Self-realization Tour

Welcome to [Self Realisation Tour], a sacred space dedicated to the timeless wisdom of Advaita Vedanta — the philosophy of non-duality and ultimate Self-realization. 🌿
Here, we explore the profound truth: You are not the body, not the mind — You are Pure Consciousness.
Through guided reflections, talks, and meditative insights, this channel invites you to look within and discover the boundless awareness that is your true nature. Whether you are a seeker on the path of Jñāna (knowledge), a student of Vedantic philosophy, or simply someone longing for inner peace and clarity, you’ll find here a gentle light pointing you back to the Self.
🕉️ What You’ll Find Here:
Teachings on Advaita Vedanta & the Upanishads
Reflections on Self-Inquiry (Atma Vichara) and the teachings of Acharya Ashutosh Aniket
Discourses on Janm Maran k Par and 10 Other books of Swami ji timeless Vedantic wisdom


Self-realization Tour

आत्मीय स्वजन!
सत्य के जिज्ञासुओं के लिए कुछ साधकों के सौजन्य से 'सम्बोधि मन्दिरम् प्रकाशन' द्वारा पूर्वप्रकाशित पुस्तकों का ध्वनिमुद्रण (Audio version) किया जा रहा है। तमाम मनाहियों और स्वास्थ्यसम्बन्धी विसंगतियों के बावजूद सबका आग्रह है कि यह ध्वनिमुद्रण मेरी ही आवाज में किया जाए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रयोग और तमाम संशुद्धकों (Filters) का प्रयोग करने के बाद उनकी सीमाओं को समझकर और यथासम्भव शुद्धतम पाठ पहुँचाने की दृष्टि से भी यही विचार उचित लगा। अबतक कई ऑडियो पाठ प्रकाशित किए जा चुके हैं और उनमें निरन्तर सुधार किया जा रहा है।...
मर्म की बात कहूँ तो आध्यात्मिक ज्ञान आरोपित नहीं किया जा सकता। अनुभव कहता है कि जिज्ञासा से भरा हृदय सत्य को खोज ही लेगा। वह निरन्तर खोज ही रहा है। मुझे नहीं पता कि अध्यात्म के गहरे विषय कितने लोगों को रुचिकर लगते होंगे, लेकिन उनकी संख्या अत्यंत थोड़ी होती है-सदैव। एक निर्मम तथ्य यह भी तो है! श्रद्धा और वैराग्यपूरित चित्त कहाँ उपलब्ध हो पाता है! उन थोड़े-से लोगों के लिए ही यह सारा आयोजन-उपक्रम किया जा रहा है। समूची साधना तो साक्षी के समझ की है, किंतु यहाँ आपको रुकना पड़ेगा, डूबना पड़ेगा। डूबकर पार होने की कीमिया सीखनी पड़ेगी।
कबीर ने कहा था न—जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ..! आइए, उतरिए—विवेक के गह्वर में, मुक्ति के उदधि में!#Selfrealization 🎻 📿 🪔

4 weeks ago (edited) | [YT] | 6

Self-realization Tour

एक ऋषि कहता है-
आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा: क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥
क्या भाव है!
वह कह रहा है-हे माँ! हे दुर्गे ! हे दयासागर माहेश्वरी ! जब भी मैं आपदाओं में डूबने लगता हूँ, तो तुम्हें ही स्मरण करता हूँ। और, इसे तुम मेरी कोई शठता, मेरी दुष्टता मत समझ लेना!
क्यों भला?
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति..
पुराण का ऋषि एकदम निश्छल चित्त शिशु की भाँति कह क्या रहा है! कहता है कि यदि
कोई बच्चा क्षुधा एवं तृषा से ग्रसित हो, भूख-प्यासा हो, तो वह किसे पुकारेगा! किसी और को नहीं, अपितु अपनी जननी को, माँ को! भले ही उसे पुकारना न आता हो, उसके पास कोई सधी हुई वाणी न हो, उसकी भाषा का परिष्कार न हुआ हो, किंतु वह पुकारता है और माँ आ जाती है। वह रो पड़ता है और माँ आ जाती है। उसके आँसू माँ को खींच लाते हैं। जैसे वह क्षुधातृषार्त शिशु माँ का स्मरण करता है और वह प्रकट हो जाती है, ठीक वैसा ही ईश्वर है। उस क्षुधित तृषार्त शिशु की भाँति हमें पुकारना न आता हो, यह भिन्न बात है। हम उसे पुकारते नहीं, अन्यथा उसके अवतीर्ण होने में कोई कमी नहीं है। वह नित्य ही अपनी परिपूर्णता के साथ विद्यमान है।उसे तो बस प्रकट हो जाना है। वह कहीं और से प्रकट भी नहीं होगा। ईश्वर का प्रथम आवास तुम हो। वह तुम्हारे हृदय में है। वह तुम्हारे रूप में है। उसके अनावरण की विधि हमको नहीं पता।
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति.. यही विधि है। सद्योजात शिशु की भाँति पुकारना; यही विधि है। शून्य में अपनी पीड़ा के अश्रुपात् कर देना; यही विधि है। और ध्यान रहे, झूठे आँसुओं से काम न चलेगा। आँसू सच्चे होने चाहिए। वे भीतर की क्षुधा से उपजने चाहिए। वे अन्तर्मन की पीड़ा से उठने चाहिए।
फिर तो माँ दौड़ी ही आयेगी। और, माँ ही आयेगी! कोई अन्य नहीं आयेगा। वह पहचान लेती है अपने बच्चे को, उसकी आवाज़ को, उसके आँसुओं को! जगत की माँओं के पास तो विकल्प भी होता है। वहाँ तो धाय माँ भी होती है। परमात्मा के पास अपना कोई विकल्प नहीं है। उसे पुकारा जाता है तो वह ही आता है। रामकृष्ण परमहंस ने पुकारा। मीरा ने पुकारा। सूर, तुलसी और कबीर ने पुकारा। उनकी पुकार सुनकर परमात्मा आया।
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति..
मुझे यह भाव अत्यन्त प्रीतिकर लगा। हमें ऐसे ही पुकारना है! 🎻 📿 🪔

1 month ago (edited) | [YT] | 5

Self-realization Tour

एक रंग है वासना का, एक रंग है उपासना का। एक रंग है अनुराग का, एक रंग है विराग का। एक रंग है आसक्ति का, एक रंग है भक्ति का। एक रंग है भोग का, एक रंग है मोक्ष का।
और, रँगरेंज कोई और नहीं, तुम ही हो। चित्त तुम्हारा, रंग तुम्हारा। रंगने की स्वतंत्रता तुम्हें पूरी है। यह मनुष्य जीवन तुम्हारी परमस्वतंत्रता का उत्सव है। इसका लाभ उठाओ! तुम्हारा श्रेय करने वाले रंगों को चुनो, उसी में डूबो।
संसार के हाथ का खिलौना नहीं बनना! वह सदा से ही वासना का सहयोगी है और उपासना का विरोधी। उसे अनुराग भाता है, विराग नहीं। वह प्रह्लाद को आग में झोंक देता है, मीरा को विष दे देता है, मंसूर का गला काट देता है। इससे बचो!#Selfrealization 🎻 📿 🪔

1 month ago (edited) | [YT] | 7

Self-realization Tour

सत्य सुलभ है; दुर्लभ तो खोजी है।
कृष्ण ने कहा—
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।
दुर्लभ तो है, बड़े ही आश्चर्य की बात है; फिर भी कोई कहता है और कोई न कोई तो सुन ही लेता है। मैं भी उसी आश्चर्य को, उसी रहस्य को स्वर दे रहा हूँ। कुछ नया नहीं है, कुछ अलग नहीं है। आत्मा सबकी निजी सम्पदा है, मिल्कियत है। सम्पदा कहना अजीब है लेकिन कहना पड़ता है, क्योंकि उसके अभाव में ही तो जगत के भिखारी हुए पड़े हैं। आत्मसम्पदा से परिचित न होने के कारण ही तो हम दीनहीन बने फिरते रहते हैं। आत्मोपलब्धि परमसम्पदा है। आत्मा तो स्वरूप है—अपनी वास्तविकता; और वह सबको ही उपलब्ध है। सत्संग, स्वाध्याय और विवेक से वह प्रकाशितमात्र हो जाता है, अपनी महिमा ज्ञात हो जाती है।
समस्त सद्शास्त्रों की, गुरुओं और शास्ताओं की जो बड़ी से बड़ी बात है, वह आत्मबोध है। उस आत्मा का बोध, जो तुम हो! तुम आत्मा हो; और यह बात तुमको पता नहीं है। हो गयी न विसंगति! फिर तुम आत्मा की खोज करते हो। हर खोज स्वयं से दूर ही ले जाती है, लेकिन कोई दूसरा उपाय भी नहीं है। इससे तुम्हारी सजगता बढ़ती है, मुमुक्षा बलवती होती है। तुम्हारे भीतर एक अनूठी आग जलती है—जिज्ञासा की आग, विरह की आग, उन्मत्तता की आग; जिसमें तुम्हारी झूठी अस्मिताएँ, पार्थिव उपाधियाँ भग्न और भस्म होती जाती हैं। जब सब खोजकर थके-हारे तुम लौटते हो—सर्वहारा की तरह, निर्मान होकर, निस्संग होकर; कदाचित् निष्प्रयोज्य और निष्प्राण होकर.. और फिर सहसा कोई तुम्हारे कानों में मन्त्र फूँक देता है—तत्त्वमसि! वह संकेत कर देता है कि तुम तो सदैव तुम्हारे पास थे! जिसे तुम खोज रहे थे, वह तो तुम्हीं थे—अयमात्मा ब्रह्म!
और यह सुनकर तुम चौंक जाते हो। सहसा तुमको विश्वास नहीं होता। तुम आनन्दमिश्रित आश्चर्य से भर जाते हो। तुमको अपनी अबोधता पर ग्लानि होती है, हँसी भी आती है।
आत्मा होकर आत्मा की खोज!
आत्मा होकर अनात्म में खोज!
लेकिन, ऐसा होता है। खुद से खुद की खोज की अपनी मौज है। आत्मविरह का भी अलग आनंद है। सीधी-सपाट राहों पर चलते हुए भी कई बार भ्रान्ति उत्पन्न होती है और किसी से पूछने का मन करता है कि यह सही राह तो है न! अत्यन्त विरह के पश्चात्‌ मिलने पर प्रियतम से लिपटकर रोती हुई प्रेमिका उसी से कहती है कि, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैंने तुम्हें पा लिया है। आत्मबोध विरही आत्मा का प्रेमप्रणय ही तो है!
यहाँ कोई विद्वत-आख्यान नहीं हो रहा है। यहाँ तो अपनों से अपनी बात हो रही है। यहाँ तो आत्म-विरहियों से आत्म-अनुराग का आत्मालाप हो रहा है। मैं तो बस आत्मबोध से आत्मस्वीकार तक के यात्रापथ की अपनी और अपने जैसे बहुतों की अनुभूतियों को, विरह-व्यथाओं को और आनन्द-उल्लास को समस्वरता में गा रहा हूँ। मेरी-उनकी बात एक ही है! आप भी इसमें सहभागी बन सकते हैं!
शुभमस्तु!
🪷 🎻 📿 🪔

2 months ago | [YT] | 9

Self-realization Tour

यह ध्यान रहे कि जब तुम देह को "स्व" समझते हो; तो वह इसलिए नहीं होता कि यही वास्तविकता है। वह इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारा अध्यास ही देह का है। देहाध्यास के कारण देह के गुण तुम्हें स्वयं में घटित होते प्रतीत होते हैं। देहाध्यास के कारण ही देह का जन्म, देह का बचपन-यौवन और वृद्घता तथा देह की मृत्यु तुम्हें स्वयं में घटित होती प्रतीत होती है। अन्तःकरणों से अध्यस्त होने के कारण ही सुख-दुःख, हानि-लाभ, निद्रा और जागरण, स्वप्न और सुषुप्ति, मैं-मेरा, तू तेरा आदि द्वन्द्व तुम्हें पकड़ते हैं।🎻 📿 🪔


#तत्त्व #selfrealisation#truth#death

2 months ago (edited) | [YT] | 5

Self-realization Tour

आत्मा की, "मैं कौन हूँ" की अनुसंधान यात्रा "मैं हूँ" पर समाप्त होती है। "कौन" का कभी पता नहीं चलता; सिवाय इस बात के कि "मैं हूँ।" "कौन" का प्रश्न मिट जाता है और "मैं" रह जाता है। इस "होने" का कोई नाम नहीं होता, कोई रूप नहीं होता। बस, "होना" मात्र होता है।
विवेक की छननी से वह सब छानते जाओ, जो "मैं" नहीं है। जो "मैं" नहीं है, वह "सत्" नहीं है। जो "सत्" नहीं है; वह सब छन जाता है, छननी से गिर जाता है, मर जाता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि... और तो और समस्त संसार छ्न कर गिर जाता है।#selfrealization 🎻 📿 🪔

2 months ago (edited) | [YT] | 9

Self-realization Tour

"जनम-मरण के पार" पुस्तक से..

2 months ago (edited) | [YT] | 7