जानिए महात्मा बुद्ध के सबसे अलग और भयानक दिखने वाले, मगर महानतम zen गुरु के बारे में.... और कैसे उन्होनें चीन में जाकर वहां के राजा को आत्मज्ञान प्राप्त कराया और वहां के लोगों के जीवन को एक नई दिशा दी....
वैदिक परंपरा में यज्ञ को अक्सर अग्नि में आहुति देने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझा जाता है। लेकिन शास्त्र बताते हैं कि यज्ञ का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं— "यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः" (3.9), अर्थात जो कर्म यज्ञ की भावना से किए जाते हैं, वे मनुष्य को बंधन से मुक्त करते हैं, जबकि स्वार्थ के लिए किए गए कर्म उसे बाँध देते हैं। इसलिए यज्ञ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से जीवन जीने की एक कला है।
गीता आगे बताती है कि प्रजापति ने सृष्टि की रचना यज्ञ के साथ की (3.10)। इसका अर्थ है कि जीवन का आधार एक-दूसरे को देना और सहयोग करना है। चौथे अध्याय (4.24–32) में श्रीकृष्ण यज्ञ के अर्थ को और व्यापक बनाते हैं। वे बताते हैं कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि इसके अनेक रूप हैं— ज्ञान का यज्ञ (ज्ञान-यज्ञ), आत्मसंयम का यज्ञ, प्राणायाम का यज्ञ और शास्त्रों के अध्ययन का यज्ञ (स्वाध्याय-यज्ञ)। यहाँ ध्यान बाहरी अनुष्ठान पर नहीं, बल्कि समर्पण की भावना पर दिया गया है।
यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो हमारा हर दिन का जीवन भी यज्ञ बन सकता है। बिना किसी प्रशंसा या सम्मान की इच्छा के किसी को शिक्षा देना, प्रकृति की रक्षा करना, प्रेमपूर्वक अपने परिवार की सेवा करना, ईमानदारी से अपना काम करना या उदारता से अपना ज्ञान दूसरों के साथ बाँटना— ये सब यज्ञ हैं, यदि इनमें कोई स्वार्थ न हो। इस प्रकार यज्ञ केवल यज्ञशाला या वेदी तक सीमित नहीं रहता। वह अपने हर कर्म को दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित करने का एक शाश्वत जीवन-दर्शन बन जाता है।
जीवन में अनेक धूसर क्षेत्र हैं, जो बताते हैं कि हमारी इंद्रियाँ जो देखती हैं, वही सम्पूर्ण सत्य नहीं है। जहाँ प्रकाश होता है, वहीं छाया भी जन्म लेती है। आनंद के भीतर दुःख की संभावना छिपी रहती है। एक दोषपूर्ण व्यक्ति के भीतर भी अच्छाई हो सकती है, और कभी-कभी असत्य के भीतर भी कोई सीख या सत्य का छोटा-सा अंश छिपा होता है।
बौद्ध दर्शन का प्रतीत्यसमुत्पाद भी यही कहता है कि इस संसार में कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रखती। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यह पूरा अस्तित्व आपसी संबंधों का एक विशाल जाल है, जो हमारी सीमित समझ से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।
अद्वैत वेदांत भी द्वैत को अस्वीकार करता है। अष्टावक्र गीता के दूसरे अध्याय के चौथे श्लोक में महर्षि अष्टावक्र कहते हैं, कि जैसे झाग और बुलबुले पानी से अलग नहीं होते, वैसे ही आत्मा से प्रकट हुआ यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भी आत्मा से अलग नहीं है। अच्छा और बुरा, प्रकाश और अंधकार, ये सब उसी एक आत्मा में विद्यमान हैं, जो मनुष्य के हृदय-गुहा में प्रकाशित होती है।
उपनिषदों में दो पक्षियों का एक सुंदर रूपक मिलता है। एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी फल खाता है, जबकि दूसरा केवल उसे देखता रहता है। फल खाने वाला पक्षी हम हैं, जो जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता और हर अनुभव को जीते हैं। दूसरा पक्षी केवल साक्षी है, वह आत्मा (आत्मन्) है, जो जानती है कि यह पूरा संसार उसी द्वारा रचा गया एक खेल है और अंततः उसी में विलीन हो जाएगा।
सूफी संत जलालुद्दीन रूमी कहते हैं— "हे बूंद, बिना किसी पछतावे के स्वयं को समर्पित कर दो, और बदले में पूरे महासागर को पा लो।" क्योंकि बूंद महासागर से अलग नहीं होती, बल्कि स्वयं महासागर का ही एक रूप होती है। इसी प्रकार हमारी इच्छाएँ, वासनाएँ, आवश्यकताएँ, अहंकार और महत्वाकांक्षाएँ हमें जीवनभर चलाती रहती हैं। लेकिन अंततः हमें यह समझना होता है कि हम केवल बूंद नहीं हैं, हम स्वयं महासागर भी हैं।
अमीर खुसरो ने इसी सत्य को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है— "खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।" प्रेम की इस धारा में जो अपने अहंकार के साथ उतरता है, वह डूब जाता है; और जो स्वयं को पूरी तरह डुबो देता है, वही वास्तव में पार पहुँचता है।
वही पक्षी जो जीवन के फल खाता है, और वही दूसरा पक्षी जो शांत भाव से उसे देखता रहता है, ये दोनों अंततः एक ही हैं। अपने वास्तविक स्वरूप तक लौटने का मार्ग इन्हीं विरोधाभासों को स्वीकार करने से होकर जाता है। जब हम समझ लेते हैं कि हमारे भीतर प्रकाश भी है और अंधकार भी, कर्म भी है और साक्षी भी, तब हम अपने शुद्ध "मैं" में विश्राम करना सीख जाते हैं। यही आत्मबोध की शुरुआत है। 🙂↕️❤️
भारत पूरी दुनिया में एक गहरी आध्यात्मिक सभ्यता के रूप में जाना जाता है। राम मंदिर के ऐतिहासिक निर्माण से लेकर तिरुपति बालाजी जैसे प्राचीन और भव्य मंदिरों तक, आस्था हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। लेकिन इस गहरी धार्मिकता के साथ एक बड़ा विरोधाभास भी दिखाई देता है, कि समाज में भ्रष्टाचार आज भी व्यापक रूप से मौजूद है।
यहाँ तक कि बड़े-बड़े धार्मिक संस्थान भी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं से अछूते नहीं हैं। इससे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय प्रश्न उठता है, आख़िर ऐसा क्यों होता है कि बहुत धार्मिक व्यक्ति भी जब भ्रष्टाचार करते हैं, तो उनकी अंतरात्मा उन्हें नहीं रोकती? लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और समाज में फैले भ्रष्टाचार के बीच का यह संबंध एक जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक विरोधाभास है।
बाहरी धार्मिक कर्मकांड अक्सर व्यक्ति के भीतर नैतिकता और ईमानदारी पैदा नहीं कर पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि कुछ लोग धार्मिक अनुष्ठानों का उपयोग अपने मन को तसल्ली देने और अपने अपराधबोध को दबाने के लिए करते हैं। वे आध्यात्मिक नियमों को लेन-देन का सौदा मान लेते हैं। इससे उनके मन में एक ऐसा मानसिक बहाना बन जाता है, जो उन्हें अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी लेने से बचा लेता है।
ऐसे लोग पूजा, व्रत, तीर्थयात्रा या तपस्या जैसे धार्मिक कार्यों को आत्म-परिवर्तन का साधन नहीं, बल्कि भगवान से सौदा करने का माध्यम समझते हैं। उन्हें लगता है कि जितने अधिक पुण्य कर्म करेंगे, उतने ही उनके पाप अपने-आप समाप्त हो जाएंगे।
वे अनजाने में यह विश्वास कर लेते हैं कि अपने सामान्य जीवन में किए गए अनैतिक और गलत कामों को बड़े-बड़े धार्मिक कर्मों या प्रायश्चित के द्वारा धोया जा सकता है। इस तरह जब धर्म को एक लेन-देन बना दिया जाता है, तो ईमानदारी का मूल नैतिक सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है। भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति अक्सर सोचता है, "अगर मैं अपने गलत तरीके से कमाए हुए पैसे का कुछ हिस्सा दान कर दूँ, तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और मेरे पाप माफ़ हो जाएंगे।"
ऐसी सोच पैदा क्यों होती है? इसका कारण यह है कि ऐसे लोग धर्म की किसी सामान्य बात को बिना उसकी गहराई समझे हर परिस्थिति में लागू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, वे सुनते हैं कि "भगवान उन लोगों से प्रेम करते हैं जो पूजा, यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं।" फिर वे इसका अर्थ यह निकाल लेते हैं कि "मैंने पूजा कर ली, इसलिए मेरे सारे पाप मिट गए।"
वे इस महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि लगभग सभी धर्मों में सच्ची क्षमा केवल पूजा-पाठ से नहीं मिलती। उसके लिए मन से सच्चा पश्चाताप करना, अपनी गलतियों को छोड़ना और अनैतिक व्यवहार का त्याग करना आवश्यक है। केवल धार्मिक कर्मकांड करते रहना, जबकि जीवन में गलत काम जारी रहें, किसी भी धर्म की वास्तविक शिक्षा नहीं है।
ऐसे व्यक्ति को लगता है कि जैसे ही उसका धार्मिक अनुष्ठान पूरा हुआ, उसका आध्यात्मिक कर्ज़ चुक गया और उसकी अंतरात्मा पूरी तरह शुद्ध हो गई।
प्राचीन रोमन दार्शनिक मार्कस टुलियस सिसरो ने अपनी पुस्तक 'डे लेगिबुस (On the Laws)' में इसी बात को स्पष्ट किया था। उन्होंने लिखा था:
"दुष्ट व्यक्ति को यह साहस नहीं करना चाहिए कि वह उपहार देकर ईश्वर के क्रोध को शांत कर सकता है, क्योंकि जैसे एक अच्छा इंसान किसी दुष्ट व्यक्ति से रिश्वत स्वीकार नहीं करता, वैसे ही ईश्वर भी नहीं करते।"
सिसरो की यह बात बताती है कि ईश्वर या नैतिक न्याय को खरीदा या रिश्वत देकर अपने पक्ष में नहीं किया जा सकता। बाहर से पूजा-पाठ और शुद्धि के अनुष्ठान करना, लेकिन भीतर भ्रष्टाचार और बेईमानी से कमाई हुई संपत्ति को संभालकर रखना, तर्क और नैतिकता, दोनों के विरुद्ध है।
गहरी धार्मिक आस्था और भ्रष्टाचार का एक साथ मौजूद होना यह दिखाता है कि धार्मिक कर्मकांड और सच्ची नैतिकता के बीच एक गहरी खाई है। वास्तविक आध्यात्मिकता तभी जागती है, जब धर्म केवल बाहरी दिखावे की जगह व्यक्ति के भीतर ईमानदारी, सत्य और नैतिकता की माँग करे। तभी अंतरात्मा सच में जागती है और गलत काम करने से रोकती है। ❤️@KnowMantr
हर वर्ष योग दिवस हमें योग के महत्व की याद दिलाता है, लेकिन अक्सर हम इसे केवल शारीरिक अभ्यास तक ही सीमित समझ लेते हैं। इसी विषय पर हमने एक विशेष वीडियो बनाई है, जिसमें राजयोग के वास्तविक अर्थ, उसकी गहराई, और यह बताया गया है कि उसे अपने जीवन में अपनाकर हम शांति, एकाग्रता, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति जैसे गुणों को कैसे विकसित कर सकते हैं।
🎥 समय मिले तो इस वीडियो को अवश्य देखें और हमें बताइए कि राजयोग की कौन-सी बात आपको सबसे अधिक प्रेरणादायक लगी।
आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का सदैव स्वागत है। धन्यवाद 😊🧘
दुनिया कृष्ण को उनके जीवन के सबसे शोरगुल वाले क्षण के लिए याद रखती है। वह उन्हें कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में याद करती है, जहाँ वे दो सेनाओं के बीच खड़े होकर ऐसे शब्द बोल रहे थे जो सदियों से लोगों के मन में गूँजते रहे हैं। वह अर्जुन को दिखाए गए उस विराट रूप को याद करती है जिसने उसे विस्मित कर दिया था। वह उस प्रसिद्ध पंक्ति को भी याद करती है जिसे ओपेनहाइमर ने न्यू मैक्सिको में पहले परमाणु विस्फोट को देखकर उद्धृत किया था—“अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, संसारों का संहारक।”
लेकिन कृष्ण युद्धभूमि पर गीता का उपदेश देने वाले बनने से बहुत पहले भी बहुत कुछ थे। कुरुक्षेत्र से पहले उनके हाथ में बांसुरी थी। कर्तव्य से पहले आनंद था। दर्शन से पहले खेल था।
वह एक बालक थे जो वृंदावन की गलियों में नंगे पाँव दौड़ता था। वह मिट्टी के मटकों से माखन चुराता था और फिर इतनी मासूमियत से घर लौटता था कि कोई उस पर आरोप भी नहीं लगा सकता था। यमुना के किनारे संध्या के समय हँसी की मधुर ध्वनि गूँजती थी। आम के बागों में संगीत बहता था। ऐसा लगता था मानो पूरा ब्रह्मांड शक्ति और विजय से अधिक आश्चर्य और आनंद में रुचि रखता हो।
लेकिन समय के साथ हमने कृष्ण के भीतर के उस बालक को भुला दिया और केवल सलाहकार, दार्शनिक और योद्धा को याद रखा। हम ऐसी सभ्यता में जीते हैं जो परिणामों से मोहित है। हम हर चीज़ को मापते हैं, गणना करते हैं, भविष्यवाणी करते हैं और नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। हम गंभीरता को महत्व देते हैं और उन लोगों पर विश्वास करते हैं जो हर चीज़ का तर्क और परिणाम बता सकते हैं। रहस्य अब हमें असुविधाजनक लगने लगा है।
फिर भी प्राचीन ज्ञान परंपराएँ हमें एक अलग संभावना की ओर संकेत करती रही हैं।
वे कहती थीं—“नाद ब्रह्म”। अर्थात् यह संसार मूल रूप से ध्वनि है। पत्थर नहीं, मशीन नहीं, विजय नहीं ध्वनि।
आधुनिक भौतिकी भी अपने अनोखे तरीके से इसी सत्य के आसपास घूमती दिखाई देती है। वास्तविकता के सबसे गहरे स्तर पर पदार्थ ठोस वस्तु की तरह नहीं रहता, बल्कि कंपन, लय और पैटर्न में बदल जाता है। जैसे कोई धुन आती है, कुछ समय ठहरती है और फिर विलीन हो जाती है, लेकिन हमें भीतर से बदल जाती है। तब ब्रह्मांड किसी विशाल स्मारक की तरह नहीं, बल्कि एक संगीत की तरह दिखाई देता है। ऐसा संगीत जिसे जीतना नहीं है, बल्कि जिसमें हमें सहभागी होना है।
शायद इसी कारण कृष्ण के हाथ में बांसुरी है। बांसुरी एक अद्भुत वाद्ययंत्र है। वह केवल इसलिए संगीत उत्पन्न कर सकती है क्योंकि वह भीतर से खाली होती है। स्वर शून्यता से जन्म लेता है। दिव्यता उसी खालीपन और खुलेपन में प्रवेश करती है। अहंकार भरता है, जबकि बांसुरी स्वयं को खाली कर देती है।
जब कृष्ण माखन चुराते हैं, तो वे केवल चोरी नहीं कर रहे होते। वे जीवन को अत्यधिक गंभीरता से बचा रहे होते हैं। माखन वह दूध है, जो धैर्य, समय और प्रेम से रूपांतरित हुआ है।
इन कथाओं में पवित्रता कठोर नहीं है। वह चमकती है, खिलखिलाती है। और गीता के कृष्ण भी वैसे नहीं हैं जैसे अधिकांश लोग उन्हें याद करते हैं। युद्ध से पहले वे शांति के दूत बनकर गए थे। उन्होंने संयम की बात की थी। उन्होंने केवल पाँच गाँव माँगे थे। जब हर द्वार बंद हो गया और शांति की हर संभावना समाप्त हो गई, तभी उन्होंने युद्ध की बात की। गीता कहानी का पहला अध्याय नहीं थी; वह अंतिम अध्याय थी।
जो सभ्यता केवल कुरुक्षेत्र को याद रखती है, वह अंततः हर जगह संघर्ष और युद्ध देखने लगती है। लेकिन जो सभ्यता वृंदावन को याद रखती है, वह समझती है कि जीवन केवल कोई समस्या नहीं है जिसे हल करना है, बल्कि एक रहस्य है जिसे जीना और अनुभव करना है।
इसलिए शायद आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण छवि वह नहीं है जिसमें कृष्ण विराट रूप धारण किए हुए हैं, और न ही वह जिसमें वे रथ पर बैठे महान दार्शनिक हैं। शायद सबसे सुंदर छवि वह है जिसमें एक बालक संध्या के समय किसी वृक्ष के नीचे बैठा है, हाथ में बांसुरी है और वह उस दुनिया को देखकर मुस्कुरा रहा है जो स्वयं के बारे में कुछ अधिक ही निश्चित हो चुकी है।
क्योंकि इतिहास के शोर, महत्वाकांक्षाओं, चिंताओं, जीत और हार के पीछे कहीं न कहीं यह ब्रह्मांड अब भी वही कर रहा होगा जो वह हमेशा से करता आया है। संभव है कि वह अब भी गा रहा हो।
जिसे हम पदार्थ (Matter) कहते हैं—चाहे वह एक परमाणु हो, कोई अणु, पर्वत, नदी या मानव शरीर—वास्तव में वह ऊर्जा का ही सघन रूप है। पदार्थ कुछ और नहीं, बल्कि ऊर्जा है जो एक संगठित और संकुचित रूप में प्रकट होती है। आधुनिक भौतिकी भी धीरे-धीरे इसी समझ की ओर बढ़ी है। पत्थर और प्रकाश की किरण में मूलभूत अंतर नहीं है; दोनों ऊर्जा के ही अलग-अलग रूप और अभिव्यक्तियाँ हैं।
ऊर्जा के नियमों को समझकर मनुष्य ने बिजली उत्पन्न की, मशीनें बनाईं, अंतरिक्ष की खोज की और परमाणुओं के रहस्यों को जाना। विज्ञान हमें पदार्थ की कार्यप्रणाली को ऊर्जा की भाषा में समझाता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी बना हुआ है—क्या ऊर्जा ही अस्तित्व की अंतिम सच्चाई है?
यदि यह पूरा ब्रह्मांड केवल कणों और शक्तियों का समूह है, तो फिर चेतना कहाँ से आई? विचार, भावनाएँ, कल्पना, प्रेम, स्मृति और "मैं हूँ" का अनुभव निर्जीव पदार्थ से कैसे उत्पन्न हो गया? कोई चीज़ पूर्ण शून्य से पैदा नहीं हो सकती। यदि आज मनुष्य में चेतना मौजूद है, तो उसकी संभावना सृष्टि के आरंभ से ही किसी न किसी रूप में मौजूद रही होगी।
अरबों वर्ष पहले, जब पृथ्वी पर न पेड़-पौधे थे, न पशु और न ही मनुष्य, तब केवल ऊर्जा के सूक्ष्म रूप मौजूद थे। लेकिन उन्हीं प्रारंभिक रूपों के भीतर चेतना की संभावना एक बीज की तरह छिपी हुई थी। समय के साथ, प्रकृति की विकास-यात्रा के माध्यम से यह सुप्त चेतना धीरे-धीरे प्रकट होने लगी। पहले पौधों में जीवन की हल्की झलक दिखाई दी, फिर पशुओं में संवेदनाएँ और प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं, और अंततः मनुष्य में आत्म-जागरूकता तथा चिंतन की क्षमता प्रकट हुई।
इस प्रक्रिया को एक बीज के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक छोटा-सा बीज देखने में साधारण और निर्जीव लगता है, लेकिन उसके भीतर एक विशाल वृक्ष बनने की संभावना छिपी होती है। उचित परिस्थितियाँ मिलने पर वही छिपा हुआ जीवन धीरे-धीरे विकसित होकर वृक्ष का रूप ले लेता है। इसी प्रकार, चेतना भी ऊर्जा के प्रारंभिक रूपों में एक सुप्त संभावना के रूप में मौजूद थी, जो प्रकृति के विकासक्रम के साथ धीरे-धीरे जागृत हुई।
भारतीय आध्यात्मिक दर्शन इस संबंध को शिव और शक्ति की अवधारणा के माध्यम से समझाता है। शक्ति, ऊर्जा, गति और सृजन की सक्रिय शक्ति का प्रतीक है। शिव, शुद्ध चेतना का प्रतीक हैं—वह मौन साक्षी जो सभी गतिविधियों के पीछे विद्यमान है। जैसे नर्तक के बिना नृत्य का अस्तित्व नहीं हो सकता, वैसे ही चेतना के बिना ऊर्जा को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। प्रकृति की सभी गतिविधियाँ—तारों का निर्माण, जीवन का विकास और मानव चेतना का उदय—एक गहरी चेतना की पृष्ठभूमि में घटित होती हैं।
जैसे तार में बहती हुई बिजली सीधे दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके प्रभावों से उसकी उपस्थिति स्पष्ट हो जाती है, उसी तरह चेतना भी विभिन्न स्तरों पर पूरे अस्तित्व में अभिव्यक्त होती है। यदि हम जीवन को केवल परमाणुओं और कणों तक सीमित कर दें, तो हम उसके रहस्य को अत्यधिक सरल बना देंगे। एक मशीन बहुत तेज़ी से जानकारी का विश्लेषण कर सकती है, लेकिन वह आनंद, दुःख, आश्चर्य या जीवित होने का अनुभव नहीं कर सकती।
गहरे ध्यान, चिंतन या आध्यात्मिक अनुभूति के क्षणों में कभी-कभी व्यक्ति ऐसी अवस्था का अनुभव करता है जहाँ समय, स्थान और व्यक्तिगत पहचान की सामान्य सीमाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं। उसकी चेतना अपने छोटे-से व्यक्तिगत अहंकार से आगे बढ़कर किसी विशाल और सार्वभौमिक सत्ता से जुड़ी हुई महसूस होती है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपराएँ इस जागृत अवस्था को ब्रह्म, शिव या ब्रह्मांडीय चेतना की अनुभूति कहती हैं। पदार्थ ऊर्जा का सघन रूप है, लेकिन स्वयं ऊर्जा भी चेतना की व्यापक गोद में ही गतिशील है।
KNOW MANTRA
जानिए महात्मा बुद्ध के सबसे अलग और भयानक दिखने वाले, मगर महानतम zen गुरु के बारे में.... और कैसे उन्होनें चीन में जाकर वहां के राजा को आत्मज्ञान प्राप्त कराया और वहां के लोगों के जीवन को एक नई दिशा दी....
2 days ago | [YT] | 3
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KNOW MANTRA
वैदिक परंपरा में यज्ञ को अक्सर अग्नि में आहुति देने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझा जाता है। लेकिन शास्त्र बताते हैं कि यज्ञ का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं— "यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः" (3.9), अर्थात जो कर्म यज्ञ की भावना से किए जाते हैं, वे मनुष्य को बंधन से मुक्त करते हैं, जबकि स्वार्थ के लिए किए गए कर्म उसे बाँध देते हैं। इसलिए यज्ञ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से जीवन जीने की एक कला है।
गीता आगे बताती है कि प्रजापति ने सृष्टि की रचना यज्ञ के साथ की (3.10)। इसका अर्थ है कि जीवन का आधार एक-दूसरे को देना और सहयोग करना है। चौथे अध्याय (4.24–32) में श्रीकृष्ण यज्ञ के अर्थ को और व्यापक बनाते हैं। वे बताते हैं कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि इसके अनेक रूप हैं— ज्ञान का यज्ञ (ज्ञान-यज्ञ), आत्मसंयम का यज्ञ, प्राणायाम का यज्ञ और शास्त्रों के अध्ययन का यज्ञ (स्वाध्याय-यज्ञ)। यहाँ ध्यान बाहरी अनुष्ठान पर नहीं, बल्कि समर्पण की भावना पर दिया गया है।
यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो हमारा हर दिन का जीवन भी यज्ञ बन सकता है। बिना किसी प्रशंसा या सम्मान की इच्छा के किसी को शिक्षा देना, प्रकृति की रक्षा करना, प्रेमपूर्वक अपने परिवार की सेवा करना, ईमानदारी से अपना काम करना या उदारता से अपना ज्ञान दूसरों के साथ बाँटना— ये सब यज्ञ हैं, यदि इनमें कोई स्वार्थ न हो। इस प्रकार यज्ञ केवल यज्ञशाला या वेदी तक सीमित नहीं रहता। वह अपने हर कर्म को दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित करने का एक शाश्वत जीवन-दर्शन बन जाता है।
1 month ago | [YT] | 16
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KNOW MANTRA
जीवन में अनेक धूसर क्षेत्र हैं, जो बताते हैं कि हमारी इंद्रियाँ जो देखती हैं, वही सम्पूर्ण सत्य नहीं है। जहाँ प्रकाश होता है, वहीं छाया भी जन्म लेती है। आनंद के भीतर दुःख की संभावना छिपी रहती है। एक दोषपूर्ण व्यक्ति के भीतर भी अच्छाई हो सकती है, और कभी-कभी असत्य के भीतर भी कोई सीख या सत्य का छोटा-सा अंश छिपा होता है।
बौद्ध दर्शन का प्रतीत्यसमुत्पाद भी यही कहता है कि इस संसार में कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रखती। सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यह पूरा अस्तित्व आपसी संबंधों का एक विशाल जाल है, जो हमारी सीमित समझ से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।
अद्वैत वेदांत भी द्वैत को अस्वीकार करता है। अष्टावक्र गीता के दूसरे अध्याय के चौथे श्लोक में महर्षि अष्टावक्र कहते हैं, कि जैसे झाग और बुलबुले पानी से अलग नहीं होते, वैसे ही आत्मा से प्रकट हुआ यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भी आत्मा से अलग नहीं है। अच्छा और बुरा, प्रकाश और अंधकार, ये सब उसी एक आत्मा में विद्यमान हैं, जो मनुष्य के हृदय-गुहा में प्रकाशित होती है।
उपनिषदों में दो पक्षियों का एक सुंदर रूपक मिलता है। एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी फल खाता है, जबकि दूसरा केवल उसे देखता रहता है। फल खाने वाला पक्षी हम हैं, जो जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता और हर अनुभव को जीते हैं। दूसरा पक्षी केवल साक्षी है, वह आत्मा (आत्मन्) है, जो जानती है कि यह पूरा संसार उसी द्वारा रचा गया एक खेल है और अंततः उसी में विलीन हो जाएगा।
सूफी संत जलालुद्दीन रूमी कहते हैं—
"हे बूंद, बिना किसी पछतावे के स्वयं को समर्पित कर दो, और बदले में पूरे महासागर को पा लो।"
क्योंकि बूंद महासागर से अलग नहीं होती, बल्कि स्वयं महासागर का ही एक रूप होती है।
इसी प्रकार हमारी इच्छाएँ, वासनाएँ, आवश्यकताएँ, अहंकार और महत्वाकांक्षाएँ हमें जीवनभर चलाती रहती हैं। लेकिन अंततः हमें यह समझना होता है कि हम केवल बूंद नहीं हैं, हम स्वयं महासागर भी हैं।
अमीर खुसरो ने इसी सत्य को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है—
"खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।"
प्रेम की इस धारा में जो अपने अहंकार के साथ उतरता है, वह डूब जाता है; और जो स्वयं को पूरी तरह डुबो देता है, वही वास्तव में पार पहुँचता है।
वही पक्षी जो जीवन के फल खाता है, और वही दूसरा पक्षी जो शांत भाव से उसे देखता रहता है, ये दोनों अंततः एक ही हैं। अपने वास्तविक स्वरूप तक लौटने का मार्ग इन्हीं विरोधाभासों को स्वीकार करने से होकर जाता है। जब हम समझ लेते हैं कि हमारे भीतर प्रकाश भी है और अंधकार भी, कर्म भी है और साक्षी भी, तब हम अपने शुद्ध "मैं" में विश्राम करना सीख जाते हैं। यही आत्मबोध की शुरुआत है।
🙂↕️❤️
2 months ago | [YT] | 25
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KNOW MANTRA
भारत पूरी दुनिया में एक गहरी आध्यात्मिक सभ्यता के रूप में जाना जाता है। राम मंदिर के ऐतिहासिक निर्माण से लेकर तिरुपति बालाजी जैसे प्राचीन और भव्य मंदिरों तक, आस्था हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। लेकिन इस गहरी धार्मिकता के साथ एक बड़ा विरोधाभास भी दिखाई देता है, कि समाज में भ्रष्टाचार आज भी व्यापक रूप से मौजूद है।
यहाँ तक कि बड़े-बड़े धार्मिक संस्थान भी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं से अछूते नहीं हैं। इससे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय प्रश्न उठता है, आख़िर ऐसा क्यों होता है कि बहुत धार्मिक व्यक्ति भी जब भ्रष्टाचार करते हैं, तो उनकी अंतरात्मा उन्हें नहीं रोकती? लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और समाज में फैले भ्रष्टाचार के बीच का यह संबंध एक जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक विरोधाभास है।
बाहरी धार्मिक कर्मकांड अक्सर व्यक्ति के भीतर नैतिकता और ईमानदारी पैदा नहीं कर पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि कुछ लोग धार्मिक अनुष्ठानों का उपयोग अपने मन को तसल्ली देने और अपने अपराधबोध को दबाने के लिए करते हैं। वे आध्यात्मिक नियमों को लेन-देन का सौदा मान लेते हैं। इससे उनके मन में एक ऐसा मानसिक बहाना बन जाता है, जो उन्हें अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी लेने से बचा लेता है।
ऐसे लोग पूजा, व्रत, तीर्थयात्रा या तपस्या जैसे धार्मिक कार्यों को आत्म-परिवर्तन का साधन नहीं, बल्कि भगवान से सौदा करने का माध्यम समझते हैं। उन्हें लगता है कि जितने अधिक पुण्य कर्म करेंगे, उतने ही उनके पाप अपने-आप समाप्त हो जाएंगे।
वे अनजाने में यह विश्वास कर लेते हैं कि अपने सामान्य जीवन में किए गए अनैतिक और गलत कामों को बड़े-बड़े धार्मिक कर्मों या प्रायश्चित के द्वारा धोया जा सकता है। इस तरह जब धर्म को एक लेन-देन बना दिया जाता है, तो ईमानदारी का मूल नैतिक सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है। भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति अक्सर सोचता है, "अगर मैं अपने गलत तरीके से कमाए हुए पैसे का कुछ हिस्सा दान कर दूँ, तो भगवान प्रसन्न हो जाएंगे और मेरे पाप माफ़ हो जाएंगे।"
ऐसी सोच पैदा क्यों होती है? इसका कारण यह है कि ऐसे लोग धर्म की किसी सामान्य बात को बिना उसकी गहराई समझे हर परिस्थिति में लागू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, वे सुनते हैं कि "भगवान उन लोगों से प्रेम करते हैं जो पूजा, यज्ञ और अनुष्ठान करते हैं।" फिर वे इसका अर्थ यह निकाल लेते हैं कि "मैंने पूजा कर ली, इसलिए मेरे सारे पाप मिट गए।"
वे इस महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि लगभग सभी धर्मों में सच्ची क्षमा केवल पूजा-पाठ से नहीं मिलती। उसके लिए मन से सच्चा पश्चाताप करना, अपनी गलतियों को छोड़ना और अनैतिक व्यवहार का त्याग करना आवश्यक है। केवल धार्मिक कर्मकांड करते रहना, जबकि जीवन में गलत काम जारी रहें, किसी भी धर्म की वास्तविक शिक्षा नहीं है।
ऐसे व्यक्ति को लगता है कि जैसे ही उसका धार्मिक अनुष्ठान पूरा हुआ, उसका आध्यात्मिक कर्ज़ चुक गया और उसकी अंतरात्मा पूरी तरह शुद्ध हो गई।
प्राचीन रोमन दार्शनिक मार्कस टुलियस सिसरो ने अपनी पुस्तक 'डे लेगिबुस (On the Laws)' में इसी बात को स्पष्ट किया था। उन्होंने लिखा था:
"दुष्ट व्यक्ति को यह साहस नहीं करना चाहिए कि वह उपहार देकर ईश्वर के क्रोध को शांत कर सकता है, क्योंकि जैसे एक अच्छा इंसान किसी दुष्ट व्यक्ति से रिश्वत स्वीकार नहीं करता, वैसे ही ईश्वर भी नहीं करते।"
सिसरो की यह बात बताती है कि ईश्वर या नैतिक न्याय को खरीदा या रिश्वत देकर अपने पक्ष में नहीं किया जा सकता। बाहर से पूजा-पाठ और शुद्धि के अनुष्ठान करना, लेकिन भीतर भ्रष्टाचार और बेईमानी से कमाई हुई संपत्ति को संभालकर रखना, तर्क और नैतिकता, दोनों के विरुद्ध है।
गहरी धार्मिक आस्था और भ्रष्टाचार का एक साथ मौजूद होना यह दिखाता है कि धार्मिक कर्मकांड और सच्ची नैतिकता के बीच एक गहरी खाई है। वास्तविक आध्यात्मिकता तभी जागती है, जब धर्म केवल बाहरी दिखावे की जगह व्यक्ति के भीतर ईमानदारी, सत्य और नैतिकता की माँग करे। तभी अंतरात्मा सच में जागती है और गलत काम करने से रोकती है।
❤️@KnowMantr
2 months ago | [YT] | 14
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KNOW MANTRA
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2 months ago | [YT] | 6
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KNOW MANTRA
हर वर्ष योग दिवस हमें योग के महत्व की याद दिलाता है, लेकिन अक्सर हम इसे केवल शारीरिक अभ्यास तक ही सीमित समझ लेते हैं। इसी विषय पर हमने एक विशेष वीडियो बनाई है, जिसमें राजयोग के वास्तविक अर्थ, उसकी गहराई, और यह बताया गया है कि उसे अपने जीवन में अपनाकर हम शांति, एकाग्रता, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति जैसे गुणों को कैसे विकसित कर सकते हैं।
🎥 समय मिले तो इस वीडियो को अवश्य देखें और हमें बताइए कि राजयोग की कौन-सी बात आपको सबसे अधिक प्रेरणादायक लगी।
आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का सदैव स्वागत है। धन्यवाद 😊🧘
3 months ago (edited) | [YT] | 3
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KNOW MANTRA
दुनिया कृष्ण को उनके जीवन के सबसे शोरगुल वाले क्षण के लिए याद रखती है। वह उन्हें कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में याद करती है, जहाँ वे दो सेनाओं के बीच खड़े होकर ऐसे शब्द बोल रहे थे जो सदियों से लोगों के मन में गूँजते रहे हैं। वह अर्जुन को दिखाए गए उस विराट रूप को याद करती है जिसने उसे विस्मित कर दिया था। वह उस प्रसिद्ध पंक्ति को भी याद करती है जिसे ओपेनहाइमर ने न्यू मैक्सिको में पहले परमाणु विस्फोट को देखकर उद्धृत किया था—“अब मैं मृत्यु बन गया हूँ, संसारों का संहारक।”
लेकिन कृष्ण युद्धभूमि पर गीता का उपदेश देने वाले बनने से बहुत पहले भी बहुत कुछ थे। कुरुक्षेत्र से पहले उनके हाथ में बांसुरी थी। कर्तव्य से पहले आनंद था। दर्शन से पहले खेल था।
वह एक बालक थे जो वृंदावन की गलियों में नंगे पाँव दौड़ता था। वह मिट्टी के मटकों से माखन चुराता था और फिर इतनी मासूमियत से घर लौटता था कि कोई उस पर आरोप भी नहीं लगा सकता था। यमुना के किनारे संध्या के समय हँसी की मधुर ध्वनि गूँजती थी। आम के बागों में संगीत बहता था। ऐसा लगता था मानो पूरा ब्रह्मांड शक्ति और विजय से अधिक आश्चर्य और आनंद में रुचि रखता हो।
लेकिन समय के साथ हमने कृष्ण के भीतर के उस बालक को भुला दिया और केवल सलाहकार, दार्शनिक और योद्धा को याद रखा। हम ऐसी सभ्यता में जीते हैं जो परिणामों से मोहित है। हम हर चीज़ को मापते हैं, गणना करते हैं, भविष्यवाणी करते हैं और नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। हम गंभीरता को महत्व देते हैं और उन लोगों पर विश्वास करते हैं जो हर चीज़ का तर्क और परिणाम बता सकते हैं। रहस्य अब हमें असुविधाजनक लगने लगा है।
फिर भी प्राचीन ज्ञान परंपराएँ हमें एक अलग संभावना की ओर संकेत करती रही हैं।
वे कहती थीं—“नाद ब्रह्म”। अर्थात् यह संसार मूल रूप से ध्वनि है। पत्थर नहीं, मशीन नहीं, विजय नहीं ध्वनि।
आधुनिक भौतिकी भी अपने अनोखे तरीके से इसी सत्य के आसपास घूमती दिखाई देती है। वास्तविकता के सबसे गहरे स्तर पर पदार्थ ठोस वस्तु की तरह नहीं रहता, बल्कि कंपन, लय और पैटर्न में बदल जाता है। जैसे कोई धुन आती है, कुछ समय ठहरती है और फिर विलीन हो जाती है, लेकिन हमें भीतर से बदल जाती है। तब ब्रह्मांड किसी विशाल स्मारक की तरह नहीं, बल्कि एक संगीत की तरह दिखाई देता है। ऐसा संगीत जिसे जीतना नहीं है, बल्कि जिसमें हमें सहभागी होना है।
शायद इसी कारण कृष्ण के हाथ में बांसुरी है। बांसुरी एक अद्भुत वाद्ययंत्र है। वह केवल इसलिए संगीत उत्पन्न कर सकती है क्योंकि वह भीतर से खाली होती है। स्वर शून्यता से जन्म लेता है। दिव्यता उसी खालीपन और खुलेपन में प्रवेश करती है। अहंकार भरता है, जबकि बांसुरी स्वयं को खाली कर देती है।
जब कृष्ण माखन चुराते हैं, तो वे केवल चोरी नहीं कर रहे होते। वे जीवन को अत्यधिक गंभीरता से बचा रहे होते हैं। माखन वह दूध है, जो धैर्य, समय और प्रेम से रूपांतरित हुआ है।
इन कथाओं में पवित्रता कठोर नहीं है। वह चमकती है, खिलखिलाती है। और गीता के कृष्ण भी वैसे नहीं हैं जैसे अधिकांश लोग उन्हें याद करते हैं। युद्ध से पहले वे शांति के दूत बनकर गए थे। उन्होंने संयम की बात की थी। उन्होंने केवल पाँच गाँव माँगे थे। जब हर द्वार बंद हो गया और शांति की हर संभावना समाप्त हो गई, तभी उन्होंने युद्ध की बात की। गीता कहानी का पहला अध्याय नहीं थी; वह अंतिम अध्याय थी।
जो सभ्यता केवल कुरुक्षेत्र को याद रखती है, वह अंततः हर जगह संघर्ष और युद्ध देखने लगती है। लेकिन जो सभ्यता वृंदावन को याद रखती है, वह समझती है कि जीवन केवल कोई समस्या नहीं है जिसे हल करना है, बल्कि एक रहस्य है जिसे जीना और अनुभव करना है।
इसलिए शायद आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण छवि वह नहीं है जिसमें कृष्ण विराट रूप धारण किए हुए हैं, और न ही वह जिसमें वे रथ पर बैठे महान दार्शनिक हैं। शायद सबसे सुंदर छवि वह है जिसमें एक बालक संध्या के समय किसी वृक्ष के नीचे बैठा है, हाथ में बांसुरी है और वह उस दुनिया को देखकर मुस्कुरा रहा है जो स्वयं के बारे में कुछ अधिक ही निश्चित हो चुकी है।
क्योंकि इतिहास के शोर, महत्वाकांक्षाओं, चिंताओं, जीत और हार के पीछे कहीं न कहीं यह ब्रह्मांड अब भी वही कर रहा होगा जो वह हमेशा से करता आया है। संभव है कि वह अब भी गा रहा हो।
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3 months ago | [YT] | 30
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KNOW MANTRA
जिसे हम पदार्थ (Matter) कहते हैं—चाहे वह एक परमाणु हो, कोई अणु, पर्वत, नदी या मानव शरीर—वास्तव में वह ऊर्जा का ही सघन रूप है। पदार्थ कुछ और नहीं, बल्कि ऊर्जा है जो एक संगठित और संकुचित रूप में प्रकट होती है। आधुनिक भौतिकी भी धीरे-धीरे इसी समझ की ओर बढ़ी है। पत्थर और प्रकाश की किरण में मूलभूत अंतर नहीं है; दोनों ऊर्जा के ही अलग-अलग रूप और अभिव्यक्तियाँ हैं।
ऊर्जा के नियमों को समझकर मनुष्य ने बिजली उत्पन्न की, मशीनें बनाईं, अंतरिक्ष की खोज की और परमाणुओं के रहस्यों को जाना। विज्ञान हमें पदार्थ की कार्यप्रणाली को ऊर्जा की भाषा में समझाता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी बना हुआ है—क्या ऊर्जा ही अस्तित्व की अंतिम सच्चाई है?
यदि यह पूरा ब्रह्मांड केवल कणों और शक्तियों का समूह है, तो फिर चेतना कहाँ से आई? विचार, भावनाएँ, कल्पना, प्रेम, स्मृति और "मैं हूँ" का अनुभव निर्जीव पदार्थ से कैसे उत्पन्न हो गया? कोई चीज़ पूर्ण शून्य से पैदा नहीं हो सकती। यदि आज मनुष्य में चेतना मौजूद है, तो उसकी संभावना सृष्टि के आरंभ से ही किसी न किसी रूप में मौजूद रही होगी।
अरबों वर्ष पहले, जब पृथ्वी पर न पेड़-पौधे थे, न पशु और न ही मनुष्य, तब केवल ऊर्जा के सूक्ष्म रूप मौजूद थे। लेकिन उन्हीं प्रारंभिक रूपों के भीतर चेतना की संभावना एक बीज की तरह छिपी हुई थी। समय के साथ, प्रकृति की विकास-यात्रा के माध्यम से यह सुप्त चेतना धीरे-धीरे प्रकट होने लगी। पहले पौधों में जीवन की हल्की झलक दिखाई दी, फिर पशुओं में संवेदनाएँ और प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं, और अंततः मनुष्य में आत्म-जागरूकता तथा चिंतन की क्षमता प्रकट हुई।
इस प्रक्रिया को एक बीज के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक छोटा-सा बीज देखने में साधारण और निर्जीव लगता है, लेकिन उसके भीतर एक विशाल वृक्ष बनने की संभावना छिपी होती है। उचित परिस्थितियाँ मिलने पर वही छिपा हुआ जीवन धीरे-धीरे विकसित होकर वृक्ष का रूप ले लेता है। इसी प्रकार, चेतना भी ऊर्जा के प्रारंभिक रूपों में एक सुप्त संभावना के रूप में मौजूद थी, जो प्रकृति के विकासक्रम के साथ धीरे-धीरे जागृत हुई।
भारतीय आध्यात्मिक दर्शन इस संबंध को शिव और शक्ति की अवधारणा के माध्यम से समझाता है। शक्ति, ऊर्जा, गति और सृजन की सक्रिय शक्ति का प्रतीक है। शिव, शुद्ध चेतना का प्रतीक हैं—वह मौन साक्षी जो सभी गतिविधियों के पीछे विद्यमान है। जैसे नर्तक के बिना नृत्य का अस्तित्व नहीं हो सकता, वैसे ही चेतना के बिना ऊर्जा को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। प्रकृति की सभी गतिविधियाँ—तारों का निर्माण, जीवन का विकास और मानव चेतना का उदय—एक गहरी चेतना की पृष्ठभूमि में घटित होती हैं।
जैसे तार में बहती हुई बिजली सीधे दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके प्रभावों से उसकी उपस्थिति स्पष्ट हो जाती है, उसी तरह चेतना भी विभिन्न स्तरों पर पूरे अस्तित्व में अभिव्यक्त होती है। यदि हम जीवन को केवल परमाणुओं और कणों तक सीमित कर दें, तो हम उसके रहस्य को अत्यधिक सरल बना देंगे। एक मशीन बहुत तेज़ी से जानकारी का विश्लेषण कर सकती है, लेकिन वह आनंद, दुःख, आश्चर्य या जीवित होने का अनुभव नहीं कर सकती।
गहरे ध्यान, चिंतन या आध्यात्मिक अनुभूति के क्षणों में कभी-कभी व्यक्ति ऐसी अवस्था का अनुभव करता है जहाँ समय, स्थान और व्यक्तिगत पहचान की सामान्य सीमाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं। उसकी चेतना अपने छोटे-से व्यक्तिगत अहंकार से आगे बढ़कर किसी विशाल और सार्वभौमिक सत्ता से जुड़ी हुई महसूस होती है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपराएँ इस जागृत अवस्था को ब्रह्म, शिव या ब्रह्मांडीय चेतना की अनुभूति कहती हैं। पदार्थ ऊर्जा का सघन रूप है, लेकिन स्वयं ऊर्जा भी चेतना की व्यापक गोद में ही गतिशील है।
3 months ago | [YT] | 18
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KNOW MANTRA
जब पूरी दुनिया...शोर, बहस और तमाशों में खो चुकी हो,
तब अपने भीतर शांति बचाए रखना,
सिर्फ समझदारी नहीं,
एक जागृत चेतना की निशानी है।
@KnowMantr ❤️
3 months ago | [YT] | 17
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KNOW MANTRA
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4 months ago | [YT] | 4
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