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पहला वीर बाल दिवस कब बनाया गया?

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एक बार शाहजहाँ ने हाथी चराई पर कर ( जिसे उस समय फीलचराई कर कहा जाता था ) वसूलने की घोषणा की। यह कर वह अपने दरबारियों से वसूलना चाहता था।

यह घोषणा दरबार में बैठा एक रौंबदार मूंछों वाला नौजवान पुरुष बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह वीर पुरुष जोधपुर महाराजा गज सिंह जी के पुत्र और नागौर के स्वामी स्वयं राव राजा अमर सिंह राठौड़ थे।

जब शाहजहां के किसी मंत्री ने वीर वर राठौड़ जी को कर अदा करने के लिए कहा तब उन्होंने जवाब दिया -

"ये धरती हमारी हम किस चीज़ का कर दे, अब हम हमारी ही धरती पर अपने जानवरों की चराई का कर भी दें?
हम ये कर नहीं देंगे! जाकर कह दो अपने जहाँपनाह से।"

जब शाहजहाँ ने यह सुना तो वह उन पर भड़क गया।

लेकिन उसके मुंह से उस राजपूत योद्धा के सामने एक शब्द नहीं निकला।

कुछ समय बाद अमर सिंह जी शाहजहाँ की अनुमति के बिना शिकार के लिए चले गए और कई दिनों तक दरबार में नहीं आए । शाहजहाँ ने अपमान महसूस किया।

काफी प्रयासों के बाद अमरसिंह जी को अपने दरबार में बुलाया और उनसे अनुपस्थिति का कारण पूछा।

शाहजहाँ: आप कहाँ थे?

अमर सिंह राठौड़ : मैं किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हूं।

तभी शाहजहाँ के साले सलावत ख़ान ने बीच में टांग अड़ाते हुए कहा:-

" तुम्हें इस लापरवाही का ज़ुर्माने अदा करना होगा और साथ ही जहाँपनाह को कर भी देना होगा।"

अमरसिंह जी ने अपना हाथ कमर पर लटकी तलवार पर पटका और जोश से कहा -

"एक राजपूत की असली सम्पत्ति उसकी तलवार होती है और मेरी जो भी संपत्ति है वह मेरी म्यान के अंदर है, जिस किसी मे भी हिम्मत है आकर वसूल ले जितना कर वसूलना है।

सलावत खान ने मजाक उड़ाते हुए कहा:

क्या ज़ाहिल जैसी बात कर रहे हो राव , क्या तुम्हें पता नहीं तुम कहाँ खड़े हो और अमर सिंह को गंवार कहकर हिन्दू धर्म को अपशब्द कहनें जारी रखें।

ये सुनते ही अमर सिंह जी का पौरुष जाग उठा और गुस्से में आंख उठाकर कहा:

तगा तगा इं कर मते, बोल मुँह संभाल
नाहर अर रजपूत ने, रेखा री रीगाङ।

अर्थात : - मूर्ख ! अपना मुंह संभाल और तू तड़का बंद कर , एक शेर और राजपूत को सीमा उल्लंघन कतई बर्दास्त नहीं ।

अमर सिंह जी की आंखे गुस्से में शोला बन चुकी थी। अब अगर सलावत एक अपशब्द भी बोलता वह वहीं प्राण गवा देता ।

लेकिन सलावत खान यहां नहीं माना उसने राव को अपमानित करने के लिए दुबारा जैसे ही गंवार बोलना चाहा , अमर सिंह जी तीव्र वेग से उठे और अपनी तलवार ( कटारी ) उसकी छाती के आर पार कर दी। प्रहार इतना प्रचंड था कि सालावत खां वहीं ढेर हो गया

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