सिनेमा और रेप कल्चर : एक गीत के बहाने एक व्यापक समीक्षा
सिनेमा को आजकल समाज का “दर्पण” भी कहा जाता है, लेकिन यह केवल दर्पण ही नहीं है यह समाज का निर्माता भी है।
क्योंकि जाने अनजाने ( प्रत्यक्ष परोक्ष) में यह समाज पर प्रभाव तो डाल ही रहा है ।
जो दृश्य, संवाद और गीत बड़े परदे पर दिखते हैं, वे सिर्फ मनोरंजन नहीं होते; वे समाज के व्यवहार, संवेदनाओं और नैतिकता को आकार देते हैं।
इसी संदर्भ में पुराने समय का एक लोकप्रिय गीत
“अठरा बरस की कुँवारी कली थी, फँसी गोरी चने के खेत में…” एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:
यह गीत इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।
यदि इसकी लिरिकल सामग्री को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह एक नाबालिग लड़की के साथ होने वाली ज़बरदस्ती, बलात् और घेराबंदी, बेबसी और सामाजिक शर्म को “रोमांटिक” और “मनोरंजक” रूप में प्रस्तुत करता है।
यह सिर्फ एक गीत नहीं है बल्कि भारतीय लोकप्रिय संस्कृति के एक बड़े पैटर्न की निशानी है। हमारे समाज को विनाश की ओर ढकेलने की तैयारी है ।
गीत का विश्लेषण : ज़बरदस्ती को रोमांस में बदलने की प्रवृत्ति
गीत में लड़की से कहलवाया जा रहा है “फँसी गोरी” “ ज़ुल्मी ने पकड़ी कलाई” “ शिकारियों के घेरे” ( गैंग रेप) “जवानी के लुटेरे” “क्या-क्या हुआ मेरे साथ रे”
फिर भी गीत की धुन, लोकेशन, फिल्मांकन और नृत्य सब “मस्ती”, “छेड़छाड़”, “उत्साह” की शैली में हैं। अर्थात् रेप में भी उत्साह दिखाया जा रहा है ।
यह गंभीर हिंसा को “मज़ाकिया”, “अशरफी-छर्रा रोमांस” और “देहात की शरारत” जैसा रंग देता है।
यही rape culture की नींव है ।जहाँ अपराध को अपराध नहीं, बल्कि “युवा जोश”, “मस्ती” और “छेड़खानी” बताया जाता है।
प्रेम और पीछा करने (Stalking) का मिश्रण : दुर्व्यवहार का सामान्यीकरण
भारतीय सिनेमा में दशकों से यह narrative चलता आया है कि ,लड़की “ना” कहेगी , लड़का ज़ोर डालेगा , लड़की धीरे-धीरे “हाँ” कर देगी
यह फ़ॉर्मूला अनगिनत फिल्मों और गीतों में दोहराया गया है, जिसमें , पीछा करना, कलाई पकड़ना, जबरदस्ती नाचने के लिए खींचना, सुनसान में रोकना , बिना अनुमति छूना इत्यादि ।
इन्हें “रोमांटिक मूव्स” के रूप में दिखाया गया।
लड़कियों की “असंवेदना” या “ना” को “शर्म”, “ना-नुकुर” या “नखरे” बताया गया।
यह cinematic device युवाओं को यह सिखाता है कि
ना का मतलब कभी-कभी हाँ भी हो सकता है।
जबरदस्ती का अर्थ रोमांस।
और सीमाएँ पार करना , अर्थात मर्दानगी।
इसी मानसिकता के कारण समाज में छेड़खानी, पीछा करने और यौन आक्रामकता को गंभीर अपराध नहीं समझा जाता।
पीड़िता की चुप्पी का महिमामंडन
गीत में लड़की कहती है कि “ ऐसे कैसे सबको कहानी बताऊँ?” “ कोई भी तो आया न हाथ रे…”
यह वह वास्तविक पीड़ा है जिसे गीत में मनोरंजन सामग्री में बदल दिया गया।
इस प्रकार के चित्रण युवा दर्शकों में यह धारणा बनाते हैं कि,
पीड़िता को चुप रहना चाहिए अर्थात उसका रेप भी हो जाये पर वह चुप रहे नहीं तो समाज उसकी बात पर हँसेगा
और उसे ही शर्म आएगी ।
यही rape culture का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें
अपराध को छिपाना, पीड़िता को दोषी महसूस कराना, और अपराधियों के व्यवहार को ‘यौवन’ मान लेना।
अब #तहर्रूश समझिये । तहर्रूश क्या होता है अलग से गूगल कर लें ।
घेराबंदी, भीड़ और “लुटेरे” और अपराधियों का ग्लैमराइजेशन
गीत में अपराधियों को “जवानी के लुटेरे” कहा गया है अर्थात्
हिंसा को “युवा ऊर्जा” का रूप दिया गया है।
यह ग्लैमराइजेशन केवल पुराने गीतों तक सीमित नहीं।
बॉलीवुड ने बार-बार यही किया है और करते आ रहे हैं ।
यही visual language युवा लड़कों को सिखाती है कि aggression = attraction।
अब आप प्रश्न करें कि सिनेमा समाज का दर्पण या समाज का निर्माता? अथवा हमें गर्त में डाल रहा है ।
सिनेमा के निर्माताओं का अक्सर तर्क होता है कि हम समाज को जैसा है वैसा दिखाते हैं।
लेकिन सिनेमा केवल दिखाता नहीं बल्कि यह मॉडलिंग, रिपीटिंग और नॉर्मलाइजिंग भी करता है।
अगर एक व्यवहार , गीतों में बार-बार सुनाई दे , फिल्मों में लगातार दिखाया जाए , हीरो द्वारा किया जाए तो वह समाज में स्वीकार्य बन जाता है।
इसलिए सिनेमा वस्तुतः दर्पण और ढालने वाला दोनों है।
समाधान : क्या किया जा सकता है?
Consent को रोमांस का नया केंद्र बनाया जाना चाहिये । तथा स्टॉकिंग और हेरासमेंट को कॉमेडी या रोमांस की जगह अपराध की तरह दिखाया जाना चाहिए । महिलाओं की इच्छाओं, सीमाओं और agency को मुख्य भूमिका में लाना चाहिए । गीतों और फिल्मों का सामाजिक समीक्षात्मक मूल्यांकन होना चाहिये । फिल्मकारों की संवेदनशीलता का मूल्यांकन होना चाहिये ।
सिनेमा जितना बड़ा प्रभाव पैदा कर सकता है, उतना ही बड़ा बदलाव भी ला सकता है।
“अठरा बरस की कुँवारी कली थी…” जैसे गीत सिर्फ एक उदाहरण हैं।
लेकिन यह उदाहरण यह दिखाता है कि सिनेमा ने वर्षों तक कि ज़बरदस्ती को रोमांस, पीछा करने को प्रेम, लड़की की चुप्पी को मर्यादा, और हिंसा को मर्दानगी के रूप में प्रस्तुत किया।
यही वह invisible framework है जिसे आधुनिक समाज में rape culture कहा जाता है
जहाँ यौन हिंसा को हिंसा नहीं, बल्कि “पुरुष व्यवहार”, “शरारत” या “प्रेम का तरीका” मान लिया जाता है।
सिनेमा इस संस्कृति को दर्शाता भी है और बढ़ाता भी।
और इसलिए इसकी समीक्षा, पुनर्विचार और सुधार
आज अधिक आवश्यक है जितना कभी था।
शेष : यदि बात बुरी लगी हो तो बाभन गरियाइये । मनुस्मृति जलाइये । वे , तहर्रूश के लिये तैयार बैठे हैं । तहर्रूश क्या होता, गूगल कर लें ।
हमारे शहर में SIR का काम शुरू हो चुका है..
कागज हाथ में लिए शिक्षिकाएं (अन्य कर्मचारी भी) एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे जा रही हैं ...
एक ऐसी ही शिक्षिका से बात हुई..
उनका अनुभव हमारे समाज की सच्चाई बता रहा था ..
बोलीं मुस्लिम इलाकों में एक घर जाकर खड़े होने की देर होती है पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता है..लोग जागरूक हैं..
यहां तक कि जिनका छूट जा रहा है वो कॉल कर करके घर तक आ जा रहे हैं ..
वो स्त्रियां जो बुर्का ओढ़े दुनिया से कटी मालूम देती हैं..पूरी जानकारी दे रही हैं..
इसके उलट अपने लोगों में door bell बजाओ तो बोल दे रहे हैं ..
"ये तो कोई टाइम नहीं है आने का.."
"आगे हमारी दुकान पर चली जाओ"
"कल देख लेना आकर"
बोलीं अपने लोगों को लग रहा है कि सरकार ने आदमी भेजा है..तो सरकार की गरज है और उस सरकारी आदमी की गरज है..
#जो जागत है सो पावत है..
Hubble नाम ने एक 'खगोलशास्त्री' ने आज से लगभग सौ साल पहले बताया था कि ये सृष्टि असीम है और लगातार फैलती जा रही है और इस सृष्टि में जो 'निहारिका' (नेबुला) हमसे जितनी अधिक दूर है वो हमसे उतनी ही अधिक तेजी से दूर भागती जा रही है।
दुनिया के लिए ये ज्ञान नया होगा पर हमारे लिए नहीं था क्योंकि हमारे सबसे आदि ग्रंथ 'ऋग्वेद' के एक मंत्र में आता है :- "कई नक्षत्र ऐसे हैं कि जिनका प्रकाश तीव्र गति से चलता हुआ भी अब तक पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँचा है।" यह इस सृष्टि के असीम होने का ही तो प्रमाण है। इसके अलावा हमारे यहाँ भगवान को "अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक" कहा गया है यानि वो जो इस 'अनंत सृष्टि' का स्वामी है।
ये सब बताता है कि हमारे पूर्वज ज्ञान और विज्ञान में कितने ऊँचे थे। "पूज्य गुरुजी गोलवलकर" इन्हीं सबके आधार पर कहा करते थे कि "विज्ञान जितनी अधिक उन्नति करेगा, 'हिन्दू धर्म' उतना ही अधिक इस विश्व में स्थापित होता चला जाएगा।"
इसीलिए हम आये दिन सुनते हैं कि सूर्य की सतह से उतने वाले नाद की ध्वनि ॐ के उच्चारण जैसी है तो कभी हम सुनते हैं कि 'गुरुत्वाकर्षण' का सिद्धांत हमारे यहाँ पहले से है तो कभी हमारे पूर्वजों के द्वारा चित्रित मूर्तियों में पूरी की पूरी embryology उत्कीर्ण मिलती है तो कभी बिष्णु पुराण से हमें पृथ्वी के घूर्णन गति का पता चलता है, तो कभी कभी हम हमारे 'रामायण' में 'सुग्रीव' को पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन करता हुआ बताते सुनते हैं।
अभी कुछ समय पहले NASA (The National Aeronautics and Space Administration) ने एक "नेबुला" (निहारिका) की खोज की और उसको नाम दिया "हैण्ड ऑफ़ गॉड"
जानते हैं क्यों?
क्योंकि ये 'नेबुला' रंग और आकृति में हमारी परंपरा में उल्लेखित, वर्णित और चित्रित "सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण" के चक्र धारण किये हुए हाथ सरीखी दिखती है जो एक साथ पूरी सृष्टि का 'अभय' और 'विनाश' दोनों करने को प्रस्तुत दिखती है।
इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि इस धर्म का "सूर्योदय" अब "पश्चिम" से होगा, पूर्व इसे धारण करने की, सहेजने की और संभालने की योग्यता खो चुका है।
स्किल अर्थात कौशल।
कौशल ही वर्ण व्यवस्था का आधार था।
मेधा कौशल की बहुलता - ब्राम्हण।
रक्षा कौशलं की बहुलता - क्षत्रिय।
वाणिज्य कौशलं की बहुलता - वैश्य।
श्रम कौशलं की बहुलता - शूद्र।
चलिये आपने बड़ा अच्छा किया कि इस व्यवस्था को नष्ट कर दिया जिसके दम पर भारत, हजारों वर्षों से मात्र 200 वर्षो के पूर्व तक, विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति हुवा करता था।
यह मैं नहीं कह रहा - अंगुस मैडिसन, पॉल बैरोच से लेकर गुरुमूर्ति और शशि थरूर सब बोल रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन स्किल्स की आवश्यकता नष्ट हो गयी ? आज भी मेधा शक्ति, रक्षा शक्ति, वाणिज्य शक्ति और श्रम शक्ति का हर देश और समाज में बोल बाला है। स्वरूप बदल सकता है समय के साथ, मूल सिद्धांत तो आज भी वहीं हैं।
वर्ण व्यवस्था की ये कुशलताएं, एक दूसरे के विपरीत नहीं वरन एक दूसरे के पूरक। जैसे रात और दिन - एक दृष्टिकोण यह हो सकता है कि दोनों के दूसरे के विरोधी हैं। या यहां तक कि शोषक भी मान सकते हो। लेकिन सत्य तो यह है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दिन ही दिन हो, रात न हो तो?
आज समस्त संसार में स्किल डिवेलपमेंट को प्रधानता दी जा रही है।
मेरी सलाह है, जिससे आप असहमत भी हो सकते हैं। कि उन स्किल्स की पहचान किया जाय, जिसे घर में सिखाया जाना संभव हो। घर का अर्थ है बचपन से।
जब हर तरह की बात सीखना एक खेल था। हमें याद है कि बचपन में हल जोतना सीखना भी एक आनंद का विषय होता था। याकि खेत जोतने के बाद उसे समतल करना। हेंगा के द्वारा।
तो ऐसे स्किल की पहचान की जाय - जिससे बचपन से ही बच्चे अपने माता पिता से सीख सकें। कालांतर में यदि उन्हें उसी क्षेत्र में आगे बढ़ना हो तो उस स्किल सम्बंधित स्कूल और कॉलेजों में भर्ती करवाकर उन स्किल्स के सैद्धांतिक पहलुओं को पढ़ाया जाय।
आज स्कूल और कॉलेज थ्योरी के अतिरिक्त क्या पढ़ाते हैं। रटवा रहे हैं वही सब बकवास, जो बच्चों के जीवन में कभी भी काम न आएगा।
आज स्किल सम्बंधित डिग्री देने वाले अनेक संस्थान धन्ना सेठों द्वारा खोलकर उनमें स्किल सिखाने के नाम पर लूटा जा रहा है।
अगल बगल देखिये कोचिंग और विश्वविद्यालयों को।
They are producing unemployable youths, by extracting huge money from their pockets, or from government revenue to run those institutions, which are producing copy cat pen drive.
यदि ऐसा संभव हो सके तो बच्चे 20 की आयु के पूर्व ही प्रोडक्टिव कार्य करने में सक्षम हो सकेंगे।
#शिक्षक_दिवस_विशेष।
Abhishek Shukla
अगर मेथी और बथुआ के पराठों मे लड़ाई हो तो कौन जीतेगा ?
2 months ago | [YT] | 59
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Abhishek Shukla
Bandhan Vs Nippon smallcap fund
2 months ago | [YT] | 4
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Abhishek Shukla
बहुत से लोगों को नोटिफिकेशन न मिलने की परेशानी हो रही है
आप टेलेग्राम पर जुड़ सकते है लिंक कमेन्ट में
2 months ago | [YT] | 75
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Abhishek Shukla
सिनेमा और रेप कल्चर : एक गीत के बहाने एक व्यापक समीक्षा
सिनेमा को आजकल समाज का “दर्पण” भी कहा जाता है, लेकिन यह केवल दर्पण ही नहीं है यह समाज का निर्माता भी है।
क्योंकि जाने अनजाने ( प्रत्यक्ष परोक्ष) में यह समाज पर प्रभाव तो डाल ही रहा है ।
जो दृश्य, संवाद और गीत बड़े परदे पर दिखते हैं, वे सिर्फ मनोरंजन नहीं होते; वे समाज के व्यवहार, संवेदनाओं और नैतिकता को आकार देते हैं।
इसी संदर्भ में पुराने समय का एक लोकप्रिय गीत
“अठरा बरस की कुँवारी कली थी, फँसी गोरी चने के खेत में…” एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है:
यह गीत इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।
यदि इसकी लिरिकल सामग्री को ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह एक नाबालिग लड़की के साथ होने वाली ज़बरदस्ती, बलात् और घेराबंदी, बेबसी और सामाजिक शर्म को “रोमांटिक” और “मनोरंजक” रूप में प्रस्तुत करता है।
यह सिर्फ एक गीत नहीं है बल्कि भारतीय लोकप्रिय संस्कृति के एक बड़े पैटर्न की निशानी है। हमारे समाज को विनाश की ओर ढकेलने की तैयारी है ।
गीत का विश्लेषण : ज़बरदस्ती को रोमांस में बदलने की प्रवृत्ति
गीत में लड़की से कहलवाया जा रहा है “फँसी गोरी” “ ज़ुल्मी ने पकड़ी कलाई” “ शिकारियों के घेरे” ( गैंग रेप) “जवानी के लुटेरे” “क्या-क्या हुआ मेरे साथ रे”
फिर भी गीत की धुन, लोकेशन, फिल्मांकन और नृत्य सब “मस्ती”, “छेड़छाड़”, “उत्साह” की शैली में हैं। अर्थात् रेप में भी उत्साह दिखाया जा रहा है ।
यह गंभीर हिंसा को “मज़ाकिया”, “अशरफी-छर्रा रोमांस” और “देहात की शरारत” जैसा रंग देता है।
यही rape culture की नींव है ।जहाँ अपराध को अपराध नहीं, बल्कि “युवा जोश”, “मस्ती” और “छेड़खानी” बताया जाता है।
प्रेम और पीछा करने (Stalking) का मिश्रण : दुर्व्यवहार का सामान्यीकरण
भारतीय सिनेमा में दशकों से यह narrative चलता आया है कि ,लड़की “ना” कहेगी , लड़का ज़ोर डालेगा , लड़की धीरे-धीरे “हाँ” कर देगी
यह फ़ॉर्मूला अनगिनत फिल्मों और गीतों में दोहराया गया है, जिसमें , पीछा करना, कलाई पकड़ना, जबरदस्ती नाचने के लिए खींचना, सुनसान में रोकना , बिना अनुमति छूना इत्यादि ।
इन्हें “रोमांटिक मूव्स” के रूप में दिखाया गया।
लड़कियों की “असंवेदना” या “ना” को “शर्म”, “ना-नुकुर” या “नखरे” बताया गया।
यह cinematic device युवाओं को यह सिखाता है कि
ना का मतलब कभी-कभी हाँ भी हो सकता है।
जबरदस्ती का अर्थ रोमांस।
और सीमाएँ पार करना , अर्थात मर्दानगी।
इसी मानसिकता के कारण समाज में छेड़खानी, पीछा करने और यौन आक्रामकता को गंभीर अपराध नहीं समझा जाता।
पीड़िता की चुप्पी का महिमामंडन
गीत में लड़की कहती है कि “ ऐसे कैसे सबको कहानी बताऊँ?” “ कोई भी तो आया न हाथ रे…”
यह वह वास्तविक पीड़ा है जिसे गीत में मनोरंजन सामग्री में बदल दिया गया।
इस प्रकार के चित्रण युवा दर्शकों में यह धारणा बनाते हैं कि,
पीड़िता को चुप रहना चाहिए अर्थात उसका रेप भी हो जाये पर वह चुप रहे नहीं तो समाज उसकी बात पर हँसेगा
और उसे ही शर्म आएगी ।
यही rape culture का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें
अपराध को छिपाना, पीड़िता को दोषी महसूस कराना, और अपराधियों के व्यवहार को ‘यौवन’ मान लेना।
अब #तहर्रूश समझिये । तहर्रूश क्या होता है अलग से गूगल कर लें ।
घेराबंदी, भीड़ और “लुटेरे” और अपराधियों का ग्लैमराइजेशन
गीत में अपराधियों को “जवानी के लुटेरे” कहा गया है अर्थात्
हिंसा को “युवा ऊर्जा” का रूप दिया गया है।
यह ग्लैमराइजेशन केवल पुराने गीतों तक सीमित नहीं।
बॉलीवुड ने बार-बार यही किया है और करते आ रहे हैं ।
यही visual language युवा लड़कों को सिखाती है कि aggression = attraction।
अब आप प्रश्न करें कि सिनेमा समाज का दर्पण या समाज का निर्माता? अथवा हमें गर्त में डाल रहा है ।
सिनेमा के निर्माताओं का अक्सर तर्क होता है कि हम समाज को जैसा है वैसा दिखाते हैं।
लेकिन सिनेमा केवल दिखाता नहीं बल्कि यह मॉडलिंग, रिपीटिंग और नॉर्मलाइजिंग भी करता है।
अगर एक व्यवहार , गीतों में बार-बार सुनाई दे , फिल्मों में लगातार दिखाया जाए , हीरो द्वारा किया जाए तो वह समाज में स्वीकार्य बन जाता है।
इसलिए सिनेमा वस्तुतः दर्पण और ढालने वाला दोनों है।
समाधान : क्या किया जा सकता है?
Consent को रोमांस का नया केंद्र बनाया जाना चाहिये । तथा स्टॉकिंग और हेरासमेंट को कॉमेडी या रोमांस की जगह अपराध की तरह दिखाया जाना चाहिए । महिलाओं की इच्छाओं, सीमाओं और agency को मुख्य भूमिका में लाना चाहिए । गीतों और फिल्मों का सामाजिक समीक्षात्मक मूल्यांकन होना चाहिये । फिल्मकारों की संवेदनशीलता का मूल्यांकन होना चाहिये ।
सिनेमा जितना बड़ा प्रभाव पैदा कर सकता है, उतना ही बड़ा बदलाव भी ला सकता है।
“अठरा बरस की कुँवारी कली थी…” जैसे गीत सिर्फ एक उदाहरण हैं।
लेकिन यह उदाहरण यह दिखाता है कि सिनेमा ने वर्षों तक कि ज़बरदस्ती को रोमांस, पीछा करने को प्रेम, लड़की की चुप्पी को मर्यादा, और हिंसा को मर्दानगी के रूप में प्रस्तुत किया।
यही वह invisible framework है जिसे आधुनिक समाज में rape culture कहा जाता है
जहाँ यौन हिंसा को हिंसा नहीं, बल्कि “पुरुष व्यवहार”, “शरारत” या “प्रेम का तरीका” मान लिया जाता है।
सिनेमा इस संस्कृति को दर्शाता भी है और बढ़ाता भी।
और इसलिए इसकी समीक्षा, पुनर्विचार और सुधार
आज अधिक आवश्यक है जितना कभी था।
शेष : यदि बात बुरी लगी हो तो बाभन गरियाइये । मनुस्मृति जलाइये । वे , तहर्रूश के लिये तैयार बैठे हैं । तहर्रूश क्या होता, गूगल कर लें ।
2 months ago (edited) | [YT] | 103
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Abhishek Shukla
हमारे शहर में SIR का काम शुरू हो चुका है..
कागज हाथ में लिए शिक्षिकाएं (अन्य कर्मचारी भी) एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे जा रही हैं ...
एक ऐसी ही शिक्षिका से बात हुई..
उनका अनुभव हमारे समाज की सच्चाई बता रहा था ..
बोलीं मुस्लिम इलाकों में एक घर जाकर खड़े होने की देर होती है पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता है..लोग जागरूक हैं..
यहां तक कि जिनका छूट जा रहा है वो कॉल कर करके घर तक आ जा रहे हैं ..
वो स्त्रियां जो बुर्का ओढ़े दुनिया से कटी मालूम देती हैं..पूरी जानकारी दे रही हैं..
इसके उलट अपने लोगों में door bell बजाओ तो बोल दे रहे हैं ..
"ये तो कोई टाइम नहीं है आने का.."
"आगे हमारी दुकान पर चली जाओ"
"कल देख लेना आकर"
बोलीं अपने लोगों को लग रहा है कि सरकार ने आदमी भेजा है..तो सरकार की गरज है और उस सरकारी आदमी की गरज है..
#जो जागत है सो पावत है..
2 months ago | [YT] | 166
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Abhishek Shukla
न्यूज18 पर म्यूचूअल फंड चर्चा में
2 months ago | [YT] | 8
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Abhishek Shukla
Hubble नाम ने एक 'खगोलशास्त्री' ने आज से लगभग सौ साल पहले बताया था कि ये सृष्टि असीम है और लगातार फैलती जा रही है और इस सृष्टि में जो 'निहारिका' (नेबुला) हमसे जितनी अधिक दूर है वो हमसे उतनी ही अधिक तेजी से दूर भागती जा रही है।
दुनिया के लिए ये ज्ञान नया होगा पर हमारे लिए नहीं था क्योंकि हमारे सबसे आदि ग्रंथ 'ऋग्वेद' के एक मंत्र में आता है :- "कई नक्षत्र ऐसे हैं कि जिनका प्रकाश तीव्र गति से चलता हुआ भी अब तक पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँचा है।" यह इस सृष्टि के असीम होने का ही तो प्रमाण है। इसके अलावा हमारे यहाँ भगवान को "अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक" कहा गया है यानि वो जो इस 'अनंत सृष्टि' का स्वामी है।
ये सब बताता है कि हमारे पूर्वज ज्ञान और विज्ञान में कितने ऊँचे थे। "पूज्य गुरुजी गोलवलकर" इन्हीं सबके आधार पर कहा करते थे कि "विज्ञान जितनी अधिक उन्नति करेगा, 'हिन्दू धर्म' उतना ही अधिक इस विश्व में स्थापित होता चला जाएगा।"
इसीलिए हम आये दिन सुनते हैं कि सूर्य की सतह से उतने वाले नाद की ध्वनि ॐ के उच्चारण जैसी है तो कभी हम सुनते हैं कि 'गुरुत्वाकर्षण' का सिद्धांत हमारे यहाँ पहले से है तो कभी हमारे पूर्वजों के द्वारा चित्रित मूर्तियों में पूरी की पूरी embryology उत्कीर्ण मिलती है तो कभी बिष्णु पुराण से हमें पृथ्वी के घूर्णन गति का पता चलता है, तो कभी कभी हम हमारे 'रामायण' में 'सुग्रीव' को पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन करता हुआ बताते सुनते हैं।
अभी कुछ समय पहले NASA (The National Aeronautics and Space Administration) ने एक "नेबुला" (निहारिका) की खोज की और उसको नाम दिया "हैण्ड ऑफ़ गॉड"
जानते हैं क्यों?
क्योंकि ये 'नेबुला' रंग और आकृति में हमारी परंपरा में उल्लेखित, वर्णित और चित्रित "सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण" के चक्र धारण किये हुए हाथ सरीखी दिखती है जो एक साथ पूरी सृष्टि का 'अभय' और 'विनाश' दोनों करने को प्रस्तुत दिखती है।
इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि इस धर्म का "सूर्योदय" अब "पश्चिम" से होगा, पूर्व इसे धारण करने की, सहेजने की और संभालने की योग्यता खो चुका है।
3 months ago | [YT] | 116
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Abhishek Shukla
On News18
Don't go by thumbnail
3 months ago | [YT] | 6
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Abhishek Shukla
Every year drama
3 months ago | [YT] | 19
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Abhishek Shukla
स्किल अर्थात कौशल।
कौशल ही वर्ण व्यवस्था का आधार था।
मेधा कौशल की बहुलता - ब्राम्हण।
रक्षा कौशलं की बहुलता - क्षत्रिय।
वाणिज्य कौशलं की बहुलता - वैश्य।
श्रम कौशलं की बहुलता - शूद्र।
चलिये आपने बड़ा अच्छा किया कि इस व्यवस्था को नष्ट कर दिया जिसके दम पर भारत, हजारों वर्षों से मात्र 200 वर्षो के पूर्व तक, विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति हुवा करता था।
यह मैं नहीं कह रहा - अंगुस मैडिसन, पॉल बैरोच से लेकर गुरुमूर्ति और शशि थरूर सब बोल रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन स्किल्स की आवश्यकता नष्ट हो गयी ? आज भी मेधा शक्ति, रक्षा शक्ति, वाणिज्य शक्ति और श्रम शक्ति का हर देश और समाज में बोल बाला है। स्वरूप बदल सकता है समय के साथ, मूल सिद्धांत तो आज भी वहीं हैं।
वर्ण व्यवस्था की ये कुशलताएं, एक दूसरे के विपरीत नहीं वरन एक दूसरे के पूरक। जैसे रात और दिन - एक दृष्टिकोण यह हो सकता है कि दोनों के दूसरे के विरोधी हैं। या यहां तक कि शोषक भी मान सकते हो। लेकिन सत्य तो यह है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दिन ही दिन हो, रात न हो तो?
आज समस्त संसार में स्किल डिवेलपमेंट को प्रधानता दी जा रही है।
मेरी सलाह है, जिससे आप असहमत भी हो सकते हैं। कि उन स्किल्स की पहचान किया जाय, जिसे घर में सिखाया जाना संभव हो। घर का अर्थ है बचपन से।
जब हर तरह की बात सीखना एक खेल था। हमें याद है कि बचपन में हल जोतना सीखना भी एक आनंद का विषय होता था। याकि खेत जोतने के बाद उसे समतल करना। हेंगा के द्वारा।
तो ऐसे स्किल की पहचान की जाय - जिससे बचपन से ही बच्चे अपने माता पिता से सीख सकें। कालांतर में यदि उन्हें उसी क्षेत्र में आगे बढ़ना हो तो उस स्किल सम्बंधित स्कूल और कॉलेजों में भर्ती करवाकर उन स्किल्स के सैद्धांतिक पहलुओं को पढ़ाया जाय।
आज स्कूल और कॉलेज थ्योरी के अतिरिक्त क्या पढ़ाते हैं। रटवा रहे हैं वही सब बकवास, जो बच्चों के जीवन में कभी भी काम न आएगा।
आज स्किल सम्बंधित डिग्री देने वाले अनेक संस्थान धन्ना सेठों द्वारा खोलकर उनमें स्किल सिखाने के नाम पर लूटा जा रहा है।
अगल बगल देखिये कोचिंग और विश्वविद्यालयों को।
They are producing unemployable youths, by extracting huge money from their pockets, or from government revenue to run those institutions, which are producing copy cat pen drive.
यदि ऐसा संभव हो सके तो बच्चे 20 की आयु के पूर्व ही प्रोडक्टिव कार्य करने में सक्षम हो सकेंगे।
#शिक्षक_दिवस_विशेष।
5 months ago | [YT] | 98
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