भगवान कृष्ण ने सम्पूर्ण गीता में एक ही बात पर बल दिया है, वह है ध्यान। होशपूर्वक किया गया युद्ध भी ध्यान ही है। जागृतपूर्वक अपने रिश्तेदारों के साथ युद्ध भी ध्यान है। चेतना के साथ अपने पुत्र की निर्मम हत्या की घटना को देखना भी ध्यान ही है। गीता में भगवान अर्जुन को बार-बार एक ही बात कहते हैं कि गौर से, होश से, चेतनता के साथ देखो अर्जुन जो कुछ भी घटित है, घटने योग्य है या घट चुका है। वह सब मेरे द्वारा ही रचित है, वह अदृश्य है, लेकिन ध्यान की गहरी साधना से देखा जा सकता है, आंख खोलकर।
और जब तुम अपने चक्षु से दृश्य देखते हो, वह स्थूलता में और सूक्ष्मता में भिन्न मालूम पड़ता है, लेकिन कारण कार्य की रचना की डोर उस सृष्टि के जनक के हाथ में होती है, इसलिये ध्यानी व्यक्ति चिंतित नहीं होता है। लेकिन साधारण सुप्त मनुष्य इस चेतना की परिधि से खुद को बाहर पाता है।
इसलिए जीवन ध्यानमय हो, इसकी हर रोज साधना आवश्यक है, वह श्वास पर हो, बर्तन धोने में हो, खेत जोतने में, किताब पढ़ने में हो, लिखने में हो, खेलने में हो, रोने में हो, हंसने में हो, योग में हो या भोग में हो। कहीं भी हो दीप आंतरिक सतत जलते रहे।
एक रोज दिया जलेगा: और बुध्द का वाक्य प्रासंगिक होगा- "अप्प दीपोभव:" विश्व ध्यान दिवस की शुभकामनाएं❣️🙏🌻🌼 ~ऋषि
the Yogi Monk
जो था, जो है, जो रहेगा
वही सनातन सत्य: शिव 🕉
हर हर महादेव 🔱
#Sanatan
#HarHarMahadev #Shiva
1 day ago | [YT] | 92
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the Yogi Monk
"कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं"
जय श्री राम 🙏🚩
4 days ago | [YT] | 253
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the Yogi Monk
प्रभु का स्नेह 🙏🤗🌼
Pranam Bhagwan🌷🌻
5 days ago | [YT] | 71
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the Yogi Monk
Jay Shree Ram 🙏💕
1 week ago | [YT] | 276
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the Yogi Monk
भगवान कृष्ण ने सम्पूर्ण गीता में एक ही बात पर बल दिया है, वह है ध्यान।
होशपूर्वक किया गया युद्ध भी ध्यान ही है।
जागृतपूर्वक अपने रिश्तेदारों के साथ युद्ध भी ध्यान है।
चेतना के साथ अपने पुत्र की निर्मम हत्या की घटना को देखना भी ध्यान ही है।
गीता में भगवान अर्जुन को बार-बार एक ही बात कहते हैं कि गौर से, होश से, चेतनता के साथ देखो अर्जुन जो कुछ भी घटित है, घटने योग्य है या घट चुका है। वह सब मेरे द्वारा ही रचित है, वह अदृश्य है, लेकिन ध्यान की गहरी साधना से देखा जा सकता है, आंख खोलकर।
और जब तुम अपने चक्षु से दृश्य देखते हो, वह स्थूलता में और सूक्ष्मता में भिन्न मालूम पड़ता है, लेकिन कारण कार्य की रचना की डोर उस सृष्टि के जनक के हाथ में होती है, इसलिये ध्यानी व्यक्ति चिंतित नहीं होता है। लेकिन साधारण सुप्त मनुष्य इस चेतना की परिधि से खुद को बाहर पाता है।
इसलिए जीवन ध्यानमय हो, इसकी हर रोज साधना आवश्यक है, वह श्वास पर हो, बर्तन धोने में हो, खेत जोतने में, किताब पढ़ने में हो, लिखने में हो, खेलने में हो, रोने में हो, हंसने में हो, योग में हो या भोग में हो। कहीं भी हो दीप आंतरिक सतत जलते रहे।
एक रोज दिया जलेगा: और बुध्द का वाक्य प्रासंगिक होगा-
"अप्प दीपोभव:"
विश्व ध्यान दिवस की शुभकामनाएं❣️🙏🌻🌼
~ऋषि
2 weeks ago | [YT] | 89
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the Yogi Monk
ॐ हनुमान्जनसुनुर्वायुपुत्रो महाबलः।
रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः॥
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः।
लक्ष्मणप्राणदाताश्च दशग्रीवस्य दर्पहा॥
3 weeks ago | [YT] | 176
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the Yogi Monk
ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट'
1 month ago | [YT] | 338
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the Yogi Monk
Jay Bajarangbali ki🙏🛕🕉️
1 month ago | [YT] | 278
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the Yogi Monk
Small Conversation with @authorshishirk 🙏🙏💕
2 months ago | [YT] | 38
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the Yogi Monk
सदा शिव, सर्वदा शिव 🔱
हर हर महादेव 🙏🏻
2 months ago | [YT] | 130
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