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Happy new Year 2026......
“तुम्हारी मोहब्बत ही मेरी पूरी दुनिया है।”
“तुम हाथ थाम लो, सब ठीक हो जाता है।”
“भीड़ में भी तुम्हें ही ढूंढता है दिल।”
“तुम मिल जाओ, इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।”
“तुम मेरी ज़रूरत भी हो और सुकून भी।”
1 week ago | [YT] | 0
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“उम्मीदों से भरा हर दिन,
खुशियों से भरी रातें…
Happy New Year 2026!”
1 week ago | [YT] | 16
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Moto pad 60 Neo, best performance, student purpose best, 👍...
1 month ago | [YT] | 3
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🙏🙏🙏धर्मेंद्र का यह कदम सिर्फ एक पिता का अपने बेटे के प्रति प्यार नहीं था, बल्कि यह उनके गहरे अनुभव और फिल्म उद्योग की समझ का भी प्रमाण था। उन्होंने देखा कि सनी में एक्शन हीरो बनने की क्षमता है, और उन्होंने सही समय पर सही अवसर प्रदान किया। 'पाप की दुनिया' ने सनी देओल को वह मंच दिया जिसकी उन्हें तलाश थी, और उन्होंने अपनी प्रतिभा से उसे भुनाया।
इस फिल्म की सफलता ने बॉलीवुड में एक्शन फिल्मों के एक नए युग की शुरुआत की। सनी देओल के बाद कई अन्य अभिनेताओं ने एक्शन हीरो की छवि अपनाई, लेकिन सनी की अपनी एक अलग पहचान बनी रही। उनकी डायलॉग डिलीवरी, उनकी आँखों में गुस्सा और उनकी शारीरिक बनावट ने उन्हें एक अद्वितीय एक्शन स्टार बनाया।
धर्मेंद्र की यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे सही मार्गदर्शन और विश्वास किसी के करियर को बदल सकता है। उन्होंने न केवल अपने बेटे को सफलता की राह दिखाई, बल्कि फिल्म उद्योग में भी एक नया मानदंड स्थापित किया। यह घटना आज भी बॉलीवुड में प्रेरणा का स्रोत है, जो यह दर्शाती है कि कैसे परिवार का समर्थन और सही निर्णय किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं।
1 month ago | [YT] | 23
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किस हीरोइनों की फोटो है...? 😱
1 month ago (edited) | [YT] | 16
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क्या आप भी धर्मेंद्र के फैन थे?,,,,,,
1 month ago | [YT] | 37
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दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे: 25 साल का बेमिसाल सफ़र
हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री की सबसे प्रतिष्ठित रोमांटिक फ़िल्मों में से एक, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (DDLJ), ने अपनी रिलीज़ के 25 साल पूरे कर लिए हैं। यह फ़िल्म, जिसने एक पूरी पीढ़ी को राज और सिमरन के प्यार में डूबो दिया था, आज भी दर्शकों के दिलों पर राज करती है।
DDLJ का जादू: पीढ़ी दर पीढ़ी
पुरानी पीढ़ी: जिन युवाओं ने 1995 में इस फ़िल्म को देखा था, वे आज अधेड़ हो चुके हैं।
नई पीढ़ी: इस फ़िल्म के बाद जन्मी पीढ़ी अब जवान हो चुकी है।
अमिट प्रभाव: इन सबके बावजूद, फ़िल्म का जादू और इसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है।
कहानी: राज और सिमरन की प्रेम गाथा
DDLJ की कहानी राज (शाहरुख़ ख़ान) और सिमरन (काजोल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो लंदन में रहने वाले भारतीय मूल के परिवार से हैं।
मुख्य किरदार और उनकी पृष्ठभूमि:
सिमरन के पिता (बलदेव सिंह - अमरीश पुरी):
परंपरागत सोच वाले।
अपने देश की मिट्टी से गहरा लगाव।
राज के पिता (अनुपम खेर):
खुले विचारों वाले।
सिमरन (काजोल):
सच्चे प्रेम के सपने देखती है।
माँ (फ़रीदा जलाल) उसे सपनों के पूरा न होने की चेतावनी देती है।
शादी का प्रस्ताव और यूरोप यात्रा:
बचपन का वादा: बलदेव को अपने बचपन के दोस्त अजीत (सतीश शाह) से एक चिट्ठी मिलती है।
शादी तय: यह चिट्ठी 20 साल पहले दिए गए वचन की याद दिलाती है, जिसमें सिमरन की शादी अजीत के बेटे कुलजीत (परमीत सेठी) से तय की गई थी।
सिमरन की इच्छा: शादी से पहले सिमरन अपनी दोस्तों के साथ यूरोप घूमने जाना चाहती है और इसके लिए पिता से इजाज़त मांगती है।
राज और सिमरन की मुलाक़ात:
यूरोप ट्रिप: यूरोप यात्रा के दौरान सिमरन की मुलाक़ात राज से होती है।
प्यार की शुरुआत: ट्रेन छूट जाने के कारण दोनों को साथ में समय बिताना पड़ता है, और ट्रिप के अंत तक उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो जाता है, लेकिन वे इसका इज़हार नहीं कर पाते।
पंजाब में पुनर्मिलन:
सिमरन की वापसी: सिमरन कुलजीत से शादी के लिए अपने परिवार के साथ पंजाब आ जाती है।
राज का पीछा: राज भी सिमरन को ढूंढते-ढूंढते पंजाब पहुँच जाता है और उससे अपने प्यार का इज़हार करता है।
माँ की सलाह: सिमरन की माँ दोनों को भागकर शादी करने की सलाह देती है।
राज का सिद्धांत: राज सिमरन के पिता की इजाज़त के बिना शादी करने से इनकार कर देता है।
बलदेव सिंह का आशीर्वाद:
राज का प्रयास: राज बलदेव और पूरे परिवार को प्रभावित करने की कोशिश करता है।
अंतिम संवाद: अंत में, बलदेव सिंह कहते हैं, "जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी।"
DDLJ की ऐतिहासिक सफलता
20 अक्टूबर 1995 को रिलीज़ हुई "डीडीएलजे" को दर्शकों से अपार प्यार मिला।
व्यावसायिक और आलोचनात्मक सफलता:
व्यापक लोकप्रियता: फ़िल्म को न केवल भारत में, बल्कि विदेश में रह रहे भारतीयों द्वारा भी खूब पसंद किया गया।
नई रोमांटिक जोड़ी: इस फ़िल्म ने हिंदी सिनेमा को शाहरुख़ ख़ान और काजोल के रूप में एक नई और आइकॉनिक रोमांटिक जोड़ी दी, जिसका जादू आज भी बरकरार है।
रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन: फ़िल्म ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
मराठा मंदिर में प्रदर्शन: मुंबई के मराठा मंदिर में यह फ़िल्म 1000 हफ़्ते तक चली, जो एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड है।
पुरस्कार: DDLJ ने 10 फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते।
वित्तीय आंकड़े:
बजट: फ़िल्म का निर्माण मात्र 4 करोड़ रुपये में हुआ था।
कुल कमाई (1995): फ़िल्म ने कुल 102.50 करोड़ रुपये का बिज़नेस किया।
भारत से कमाई: 89 करोड़ रुपये।
विदेश से कमाई: 13.50 करोड़ रुपये।
DDLJ की अपील: दर्शकों को क्या छू गया?
फ़िल्म इतिहासकार एसएमएम असजा बताते हैं कि DDLJ ने दर्शकों, खासकर उस दौर के नौजवानों को एक नई पहचान दी।
नौजवानों से जुड़ाव:
स्वयं की पहचान: असजा कहते हैं, "डीडीएलजे से आम लोगों, ख़ासकर उस दौर के नौजवान को एक पहचान मिली। उन नौजवानों ने शाहरुख़ में अपने आप को देखा।"
रोमांटिक हीरो का बदलाव: यह फ़िल्म 80 और 90 के शुरुआती दशक की रोमांटिक हिंदी फ़िल्मों से अलग थी, जहाँ हीरो अक्सर सुपर हीरो होता था। DDLJ ने इस धारणा को तोड़ा।
भावनात्मक जुड़ाव: "इसने नौजवानों के दिलों में जगह बनाई। जैसे-जैसे फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती है, आप देख सकते हैं कि दर्शक प्रार्थना कर रहे होते हैं कि राज-सिमरन पकड़े ना जाएं और राज को सिमरन मिल जाए।"
आम लोगों की कहानी: इस कहानी से आम लोग ख़ुद को जोड़ सके।
सिमरन का किरदार:
आधुनिकता और स्वीकार्यता: सिमरन के किरदार की विवेचना करते हुए एसएमएम असजा कहते हैं, "सिमरन का क़िरदार सामाजिक स्वीकार्यता के हद तक मॉर्डन था।"
पश्चिमी प्रभाव और भारतीय मूल्य: काजोल का किरदार विदेश में पढ़ाई करता है और पश्चिमी कपड़े पहनता है, लेकिन उसके भीतर भारतीय मूल्य और परंपराएं भी मौजूद हैं, जो उसे दर्शकों के लिए और भी relatable बनाती हैं।
1 month ago | [YT] | 9
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दी - अमिताभ बच्चन और अमृता सिंह। इस फिल्म ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई और आज भी इसे एक कल्ट क्लासिक के तौर पर याद किया जाता है।
कहानी का सार: एक पिता और पुत्र का अटूट बंधन
"मर्द" की कहानी एक ऐसे पिता और पुत्र के इर्द-गिर्द घूमती है जो अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं। अमिताभ बच्चन ने राजू नामक एक बहादुर और निडर युवक का किरदार निभाया, जो अपने पिता, राजा आज़ाद सिंह (दारा सिंह) के नक्शेकदम पर चलता है। राजा आज़ाद सिंह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई थी और अपने लोगों की रक्षा के लिए हर चुनौती का सामना किया था। फिल्म में पिता और पुत्र के बीच का भावनात्मक बंधन, उनके बलिदान और न्याय के लिए उनकी लड़ाई को बखूबी दर्शाया गया है।
अमिताभ बच्चन का दमदार अभिनय और डायलॉग्स
अमिताभ बच्चन ने राजू के किरदार में जान डाल दी थी। उनके दमदार डायलॉग्स, जैसे "मर्द को दर्द नहीं होता" और "मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता", आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। उनकी एक्शन सीक्वेंस, उनका स्टाइल और उनकी संवाद अदायगी ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। अमृता सिंह ने भी अपनी भूमिका में शानदार प्रदर्शन किया और उनकी केमिस्ट्री अमिताभ बच्चन के साथ खूब पसंद की गई।
संगीत और गाने: फिल्म की जान
फिल्म का संगीत अनु मलिक ने दिया था और गाने आज भी लोकप्रिय हैं। "मर्द तांगेवाला", "हम तो तीन यार हैं" और "ओ माँ शेरावालिये" जैसे गाने फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाते हैं और दर्शकों को बांधे रखते हैं। इन गानों ने फिल्म की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामाजिक संदेश और प्रासंगिकता
"मर्द" सिर्फ एक एक्शन फिल्म नहीं थी, बल्कि इसमें एक गहरा सामाजिक संदेश भी था। यह फिल्म अन्याय के खिलाफ खड़े होने, अपने अधिकारों के लिए लड़ने और अपने देश के प्रति वफादार रहने का संदेश देती है। आज भी, यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि साहस, ईमानदारी और न्याय के लिए संघर्ष कितना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
"मर्द" एक ऐसी फिल्म है जिसने भारतीय सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यह अमिताभ बच्चन के करियर की एक मील का पत्थर फिल्म है और आज भी इसे एक प्रेरणादायक और मनोरंजक फिल्म के रूप में देखा जाता है। तो दोस्तों, अगर आपने अभी तक यह फिल्म नहीं देखी है, तो इसे ज़रूर देखें और अनुभव करें "मर्द" का जादू!
1 month ago | [YT] | 5
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रामायण कथा: हनुमानजी की चाल में फंसी रावण की पत्नी, मिला प्रभु राम को रावण की मृत्यु का सामान, और हुआ रावणराज का अंत
भगवान राम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था। बार-बार प्रहार करने के बाद भी रावण रणभूमि में अट्टहास करता हुआ खड़ा हो जाता था। यह देखकर भगवान राम की चिंता बढ़ गई। तब विभीषण ने रावण की मृत्यु का रहस्य भगवान राम से कहा,
1 month ago | [YT] | 5
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नमस्ते दोस्तों!
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विनोद खन्ना की वो फिल्म, 3 महीने तक रही हाउसफुल, मेकर्स को नोट गिनने के लिए रखनी पड़ी थी टीम
आज हम जिस फिल्म की बात कर रहे हैं, वह 1980 की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म थी, जिसके बाद एक सुपरस्टार का मोहभंग हो गया था।
विनोद खन्ना बॉलीवुड के उन सुपरस्टार्स में से एक थे, जिन्होंने विलेन के रूप में इंडस्ट्री में कदम रखा और फिर बड़े-बड़े सितारों को पीछे छोड़कर हीरो बन गए। उनकी धमाकेदार अदाकारी देखकर कई लोगों ने तो यह कहना शुरू कर दिया था कि अमिताभ बच्चन को अगर कोई टक्कर देगा, तो वह सिर्फ और सिर्फ विनोद खन्ना ही होंगे।
1980 में उन्होंने एक जबरदस्त फिल्म दी, जिसमें शानदार एक्शन और थ्रिलर देखने को मिला। फिल्म के एक्शन सीन, गाने और कहानी ने दर्शकों को सिनेमाघरों में बांधे रखा। आलम यह था कि फिल्म के टिकट एडवांस में बिकने शुरू हो गए थे। यह फिल्म कुछ दिनों तक नहीं, बल्कि 3 महीने तक हाउसफुल रही थी।
लेकिन इस फिल्म के बाद, दिग्गज स्टार विनोद खन्ना ने अचानक 'कुर्बानी' दे दी। विनोद खन्ना ऐसे अभिनेता थे, जिनके पास पैसा, ग्लैमर और शोहरत की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने 1971 से 1982 के बीच लगभग 47 मल्टीस्टारर फिल्मों में काम किया। इनमें 'एक और एक ग्यारह', 'हेरा फेरी', 'खून पसीना', 'अमर अकबर एंथोनी', 'जमीर', 'परवरिश' और 'मुकद्दर का सिकंदर' जैसी हिट फिल्में शामिल हैं। कहा जाता है कि विनोद खन्ना जिस भी फिल्म में होते थे, उसका बॉक्स ऑफिस पर हिट होना तय माना जाता था।
1980 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म
आज हम जिस फिल्म की बात कर रहे हैं, वह और कोई नहीं बल्कि साल 1980 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म 'कुर्बानी' है। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता फिरोज खान और अभिनेत्री जीनत अमान के साथ स्क्रीन साझा की थी। इस फिल्म के ब्लॉकबस्टर होते ही सुपरस्टार का मोहभंग हो गया था।
अमिताभ बच्चन ने ठुकराई, विनोद खन्ना की खुली किस्मत!
20 जून 1980 को रिलीज हुई इस फिल्म में विनोद खन्ना के साथ फिरोज खान और जीनत अमान नजर आए थे। IMDb की रिपोर्ट के अनुसार, विनोद खन्ना के रोल के लिए मेकर्स अमिताभ बच्चन को कास्ट करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। इसके बाद यह रोल विनोद खन्ना की झोली में आ गिरा और उस साल की ब्लॉकबस्टर बन गई।
इस फिल्म को फिरोज खान ने प्रोड्यूस और डायरेक्ट दोनों किया था। उन्होंने इस फिल्म में अभिनय भी किया था।
नोट गिनने के लिए रखनी पड़ी टीम
कहा जाता है कि जब फिल्म 'कुर्बानी' रिलीज हुई थी, तो इसने बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। कहते हैं कि मुंबई में ही यह फिल्म तीन महीने तक हाउसफुल चली थी। फिल्म की धुआंधार कमाई ने नोटों की बारिश कर दी थी। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म के नोट गिनने के लिए फिरोज खान ने एक पूरी टीम लगा दी थी।
इस फिल्म को फिरोज खान ने 1.55 करोड़ रुपये में बनाया था और इसने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 6 करोड़ रुपये और पूरे विश्व में 12 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की थी।
ब्लॉकबस्टर होते हुए सिनेमा से मोहभंग
इस फिल्म के रिलीज होते ही, अपने स्टारडम के चरम पर बैठे विनोद खन्ना ने अचानक अध्यात्म का रास्ता अपना लिया। उन्होंने बॉलीवुड को अलविदा कहा और सब कुछ छोड़कर ओशो की शरण में चले गए थे। जब कुछ साल बाद वह वापस आए, तो उन्हें लोगों का वह प्यार नहीं मिल पाया।
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धन्यवाद!
1 month ago | [YT] | 11
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