प्यारे साथियों,सनातन संस्कार के इस यूट्यूब चैनल पर, आप सभी का स्वागत है।यह चैनल हमारी एक पहल है सभी को पुन: एक बार अपने सनातन ज्ञान - विज्ञान से अवगत कराने की,उससे जोड़ने की।हमें आशा है कि आप सभी हमारी इस पहल में हमारे उत्साह का वर्धन करेंगे ताकि हम आपके सामने भारत के सनातन ज्ञान - विज्ञान को, उसके दर्शन को हृदय से प्रस्तुत कर सकें।

वर्तमान समय में जहां लोग अनेक मनोविकारों से ग्रस्त हैं,समस्याओं से घिरे हुए हैं,उनके लिए यह चैनल एक सुखद मार्गदर्शन है।सिद्धार्थ द्विवेदी भारत के सबसे युवा साहित्यकार एवं दार्शनिक हैं,इनकी विद्वता के चलते इन्हें बहुत कम उम्र में ही महाराष्ट्र के राज्य पाल श्री भगत सिंह कोश्यारी जी द्वारा सम्मान प्राप्त हुआ।आज अपने ज्ञान के माध्यम से ये समाज को जोड़ने का अनुपम कार्य कर रहे हैं ।आप सब सिद्धार्थ जी के इस मंगलमय अनुष्ठान में जुड़ कर उनका सहयोग करेंगे।ऐसी हमारी आशा है।


Writer / spritual orator
Research scholar
MU, मुंबई विश्वविद्यालय
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

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प्रेम के दो रूप हैं—प्यास और तृप्ति।

प्रेम का प्रथम स्वरूप प्यास है और दूसरा स्वरूप तृप्ति। परन्तु यह साधारण प्यास नहीं, बल्कि ईश्वर के मिलन की वह आंतरिक व्याकुलता है जो मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती। जब तक प्रभु का साक्षात्कार न हो जाए, तब तक हृदय में एक मधुर बेचैनी बनी रहती है। यही प्रेम की सच्ची शुरुआत है।
संतों ने कहा है—
"मैं बौरी ढूँढन चली, रही किनारे पैठ।"
अर्थात यदि हम भगवान् को पाने की बात तो करें, पर अपने जीवन में कोई साहस, साधना, त्याग और पुरुषार्थ न हो; यदि हम नदी के किनारे बैठकर ही मोती मिलने की आशा करें, तो यह प्रेम नहीं, केवल कल्पना है। मोती उसी को मिलता है जो गहरे जल में उतरने का साहस करता है।

ईश्वर की प्राप्ति भी ऐसी ही है। केवल चर्चा, केवल इच्छा या केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जब तक हृदय में ऐसी तड़प न जागे कि भगवान् के बिना जीवन अधूरा लगे, तब तक प्रेम का वास्तविक उदय नहीं होता। यही प्यास साधक को जप, ध्यान, भक्ति, सेवा और आत्मपरिवर्तन की ओर ले जाती है।
और जब यही प्यास अपने चरम पर पहुँचकर भगवान् के साक्षात्कार में परिणत होती है, तब जन्म लेती है तृप्ति। उस अवस्था में न कोई अभाव रह जाता है, न कोई माँग, न कोई शिकायत। केवल आनंद, शांति और परम संतोष शेष रहता है। इसलिए प्रेम का प्रारम्भ प्यास से होता है, किन्तु उसकी पूर्णता तृप्ति में होती है।

2 months ago | [YT] | 0

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8 months ago | [YT] | 4

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हम दुःखी क्यों हैं?

जिंदगी में कब क्या होगा हम नहीं जानते वास्तव में जिंदगी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है लेकिन फिर भी हमें पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि जिंदगी हमारे हिसाब से चलेगी। पता नहीं क्यों हम ज़िंदगी के हर छोटे- बड़े, अच्छे -बुरे लम्हों हो नियंत्रित करना चाहते हैं।मुझे लगता है कि यही हमारे दुःख का का सबसे बड़ा कारण है। हम जैसी जिंदगी है उसको उसी तरह कभी स्वीकार कर ही नहीं पाते या फिर शायद करना ही नहीं चाहते।

1 year ago (edited) | [YT] | 2

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डॉ. रोशनी किरण जी की गीत-पुस्तक "सुधियां तुम्हारी पास हैं" के लोकार्पण एवं परिचर्चा समारोह में महाराष्ट्र राज्य के पूर्व मंत्री माननीय श्री अमरजीत मिश्र जी और महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष श्री शीतलाप्रसाद दुबे जी से सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस विशेष अवसर पर कार्यक्रम के कुशल संचालन के लिए आदरणीय बाबूजी श्री मयंक जी, डॉ. सुधाकर मिश्र जी एवं अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों का आशीर्वाद एवं स्नेह प्राप्त हुआ। यह सम्मान और स्नेह साहित्य साधना के मार्ग को और अधिक ऊर्जा एवं प्रेरणा प्रदान करता है।

1 year ago (edited) | [YT] | 9

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साधना की महत्ता


प्रत्येक दिन अनेक प्रकार के मोह, अनेक प्रकार के आकर्षण, अपने हृदय पर अपनी छाप जमाते हुए अनेक प्रकार की विकृतियां उत्पन्न करते रहते हैं। उन दुष्ट संस्कारों से अन्तःकरण को मुक्त करने के लिए हमें प्रत्येक दिन प्रयत्न करते रहना चाहिए । वह करना ही पडता है, इससे छुटकारा नहीं ।

श्रीरामकृष्ण परमहंस के गुरु, श्रद्धेय श्री तोतापुरीजी बडे श्रेष्ठ पुरुष थे । जीवन का सर्वश्रेष्ठ अन्तिम साक्षात्कार उन्होंने पाया हुआ था । परन्तु प्रतिदिन, और दिन में कई बार वे आसन जमाकर ध्यानमग्न, समाधिस्थ अवस्था में बैठ जाते थे। एक दिन रामकृष्ण परमहंस ने उनसे पूछा-" महाराज, आपने तो ब्रह्म-प्राप्ति कर ली है, ज्ञान-प्राप्ति कर ली है। अब आपको आसन लगाकर बैठने की क्या आवश्यकता है ?" उन्होंने कहा-" मैंने सब कुछ पा लिया यह अभिमान मन में नहीं आना चाहिए । अपनी साधना प्रत्येक दिन नियमित रूप से करनी ही चाहिए । देखो, यह मेरे पास पानी का लोटा है। कितना साफ है, चमकता है ? उसमें अपना चेहरा देख लो । परन्तु इसे मैंने रोज अच्छी प्रकार से मांजकर साफ नहीं किया तो इसपर दाग पड जाएगा। अन्दर भी दाग पड जाएगा। इसे और कुछ दिन नहीं मांजा तो इसमें रखा हुआ पानी पीने योग्य क्या, व्यवहार करने योग्य भी नहीं रहेगा।"

अपने अन्तःकरण को भी ऐसे ही रोज साफ करना चाहिए । यह मत सोचो कि मेरी साधना पूर्ण हो गयी, मैंने सब कुछ पालिया है। मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं, यह अभिमान व्यर्थ है।

1 year ago | [YT] | 7

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नारद जी का अभिमान


एक बार श्री नारद जी के मन में यह अभिमान हुआ कि मेरे समान इस त्रिलोकी में कोई संगीतज्ञ नहीं है। इसी बीच एक दिन उन्होंने रास्ते में कुछ दिव्य स्त्री-पुरुषों को देखा, जो कि मूर्छित पड़े थे,घायल पड़े थे और उनके विविध अंग जो है,कटे हुए थे। नारद जी के द्वारा इस स्थिति का कारण पूछने पर उन दिव्य देव- देवियों ने बड़े ही आर्त स्वरमें नारद जी से निवेदन करते हुए कहा कि -'हम सभी राग-रागिनियाँ हैं। पहले हम अंग-प्रत्यंगों से पूर्ण थे; पर आजकल नारद नामका एक संगीतानभिज्ञ व्यक्ति, जिसको संगीत का कुछ भी ज्ञान नहीं है, वह दिन-रात राग-रागिनियों का अलाप करता चलता है, जिससे कि हम लोगों का अंग-भंग हो गया है। इसलिए हे! महात्मन आप यदि विष्णुलोक को जा रहे हों तो कृपया हमारी दुरवस्था का समाचार भगवान् विष्णु को देंगे और उनसे प्रार्थना करेंगे कि हम लोगों को इस कष्ट से शीघ्र ही, वे मुक्त करें।'

अब, जब नारदजी ने अपनी संगीतानभिज्ञता की बात सुनी, तब वे बड़े दुखी हो गये। और जब वे भगवद्धाम पहुँचे, तो प्रभु ने उनका उदास मुख मण्डल देखकर उनकी खिन्नता और उदासी का कारण पूछा। नारदजी ने सारी बात बता दी। भगवान् बोले- हे! नारद, मैं भी इस कला का मर्मज्ञ कहाँ हूँ। यह तो भगवान् शंकर के वश की बात है। अतएव उनके कष्ट दूर करनेके लिये शंकरजी से प्रार्थना करनी चाहिये।'


अब, जब नारदजी ने महादेव जी से सारी बातें कहीं, तब भगवान् भोलेनाथ ने उत्तर दिया कि - नारद! यदि मैं ठीक ढंग से राग-रागिनियों का अलाप करूँ तो निःसन्देह वे सभी अंगों से पूर्ण हो जायँगी; पर मेरे संगीत का श्रोता, कोई उत्तम अधिकारी मिलना चाहिये।' अब नारदजी को और भी दुःख हुआ कि क्या ? मैं संगीत सुनने का अधिकारी भी नहीं हूँ।' जो हो, उन्होंने भगवान् शंकर से ही उत्तम संगीत-श्रोता चुनने की प्रार्थना की। और जिसके लिए फिर भगवान शंकर ने भगवान नारायण के नाम का चुनाव किया।इस तरह, प्रभु ने भी फिर यह प्रस्ताव मान लिया। संगीत समारोह आरम्भ हुआ। सभी देव, गन्धर्व तथा राग-रागिनियाँ वहाँ उपस्थित हुई। और महादेवजी के राग अलाप ते ही उनके सारे अंग - प्रत्यंग पूरे हो गये, जुड़ गए।

अब,नारद जी तो ठहरे साधु-हृदय, परम महात्मा। सो, उनका अहंकार भी दूर हो गया और राग-रागिनियों को फिर से पूर्णांग देखकर वे बड़े ही प्रसन्न हुए, आनंदित हुए।

1 year ago | [YT] | 3

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क्या है ? सनातन शब्द ॐ

प्यारे साथियों, महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में कहा कि सृष्टि का सृजन, पालन और संहार जिसके द्वारा होता है वही वस्तुत: ईश्वर है। लेकिन उस ईश्वर को हम देख नहीं सकते। अब प्रश्न उठता है कि जिसको हम देख नहीं सकते उसको जानेंगे कैसे?। तो महर्षि पतंजलि ने कहा कि तस्य वाचक: प्रणव:। यानि कि भले ही हम उसे देख नहीं सकते। परन्तु यदि हम उसके नाम का आश्रय लें, तो हम उसे देख भी पाएंगे और जान भी पाएंगे। और इसीलिए आप देखें कि गोस्वामी जी ने नाम महिमा गाते हुए कहा कि

अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।
उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी॥४॥

यानि कि ब्रह्म का जो निर्गुण और सगुण स्वरूप है उन दोनों के बीच नाम चतुर दुभाषिये का काम करता है। दुभाषिया ट्रांसलेटर को कहते हैं। जैसे आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री जब किसी दूसरे देश में जाते हैं तो उनके साथ एक ट्रांसलेटर चलता है यानि कि एक ऐसा व्यक्ति जिसको कि दुभाषिया कहते हैं क्योंकि उसे दोनों ही भाषाओं का ज्ञान होता है। जो कि वहां के प्रधानमंत्री की भाषा को हिंदी में ट्रांसलेट करके अपने प्रधानमंत्री को बताता है। तो, कुछ इसी प्रकार से ईश्वर का नाम भी काम करता है। वह भी जो उसका निर्गुण और सगुण स्वरूप है उसका बोध हमको और आपको करा देता है। अतः ईश्वर का बोध कराने वाला जो शब्द है उसे ही ओम कहते हैं। इसी को प्रणव भी कहते हैं। प्रणव अर्थात वह शब्द जिसके द्वारा उत्कृष्ट रूप से ईश्वर की स्तुति की जाती है।

1 year ago (edited) | [YT] | 6

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सच्चे भक्त का लक्षण क्या है?

भक्त का पहला लक्षण है कि उसमें किसी भी प्रकार का दिखावा नहीं होता,वह हर प्रकार के दिखावे से दूर रहकर,एकांत में भगवान का भजन करता है। और जैसा कि मैंने कुछ देर पहले भी कहा कि प्रेम छिपाने की वस्तु है,प्रदर्शन करने की नहीं। क्योंकि प्रेम छिपाने से ही बढ़ता है।

भक्त का दूसरा लक्षण है। कामनाओं से रहित होना। यानी माता शबरी की तरह जिसका मन हर प्रकार की कामानों से रहित है और एक भगवान में ही लगा हुआ है। वही सच्चा भक्त है। प्यारे साथियों, यह सारा प्रपंच जो दिखाई पड़ता है, उसके मूल में कारण कामना ही है। कामना के कारण ही जगत है, हम और आप हैं। कामना नहीं तो कुछ भी नहीं। तो जिसके भीतर कामना होती है वही वस्तुत: दुनिया भर का दिखावा करता है। इसलिए कमनायुक्त अंत:करण वाला व्यक्ति भले ही अपने आपको भगवान का भक्त कहे लेकिन सच बात तो यह है कि वह भगवान का भक्त नहीं अपितु अपनी कामनाओं का भक्त है। तो ऐसे लोगों से हमको चाहिए कि हम लोग सावधान रहें।

भक्त का तीसरा लक्षण है। करुणा। प्यारे साथियों, जैसे भगवान करुणा निधान है। वैसे ही उनके भक्त भी करुणा से भरे हुए होते हैं। वे सब पर दया करते हैं। किसी से भी किसी प्रकार का वैर भाव वे नहीं रखते। उनके मन में विश्व के समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का भाव होता है। और इसीलिए हमारे ऋषियों ने कहा कि

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।

हे! प्रभु सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो और किसी को किसी भी प्रकार का कोई दुख न हो।


तो प्यारे साथियों, यह थे भक्तों के कुछ लक्षण जिनपर हमने अभी चर्चा की। मुझे आशा है कि भक्ति के स्वरूप को और सच्चे भक्तों के लक्षण को आपने हृदयंगम कर लिए होगा।

1 year ago | [YT] | 6

sanatan sanskar

गुण और दोष


यह जो सृष्टि है,यह सृष्टि गुणl दोषमय है। इसमें गुण और दोष दोनों समान परिपाक में हैं। जैसे आटा और पानी को सान दें तो फिर उसको चाह करके भी हम अलग-अलग नहीं कर सकते ठीक वैसे ही यह जो सृष्टि है वह गुण और दोष से युक्त है। उससे मिल करके बनी हुई है। अतः हमें चाहिए कि जब भी ग्रहण करने की बात आए तो हम गुणों को ग्रहण करें। गोस्वामी जी श्री रामचरितमानस में बड़ा सुंदर सूत्र देते हैं। वे गुण के ग्राहकों को संत कहते हैं और उनका स्वभाव हंस की तरह बताते हैं?। और मुझे लगता है कि संत की परिभाषा इससे अच्छी हो नहीं सकती। वास्तव में जो दूसरों के अवगुणों को न देखते हुए उनके गुणों को देखता है, वही संत है। वस्तुतः गुण और अवगुण तो सब में है, रचा बसा हुआ है। हम चाह कर भी अवगुणों को व्यक्ति से दूर नहीं कर सकते, ऐसे में उत्तम मार्ग तो व्यक्ति के गुणों को हंस की तरह ग्रहण करना ही है। जो न केवल व्यवहारिक अपितु आत्मिक दृष्टि से भी हमारी उन्नति सुनिश्चित कर सकता है।

1 year ago | [YT] | 5

sanatan sanskar

उत्कृष्ट शोध के लिए SGT विश्वविद्यालय में पुरस्कार प्राप्त करते हुए 🙏😊

1 year ago | [YT] | 14