Samaj ka sach
About channel -
"Samaj ka sach" चैनल समाज में फैली कुरीतियों, भ्रष्टाचार, रूढ़ियों, लैंगिक भेदभाव, महिला शोषण, अंधविश्वास, पाखंड, अमानवीय कृत्यों को बेनकाब करने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि मानव सभ्यता एक बेहतर जीवन जी सके, सिर्फ मानवीय, वैज्ञानिक सोच ही मानव भविष्य को बेहतर बना सकती है इसलिए मानवता और वैज्ञानिक सोच जरुरी है, इंसानियत और वैज्ञानिक सोच लोगों में जागृत हो सके इसके लिए हम अपने चैनल के माध्यम से प्रयासरत हैं..
मुझसे संपर्क करने के लिए shashisingh9192@gmail.com पर ईमेल करें.
_______
अगर मेरा काम पसंद आ रहा है और आप चाहते हैं कि समाज को बेहतर बनाने के लिए जागरूकता फैलाते रहें, तो आप चैनल को मजबूत बनाने के लिए आर्थिक रूप से समर्थन दे सकते हैं।
मेरी UPI ID shashisingh9192@okicici पर अपनी इच्छानुसार राशि भेजकर मदद कर सकते हैं। आपका हर योगदान विचारशील और प्रेरणादायक कंटेंट को जारी रखने में सहायता करेगा। आपका समर्थन मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
My other channel link- youtube.com/@shashi.antinatalist?si=q97vejADNBxm5F…
Samaj ka sach
भारतीय समाज एक पुरुषप्रधान/पितृसत्तात्मक समाज है। यह व्यवस्था सदियों से महिलाओं को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई।
लेकिन इस मूर्ख सड़ी-गली व्यवस्था के चलते करोड़ों महिलाएं तो रोज प्रताड़ित की ही जा रही हैं, साथ में कुछ पुरुष भी पिस रहे हैं।
इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लड़की की "ससुराल विदाई' सबसे क्रूर कुप्रथा है। इस व्यवस्था में लड़कियों को गुलाम बनाकर रखने का नियम है। इसमें उसी पुरुष को मजबूत माना जाता है जो पुरुष अपनी पत्नी को गुलाम बनाकर रख सके।
अगर कोई पति अपनी पत्नी को प्रेम करता है या करना चाहता है तो उसे कमजोर या "जोरू का गुलाम" आदि कहकर मजाक उड़ाया जाता है। यानी यहाँ इंसानियत नहीं, बल्कि नियंत्रण को ताकत माना जाता है।
इसलिए अधिकतर पुरुष पत्नी को अपने कंट्रोल में रखने की पूरी जी जान लगा देते हैं। आधुनिक समय में कोई पत्नी अगर गुलाम बनकर न रहना चाहे, इंसान बनकर जीना चाहे, कानून में दिए गए अधिकारियों का इस्तेमाल करना चाहे
तो पति अपमानित और प्रताड़ित महसूस करते हैं।
तमाम पुरुष हर साल इससे इतने आहत हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं या फिर पत्नी की हत्या कर देते हैं।
जब तक पितृसत्तात्मक मानसिकता जड़ से खत्म नहीं होगी , विदाई/विवाह कुप्रथा खत्म नहीं होती तब तक ऐसा ही चलता रहेगा...
समाज को न पितृसत्ता की जरूरत है, न मातृसत्ता की। न बेटी ससुराल विदा हो, न बेटा। जरूरत समता और समानता की है। जहां बेटा-बेटी को बचपन से ही समान अधिकार और समान अवसर मिलें।
शुरुआत पिताओं को करना होगा। बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा, समान अवसर और समान संपत्ति अधिकार देना होगा। और सबसे ज़रूरी बेटी की ससुराल विदाई प्रथा जड़ से ख़त्म होना जरूरी है।
#samaj_ka_sach
#shashi_antinatalist
#पितृसत्ता_मुर्दाबाद #विवाह_प्रथा_बंद_हो
#पितृसत्ता_और_रूढ़िवाद_से_मुक्ति_अभियान
5 days ago (edited) | [YT] | 382
View 44 replies
Samaj ka sach
अभी एक वीडियो खबर देखी जिसमें एक स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही लड़की को उसके बाप ने उसे गोलियों से भून दिया, क्योंकि उसे अपनी बेटी का लिपिस्टिक लगाना पसंद नहीं था।
मेरे खानदान में भी लड़कियों का डार्क लाल लिपिस्टिक लगाना अच्छा नहीं माना जाता। मेरी मां डार्क लिपस्टिक कभी इसलिए नहीं लगाती ताकि कोई उन्हें गलत न समझे।
ये सब महिलाओं के लिए पितृसत्तात्मक पैमाने हैं।
जानकारी के लिए बता दूं, लिपस्टिक सिर्फ मेकअप नहीं है ये विद्रोह का प्रतीक भी है।
इतिहास उठाकर देखिए, जब-जब महिलाओं ने लिपस्टिक लगाई, वो सिर्फ सुंदर दिखने के लिए नहीं था, बल्कि एक मैसेज था
“हम अपने शरीर और अपनी पसंद पर खुद का हक़ रखती हैं।”
कभी समाज ने इसे “चरित्र” से जोड़कर बदनाम किया,
कभी कहा गया कि “अच्छी लड़कियाँ” लिपस्टिक नहीं लगातीं…
लेकिन हर बार महिलाओं ने इन नियमों को तोड़ा।
युद्ध के समय भी महिलाओं ने लाल लिपस्टिक लगाकर ये दिखाया कि वो डरने वाली नहीं हैं।
फेमिनिस्ट आंदोलनों में लिपस्टिक एक बयान बन गई
एक छोटा सा रंग, लेकिन बड़े-बड़े पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ।
आज भी जब कोई लड़की अपनी मर्ज़ी से लिपस्टिक लगाती है,
तो वो सिर्फ सज नहीं रही होती, वो अपनी आज़ादी को जी रही होती है।
अगर समाज हमें रोकता है तो लिपस्टिक विद्रोह बन जाती है।
अगर समाज आपको मजबूर करता है तो वही लिपस्टिक दबाव बन जाती है।
इसलिए असली लड़ाई लिपस्टिक की नहीं, agency (अपनी पसंद का अधिकार) की है।
-------
विक्टोरियन युग में, मेकअप को भद्दा माना जाता था और मेकअप करने वाली किसी भी महिला को चरित्रहीन समझा जाता था।
लिपस्टिक तब भी लोकप्रिय थी, लेकिन 20वीं शताब्दी तक इसे शक्ति और विद्रोह के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाता था। इसकी शुरुआत ब्रिटेन में महिला मताधिकार आंदोलन के दौरान हुई, जब महिलाओं ने अपनी ताकत और एकजुटता दिखाने के लिए लाल लिपस्टिक लगाना शुरू किया। यह चलन जल्दी ही अन्य देशों में फैल गया और लिपस्टिक नारीवाद और महिला सशक्तिकरण से जुड़ गई।
लाल लिपस्टिक ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के विद्रोह, शक्ति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक रही है, जो पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती देती है। 20वीं सदी की शुरुआत में मताधिकार आंदोलन (Suffragettes) से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के प्रतिरोध और आधुनिक नारीवादी आंदोलनों तक, इसे उत्पीड़न के खिलाफ साहस और दृढ़ता के बयान के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
हाल ही में, लाल लिपस्टिक आंदोलन अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं के अधिकारों के दमन के खिलाफ एक प्रमुख डिजिटल विरोध के रूप में भी उभरा।
इसका सांस्कृतिक महत्व दिखाता है कि महिलाएं अपनी स्त्रीत्व (femininity) और कामुकता की अनदेखी किए बिना भी सशक्त और बागी हो सकती हैं, जिसे "लिपस्टिक नारीवाद" कहा जाता है।
लाल लिपस्टिक केवल एक सौंदर्य उत्पाद नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक हथियार है जो महिलाओं को अपनी बात कहने और पुरुषों द्वारा तय की गई सीमाओं को तोड़ने की शक्ति प्रदान करता है।
#lipistic
#Samaj_ka_sach
6 days ago | [YT] | 338
View 45 replies
Samaj ka sach
आज बुद्ध पूर्णिमा पर अगर आपने पशु दूध से बनी खीर बनाई या खाई,
तो एक बार ये ज़रूर सोचिए
क्या ये सच में अहिंसा है?
डेयरी इंडस्ट्री में दूध के लिए गाय-भैंस का लगातार शोषण होता है।
उनसे बार-बार गर्भधारण करवाया जाता है, बच्चों से अलग किया जाता है,
और उनकी प्राकृतिक ज़िंदगी छीन ली जाती है। बांध कर रखा जाता है उनको।
ऐसे में, क्या दूध से बनी खीर सच में अहिंसक कही जा सकती है?
आज का दिन हमें बुद्ध की पूजा नहीं,
बल्कि करुणा और सच को समझने का मौका देता है।
संकल्प लेना चाहिए पशु दूध या पशु शोषण से बनी किसी चीज का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
आइए, एक संकल्प लें
हम पशु दूध या पशु शोषण से बनी किसी भी चीज़ का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
और अगर खीर खानी ही है,
तो पशु दूध के बजाय नारियल दूध या अन्य वनस्पति आधारित विकल्प अपनाएं। 🙏💚🍀
#buddha #vegan #BuddhaPurnima
#dairy #compassion
6 days ago (edited) | [YT] | 172
View 39 replies
Samaj ka sach
जो लोग ये मानते हैं कि "बुद्ध" रात में छुपकर पत्नी और बच्चे को छोड़कर भाग गए थे।
उन्हें सच जानना ज़रूरी है।
पूरा सच जानने के लिए ये वीडियो ज़रूर देखें।
लिंक- https://youtu.be/d8ZtjUpFcRA
#buddha
#Samaj_ka_sach
1 week ago | [YT] | 372
View 38 replies
Samaj ka sach
आज बुद्ध पूर्णिमा है। आज ही के दिन महामानव गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, और संयोग से आज के दिन ज्ञान प्राप्ति (ज्ञानोदय) और महापरिनिर्वाण (मृत्यु) हुआ था।
आज का दिन हमें शांति, करुणा और सत्य के मार्ग की याद दिलाता है।
बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर, हम यह संकल्प लें कि अपने भीतर के अज्ञान, क्रोध और अहंकार को त्यागकर ज्ञान, प्रेम और मानवता को अपनाएँ।
महापारिनिर्वाण दिवस हमें यह सिखाता है कि जीवन अनित्य है, लेकिन हमारे कर्म और विचार ही हमें अमर बनाते हैं।
आइए, हम सब मिलकर दुखों से मुक्ति और समता के उस मार्ग पर चलें, जो बुद्ध ने हमें दिखाया।
आज के दिन हम यह भी प्रण लें कि किसी भी निर्दोष जीव को अनावश्यक कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। जीव हिंसा केवल शरीर को नहीं, बल्कि हमारी मानवता और संवेदनशीलता को भी आहत करती है।
करुणा ही सच्ची नैतिकता है। हर जीव के प्रति दया और सम्मान ही बुद्ध के मार्ग की असली पहचान है।
आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा और महापारिनिर्वाण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
शांति, करुणा और प्रज्ञा आपके जीवन में सदैव बनी रहे। 🌼
वीडियो देखें - https://youtu.be/fDeWuK775ag
1 week ago | [YT] | 1,140
View 78 replies
Samaj ka sach
अब स्त्री को कथित मर्यादा में रहने की जरूरत नहीं।
#Samaj_ka_sach
#पितृसत्ता_और_रूढ़िवाद_से_मुक्ति_अभियान
1 week ago | [YT] | 513
View 51 replies
Samaj ka sach
जो लोग नीले रंग का मज़ाक उड़ाते हैं,
शायद उन्होंने कभी आसमान की ऊँचाई को समझा ही नहीं,
या समंदर की गहराई में झाँका ही नहीं।
नीला रंग सिर्फ एक रंग नहीं
ये विस्तार है, सोच है, आज़ादी है।
ये उसी आसमान और समंदर का रंग है,
जिनकी कोई सीमा नहीं होती।
यह हमें सिखाता है- उदारता, गहराई और अनंत होने का अर्थ।
नज़रिया अपना-अपना हो सकता है,
लेकिन सच यही है कि
नीले के बिना न कुदरत पूरी लगती है,
और न ही हमारी दुनिया।
#Samaj_ka_sach #blue
1 week ago | [YT] | 345
View 29 replies
Samaj ka sach
लड़के अक्सर कम पढ़ी-लिखी या अनपढ़ लड़की से शादी करते हैं ताकि वो कंट्रोल में रहे।
फिर जब वही लड़की आगे पढ़ना चाहती है, कुछ बनना चाहती है या नौकरी की तैयारी करती है, तो उसे “इजाज़त” दी जाती है।
इस उम्मीद में कि अब घर की आमदनी बढ़ेगी।
लेकिन इसके साथ ही उस पर घर के सारे काम, बच्चों की जिम्मेदारी और हर बार एहसान का बोझ डाल दिया जाता है कि हमने तुम्हें पढ़ाया है या ये नौकरी करने दी"।
सवाल ये है कि पढ़ाई/नौकरी कब से किसी का एहसान हो गई?
अपने जीवन को बेहतर बनाने का हक कब से किसी की इजाज़त पर निर्भर हो गया?
और जब वही महिला आत्मनिर्भर होकर ये तय करती है कि उसे ऐसे रिश्ते में अब और नहीं रहना, तो समाज तुरंत उसे गलत, कृतघ्न और चरित्रहीन ठहराने लगता है।
क्योंकि सच ये है कि इस समाज को आज भी औरत की आज़ादी से डर लगता है।
पढ़ाई और करियर किसी का दिया हुआ उपहार नहीं, बल्कि एक बुनियादी अधिकार है और हर इंसान को ये हक है कि वो सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीने का चुनाव करे।
अब वक्त आ गया है कि हम "पति ने पढ़ाया" / पति ने करने दिया जैसी सोच को छोड़ें और ये समझें कि वो उसका हक था।
औरत कोई निवेश, प्रॉपर्टी या गुलाम नहीं है। वो एक इंसान है, जिसे अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने का पूरा अधिकार है।
#Samaj_ka_sach
1 week ago | [YT] | 171
View 47 replies
Samaj ka sach
सिर्फ गोरे अंग्रेजों से लड़ना ही आजादी की लड़ाई नहीं है बल्कि काले अंग्रेजों से आजादी के लिए, आजतक डॉ अंबेडकर का लड़ना भी आजादी की लड़ाई है..
Bibhuti Satyanarayan Thakur ✍️
#samaj_ka_sach
#ambedkar #ambedkarism
#truth #awareness
2 weeks ago | [YT] | 475
View 9 replies
Samaj ka sach
कभी-कभी हमें लगता है कि हमारे शब्दों से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता…कि हम जो कह रहे हैं, वो बस हवा में खो जाता है।
लेकिन मेरी ज़िंदगी ने मुझे कुछ और सिखाया है।
एक समय था जब मुझे लगता था कि मेरी बातें कोई नहीं समझेगा।
मैं जो महसूस करती हूँ, जो कहना चाहती हूँ शायद वो लोगों तक पहुँचेगा ही नहीं।
लेकिन आज…सैकड़ों लोग मुझे लिखते हैं, बताते हैं कि मेरे वीडियो या पोस्ट देखकर उनकी सोच बदली, उनकी ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव आया।
ये सुनकर जो महसूस होता है, उसे शब्दों में बताना आसान नहीं है।
आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद ❤ 🙏
#shashi_antinatalist
#samaj_ka_sach
2 weeks ago | [YT] | 620
View 132 replies
Load more