The Conch - A symbol of Sacred voice.
Dive deep into the rich tapestry of India with The Conch, your one-stop channel for captivating stories, insightful interviews, and stunning visuals.
Imagine The Conch as your trusty companion, guiding you through captivating journeys into the heart of India.
Untold stories, Expert insights, Local voices, and Visual storytelling
Whether you're a lifelong India enthusiast or just beginning your journey, The Conch offers a window into the soul of this incredible nation.
Hit subscribe and join the conversation!
Documentary Filmmakers Welcome!
Do you have a compelling documentary you'd like us to consider? We're also open to submissions.
Interested in Working with Us?
Are you passionate about documentary making or marketing ? We're seeking motivated individuals to join our team!
CONTACT FOR VIDEO EDITING & PODCAST RECORDING
Please reach out to us at Theconch.in@gmail.com
#culture #documentaries #Interviews
The Conch
यही है मोटामोटी सुप्रीम कोर्ट का अरावली पर निर्णय:
1 पहले FSI (फारेस्ट सर्विस ऑफ इंडिया) की अरावली को लेकर परिभाषा में 3 बातें थी यद्यपि यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नही था। इस काऱण स्टेट गवर्नमेंट मनमानी करते थे।
FSI की पुरानी परिभाषा में:
1. 3° से अधिक ढाल
2. 100 मीटर का फुटहिल बफर
3. 500 मीटर तक की घाटियाँ भी शामिल
सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा में
1 ढाल हटा दिया गया है।
2 100 मीटर का फुटहिल मानक रखा गया है
3 अब केवल वही घाटी/जमीन शामिल होगी जिन दो या अधिक पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से अधिक हो।
पुरानी परिभाषा के पॉइंट 2 और 3 में छेड़-छाड़ क्यो किया गया ?
क्योकि यदि पुरानी परिभाषा को ही कानूनी बनाया गया होता तो 0 माइनिंग होती जो सरकार नही चाहती क्योकि वह प्रेक्टिकल नही है।
इसके अलावा अब तीन
ज़ोन बनाए जाएंगे:
1 कोर ज़ोन: जहाँ कोई माइनिंग एक्टिविटी नही होगी
2 रिस्टोरेशन ज़ोन: वह पुराने खुदे हुए क्षेत्र को रिस्टोर किया जाएगा
3 टाइम बाउंड् माइनेबल ज़ोन: यहॉ एक्टिविटी होगी लेकिन पहले इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट रिशर्च एंड एडुकेशन से mpsm (मैनेजेबल प्लान फ़ॉर सस्टिनेबल माइनिंग) लेना होगा:
यहॉ माइनिंग भी झारखण्ड के सारंडा के तर्ज पर होगी।
@raj_k_mishra
2 weeks ago | [YT] | 2
View 0 replies
The Conch
800 संगठनों का संकल्प - सनातन संस्कृति की रक्षा का !
‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ के समापन में शौर्य और संस्कृति की प्रेरणा!
नई दिल्ली : देश की राजधानी स्थित भारत मंडपम में संपन्न हुए दो दिवसीय ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में देशभर से तीन हजार से अधिक हिंदू भक्तों और 800 से अधिक संगठनों के पदाधिकारी उपस्थित थे। इस अवसर पर संत-महंत, मंत्री, उद्योजक, अधिवक्ता, चिंतक और रक्षा विशेषज्ञों ने सनातन राष्ट्र की स्थापना हेतु संस्कृति के संरक्षण का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। ‘सुरक्षा, संस्कृति और शौर्य’ विषय पर हुए मार्गदर्शन तथा शस्त्र-प्रदर्शन से उपस्थित जनसमूह में अदम्य शौर्य और प्रेरणा का संचार हुआ।
“भारत बनेगा प्रजासत्ताक हिंदू राष्ट्र” – स्वामी विज्ञानानंद जी
महोत्सव के समापन अवसर पर आयोजित ‘सनातन राष्ट्र संकल्प संत सभा’ में ‘हिंदुओं का सांस्कृतिक घोषणा पत्र’ विषय पर बोलते हुए विश्व हिंदू परिषद के सह महामंत्री स्वामी विज्ञानानंद जी ने कहा कि जो राष्ट्र हिंदू जीवन-पद्धति अपनाएगा, वही सच्चे अर्थों में हिंदू राष्ट्र बनेगा। स्वतंत्रता-पूर्व भारत समृद्ध था । सूर्य के उदय से अस्त तक का भूभाग हिंदू अधिपत्य में था। आज हिंदुओं की सत्ता केवल भारत के कुछ राज्यों तक सीमित है। अतः केवल त्योहारों में रमने के बजाय, शेष प्रदेशों को पुनः हिंदू संस्कृति के रंग में लाना प्रत्येक का कर्तव्य है। तभी भारत केवल हिंदू राष्ट्र नहीं, बल्कि “प्रजासत्ताक हिंदू राष्ट्र” बनेगा।
“चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा नीति बने” – पूज्य पवन सिन्हा गुरुजी
केवल चरित्रवान लोग ही धर्मयुद्ध कर सकते हैं। जिनके पास चरित्र नहीं होता, वे युद्ध नहीं जीत सकते। भारत के पास चरित्र होने के कारण पाकिस्तान के विरुद्ध हुए अनेक छोटे-बड़े युद्धों में भारत को सफलता मिली। चरित्र निर्माण करना आसान नहीं है और चरित्र का शिक्षा से सीधा संबंध नहीं होता। अनेक उच्च शिक्षित लोग भी भ्रष्टाचारी हैं। वर्तमान शिक्षा युवाओं में चरित्र निर्माण करने में असमर्थ है, इसलिए केंद्र सरकार को चरित्र निर्माण करने वाली शैक्षणिक नीति तैयार करनी चाहिए, ऐसा आवाहन ‘पावन चिंतनधारा आश्रम’ के संस्थापक पूज्य पवन सिन्हा गुरुजी ने किया।
“संविधान में यह भेदभाव क्यों?” – श्री रमेश शिंदे
हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री रमेश शिंदे ने कहा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर देश’ कहा गया है, किंतु धारा 25 से धार्मिक आधार पर भेदभाव किया गया है। अल्पसंख्यकों के लिए अलग प्रावधान और नियम बनाए गए हैं । यह समानता के सिद्धांत के विपरीत है। सच में यदि देश सेक्युलर है तो फिर यह भेदभाव क्यों?
छत्तीसगढ़ के शदाणी दरबार के पीठाधीश्वर प.पू. युधिष्ठिरलाल महाराज ने आह्वान किया कि उपस्थित सभी व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में सनातन राष्ट्र स्थापना के कार्य को आगे बढ़ाएं। हिंदू जनजागृति समिति के धर्मप्रचारक सद्गुरु नीलेश सिंगबाळ ने कहा कि भगवान ने गीता में कहा है, “न मे भक्तः प्रणश्यति” अर्थात “मेरे भक्त का नाश नहीं होता।”
इसलिए संकट के समय में सुरक्षा के साथ ईश्वरभक्ति का मार्ग ही कल्याणकारी है। महोत्सव का समापन ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन से हुआ। इस महोत्सव के आयोजन के लिए भारत सरकार के कला व संस्कृति विभाग, भाषा विभाग, सांस्कृतिक मंत्रालय तथा दिल्ली पर्यटन विभाग का सहयोग प्राप्त हुआ।
3 weeks ago | [YT] | 12
View 0 replies
The Conch
फाईनेन्सियल टेक्नोलॉजी(फिनटेक) के दो दिग्गजों के बीच के तकरीबन दो घंटे के पोडकास्ट को तन्मय होकर सुना। मतलब एलॉन मस्क और निखिल कामथ। एक खाटी हिन्दुस्तानी और दूसरा अमेरिकी। एक खरबपति तो दूसरा भी अरबपति। अब दोनों टेक्नोलॉजी शिखर पुरुषों और लक्ष्मी कृपा पात्र धन कुबेरों के बीच चर्चा हुई तो मुख्य विषय भी प्रौद्योगिकी ही होना था। मैंने सोचा अपने फेसबुक मित्रों जिन्होनें इस लंबे पोडकास्ट को नहीं देखा सुना हो उन्हें इसके बारे में बताया जाय।
निखिल कामथ सैतीस वर्षीय युवा भारतीय अरबपति हैं जिन्हें डिजिटल टेक्नोलॉजी में महारत हासिल है और वे विश्व के चर्चित महापुरुषों के साथ पोडकास्ट करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ भी पिछले महीनों उनका एक दो घंटे का पोडकास्ट आया था। उनका यह कार्यक्रम डब्ल्यू टी एफ के नाम से जाना जाता है। डब्ल्यू टी एफ बोले तो ह्वाट द फ*। अजीब सा और अश्लील सा नाम है न। मगर आजकल डिजिटल मीडिया पर युवाओं के ऐसे ही लिंगों - उद्गार हैं। छोड़िये भी, नाम में क्या रखा है। आईये कामथ और मस्क के बीच हुई चर्चा का सार ग्रहण करें।
एलाॅन मस्क ने कहा कि विचार /आइडियाज /प्रत्यय उल्लेखनीय हैं भाषा नहीं। अब हमारे पास इंटरनेट पर तत्क्षण किसी भी भाषा के अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है। और समूचा विश्व एक 'सामूहिक चेतना' ( कलेक्टिव कांससनेश) की ओर बढ़ रहा है। और विश्व, मानवता और उसके भविष्य के साथ ही ब्रह्मांड को समझने में हमारी यह सामूहिक चेतना बड़े काम की होगी। उन्होंने खुद अपना उदाहरण देते हुये कहा कि अकेले वे क्या एक अंतरिक्ष यान बना सकते थे। एक अकेला थक जायेगा मिलकर बोझ उठाना ही मानवता की असली शक्ति है। यह एक सामूहिक चेतना का ही प्रतिफल है कि मनुष्य मंगल पर बस्ती बसाने की ओर बढ़ चला है।
दोनों धुरंधरों के सवाल जवाब के बीच एक यह बात भी आई कि मानवता के सामने आज भी अनेक ऐसे सवाल हैं जिन्हें जाना तक नहीं गया है, पूछने की तो बात ही छोड़िये। उन सवालों की खोज जरुरी है। उन्हें पूछा जाना चाहिए। जो, जीवन का अर्थ और मकसद, हमारे वजूद, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की जिज्ञासा जैसे अब तक पूछे जा रहे सवालों से अलग हो सकते हैं। आज हमारे पास उत्तर हैं मगर सवालों का टोटा है। सामूहिक चेतना के विस्तार से वे सवाल उद्घाटित हो सकते हैं जो हमारे अस्तित्व के लिये जरुरी होंगे।
उन्होंने अपने सभी उपक्रमों - स्पेस एक्स, टेक्सला और एक्स एआई का उदाहरण देकर सामूहिक चेतना के महत्व को बताया। भविष्य में सौर ऊर्जा की क्रांति का हवाला दिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारनामों का भी विस्तार से जिक्र किया। भविष्य मे गहन अंतरिक्ष में एआई सैटेलाइट का खाका खींचा। बताया कि उनकी चालक रहित कार टेस्ला कैसे रीयल टाईम एआई उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। आप्टिमस नामी एआई रोबोट मानव जीवन में क्रांति लाने को उद्यत हैं। वे निजी रोबो की, सहायक रोबों की भूमिका निभायेंगे। और निकट भविष्य में ही हालात ऐसे होने लग जायेंगे कि मनुष्य को काम करने की जरुरत ही नहीं रहेगी। सारा काम धाम रोबो संभालेंगे। मनुष्य ठाठ करेगा। नौकरी एक शौकिया उद्यम होगी।
बातचीत में एलान ने अपने स्टारलिंक सैटेलाइट से इंटरनेट सेवा की चर्चा की जो सुदूर गांवों तक बेहतर पहुंच बनायेगा। हलांकि सैटेलाइट श्रृंखला से निकली लेसर बीम घने शहरों की आबादियों में भले ही रुकावटों का सामना करेगी मगर अनेक कुदरती हादसों - भूकंप ज्वालामुखी, भारी अग्निकांड और जल प्लावन में स्टारलिंक इंटरनेट बहुत काम का होगा। और सबसे बड़ी बात कि इसमें केबल टूटने से इंटरनेट प्रभावित होने जैसी कोई बात नहीं। यह उससे सर्वथा मुक्त है। रेड सी में इंटरनेट केबल टूटने से हुये कनेक्टिविटी व्यवधान का भी जिक्र उन्होंने किया। उन्होंने कहा कि मात्र 550 किमी ऊपरी आकाश में स्टारलिंक की इंटरनेट सैटेलाइट श्रृंखला में 'लैटेंसी' काफी कम है।
आगे की चर्चा में शहर की ओर पलायन में कमी आने की संभावना व्यक्त हुई। नौकरी आप्शनल होगी अनिवार्य नहीं। ऐसा परिदृश्य आगामी दशक तक सामने होगा। एलॉन ने धर्म के बिना भी नैतिकता की जरुरत पर जोर दिया। धर्म निरपेक्ष वैश्विक नैतिकता ऐसी हो जिसमें दूसरों के प्रति भावनात्मक आग्रह हो। ट्रीट अदर पीपुल ऐज यू वुड लाईक टू बी ट्रीटेट (सुखद संयोगात ऐसी भावना हमारे शास्त्रों में पहले से ही है)।
पोडकास्ट में एक बड़ी चिंता मानव - जनसंख्या के तेजी से घटते जाने की थी। यह अब 2.1 से कम की ओर उद्यत है। तो क्या मानव लुप्त हो जायेगा? शायद ऐसा न हो मगर हमारी सामूहिक चेतना संकुचित होती जायेगी जिसके बल पर मानव ब्रह्मांड जेता होने का जज्बा पाले हुए है। इसलिये शायद हमारे लिये एक सकारात्मक भविष्य की संभावनायें क्षीण सी लगती हैं। हमें अपनी जनसंख्या अगर बढ़ानी नहीं तो एकदम से नीचे भी नहीं जाने देना चाहिए।
एक भयावह खतरा है एआई के दुरुपयोग का। जैसे प्रोपोगेंडा इंटरनेट पर चलाये जा रहे हैं, खुराफातियों ने यदि वैसा ही एआई को प्रोग्राम करना शुरु किया और जैसा होने लग गया है तो "एआई को झूठ सिखाने" के भयावह परिणाम होंगे। ऐसे में एआई मानवता की सेवा के बजाय उसके दुश्मन के रुप में आयेंगे। सच्चाई, सौंदर्यानुभूति और जिज्ञासा वे मूलभूत मानवीय विशेषतायें हैं जिन्हें एआई मे आरोपित करना ही मानवता के लिए कल्याणकारी है।
बातचीत और कई मुद्दों को समेटे हुए थी जिसमें अमेरिका की इमिंग्रेंट नीति, भारतीय बौद्धिकता, एचबी1 वीसा नीति आदि रहे। विश्व के सामने टैलेंटेड लोगों की सदैव कमी रही है, ऐसा एलॉन ने कहा। शायद ट्रंप अमेरिकी टैलेंट के विस्थापन की कीमत पर अब आप्रवासियों को अमेरिका मे न आने को लेकर सख्त हैं।मगर यह निर्णय विवेकपूर्ण होना चाहिए। क्योंकि भारतीयों ने अमेरिका के आधुनिक डिजिटल संसार की कमान संभाले हुये हैं और एक से बढ़कर एक भारतीय मूल के दिग्गज यहां कितनी ही वर्ल्ड वाइड वेब कंपनियों की सीईओ हैं। यह बातचीत मुक्त ठहाकों के बीच चलती रही और मैं सोचता रहा कि कहीं मनोविनोदी वृत्ति कुशाग्र बुद्धियुक्त लोगों की एक खास पहचान तो नहीं?
#dr.Arvind_mishra
1 month ago | [YT] | 0
View 0 replies
The Conch
बोकारो के लुगु हिल्स:
जुरासिक जंगलों के राज खोलती अरबों साल पुरानी 'लुगु फ्लोरा'
झारखंड का बोकारो शहर अपने इस्पात संयंत्र के लिए दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि यह शहर एक ऐसी प्राचीन विरासत को भी समेटे हुए है जो हमें करोड़ों साल पहले के धरती के इतिहास में ले जाती है। बोकारो के पास स्थित लुगु पहाड़ियाँ भारत के सबसे महत्वपूर्ण जीवाश्म स्थलों में से एक हैं, जहाँ से मिले 'लुगु फ्लोरा' ने पृथ्वी के विकास की एक महत्वपूर्ण कहानी को उजागर किया है।
लुगु फ्लोरा जुरासिक काल (लगभग 145 से 200 मिलियन वर्ष पहले) के पादप जीवाश्मों का एक अनूठा संग्रह है। ये जीवाश्म उस समय के पौधों के अवशेष हैं जो लाखों वर्षों में पत्थर में बदल गए। इनमें से अधिकांश पौधे 'जिम्नोस्पर्म' श्रेणी के हैं - ऐसे पौधे जिनके बीज बाहर लगते हैं, जैसे आज के देवदार और चीड़ के पेड़। विशेष रूप से साइकैडोफाइटा समूह के पौधे यहाँ बहुतायत में पाए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने लुगु पहाड़ियों से पौधों के विभिन्न अंगों के जीवाश्म खोजे हैं:
पत्तियाँ: सबसे प्रमुख खोज है पतली-लंबी पत्तियों वाला पिलोफिलम समूह, जिसमें पिलोफिलम एक्यूटिफोलियम और पिलोफिलम लुगुएंस शामिल हैं। ये पत्तियाँ आज के साइकस पौधों जैसी दिखती हैं।
बीज: लुगुकार्पस बोटानाइ, लुगुएला इंडिका और लुगुमोर्फा श्रीवास्तवे जैसे बीजों के जीवाश्म मिले हैं, जिनके नाम सीधे तौर पर लुगु क्षेत्र से जुड़े हैं।
शंकु और फूल: लुगुस्ट्रोबस मेहता और लुगेंथस इंडिकस जैसे प्रजनन अंगों के जीवाश्म भी मिले हैं, जो इन प्राचीन पौधों के जीवन चक्र को समझने में मदद करते हैं।
प्राचीन जलवायु का दर्पण: लुगु फ्लोरा के पौधे एक गर्म और आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु की ओर इशारा करते हैं। इससे पता चलता है कि आज का बोकारो क्षेत्र जुरासिक काल में घने जंगलों से भरा हुआ था।
महाद्वीपों के विभाजन का सबूत: लुगु फ्लोरा का सबसे रोमांचक पहलू है इसकी अंतर्राष्ट्रीय समानता। यहाँ मिले पिलोफिलम जैसे जीवाश्म दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका में भी मिलते हैं। यह इस बात का ठोस प्रमाण है कि ये सभी भूभाग कभी गोंडवाना नाम के एक विशाल महाद्वीप का हिस्सा थे।
भारतीय गोंडवाना क्रम का हिस्सा: लुगु फ्लोरा भारतीय गोंडवाना शृंखला का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो हमें प्राचीन पादप विकास और भूगर्भिक परिवर्तनों को समझने में मदद करता है।
कोयला निर्माण की कहानी: ये जीवाश्म इस बात की व्याख्या भी करते हैं कि कैसे प्राचीन पौधों के अवशेष करोड़ों वर्षों में दबकर कोयले में बदल गए, जो आज इस क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
लुगु फ्लोरा के जीवाश्म केवल पत्थर में तब्दील हुए पौधे नहीं हैं, बल्कि ये हमारे ग्रह के इतिहास के जीवंत पन्ने हैं। ये हमें बताते हैं कि कैसे महाद्वीप बने, कैसे जलवायु बदली और कैसे पौधों ने समय के साथ अपना रूप बदला। बोकारो की यह प्राचीन धरोहर न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है। लुगु हिल्स का यह खजाना हमें याद दिलाता है कि हमारी धरती का इतिहास हमारी कल्पना से कहीं अधिक समृद्ध और रोमांचक है।
#Raj_k_mishra
1 month ago (edited) | [YT] | 4
View 0 replies
The Conch
अफ़्रीका का सहारा रेगिस्तान के दक्षिण का क्षेत्र दुनिया में सबसे ग़रीब माना जाता है। Sub-Saharan अफ़्रीका कहते है उसे।
क्या आपको ज्ञात है कि भारत की प्रतिव्यक्ति आय 2016 तक इस क्षेत्र से भी कम थी?
भारत के हर जाति के शासक वर्ग का एक ही तरीका है: हर जाति को आरक्षण लेने/हटवाने में उलझाए रखो, और मलाई खाते रहो। तीन प्रतिशत को सरकारी नौकरी मिल जाती है, समाजवाद के कारण उन सरकारी नौकरी वालो के घर लूट के माल के अम्बार लग जाते है। शेष सब को आस मिल जाती है कि हमे नहीं तो हमारे बच्चों को तो सरकारी नौकरी मिल ही जाएगी। इसीलिए आरक्षण लेने/हटवाने के झगड़े होते है कि सरकारी नौकरी के चांस बढ़ जाएँगे। तब भी तीन प्रतिशत को ही मिलेगी, शेष 97% का क्या होगा, कोई मतलब नहीं।
हैती नाम के गरीब देश से भी भारत की प्रतिव्यक्ति आय कम थी 1989 तक। और उस समय तक भी भारत में भूख से मौतें होती थी।
ये सब मीडिया या आपके प्रोफेसर ने नहीं बताया आपको क्यूंकि इनमें बैठे लोग भी उसी लुटेरे शासक वर्ग से ही आते है। हर जाति के। लुटेरों में कोई जातिगत भेदभाव नहीं है। वो सब कहानियाँ आपके लिए है।
हाँ तो 2016 में भारत की प्रतिव्यक्ति आय 1600 डॉलर प्रतिवर्ष पार कर Sub Saharan अफ़्रीका से अधिक हो गई। आज भारत की प्रति व्यक्ति आय है 2800 डॉलर और Sub Saharan अफ़्रीका की है 1500 डॉलर।
एक व्यक्ति, ने किया ये सब। उसे हटाने के लिए आरक्षण/जाति के खेल भी जोर शोर से चल रहे है। किसी जाति को आरक्षण चाहिए, किसी को हटवाना है, किसी जाति का अपमान हो गया है।
लेकिन ये प्रति व्यक्ति आय की बात आपको मीडिया या क्लास रूम में अब भी सुनने को नहीं मिलेगी, क्यूंकि वहाँ हर जाति के लुटेरे बैठे है।
आप इस बढ़त को जारी भी रख सकते है या सरकारी नौकरी के छलावे में फिर से उन्ही लुटेरों, डकैतों को सत्ता दे सकते है जिन्होंने हमे हैती से भी गरीब किया था।
आपकी इच्छा, जैसा आप करेंगे, आपके बच्चों के साथ वही होगा।
बस दो प्रार्थना है: एक तो ये मत कहिएगा कि किसी ने बताया नहीं था। दूसरे ये याद रखिएगा कि कुछ भूल ऐसी होती है जिन्हें ठीक करने के अवसर नहीं मिलते।
#APM
3 months ago | [YT] | 2
View 0 replies
The Conch
अमेरिकी #tarrifs एंड #H1BVisa पॉलिसी और "Cobra Effect"
दोस्तों, पॉलिसी मेकिंग में आपने ‘Cobra Effect’ का नाम सुना है?
जब किसी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन ढूंढने की कोशिश असली प्रॉब्लम को और बड़ा बना दे, ऐसी स्थिति को कहते है "Cobra Effect"!
इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है जो शुरू होती है ब्रिटिश इंडिया से।
दिल्ली में ज़हरीले साँपों की संख्या कम करने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने ऐलान किया "हर मरे हुए सांप के बदले इनाम सरकार द्वारा इनाम दिया जाएगा"
शुरू में सब बढ़िया चला! लोग साँप पकड़कर मारने लगे।
लेकिन फिर बाद में एक अलग ही ट्रेंड देखने को मिला।
लोगों ने सांपों की ब्रीडिंग शुरू कर दी! उन्हें बाद में मारने से पैसे जो मिलने वाले थे!
समस्या तब बड़ी हो गई जब, सरकार ने यह स्कीम बंद करी।
अब पाले गए सांपों के स्टॉक का क्या? लोगों ने खुले में छोड़ दिया।
मतलब, समस्या पहले से भी ज़्यादा बढ़ गई!
यह "Cobra Effect" आपको कई जगह देखने को मिलता होगा!
बैंकिंग में लोन देने के अत्याधिक सख़्त नियमों से लोग शैडो बैंकिंग या अनरेग्युलेटेड NBFC की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। जिनकी लोन शर्ते आसान तो होती हैं पर प्राइसिंग और चार्जर्स इतने ज्यादा होते हैं कि कर्जदार फास जाता है और डिफॉल्ट की संभावना बढ़ जाती है। मतलब, रिस्क खत्म नहीं होता, उल्टा और खतरनाक हो जाता है।
सरकार किसानों के लोन माफ़ कर देती है।
अगली बार किसान सोचते हैं, लोन तो फिर माफ़ हो जाएगा।
रिपेमेंट डिसिप्लिन टूट जाता है, और बैंकों का NPA बढ़ता है साथ में उन किसानों की क्रेडिट हिस्ट्री जो कि बैंड बजती है सो अलग!
दुनिया के शहरों में Odd-Even जैसी स्कीमें लागू हुईं ताकि पलूशन घटे।
कुछ लोगों ने इसका तोड़ निकाला निकाला और दूसरा गाड़ी खरीद ली।
मतलब पलूशन कम कहां हो, उल्टा और ज्यादा गाड़ियाँ सड़क पर आ गईं।
ग्रामीण रोज़गार गारंटी जैसी योजनाएँ बनीं कि लोगों को न्यूनतम मज़दूरी मिल सके।
कुछ इलाकों में लोग सरकारी काम पर ही निर्भर हो गए, प्राइवेट सेक्टर में काम करने से कतराने लगे।
इससे प्रोडक्टिविटी और स्किल्ड लेबर में दोनों कमी आई!
ऐसे ढेरों उदहारण हैं।
मतलब साफ़ है कि Cobra Effect कोई आइसोलेटेड घटना नहीं है, बल्कि Governance, Policy-making, Banking, Economics हर जगह दिखाई देता है।
असल बात ये है कि जब भी कोई नीति इंसानी व्यवहार (Human Behavior) और उसके लूप होल को ठीक से समझे बिना बना दिया जाता है, तो अच्छे इरादे भी उल्टा असर डालते हैं।
अमेरिकी टैरिफ एंड Visa पॉलिसी को भी इसी Cobra ने काटा हुआ है, इफेक्ट जल्द ही दिखेंगे!
#अमित_दुबे
3 months ago | [YT] | 0
View 0 replies
The Conch
10 सितंबर 2025 के दिन जेनेवा में हुए UNHRC कि मीटिंग में स्विट्ज़रलैंड ने भारत से कहा:
“भारत सरकार को चाहिए कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए और अभिव्यक्ति की आज़ादी तथा मीडिया की स्वतंत्रता को बनाए रखे।”
भारत का जवाब सुनिए:
“हम स्विट्ज़रलैंड जैसे करीबी दोस्त और साझेदार की हैरान करने वाली, सतही और ग़लत टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देना चाहते हैं।”
“चूंकि स्विट्ज़रलैंड इस समय UNHRC (मानवाधिकार परिषद) का अध्यक्ष है, इसलिए यह और भी ज़रूरी है कि वह परिषद का समय ऐसे झूठे नैरेटिव्स में बर्बाद न करे, जो भारत की हक़ीक़त से बिल्कुल मेल नहीं खाते। इसके बजाय उसे अपने ही मसलों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे नस्लभेद, भेदभाव और Xenophobia.”
“दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे विविध और सबसे जीवंत लोकतंत्र होने के नाते, और बहुलता (pluralism) की हमारी सभ्यतागत सोच के साथ, भारत हमेशा तैयार है कि स्विट्ज़रलैंड को इन चिंताओं से निपटने में मदद करे।”
इसे कहते है नस्लीय श्रेष्ठता के अहम को जोरदार तमाचा देना।
#अमित_दुबे
3 months ago | [YT] | 3
View 0 replies
The Conch
आज मात्र चार ट्रस्ट और प्रोजेक्ट की अंदरुनी कहानी पर ध्यान देते हैं -
(1)प्रधान मंत्री राहत कोष :: यह ट्रस्ट अपने पहले प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा 1948 में स्थापित किया गया था. यह ट्रस्ट संसद से अनुमोदित नहीं था. इसका उद्देश्य उस समय पाकिस्तान से आये शरणार्थीयों की सहायता करना था. बाद में यह बाढ़ पीड़ितों और अन्य प्राकृतिक आपदा में सहायता देने में इसका फंड प्रयोग होने लगा. इसमे ट्रस्टी के रूप में आजीवन के लिए प्रधान मंत्री तथा कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को स्थायी रूप में बनाया गया. जब तक कांग्रेस की सरकार रही तब तक तो कांग्रेस की मनमानी चलती रही. दिक्कत तब आयी जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार नही रही और गैर कांग्रेस के प्रधानमंत्री को इस ट्रस्ट के फंड को प्रयोग करने के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष की सहमति लेनी होती थी. और राजनीति चरम पर पहुंची जब देश में कोविड की लहर आ गयी, तब इसके विकल्प पर विचार हुआ.
(2)प्रधान मंत्री केयर फंड :: विकल्प के तौर पर इस ट्रस्ट का निर्माण किया गया. इसमे विपक्ष के नेता, गृह, रक्षा मंत्रियों के साथ कुछ विशेषज्ञों को भी रखा गया. इसमे दी जाने वाली राशि को आयकर से मुक्त रखा गया. इससे कांग्रेस को झटका लगना स्वाभाविक था, क्योंकि उसकी दखलअंदाजी खत्म हो गयी थी. साथ ही चूंकि लोकसभा में कांग्रेस की सीट्स उस समय कुल सीट्स के दस वे भाग की भी नहीं है तो वह मुख्य विपक्षी दल भी न होने के कारण उसका वर्चस्व बिल्कुल खत्म हो गया था. इसलिये कांग्रेस ने इस ट्रस्ट का सदैव ही विरोध किया है, जबकि इस ट्रस्ट की प्रणाली को पारदर्शी रखा गया है.
(3)जलियांवाला बाग ट्रस्ट :: यह ट्रस्ट 1951 में बनाया गया था, इसमे भी अनिवार्य रूप से कांग्रेस अध्यक्ष को ट्रस्टी रखा गया था. और कांग्रेस अध्यक्ष का हस्तक्षेप निरंतर रहता था.2019 में मोदी सरकार ने बाकायदा संसद द्वारा इस ट्रस्ट की रूपरेखा बदल दी और कांग्रेस अध्यक्ष की अनिवार्यता समाप्त कर विपक्ष के नेता को रखने का प्रावधान किया. जलियांवाला बाग की स्थिति एक उपेक्षित और गन्दगी भरे स्मारक की हो गयी थी, जिसे नए ट्रस्ट ने जीर्णोद्धार करके उसे भव्य रूप दिया है, पर राहुल बाबा को उसमे शहीदों का अपमान नजर आया था। आप समझ गये होंगे उनको ऐसा क्यों लगने लगा है?
(4)सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट :: यह नयी संसद और तमाम सचिवालय एक ही कैम्पस में निर्माण कराने का प्रोजेक्ट है. कांग्रेस ने इसका सड़क से लेकर अदालत तक घोर विरोध किया है, जबकि अदालत ने भी इसे आवश्यक और एतिहासिक बताया है. इसमे असल मे खेल यह है कि आजादी के बाद से आज तक भी तमाम सचिवालय किराये के भवनों में चल रहे हैं, जिनका वार्षिक किराया लगभग 1000 करोड़ सरकार चुकाती रही है, जबकि पहले चरण में इस प्रोजेक्ट में कुल खर्च लगभग 900 करोड़ आया है. ये किराये के भवन कांग्रेस के चहेतों के थे जिनकी आमदनी अब खत्म होगी तो विरोध तो उनका वाजिब बनता है. साथ ही वो घोर ईर्ष्या की नयी संसद के निर्माण का श्रेय इतिहास में मोदी को जायेगा.
मै समझता हूं कि आप समझ गये होंगे कि आजादी के बाद देश कैसे चला और अब कैसे परिवर्तन आ रहा है.
#बालेश्वर प्रसाद गुप्ता
4 months ago | [YT] | 0
View 0 replies
The Conch
पासपोर्ट गया, सपने गए और आप बन गए "Cyber Scam "Machine
दोस्तो पिछले कुछ समय से एक नया और बेहद खतरनाक ट्रेंड सामने आ रहा है।
बेरोजगार या नौकरी की तलाश में भटक रहे भोले-भाले युवाओं को सुनहरे सपने दिखाकर विदेश बुलाना और फिर उन्हें साइबर क्राइम के दलदल में धकेल देना।
यह खेल आमतौर पर Thailand, Cambodia, Vietnam, Laos जैसे ईस्टर्न एंड साउथ ईस्टर्न देशों में ऑपरेट करने वाले गैंग चलाते हैं।
इनका पहला हथियार है “हाई सैलरी जॉब ऑफर”।
सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम चैनल्स या फेक जॉब पोर्टल्स के ज़रिये ₹1–2 लाख महीने की सैलरी, फ्री वीज़ा, फ्री टिकट और फ्री रहने-खाने का लालच दिया जाता है। जो युवा बेरोजगारी से परेशान हैं, वे इसे लाइफ बदलने का मौका समझ लेते हैं।
एजेंट्स पूरा प्रोसेस आसान बना देते हैं, एयर टिकट भेजा जाता हैं, वीज़ा का इंतज़ाम किया जाता है! यहां तक कि आपको एयरपोर्ट तक रिसीव करने आते हैं।
पीड़ित के दिमाग में ऐसा इम्प्रेशन बनाया जाता है कि लगता हैं कि सब लीगल है।
लेकिन जैसे ही वे बाहरी मुल्क में अपना पैर रखते हैं, उनका पासपोर्ट और वीज़ा छीन लिया जाता है। यही वह पल है, जब वे अपने ही देश और कानून की सुरक्षा से पूरी तरह कट जाते हैं।
फिर शुरू होता है एक ऐसा काम जहां से वापस निकल पाना हो जाता है काफी मुश्किल।
इन युवाओं को बंधक बनाकर उनसे ऑनलाइन फ्रॉड कॉल सेंटर, डेटिंग ऐप स्कैम, इन्वेस्टमेंट स्कैम, क्रिप्टो करेंसी ठगी जैसे गैरकानूनी कामों में ज़बरदस्ती लगाया जाता है। मना करने पर मारपीट या लोकल पुलिस के जाल में फँसाने की धमकी दी जाती है।
हाल ही में की गई कुछ कार्यवाहियों में कई भारतीय लोगों को Thailand और Laos में चल रहे साइबर क्राइम कैंपों से रेस्क्यू किया। इनमें कई ऐसे युवा थे जो आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों से “ड्रीम जॉब” के लालच में गए थे। कुछ मामलों में तो पीड़ितों के परिवार से फिरौती तक मांगी गई।
क्यों बढ़ रहा है यह ट्रेंड? बेरोजगारी और बेहतर जीवन की चाह,
विदेश में काम करने का आकर्षण, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर भरोसा।
कैसे बचें? ऐसे किसी भी ट्रैप का सबसे पहला कारण होता है लालच। "Too Good to be true offer" कभी भी सही नहीं होता। अगर आपके कोई काबिलियत नहीं तो क्यु आपको कोई लाखो कि सैलरी देगा।
दूसरी बात, कोई भी विदेशी जॉब ऑफर मिलने पर दूतावास/एम्बेसी से कन्फ़र्म करें।
अज्ञात एजेंट या कंपनी के साथ कभी भी पासपोर्ट या पैसे साझा न करें।
सोशल मीडिया के एड्स पर बिना वेरिफिकेशन भरोसा न करें।
और सबसे जरूरी बात, अपने परिवार दोस्तों और खासकर युवाओं को इस ट्रेंड के बारे में बताएं।
एक गलत कदम आपका करियर, आपकी आज़ादी और आपकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर सकता है।
विदेशी जॉब का सपना बुरा नहीं है, लेकिन बिना जांच के किसी भी ऑफ़र पर भरोसा करना जानलेवा हो सकता है।
संदेश साफ है: जागरूक रहें, दूसरों को भी जागरूक करें, क्योंकि एक शेयर किसी की जान बचा सकता है।
#अमित दुबे!
4 months ago | [YT] | 0
View 0 replies
The Conch
कितने झूठे और आपत्तिजनक हैं ये पोस्टर जिन्हें गूगल प्रतिदिन के अपने समाचारों के संकलन में दिखा रहा है। इन्हें ऐसे ही इग्नोर नहीं किया जा सकता। इसकी जवाबदेही बनती है। गूगल द्वारा भी ऐसे झूठे सनसनीखेज और घोर आपत्तिजनक समाचारों को अपने प्लेटफार्म पर स्थान देना यह दर्शाता है कि या तो वह जानबूझकर ऐसा कर रहा है या फिर उसका अनुचित डिजिटल सामग्री पर नियंत्रण नहीं है। और उसके लागर्थिम के कमजोरी से ये अवांछित समाचार सेलेक्ट होकर दर्शकों /पाठकों के समक्ष आ रहे हैं।
सभी पोस्टर क्लिक बेट हैं और इनके शातिराना चाल से अनभिज्ञ मोबाइल यूजर इन लिंक पर तत्काल क्लिक करता है। सभी में एअरटेल के नये रिचार्ज की सूचना भी नीचे है। तो क्या एअरटेल ऐसे अनुचित अनैतिक और धोखेभरे विज्ञापन दिखा रहा है? यदि हमारे यहां डिजिटल सामग्री नियमन का कोई प्रभावी कानून है तो उसे तत्काल ऐसे विज्ञापनों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
मुझे मित्रों से इस मुद्दे को इसलिये साझा करना पड़ा कि इनके विरुद्ध मैंने अभी तक कोई आवाज नहीं सुनी। पता नहीं आप सभी ने इन पर ध्यान दिया भी या नहीं? या देकर इग्नोर कर दिया? मगर यह मामला तो गौर तलब है।
#झूठेविज्ञापन #क्लिकबेटविज्ञापन
#Dr.Arvind_mishra
4 months ago | [YT] | 3
View 1 reply
Load more