Charchagram Official

Charchagram is a digital civic platform where citizens can rate their political candidates, share local issues, and collectively amplify their voices. The goal is to bring people’s concerns to the forefront of public and electoral discourse.
We are live during the *Bihar Elections 2025*.

चर्चाग्राम एक डिजिटल मंच है जहाँ नागरिक अपने उम्मीदवारों को रेट कर सकते हैं, अपनी स्थानीय समस्याएँ और मुद्दे साझा कर सकते हैं, ताकि जनता की आवाज़ को संगठित कर चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाया जा सके।
📍 बिहार चुनाव 2025 के लिए अब लाइव।

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www.charchagram.com


Charchagram Official

नौबतपुर से बिक्रम तक — ज़मीन पर कब्ज़े की लड़ाई अब खेतों में नहीं, कागज़ों और सिस्टम के गलियारों में लड़ी जा रही है।
भूमि सर्वे और डिजिटलीकरण के नाम पर शुरू हुई योजना, कई जगह भू-माफ़िया, स्थानीय प्रशासन और प्रभावशाली तबकों की मिलीभगत से दमन का नया रूप ले रही है।

जहाँ गरीब और दलित अपने पुश्तैनी हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं कागज़ों की ग़लती उनके खेत और पहचान दोनों छीन रही है।
यह सिर्फ़ एक नौबतपुर की कहानी नहीं — बल्कि बिहार के कई इलाकों में दोहराई जा रही हकीकत है।

✍️ ऐसी नागरिक आवाज़ें और ज़मीनी कहानियाँ अब Charchagram.com पर दर्ज हो रही हैं —
जहाँ लोग अपने अनुभव, मुद्दे और सवाल खुद लिख रहे हैं।

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3 months ago | [YT] | 3

Charchagram Official

चर्चायात्रा के दौरान जब हम शेरघाटी के गोपालपुर पहुँचे, तो पंचायत के उपाध्यक्ष ने कुछ स्थानीय महिलाओं को चर्चा के लिए बुलाया था। शुरुआत में माहौल थोड़ा संकोच भरा था, जैसे सबके पास कहने को बहुत कुछ है, पर शायद भरोसा नहीं कि कोई सुनेगा भी।
धीरे-धीरे एक जीविका दीदी ने बात शुरू की। उन्होंने बताया कि अपनी बेटी की शादी के लिए उन्होंने 1 लाख 80 हजार रुपये का कर्ज लिया था, जिसे अब तक चुका नहीं पाई हैं। यह सुनकर लगा कि कर्ज का बोझ सिर्फ पैसों का नहीं होता, बल्कि उस व्यवस्था का भी होता है जो बिना देखे-समझे उधार तो दे देती है, पर मुश्किल वक्त में साथ नहीं देती।
बातचीत आगे बढ़ी तो और भी तमाम मुद्दे सामने आए जैसे कि राशन वितरण में अनियमितता, कार्ड बनवाने के लिए रिश्वत की माँग, और इंदिरा आवास योजना में अटकी उम्मीदें। इन चर्चाओं के बीच एक बात साफ दिखी - गाँव की असल तस्वीर सिर्फ आँकड़ों या रिपोर्टों से नहीं बनती, वो इन छोटी-छोटी सच्ची आवाजों से बनती है।
ऐसे में ग्राम पंचायतों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। जब पंचायतें इन मुद्दों को सुनने और सुलझाने का मंच बनाती हैं – जहाँ आम नागरिक बिना झिझक अपनी बात रख सकें, जहाँ हर योजना की जानकारी खुले में साझा की जाए, और जहाँ अधिकारियों या कंपनियों से जवाब माँगा जा सके – तभी बदलाव सिर्फ चर्चा तक सीमित नहीं रहेगा। ग्राम सभा, पंचायत और लोगों के बीच यह सीधा संवाद ही जवाबदेही की असली शुरुआत हो सकती है।
शायद यही चर्चाग्राम की कोशिश भी है - ऐसी यात्राओं और संवादों के जरिए, आवाजों को जोड़ना और यह समझ बनाना कि परिवर्तन वहीं से शुरू होता है जहाँ लोग अपनी बात खुलकर कहने लगते हैं।

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3 months ago | [YT] | 6