीय सहित अनेक समाजजन अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। आयोजकों ने समाज के सभी सदस्यों से तन-मन-धन से सहयोग कर सम्मेलन को सफल बनाने का आभार व्यक्त किया।
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khabre24x7
भोपाल कोटरा सुल्तानाबाद की रहने वाली इस साधारण परिवार की बेटी ने जीता मिस इंडिया का ख़िताब और बनी 2025 की मिस इंडिया यह कार्यक्रम नंदन पैलेस 13 सितंबर किया गया था होशंगाबाद रोड में इसमें कुल 120 प्रतिभागी शामिल इसमें फेमिना वालों को भी बड़ा योगदान था अंशिका शर्मा को ख़िताब मिस इंडिया के साथ भी एक लाख रुपए भी प्रदान किया जाएगा इसके साथ इंटरनेशनल ट्रिप भी मिलेगी हाल ही में रिलीज हुई अभिषेक बच्चन की फिल्म कालीधर लापता में अहम भूमिका में अंशिका शर्मा नजर आएंगी
3 months ago | [YT] | 1
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khabre24x7
विश्वगुरु बनना है भारत की नियति...
समाज हितैषी कार्य करते हुए जन-जन तक पहुँचा संघ
मध्यभारत प्रांत के संघ शिक्षा वर्गों प्रकटोत्सव समारोह सम्पन्न
भोपाल। रायसेन,सिरोंज एवं विदिशा में पिछले 15 दिवस से आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यभारत प्रान्त के संघ शिक्षा वर्गों का प्रकटोत्सव समारोह रविवार को सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर वर्ग के दौरान प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले स्वयंसेवकों ने सूर्य नमस्कार, योग, व्यायाम योग, दंड युद्ध, नियुद्ध और पदविन्यास का प्रभावी प्रदर्शन किया।
रायसेन में मुख्यवक्ता प्रांत संघचालक श्री अशोक पांडेय ने कहा कि शुरुआती दौर में संघ को उपेक्षा, उपहास और अपमान का सामना करना पड़ा, फिर भी संघ समाज हित में निरंतर कार्य करते हुए जन-जन तक पहुंचा। वर्तमान में देशभर में संघ की लगभग 73,000 शाखाएं, हजारों मिलन और 40 से अधिक समविचारी संगठन सक्रिय हैं।
उन्होंने पंच परिवर्तन के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ शताब्दी वर्ष में समाज में पाँच परोपकारी कार्य लेकर समाज की दृष्टि से कार्य कर रहा है जिसमें पर्यवारण जिसके द्वारा वृक्ष और जल का संरक्षण तथा सिंगल यूज़ प्लास्टिक मुक्त भारत, समरसता के माध्यम से समाज में व्याप्त क्लेश तथा जन्म आधारित छुआछूत और अस्पृश्यता को समाप्त करना, परिवार नामक हमारी संस्था के टूटने के कारण समाज में व्याप्त गिरावट को कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से रोकना, अपने गौरवशाली अतीत को याद कर उस पर गर्व करना अपने श्रेष्ठ ज्ञान/परंपराओं आदि का पुनः स्थापित करने "स्व बोध" का भाव जागरण करना एवं नागरिक शिष्टाचार के माध्यम से प्रत्येक नागरिक कर्तव्य व शासन-समाज के नियम और कानून का पालन कर सभी राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने के पवित्र कार्य मे सहयोगी बनें।
सिरोंज में प्रकटोत्सव समारोह की अध्यक्षता कर रहे श्री श्री 1008 ईश्वर दास जी ने आशीर्वचन ने देते हुए कहा कि स्वयंसेवक अपनी साधना एवं त्याग के बल पर समाज सेवा में रत रहते हैं। स्वयंसेवकों को यह शिक्षा शाखा एवं वर्ग के माध्यम से प्राप्त होती है।
मुख्यवक्ता प्रांत संघचालक डॉ राजेश सेठी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हर भारतवासी में राष्ट्रभक्ति एवं चरित्र निर्माण के लिए हुई थी। जिसका उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन से समाज परिवर्तन स्व के आधार पर करना है, यह संघ ही है जहाँ व्यक्ति आता है तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है एवं संस्कारों का निर्माण होने लगता है।
डॉ केशव बलीराम हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना कोई आवेश में आकर नहीं की बल्कि बहुत सोच समझकर की थी। आज संघ शताब्दी वर्ष में है, समाज परिवर्तन करना होगा, व्यवस्था परिवर्तन करना होगा। संघ समाज परिवर्तन करने के लिए राष्ट्रीय चेतना का स्तर बनाने निकला है। भारतवासी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए प्राणों को न्यौछावर तक करने तैयार हैं।
स्वामी विवेकानंद कहते थे हर राष्ट्र का स्वभाव होता है, सर्वें भवन्तु सुखिनः भारत का स्वभाव है और विश्व गुरु बनना भारत की नियति है। यह भारत है जिसका स्व आधार है, भारत जहाँ गया संस्कृति देकर आया, समृद्धि देकर आया है। यह भारत है जिसमें स्व का स्वभिमान का भाव है, और यही भाव जागृत करना संघ का उद्देश्य है।
तीनों वर्गों में 801 स्वयंसेवकों ने लिया प्रशिक्षण :
विगत 15 दिनों से चल रहे इन शिक्षा वर्गों में संघ दृष्टि के 31 जिलों से आए 801 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। आज समापन के अवसर पर शिक्षार्थियों ने 15 दिन में शिक्षा वर्ग में सीखे गए शारीरिक, योग, व्यायाम, दंड युद्ध, नियुद्ध, पदविन्यास, समरसता, सामंजस्य और समन्वय आदि के साथ ही घोष की विभिन्न मनमोहक रचनाओं का वादन कर कार्यक्रम देखने पधारे नगर के लोगों का मन मोह लिया। इस अवसर पर नगर से युवा, मातृशक्ति, प्रबुद्धजन और गणमान्य नागरिक सहित नजदीकी ग्रामों से भी बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
7 months ago | [YT] | 0
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"आईआईटी खड़गपुर: युवा इनोवेटर्स के लिए YIP का छठा संस्करण शुरू"
आईआईटी खड़गपुर यंग इनोवेटर प्रोग्राम (YIP) के छठे संस्करण के लिए आवेदन खुले हैं। पंजीकरण की अंतिम तिथि 12 दिसंबर, 2024 है। कार्यक्रम का उद्देश्य कक्षा 8 से 12 के छात्रों में वैज्ञानिक सोच विकसित करना है।
पहले दौर में, ऑनलाइन प्रस्तुति के आधार पर शीर्ष टीमों का चयन किया जाएगा। चयनित टीमों को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर में अपने मॉडल और प्रोटोटाइप प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। इनका मूल्यांकन संस्थान के प्रोफेसरों द्वारा किया जाएगा।
YIP को भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद और सिंगापुर के GIIS स्मार्ट कैंपस की राधा जी जैसे कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों से सराहना मिली है। 2023 में 3,000 से अधिक प्रविष्टियों के साथ, YIP ने वैश्विक स्तर पर युवा दिमागों को प्रेरित किया है।
भागीदारी के लिए, स्कूल के प्रिंसिपल को एक समन्वयक शिक्षक नामित करना होगा। शिक्षक को छात्रों के पंजीकरण के लिए एक यूजर आईडी और पासवर्ड दिया जाएगा। छात्र दो या तीन सदस्यों की टीम बनाकर अपनी जानकारी शिक्षक को सौंपेंगे।
पहले दौर में वैज्ञानिक प्रस्ताव प्रस्तुत करना होगा। सफल टीमों को सेमीफाइनल के लिए तीन दिवसीय कार्यक्रम के लिए आईआईटी खड़गपुर बुलाया जाएगा। इस चरण में पंजीकरण शुल्क की जानकारी परिणामों के बाद दी जाएगी। फाइनल में, टीमें अपने विचारों की प्रस्तुति और प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लेंगी।
इच्छुक छात्र अपने प्रोजेक्ट्स पर और काम करने के लिए आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसरों से संपर्क कर सकते हैं।
पंजीकरण के लिए लिंक: yip.iitkgp.ac.in/
1 year ago | [YT] | 3
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