गोपियाँ बाबा के द्वार पे ठाडी पूछ रही है :- बाबा वो जशोदा का छोरा तेरे इहाँ आयो है?
बाबा :- ना इहाँ ना आयो।
गोपी :- परन्तु हमनें तो इही आतो देखो थो।
बाबा :- देखूँ तो मैं भी प्रतिदिन हूँ कि वो मेरे इहाँ आ रहयो है।परन्तु जब आंख खुले है तो पता पडे हैं कि बाबा तो स्वप्न देख रहयो थो।
गोपी :- परन्तु बाबा जे स्वप्न की बात ना हैं।हमनें स्वम् वाको तेरे घर में घुसतो देखयो है।
बाबा :- तुममे और मोहमें केवल एक ही अंतर है कि तुम खुली आंखन ते स्वप्न देखो हो और मैं बंद आंखन ते।
गोपी :- बाबा नेक द्वार ते हट तो सही।भीतर तो आन दे।
बाबा :- ना मैं विरक्त बाबा जी।मेरे इहाँ स्त्रीयों का प्रवेश वर्जित है।
गोपी :- और जो रात-रात भर स्वप्न में हमारे संग रास में घूमतो डोले है।तब तेरी विरक्ताइ कहाँ चली जाए है।
बाबा गोपी की बात सुन स्तंभ सा खड़ो रह गयो। अब बाबा सोच रहयो है कि ये तो भीतर तक की जाने है।
बाबा अपने मुख के हावभाव छूपाते भए :- उस समय तुम हमारी गुरू होती हो और मैं मंजरी स्वरूप में तुम्हारी दासी।
गोपी :- बाबा दासी तो आठों पहर ही दासी रहे है।फिर चाहे स्वप्न में होए या प्रत्यक्ष।
बाबा :- सो तुम्हारी बात ठीक है परन्तु अभी मोहे अच्छे से भान हैं कि मैं पुरुष शरीर में हूँ।अर्थात मैं अपने मंजरी स्वरूप कू भूले बैठो हूँ।
गोपी :- बाबा अब तू चाहवे काह है?
बाबा :- तुम तो भीतर तक की जानों हो।अपने आप ही जान लेओ।
गोपी :- हम तो तोहे स्थाई रूप ते मंजरी स्वरूप प्रदान कर देंगी।परन्तु बाबा तू वा स्वरूप कू झेल ना पाएंगो।सांझ तक ही तेरे प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।अब सोच ले जे थोड़ो-थोड़ो सुख लेके बृज में ही रहनो है या एक बारी में ही बैकुंठ कू वास करनो है।
गोपी की बात सुन बाबा मार्ग छोड़कर एक ओर हट गयो।
इहाँ बाबा कू शरीर के छूटबे को भय ना है।भय तो केवल उस थोड़े-थोड़े सुख के छूटबे को है जो बृज में रहकर मिल रहयो है।
अद्भुत नृत्य क्रीड़ा अप्राकृत राज्य के अप्राकृत प्रेम का अप्राकृत भाव प्रदर्शन श्री युगल करते करते भाव विभोर हुए डूबे सखियों को आनंद प्रदान कर रहे हैं।वहीं सखियाँ अपने अभिन्न स्वरूप भावों से प्रियाप्रियतम जु की नृत्य क्रीड़ा में गहरा संगीत गान कर उन्हें स्पंदन दे रही हैं।परस्पर सुख हेतु युगल सखियाँ सेवारत हो लीलारस को बढ़ा रही हैं।
श्यामा जु के चरणों में पहनी पायल के नन्हे घुंघरू कटि पर करधनी की मधुर छोटी घंटियाँ और चूड़ियों की सुरीली खनक सब ताल से ताल मिला कर"राधे राधे"पुकार रहे हैं।उनकी श्यामल वेणी की सुनहरी कनखियाँ तो झूम झूम कर श्यामसुंदर जु को मंत्रमुग्ध करती"श्याम श्याम"कह उनको अपने प्रेम पाश से बाँध रही हैं।श्यामा जु के अधरों को स्पंदन देती नथ बेसर और मस्तक पर लगा माँग का टिक्का उनके मस्तक को चूमता"सांवरा सांवरा"कह सांवल सरकार के नेत्रों में समाता जा रहा है।
श्यामा जु के कर्णफूल उनके कपोलों पर नाचते इतराते हिल हिल कर श्यामसुंदर जु के मुखकमल पर लिश्कोरें मारते उन्हें खींच रहे हैं।श्यामा जु के चरणों के अंगुष्ठ व नखों के नूपुर व दसों उंगली में पहनी अंगुठियाँ"श्यामाश्याम श्यामाश्याम"नाम ध्वनि करतीं तालबद्ध गान कर रही हैं।उनके गले पर पहने सुंदर मनमोहक हार श्यामा जु के वक्ष् का मंथन कर उनके हृदय के भावों को उनके कजरारे काले नयनों से रससुधा बहाते श्यामसुंदर जु को श्यामा जु का सब भाव वृतांत खोल सुना रहे हैं और काजल की लम्बी रेख की नुकीली धारें सीधे श्यामसुंदर जु के वक्ष् से हृदय में प्रवेश पा रही हैं।श्यामा जु के सुर्ख लाल अधरों की लाली"पिया पिया"रस में डूबी श्यामसुंदर जु के रस पिपासु अधरों को वाचाल करती जा रही है।
श्यामा जु के मुख पर प्यारी सी मुस्कन उनकी दंतकांति मंद मंद श्यामसुंदर जु को आकर्षित कर रही है।श्यामा जु के माथे पर सजी चाँद सी लाल बिंदिया व भौहों पर चमकती छोटी बिन्दु सरीखी बिदियाँ श्वेत कणों से मिल चंदन की सीली महक बन श्यामसुंदर जु की नासिका को स्पंदन दे रहीं हैं।उनके मुखकमल से जैसे चाँदनी छिटक कर श्यामसुंदर जु के श्यामल नीलरंग को चमका चटका रहीं हो।नृत्य करतीं श्यामा जु जैसे श्यामसुंदर जु को ही रिझा रहीं हैं और अनवरत अद्भुत रस संचार करतीं उनकी श्वासों में महक बन घुलती जा रहीं हैं।
वहीं समक्ष श्यामसुंदर जु के सिर पर लगा सुनहरी मोरपखा श्यामा जु को बार बार श्यामसुंदर जु की ओर आकर्षित कर रहा है।उनकी अद्भुत नृत्य क्रीड़ाओं में श्यामसुंदर जु का अंग अंग श्यामा जु को पुकार रहा है।श्यामसुंदर जु के मस्तक पर कस्तूरी तिलक श्यामा जु के वक्ष् पर लगे अंगराग से टकरा कर मनमोहक सतरंगी इन्द्रधनुषी झूला बना रहा है जिसकी तरंगें बिखर बिखर कर ब्यार में रंग भर रही है।
श्यामसुंदर जु की अंगकांति से एक अद्भुत चमकता चटकीला प्रकाश प्रदान कर रहा है जिससे श्यामा जु की अंगकांति की चमक को चार चाँद लग रहे हैं।श्यामसुंदर जु के कानों के कुण्डल व नखबेसर"श्यामा श्यामा"पुकार कर दिव्य नाद कर रही है।उनके बाजुबंध व कंगन श्यामा जु का नाम ले ले कर उन्हें पुकारते हुए भुजपाश में श्यामा जु को भर लेने को उत्सुक हैं।
श्यामसुंदर जु की पतली टेढ़ी कमर पर बंधा कमरबंध व विशाल वक्ष् पर लटकती गुंजामाल व हार"श्यामा श्यामा"पुकार उन्हें आमंत्रण दे रहे हैं।श्यामसुंदर जु के चरणों में बजते घुंघरू श्यामा जु के चरणों को छूने का प्रयास करते"श्याम राधिका"नामुच्चारण कर रहे हैं।उनकी आँखों का काजल व अधरों की लाली तो श्यामा जु के काजल व अधरों की लाली में घुलने को आतुर लालित्य रस बिखराती हुई रस ही रस बहा रही है।
श्यामसुंदर जु के गहरे काले घुंघराले केश श्यामा जु के लिए सर्परूप अनगिनत श्यामसुंदर ही हैं जिनमें बंधने के लिए श्यामा जु स्वयं उन्मादित उत्तावली हैं।श्यामसुंदर जु पल पल श्यामा जु को अपनी चंचल दिव्य मुस्कान से मोहित कर रहे हैं।उनकी अचंबित मयूर रूप नृत्य भावभंगिमाएँ श्यामा जु को चकित करतीं उन्हें आकर्षित कर रही हैं प्रियतम के गहनतम प्रेमरस में डूबने के लिए।
बलिहार !!परस्पर सुख देते प्रियाप्रियतम जु नृत्य क्रीड़ा करते एकभाव लिए दो देह में अवतरित हुए हैं।कभी श्यामा जु का पीछा करते श्यामसुंदर जु तो कभी श्यामसुंदर जु के इर्द गिर्द झूमती नाचती गुनगुनाती श्यामा जु।
अद्भुत रसक्रीड़ा करते युगल और अद्भुत गहन स्पंदन रसिक हृदय की दैहिक क्रियाओं में उफनता झुकता।श्यामा श्यामसुंदर जु को नमन करता नतमस्तक होता एक अभिन्न स्वरूप जो उनकी प्रेम रस सुधा में डूबने को सदा बह जाता।
क्रमशः ( अगला भाग कल को पोस्ट किया जाएगा )
जय जय श्यामाश्याम !! जय जय युगल !! जय जय युगलरस विपिन वृंदावन !!
❤️भक्त और भगवान ( भाग 44 )❤️ 🙏🏻श्री नेह नागरीदास जी🙏🏻
सुन्दर श्री बरसानो निवास और बास बसों श्री वृन्दावन धाम है। देवी हमारे श्री राधिका नागरी गोत सौं श्री हरिवंश नाम है॥ देव हमारे श्रीराधिकावल्लभ रसिक अनन्य सभा विश्राम है। नाम है नागरीदासि अली वृषभान लली की गली को गुलाम है॥
नेह नागरीदास का जन्म सन. 1590 के लगभग मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्रान्तर्गत बेरछा नामक गाँव के एक सम्पन्न पँवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था से ही भगवद्भक्ति और साधु सेवा में इनकी रुचि थी । एक बार राधावल्लभीय महात्मा चतुर्भुजदास, जो मध्यप्रदेश के ही गढ़ा नामक गाँव के निवासी थे, सन्त-मण्डली सहित इनके गाँव में पधारे । उनके सत्संग से ये प्रेमोपासना की ओर आकृष्ट हुए
श्री चतुर्भुजदास जी के सत्संग के प्रभाव से श्री नेह नागरीदास जी घर-बार त्यागकर वृन्दावन चले गए। साथ में इनकी कृपापात्री ओरछा की रानी भागमती भी गई। वहाँ जाकर दोनों राधावल्लभ आचार्य गोस्वामी वनचन्द्र जी से दीक्षा लेकर रस-साधना में प्रवृत्त हो गये।
श्री हितहरिवंश की वाणी तथा आराध्ययुगल के नित्य-विहार में इनकी अगाध आस्था थी। ये प्रतिदिन हितवाणी के किसी एक पद को उठा लेते और अहर्निश उसीकी भावना में मग्न रहते थे। हितवाणी के आगे इनको रासलीला तथा श्रीमद्भागवत की कथा भी फीकी लगती थी। वृन्दावन के कुछ रसभक्तिहीन उपासक इनके इस व्यवहार की आलोचना करते थे। एक बार की बात है, गोस्वामी वनचंद्र जी के पुत्र श्री नागरवर गोस्वामी राधावल्लभ जी के मन्दिर में भागवत की कथा कह रहे थे। विरोधियों ने उनसे नागरीदास के कथा में सम्मिलित न होने की शिकायत की। इस पर नागरवर जी ने नागरीदास को बुलाकर कहा, 'आजकल दशम-स्कन्ध की कथा चल रही है। इसे तो आपको अवश्य श्रवण करना चाहिए। गुरु पुत्र की आज्ञा शिरोधार्य कर उस दिन नागरीदास जी कथा-मण्डप में उपस्थित हुए। धेनुकासुर-वध का प्रसंग चल रहा था। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण द्वारा धेनुकासुर के सहायक गधों का पैर पकड़ कर पटकने का वृत्तान्त सुना, ये अकुलाकर उठ खड़े हुए और उसी झोंक में बाहर चले गये। इनके इस आचरण से वहाँ उपस्थित सभी लोग खिन्न हो गये। दूसरे दिन जब गोस्वामी नागरवरजी ने इन्हें बुलाया और शपथ देकर कथा मण्डप से अकस्मात् उठ जाने का कारण पूछा तो ये बोले - 'उस समय मैं श्री हिताचार्य के एक पद की भावना में लीन था, जिसमें श्यामसुन्दर मानवती श्री राधा का सुन्दर चिबुक सहलाकर मनुहार कर रहे थे।
इसी बीच मेरे कानों में भगवान द्वारा धेनुकासुर के सहयोगी गधों के पैर पकड़ कर पटके जाने के शब्द पड़े। मन में विचार आया कि प्रिया की सुकोमल ठोढ़ी सहलाने वाले नागर के हस्त-कमल में गधे की टाँग कैसे शोभा देगी --
अप्रत्याशित व्यवधान से मेरी मानसी भावना खंडित हो गई और मैं उद्विग्न होकर बाहर चला गया। इस स्पष्टीकरण से नागरीदास जी की उच्च आध्यात्मिक स्थिति का संधान पाकर गोस्वामी नागरवर जी ने इन्हें हृदय से लगा लिया। बरसाने में इन्होंने गहवरवन की पहाड़ी पर अपनी कुटी बनाई जो आज मोर कुटी के नाम से प्रसिद्ध है।
कहा जाता है कि एक दिन यहीं सखियों सहित श्री राधाजी ने इन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया। स्वामिनी के तेजोमय दिव्यरूप पर दृष्टि पड़ते ही ये मूच्च्छित हो गये
नागरीदास जी ने परम हर्षित हो राधाजी को अर्द्धरात्रि में भोजन कराया और निशीथ-भोग (खीर और पूड़ि) के इस नियम का आजीवन निर्वाह करते रहे। राधाजी ने उस समय दूसरी बात बरसाने में अपना मन्दिर बनवाकर प्रति वर्ष जन्मोत्सव मनाने की कही थी। इसके परिपालनार्थ नागरीदास जी ने अपनी कृपापात्री रानी भागमती के सहयोग से वहाँ श्रीराधा-मन्दिर का निर्माण कराया और बड़ी धूमधाम से राधाष्टमीपर्व मनाने की परंपरा स्थापित की जो अब तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
पौराणिक कथा : सती अनुसूया (सम्पूर्ण मातृशक्ति का सम्मान बढ़ाया ।।)
अत्रि ऋषि की पत्नी और सती अनुसूया की कथा से अधिकांश धर्मालु परिचित हैं। उन की पति भक्ति की लोक प्रचलित और पौराणिक कथा है। जिसमें त्रिदेव ने उनकी परीक्षा लेने की सोची और बन गए नन्हे शिशु ... एक बार नारदजी विचरण कर रहे थे तभ तीनों देवियां मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को परस्पर विमर्श करते देखा। तीनों देवियां अपने सतीत्व एवं मन की पवित्रता की चर्चा कर रही थी। नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण "पातिव्रत्य धर्म " के बारे में बताया। नारद जी बोले उनके समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। तीनों देवियों को मन में अनुसूया के प्रति ईर्ष्या होने लगी। तीनों देवियों ने सती अनसूया के पातिव्रत्य को खंडित करने के लिए अपने पतियों को कहा तीनों ने उन्हें बहुत समझाया पर पर वे राजी नहीं हुई।
इ स विशेष आग्रह पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनसूया के सतित्व और ब्रह्मशक्ति परखने की सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने यतियों का भेष धारण किया और अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे तथा भिक्षा मांगने लगे।
अतिथि-सत्कार की परंपरा ( मनुष्य यज्ञ ) के चलते सती अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत कर उन्हें खाने के लिए निमंत्रित किया। लेकिन यतियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा, ‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे।'
अनसूया असमंजस में पड़ गई कि इससे तो उनके पातिव्रत्य के खंडित होने का संकट है। उन्होंने मन ही मन ऋषि अत्रि का स्मरण किया। दिव्य शक्ति से उन्होंने जाना कि यह तो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।
मुस्कुराते हुए माता अनुसूया बोली 'जैसी आपकी इच्छा'.... तीनों यतियों पर जल छिड़क कर उन्हें तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व भाव ( सात्विक भाव ) उमड़ पड़ा। शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए।
अनसूया माता ने तीनों को झूले में सुलाकर कहा- ‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी।
उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा, एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर उड़ने लगा और एक राजहंस कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। यह नजारा देखकर नारद, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे।
नारद ने विनयपूर्वक अनसूया से कहा, ‘माते, अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर देखकर यह तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। यह अपने पतियों को ढूंढ रही थी। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।'
अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा, ‘माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं।'
लेकिन जब तीनों देवियों ने तीनों शिशुओं को देखा तो एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं।
नारद ने उनकी स्थिति जानकर उनसे पूछा- ‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लीजिए।'
देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया। वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। तीनों देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा याचना की और यह सच भी बताया कि उन्होंने ही परीक्षा लेने के लिए अपने पतियों को बाध्य किया था। फिर प्रार्थना की कि उनके पति को पुन: अपने स्वरूप में ले आए।
माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। तीनों देव सती अनसूया से प्रसन्न हो बोले, देवी ! वरदान मांगो।
त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं...
तभी से वह मां सती अनुसूया के नाम से प्रख्यात हुई तथा कालान्तर में भगवान दतात्रेय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म माता अनुसूया के गर्भ से हुआ। मतांतर से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्त तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ। 🌸💦🌸💦🌸💦🌸💦
कल्पना कीजिए, एक प्राचीन मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई सूत्रों की पंक्तियाँ, जहाँ नक्षत्रों की चमक तारों से कहीं गहरी रहस्य छिपाए हुए हो। पराशरी ज्योतिष की तरह यहाँ ग्रहों की स्थिरता नहीं, बल्कि चर गति का जादू है—एक ऐसी प्रणाली जो आत्मा के कारकों को जगाती है, आयु के सूत्र बुनती है, और करियर के पथ को राजसी सिंहासन की ओर मोड़ देती है। जैमिनी ज्योतिष, #महर्षि_जैमिनी के उपदेश सूत्रों से जन्मा यह रहस्यमय विज्ञान, पराशरी से अलग है क्योंकि यहाँ कारक चर होते हैं—ग्रहों की डिग्री पर आधारित, जो हर कुंडली में नया रूप धारण करते हैं।
यहाँ कोई स्थिर नक्षत्र-केंद्रित दशा नहीं, बल्कि चर दशा का प्रवाह है, जो जीवन की लहरों को पूर्वानुमानित करता है। लेकिन सावधान! इन सूत्रों की गहराई इतनी है कि आज भी अधिकांश ज्योतिषी केवल सतह छूते हैं। आइए, इस गहन शोध के माध्यम से, उपनिषदों की #ज्योतिषीय_व्याख्या और खगोलीय गणित के सूत्रों को उकेरें, उदाहरणों से रोशन करें, और तांत्रिक उपायों से समस्याओं का निवारण खोजें—एक ऐसा विश्लेषण जो अभी तक किसी ने न उजागर किया हो।
चर कारक: आत्मा के चंचल दूत, जो भाग्य के सूत्र बुनते हैं
जैमिनी सूत्रों के प्रथम अध्याय में, महर्षि कहते हैं: "अंशकाला विकलादीनां चरकारकनिर्णयः" (#जैमिनी_सूत्र 1.1.14)—अर्थात्, ग्रहों की अंश (डिग्री), कला (मिनट) और विकला (सेकंड) के आधार पर चर कारकों का निर्धारण। यहाँ सात या आठ कारक (राहु को शामिल कर) चर होते हैं, जो पराशरी के स्थिर कारकों से भिन्न हैं। सबसे ऊँचा डिग्री वाला ग्रह आत्मकारक (एके) बनता है—आत्मा का दूत, जो कर्म के गहन रहस्य को उजागर करता है। फिर #अमात्यकारक (एमके) करियर का संरक्षक, भ्रातृकारक (बीके) भाई-बहनों का, मातृकारक (एमके) माँ का, पुत्रकारक (पीके) संतान का, ग्नातिकारक (जीके) संघर्ष और आध्यात्मिक साधना का, तथा दाराकारक (डीके) जीवनसाथी का।
खगोलीय गणित की दृष्टि से, यह निर्धारण सूर्य सिद्धांत पर आधारित है: प्रत्येक ग्रह की ज्योतिषीय स्थिति (longitude) को 30° राशि में मापें। उदाहरणस्वरूप, यदि सूर्य 29°50' पर हो और मंगल 29°45' पर, तो सूर्य आत्मकारक बनेगा। यह गणना नवांश (D9) चार्ट में स्थानांतरित होकर करकांश लग्न बनाती है—आत्मकारक की राशि को जन्म कुंडली में लग्न मानें। #मंडूक्य उपनिषद की व्याख्या में, यह "ॐ" के चतुर् अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय) से जुड़ता है: आत्मकारक तुरीय अवस्था का प्रतीक है, जो माया से मुक्ति का द्वार खोलता है। शोध बताता है कि यदि केतु नवांश में आत्मकारक से 12वें या 4थे भाव में हो, तो मोक्ष योग बनता है—एक अनकहा रहस्य जो उपनिषदों की ज्योतिषीय परत को उकेरता है।
एक काल्पनिक लेकिन शोध-आधारित उदाहरण लीजिए: मान लीजिए किसी कुंडली में आत्मकारक शनि हो, नवांश में सिंह राशि में। #करकांश लग्न सिंह बन जाता है। यदि गुरु इससे 5वें भाव में दृष्टि डाले, तो राजयोग जन्म लेता है—व्यक्ति आध्यात्मिक गुरु या राजनेता बनेगा। लेकिन यदि राहु दृष्टि डाले, तो कर्म बंधन बढ़ेगा।
यह विश्लेषण पराशरी से गहरा है, क्योंकि यहाँ राशि दृष्टि (सभी राशियाँ समदृष्टि) का उपयोग होता है—चर राशियाँ पूर्ण, स्थिर द्वितीय-त्रतीय, द्विपद चतुर्थ।
#जैमिनी की यह प्रणाली विशेष लग्नों पर टिकी है, जो खगोलीय गणित से बुने जाते हैं। होरा लग्न (एचएल): सूर्योदय से जन्म समय तक सूर्य की गति को 15° प्रति घंटे मानकर गणना। सूत्र कहता है: "सूर्योदयाद् होरा लग्न" (1.2.10)—सूर्य की स्थिति से होरा लग्न निकालें। यदि जन्म रात्रि का हो, चंद्रमा की स्थिति जोड़ें। खगोलीय रूप से, यह #सूर्य सिद्धांत के अनुसार: लंबitude (λ) = सूर्य की ecliptic longitude + (जन्म समय - सूर्योदय) × 15°/घंटा। घटी लग्न (जीएल) और भी रहस्यमय: यह आयु निर्धारण का द्वार है।
गणना: घटी (24 मिनट) इकाई में, सूर्योदय से जन्म तक की दूरी × 120 (क्योंकि 5 घंटे = 12.5 घटी, लेकिन जैमिनी सूत्र में "घटिका लग्न पञ्चमात्" 1.2.15)। एक अनोखा शोध: यदि घटी लग्न को उपनिषदों के "प्राण" से जोड़ें (#प्रश्नोपनिषद्, प्राण की गति), तो यह जीवन शक्ति का माप बन जाता है। उदाहरण: यदि घटी लग्न मेष में हो और मंगल exalted हो, तो दीर्घायु (पूर्णायु) योग—व्यक्ति 100 वर्ष जीवित रहेगा, लेकिन राहु की दृष्टि से मध्यायु में संकट।
ये लग्न #राजयोग के लिए कुंजी हैं। यदि एक ग्रह होरा, घटी और जन्म लग्न को दृष्टि डाले, तो "राजा समो भवति" (जैमिनी सूत्र 1.3.5)—व्यक्ति राजा तुल्य बनेगा। एक गहन उदाहरण: स्वामी विवेकानंद की कुंडली में आत्मकारक सूर्य, शनि भ्रातृकारक के साथ 10वें भाव में—चर दृष्टि से राजयोग, जो उनके आध्यात्मिक साम्राज्य को जन्म देता है। लेकिन पराशरी में यह सामान्य लगता; #जैमिनी में यह आत्मा का उदय है।
#राजयोग: सिंहासन का गुप्त सूत्र, उपनिषदों की छाया में
राजयोग जैमिनी में आत्मकारक और पंचमेश (5वें भाव स्वामी) के संयोग से बनता है। सूत्र: "आत्मकारक पञ्चमेश योगः राजयोगः" (1.3.2)—यदि दोनों exalted या केंद्र में, तो राज्य प्राप्ति। खगोलीय गणना: दोनों की longitude अंतर <180°, और नवांश में संयोजन। उपनिषद ज्योतिष शास्त्र से उदाहरण: #बृहदारण्यक उपनिषद् (3.8.11) में "आत्मा राजा सर्वस्य" का अर्थ आत्मकारक से जोड़ें—यह योग आत्मा को राजा बनाता है।
शोधात्मक विश्लेषण: यदि करकांश लग्न में गुरु-शनि योग हो, तो धन राजयोग—व्यक्ति धनी राजा बनेगा। लेकिन एक अनकहा रहस्य: यदि यह योग 8वें भाव में हो, तो "#विष_योग" जैसा, जहाँ सफलता मृत्यु का द्वार खोलती है। उदाहरण: राजीव गांधी की कुंडली में आत्मकारक-मातृकारक संयोग, लेकिन घटी लग्न से संकट—1980 के दशक में चर दशा ने राजयोग दिया, परंतु 1991 में अंत। यह पराशरी से भिन्न, जहाँ दशा स्थिर; जैमिनी में चर प्रवाह रहस्यमय है।
#आयु_निर्धारण: जीवन की घड़ी, जो उपनिषदों से गूंजती है
जैमिनी में आयु तीन प्रकार: #अल्पायु (0-32 वर्ष), #मध्यायु (32-64), #पूर्णायु (64+)। सूत्र: "रुद्र माहेश्वर ब्रह्म राशयः" (2.3.10)—रुद्र राशियाँ (मेष आदि) अल्प, ब्रह्म (कर्क आदि) पूर्ण। गणना: घटी लग्न से द्वार राशि निकालें—सूर्योदय से जन्म दूरी × 5 (पंचम सूत्र)। खगोलीय: sidereal time को घटी में बदलें।
उपनिषद से श्लोक उदाहरण: तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1) "मृत्योर्मा अमृतं गमय" को घटी लग्न से जोड़ें—यदि केतु 12वें से दृष्टि, तो अमृत (दीर्घायु)। शोध: यदि आत्मकारक exalted हो, तो +20 वर्ष जोड़ें। समस्या: #अल्पायु योग में संकट। तांत्रिक उपाय: काल भैरव तंत्र से "रुद्राक्ष माला पर शनि होम"—शनिवार को 108 बार "ॐ भैरवाय नमः" जपें, काले तिल दाहें। यह आयु वृद्धि का गुप्त मंत्र है, जो जैमिनी के विष योग को शांत करता है।
करियर: अमात्यकारक का साम्राज्य, रहस्यमय उदय
करियर के लिए #अमात्यकारक (दूसरा उच्च डिग्री ग्रह) कुंजी। सूत्र: "अमात्यकारक दशमस्थः राजा भवति" (1.4.5)—यदि 10वें भाव में, तो राजसी पद। गणना: अमात्यकी longitude से चर दशा चलाएं—प्रत्येक राशि 12 वर्ष, लेकिन संतान/संबंधी राशियों में कटौती। उदाहरण: यदि अमात्य मंगल हो, करकांश से 10वें में, तो योद्धा/नेता करियर। शोध: उपनिषदों में "#कर्म_ब्रह्म" (ईश उपनिषद् 1) को अमात्य से जोड़ें—यह कर्म का राजा है।
एक अनोखा विश्लेषण: यदि अमात्य-आत्मक संयोजन हो, लेकिन राहु दृष्टि, तो करियर में विश्वासघात। उदाहरण: संजय गांधी की कुंडली में अमात्य कमजोर, चर दशा में पतन। समस्या निवारण: तांत्रिक उपाय—#कामाख्या तंत्र से "शुक्रवार को लाल चंदन का तिलक, 'ॐ ह्रीं कामेश्वराय नमः' 21 बार"—करियर बाधा दूर, राजयोग सक्रिय।
तांत्रिक उपाय: समस्याओं के अंधेरे को रोशनी का स्पर्श
जैमिनी की समस्याएँ—जैसे कमजोर आत्मकारक से आत्मिक संकट—तांत्रिकों से हल होती हैं। राजयोग के लिए: अग्नि तंत्र से "सूर्य को अर्घ्य, 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' 108 बार"—सफलता का द्वार खुलता। आयु के लिए: काली तंत्र "महाकाली यंत्र स्थापना, रात्रि जप"—मृत्यु भय शांत। करियर: #दुर्गा_सप्तशती से "अमात्य ग्रह के बीज मंत्र"—धन-प्रतिष्ठा वृद्धि।
ये उपाय उपनिषदों के "तपः" से प्रेरित, रहस्यमय और प्रभावी। इस गहन यात्रा में, जैमिनी ज्योतिष आत्मा का दर्पण बन जाता है—एक ऐसा विज्ञान जो न केवल #भविष्य बताता, बल्कि कर्म के गुप्त द्वार खोलता है। क्या आप तैयार हैं, इस रहस्य को अपनाने को? सितारों की पुकार सुनिए, और जीवन का राजा बनिए।
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कि कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता है
तब मेरे पास भागा-भागा आता है और मुझे सिर्फ अपनी परेशानियां बताने लगता है,मेरे पास आकर कभी भी अपने सुख या अपनी संतुष्टि की बात नहीं करता मेरे से कुछ न कुछ मांगने लगता है!
अंतत: भगवान ने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- कि हे देवो, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं
जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं
न ही शास्वत स्वरूप में रह कर साधना कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।
प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट करने शुरू किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं।
उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि आप किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।
भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- "क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं"।
अंत में सूर्य देव बोले- प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, क्योंकि मनुष्य बाहर की प्रकृति की तरफ को देखता है
दूसरों की तरफ को देखता है खुद के हृदय के अंदर कभी झांक कर नहीं देखता इसलिए वह यहाँ आपको कदापि तलाश नहीं करेगा।
करोड़ों में कोई एक जो आपको अपने ह्रदय में तलाश करेगा वह आपसे शिकायत करने लायक नहीं रहेगा क्योंकि उसकी बाहरी इच्छा शक्ति खत्म हो चुकी होगी ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई।
उन्होंने ऐसा ही किया और भगवान हमेशा के लिए मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।
उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, पर्वत पहाड़ कंदरा गुफा ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।
परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर ईश्वर को ढूंढने की कोशिश नहीं करता है
इसलिए मनुष्य "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता और ईश्वर को पाने के चक्कर में दर-दर घूमता है पर अपने ह्रदय के दरवाजे को खोल कर नहीं देख पाता।
श्रीकृष्ण का गोपियों से दधि का दान मांगना.. . भगवान श्रीकृष्ण का व्रज में आनन्द-अवतार है। उनकी व्रज की लीलाएं भक्तों को आनन्द और प्रेम बांटने के लिए हुईं हैं। इसी कारण नन्दरायजी के यहां नौ लाख गायें होने पर भी वे गोपियों से कहते हैं.. . ग्वालिनी मीठी तेरी छाछ। कहा दूध में मेलि जमायो सांचि कहुं किन बाछि।। . द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों के साथ बरसाना और चिकसौली के मध्य ‘सांकरी खोर’ नामक संकरी गली में तथा गोवर्धन स्थित ‘दानघाटी’ में गोपियों से दही-माखन का दान लिया था। इसी स्थान पर श्रीकृष्ण ने व्रजगोपियों को अपना गौरस (दूध, दही, माखन, छाछ) मथुरा जाकर बेचने से रोका था। भगवान श्रीकृष्ण की इस लीला का उद्देश्य था.. व्रजवासियों का दूध-दही-माखन व्रजवासी ही खाएं और बलिष्ठ बनें। व्रज का गौरस कंस और उसके अत्याचारियों को ना मिले। बरसाने की गोपियों से गौरस का दान लेने के लिए श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ उनका मार्ग रोकते थे। आइये इस लीला की मिठास का अनुभव कीजिये। . . बरसाने की ओर से श्रीराधा रानी अपनी सखियों के साथ आपस में बतियाती-इठलाती सिर पर दधि-माखन की चिकनी-चुपड़ी मटुकियों को रखकर दानघाटी की ओर चली आ रहीं हैं। . काले-कजरारे नुकीले नयनों में कटीला कजरा डाले, माथे पर लाल-लाल बड़ी-सी बिन्दी, गोरे-गोरे सुडौल शरीर पर घुमेरदार रंगरगीला लहंगा और उस पर लहराती-फहराती टेसू के फूलों के रंग में रंगी चुनरी, घूंघट में से झांकती तिरछी चितवन। . ऐसा लग रहा था मानो रंग-बिरंगी घटाएं आकाश से उतरकर व्रज की हरियाली धरती पर उमड़ती-घुमड़ती चली आ रहीं हैं। . सोने और चांदी के आभूषणों से लरकती-मटकती ये गोपियां जब कान्हा और उसकी टोली के भय से जल्दी-जल्दी कदम बढ़ातीं तो इनके कंगनों, कमर की कौंधनियों और पैरों में पहनी झांझर-बिछुओं की रुनझुन कदम्बवृक्ष पर बैठे कन्हैया के कानों में एक अपूर्व माधुर्यरस उडेल देती और वे अपने सखाओं को पुकार उठते.. . आओ आओ रे सखा, घेरौ घेरौ रे सखा। दही लैके ग्वालिन जाय रही, सब गोपी चलीं न जाय कहीं। दूध दही के माट भरे हैं, माखन अपने सीस धरे हैं। मैंने जानी रे सखा, पहचानी रे सखा। सौंधी-सी सुगन्ध है आय रहीं, सब गोपी चलीं न जाय कहीं।। . कान्हा अपने सखाओं को शीघ्रता से गोपियों को घेर लेने के लिए पुकारते.. ’अरे ओ सुबल ! अरे सुदामा ! ओ मधुमंगल ! धाऔ धाऔ (दौड़ो दौड़ो), कहीं ये ग्वालिन निकसि न जायं ( दूर न चली जाएं)। इनकी राह में अपनी-अपनी लकुटियां कूं टेक देओ (अपनी-अपनी लकड़ी से इनका रास्ता रोक दो)। . श्रीकृष्ण के इतना कहते ही सभी सखाओं की टोली यहां-वहां से लदर-पदर आ निकली। उस समय की नयनाभिराम झांकी का वर्णन बड़ा ही रसमय और मन को गुदगुदाने वाला है.. एक तरफ तो सकुचाता-लजाता, गोरस की मटकियों को सिर पर रखे कुछ ठगा-सा, कुछ भयभीत पर कान्हा की रूपराशि पर मोहित व्रजवनिताओं का झुण्ड और दूसरी ओर चंदन और गेरु से मुख पर तरह-तरह की पत्रावलियां बनाए, कानों में रंग-बिरंगे पुष्पों के गुच्छे लटकाए, गले में गुंजा की माला पहने, हरे-गुलाबी अगरखा (छोटा कुर्ता) पर कमर में रंग-बिरंगे सितारों से झिलमिलाते फेंटा कसे, मोरपंखों से सजी लकुटिया (बेंत) लिये ग्वालबालों सहित श्रीकृष्ण का टोल (दल)। . श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों के साथ गोपवधुओं को चारों ओर से घेर लिया और उनके आगे पैर रखकर खड़े हो गए। . तभी एक ग्वालिन चित्रासखी ने हिम्मत करते हुए कान्हा से कहा.. ’क्यों जी! क्या बात है हमारी गैल (रास्ता) क्यों रोकौ हौ? दूध दही नाय तेरे बाप की और यह गली नाय तेरे बाप की, छाछ हमारी वो पीवै जो टहल करै सब दिना की।’ . .जबाव में कान्हा ने कहा.. ’या दानघाटी पर हमारौ दान होय है। चतुराई त्यागौ और दान दै जाओ।’ . ब्रजेन्द्रनन्दन का इतना कहना था कि तपाक से एक चतुर ग्वालिन चन्द्रावली ने उत्तर दिया.. ’अजी दान काहे बात कौ? यहां के राजा तो श्रीवृषभानुजी हैं। हटौ हमारी रस्ता छोड़ौ, नहीं तो मथुरा में जाय कै कंस से कहि दीनी जाएगी। सबरी खबर परि जाएगी लाला कूं। दान देओ जाय दान (दान दो इसको दान)।’ . तभी दूसरी गोपी बोली.. ’हे मनमोहन! मैं बरसाने की ग्वालिन हूँ, मुझसे बेकार में झगड़ा मत कर। तूने केवल पांच टके का कम्बल ओढ़ रखा है, उस पर इतना घमण्ड! तुम नन्दबाबा की गाय चराते हो और मुझसे दान मांगते हो ! देखो लाला ! हाथापाई करोगे तो तुम जानो। हीरों से जड़ी ये मेरी ईडुरी (सिर पर मटकी रखने के लिए गोल पहिया जैसा) है जिसमें करोड़ों के हीरे लगे हैं, यदि इसमें से एक भी निकल कर कहीं गिर गया तो देख लेना। तुम्हारी सब गायों की कीमत भी इतनी नहीं होगी।’
कन्हैया ने कहा.. ’तू बाबरी क्या जाने, मैं तो त्रिलोकी का राजा हूँ। जड़, जीव, जल-थल सबमें मैं समाया हुआ हूँ। ब्रह्मा, शंकर, सनकादि ऋषि भी मेरा पार नहीं पाते। तू गंवार ग्वालिन मुझे क्या समझाती है। मैं अपने भक्तों की रक्षा और दुष्टों का संहार करता हूँ। कंस के तो केश पकड़ कर मैं पृथ्वी का भार उतार दूंगा। ब्रह्मारूप में सृजन, शिवरूप में संहार और विष्णुरूप में जगत की रक्षा... मैं नन्दकुमार ही करता हूँ।’ . गोपी कंस के नाम पर कन्हैया को धमकाती है.. . इस पर एक सखा बोला.. ’कन्हैया! बात बनाना तो इस गोपी को बहुत आता है। कन्हैया! तू सुन रहा है ये गोपी क्या कह रही है?’ . कन्हैया ने अपने साथी की बात सुनकर गोपी से कहा.. ’अच्छा तो तू धोंस दे रही है और वो भी उस कंस की।’ कंस की धोंस भला कन्हैया को कैसे सहन होती। . कन्हैया ने कहा–‘मैं गौओं की शपथ खाकर कहता हूँ, उस कंस को मैं उसके बंधु-बांधवों सहित मार डालूंगा।’ बस होने लगी दोनों में परस्पर मधुर ऐंचातानी (खींचतान)..
और छैल-छबीले कन्हैया ने एक हाथ से ग्वालिन का कंगन और दूसरे से आंचल पकड़ लिया और बोले कि बहुत दिनों तक तुम सब ग्वालिन दान देने से बच गयीं पर आज मैं पूरा हिसाब करुंगा.. गोपी ने कन्हैया को ताना मारते हुए कहा.. ’नंदबाबा भी गोरे हैं और जसुमति मैया भी गोरी हैं, तुम इन्हीं लक्षणों (करतूतों) के कारण सांवरे हो।’ . कान्हा से पीछा छूटता न दिखने पर एक चतुर गोपी बोली.. ’मेरे कन्हैया ! हम तुम पर बलिहारी जाती हैं। कल हम बहुत सारा गौरस लेकर आयेंगी तब तुम्हें चखायेंगी। हमारे जीवनधन! आज हमें जाने दो।’ पर कन्हैया जब पकड़ता है तब क्या कोई सरलता से छूट सकता है? कन्हैया ने गोपी से कहा.. हमें तुम पर विश्वास नहीं है। तुम्हारे गौरस को चखने के लिए मेरा मन बहुत ललचा रहा है। हाथ में आये अमृत को छोड़कर कल की आशा करना व्यर्थ है। पूर्ण चन्द्र को पाकर चकोर धैर्यवान बना रहे, यह तो असम्भव है! . हुआ भी वही.. नयनों से नयनों का मिलन हुआ। यह सांकरी खोर श्रीप्रिया-प्रियतम के प्रेमरस की लूट की अनोखी दान स्थली बन गयी, जहां श्यामसुन्दर अपनी प्यारीजू और उनकी सखियों को दान के लिए रोका करते थे। . गोपियां आपस में कहने लगीं.. ’यह नन्द का लाला तो बड़ा ढीट और निडर है। गांव में तो निर्बल बना रहता है और वन में आकर निरंकुश बन जाता है। हम आज ही चलकर यशोदाजी से इसकी करतूत कहती हैं।’ पर मन-ही-मन अपने प्यारे कन्हैया के प्रेम में मग्न होकर उनके आगे समर्पण करती हुई कहती हैं.. . तुम त्रिभुवन के नाथ जोई करो सो जिय भावे। तिहारे गुन अरु कर्म कछु हम कहत न आवे।। मटकी आगे धरी परी स्याम के पाय। मन भावे सो लीजिए बचे सो बेचन जाय।। . नन्दनन्दन ने ग्वालबालों के साथ सबके दहीपात्र भूमि पर पटक दिए। फिर श्रीकृष्ण और सखाओं ने कदम्ब व पलाश के पत्तों के दोने बनाकर टूटे पात्रों से दही लेकर खाया। . तब से वहां के वृक्षों के पत्ते दोने के आकार के होने लग गए और यह जगह ‘द्रोण’ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। आज भी यहां दही दान करके स्वयं भी पत्ते में रखकर दही खाना बहुत पुण्यमय माना जाता है। . भगवान श्रीकृष्ण की दानलीला भक्तों को परमसुख देने वाली है। हिंदी साहित्य के तमाम कृष्णभक्त कवियों ने इस लीला को और भी सजीव बना दिया है। इस लीला को पढ़ने में जितना आनंद प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक देखने और सुनने से मिलता है। सांकरी खोर नामक स्थान पर इस लीला का आयोजन किया जाता है।बरसाना के लोग राधाजी का, चिकसौली के लोग चित्रासखी का और नंदगांव के लोग श्रीकृष्ण और ग्वालों का प्रतिनिधित्व करते हुए सांकरी खोर पर पहुंचते हैं। लीला का आयोजन किया जाता है। चित्रासखी के गांव से आई मटकी पर नंदगांव के ग्वाल टूट पड़ते हैं। छीनाझपटी में मटकी टूट जाती है। श्रद्धालुओं में मटकी प्रसाद की होड़ लग जाती है।
बरसाने की एक सुगंधित बगिया में राधारानी अपने सखी संग बैठी थीं। आकाश में मंद पवन बह रही थी और वृंदावन के हर पुष्प में मानो श्याम का ही नाम झूम रहा था। राधा जी के हाथ में एक गुलाबी कमल खिला हुआ था। वह कमल उनके ही हृदय जैसा निर्मल और कोमल प्रतीत हो रहा था।
राधारानी उस बगिया के बीच एक शिला पर विराजमान थीं। नीले रंग की साड़ी, लाल ओढ़नी, गले में पुष्पों की माला और हाथों में कंगन की मधुर झंकार — वे दृश्य ऐसा लग रहा था मानो स्वयं भक्ति का सागर मूर्त रूप धरकर बैठा हो। उनके हाथ में एक खिला हुआ कमल था।
पास ही घुटनों के बल बैठी थी उनकी सखी। उसकी आँखें भक्ति के अश्रुओं से भीग रही थीं। वह अपने दोनों हाथों से राधारानी का आँचल थामे बैठी थी, मानो कह रही हो — "प्राण भी यदि छूट जाए, पर यह आँचल कभी न छूटे।"
उसकी आँखों में अपार प्रेम और समर्पण झलक रहा था। वह अपने हृदय की सारी व्याकुलता, सारी थकान भूलकर बस राधा को निहार रही थी।
राधारानी मुस्कुराती हुई उस सखी के सिर पर हाथ फेरने लगीं। उनके स्पर्श में इतनी करुणा और माधुर्य था कि मानो सखी को सम्पूर्ण जगत का सुख मिल गया हो।
“हे सखी! यह कमल देखती है? यह कीचड़ में जन्मा है, फिर भी निर्मल और सुगंधमयी है। ऐसे ही भक्त भी संसार रूपी कीचड़ में रहते हुए भी अपने हृदय को निर्मल रखते हैं। यही तो सच्चा प्रेम है, यही तो सच्ची भक्ति है।” "वैसे ही हमारी भक्ति भी संसार के झंझटों में रहकर शुद्ध बनी रहनी चाहिए। प्रेम में कोई स्वार्थ न हो, तभी कृष्ण उसमें बसते हैं।"
राधारानी ने करुणा से भरे अपने हाथ उस सखी के सिर पर रख दिए। उस स्पर्श से सखी का सम्पूर्ण शरीर रोमांचित हो उठा। राधा ने कहा — “सखी! जान ले, श्याम के हृदय तक पहुँचने का मार्ग मेरे आँचल से होकर ही जाता है। जो मुझे पा लेता है, उसे कृष्ण अपने आप मिल जाते हैं। और तेरे इन आँसुओं ने आज मुझे बाँध लिया है। अब तू मेरे बिना कभी न रह पाएगी, और मैं तेरे बिना।” लाड़ली सखी से बोली — "ललिता, विशाखा, और सब गोपियों से बढ़कर मेरे लिए तुम हो, क्योंकि तुमने मेरे श्याम के लिए अपना हृदय पूरी तरह खाली कर दिया है। जिस सखी का मन केवल कृष्ण-कृष्ण करता है, वही सच्ची राधा की प्रिय सखी बन सकती है।"
सखी ने भावविभोर होकर राधा के चरणों पर सिर रख दिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे — पर वे आँसू दुःख के नहीं, वरन् राधा की करुणा के थे।
बरसाने की उस बगिया में उस क्षण सारा वातावरण गूंज उठा — "राधे राधे श्याम मिले तो जीवन धन्य हो जाए।"
और कहते हैं, जो भी सखी-भाव से राधारानी की शरण में जाता है, वह ऐसा ही सुख अनुभव करता है जैसा इस चित्र में दिख रहा है — राधा की गोदी, राधा की करुणा और राधा का अमृतमय प्रेम। 🌸 सखी की आँखें बंद हो गईं, और उसने अनुभव किया — "यही वैकुंठ है, यही स्वर्ग है। राधा की गोदी में बैठकर भक्ति करना ही सबसे बड़ा सुख है।"
भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है, क्योंकि उन्होंने यह शिक्षा दी कि ज्ञान किसी भी स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए, जिनमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और विभिन्न जीव-जंतु भी शामिल थे। इन सभी से उन्होंने कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सीखा। यह दर्शाता है कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती और हर चीज में हमें गुरु तत्व दिख सकता है, बशर्ते हमारे पास विवेक और जिज्ञासा हो। आइए जानते हैं भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे मिली शिक्षाएँ: दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे प्राप्त शिक्षाएँ * पृथ्वी: पृथ्वी से दत्तात्रेय ने सहनशीलता, क्षमा और परोपकार की शिक्षा ली। पृथ्वी सभी जीवों का भार सहन करती है और बिना किसी भेदभाव के उन्हें आश्रय और पोषण देती है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को संसार के सुख-दुख को सहन करते हुए, अपनी प्रकृति में दृढ़ रहना चाहिए और दूसरों का भला करना चाहिए। * वायु: वायु हर जगह मौजूद होती है, लेकिन किसी से चिपकती नहीं। इससे उन्होंने निर्लिप्तता और अनासक्ति सीखी। जिस प्रकार वायु अच्छी-बुरी गंध से अप्रभावित रहती है, उसी प्रकार ज्ञानी को भी संसार के भोगों और दोषों से अप्रभावित रहना चाहिए। * आकाश: आकाश सर्वव्यापी है और किसी भी चीज से दूषित नहीं होता। इससे दत्तात्रेय ने असंगता और निराकारता का ज्ञान प्राप्त किया। आत्मा भी आकाश की तरह सर्वव्यापी, असंग और शुद्ध है। * जल: जल स्वाभाविक रूप से पवित्र और शुद्ध होता है, और दूसरों को भी पवित्र करता है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को स्वयं शुद्ध होकर दूसरों को भी पवित्रता की प्रेरणा देनी चाहिए। * अग्नि: अग्नि जिस भी वस्तु को ग्रहण करती है, उसे स्वयं में समाहित कर लेती है और पवित्र कर देती है। इससे उन्होंने प्रकाश, तेज और समदर्शिता की शिक्षा ली। जिस प्रकार अग्नि चाहे किसी भी वस्तु को जलाए, उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता, वैसे ही ज्ञानी को भी सभी अवस्थाओं में एक समान रहना चाहिए। * चंद्रमा: चंद्रमा अपनी कलाओं को घटाता-बढ़ाता है, लेकिन उसका मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि शरीर का जन्म, विकास, क्षय और मृत्यु तो होती है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है। * सूर्य: सूर्य एक होते हुए भी विभिन्न पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, और अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करता है। इससे उन्होंने आत्मा की एकता और प्रकाश का ज्ञान प्राप्त किया। * कबूतर: एक कबूतर जोड़ा अपने बच्चों के अत्यधिक मोह में इतना अंधा हो जाता है कि वह शिकारी के जाल में फंस जाता है। इससे दत्तात्रेय ने अत्यधिक मोह और आसक्ति से होने वाले दुखों को सीखा। * अजगर: अजगर बिना किसी प्रयास के जो कुछ भी मिल जाए, उसी में संतोष करता है और बिना चले उसी स्थान पर रहता है। इससे उन्होंने संतोष, धैर्य और अपरिग्रह की शिक्षा ली। * समुद्र: समुद्र की नदियाँ हमेशा भरती रहती हैं, लेकिन वह कभी अपनी सीमा नहीं लांघता। इससे दत्तात्रेय ने शांत मन, स्थिरता और असीम गहराई का पाठ पढ़ा। ज्ञानी का मन भी समुद्र की तरह शांत और गहरा होना चाहिए। * पतंगा: पतंगा आग की लौ के प्रति इतना आकर्षित होता है कि स्वयं को जला लेता है। इससे दत्तात्रेय ने भौतिक इच्छाओं और इंद्रियों के वश में होने से होने वाले विनाश को समझा। * मधुमक्खी: मधुमक्खी विभिन्न फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस इकट्ठा करती है, और भिक्षुक भी अलग-अलग घरों से थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करता है। इससे उन्होंने थोड़ा-थोड़ा संग्रह करने और आवश्यकतानुसार ग्रहण करने की शिक्षा ली। (यह भी सीखा कि अधिक संचय विपत्ति का कारण बन सकता है, जैसे मधुमक्खी का शहद छीन लिया जाता है)। * हाथी: हाथी मादा हाथी के मोह में फंसकर बंदी बना लिया जाता है। इससे दत्तात्रेय ने इंद्रिय-भोग, विशेषकर कामवासना से होने वाले पतन को सीखा। * हिरण: हिरण मधुर संगीत पर मोहित होकर शिकारी का शिकार बन जाता है। इससे उन्होंने शब्द (श्रवण) इंद्रिय के प्रति अधिक आसक्ति से होने वाले खतरे को समझा। * मछली: मछली कांटे में फँस जाती है, क्योंकि वह स्वाद के लालच को नहीं छोड़ पाती। इससे उन्होंने जिह्वा (स्वाद) इंद्रिय के वश में होने से होने वाले बंधन को सीखा। * पिंगला वेश्या: एक वेश्या (पिंगला) रात भर एक धनी ग्राहक का इंतजार करती रही, लेकिन कोई नहीं आया। अंत में, उसने सभी आशाएँ त्याग दीं और ईश्वर में मन लगाया, जिससे उसे परम शांति मिली। इससे दत्तात्रेय ने निराशा से वैराग्य और सच्ची शांति की शिक्षा ली। * कुरर पक्षी: कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लेकर उड़ रहा था, जिसे देखकर दूसरे पक्षी उसका पीछा कर रहे थे। जब उसने मांस का टुकड़ा छोड़ दिया, तो उसे शांति मिली। इससे उन्होंने अपरिग्रह (संग्रह न करना) और त्याग से मिलने वाली शांति का महत्व सीखा। * बालक (शिशु): एक बालक हमेशा आनंदमय, चिंतामुक्त और निरपेक्ष होता है। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि व्यक्ति को संसार की चिंताओं से मुक्त होकर सहज आनंद में रहना चाहिए। * कुमारी कन्या: एक अकेली कुमारी कन्या धान कूट रही थी। जब उसकी चूड़ियाँ बजने लगीं तो उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक ही पहनी रखी, जिससे शोर न हो। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि एकान्त में रहकर ध्यान करना चाहिए और अत्यधिक संगति से बचना चाहिए, क्योंकि अधिक लोग होने पर अनावश्यक विवाद या शोर हो सकता है। * बाण बनाने वाला (तीरंदाज): एक तीरंदाज बाण बनाने में इतना तल्लीन था कि उसे पास से गुजरती हुई एक बारात का भी आभास नहीं हुआ। इससे दत्तात्रेय ने एकाग्रता और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की शिक्षा ली। * सर्प (साँप): साँप किसी एक घर में नहीं रहता, बल्कि बिना घर बनाए बिलों में रहता है और अपने लिए कुछ भी इकट्ठा नहीं करता। इससे उन्होंने अनासक्ति, अपरिग्रह और बिना किसी स्थायी निवास के विचरने की शिक्षा ली। * मकड़ी: मकड़ी अपने भीतर से ही जाल बुनती है और फिर उसी में स्वयं को बांध लेती है, या उसे तोड़कर बाहर निकल जाती है। इससे दत्तात्रेय ने ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना और संहार का रहस्य और योगियों द्वारा माया से मुक्ति का मार्ग समझा। * भृंगी (भौंरा): भृंगी एक छोटे कीड़े (इल्ली) को अपने बिल में लाकर उसे बार-बार डंक मारता है, जिससे वह कीड़ा भी भृंगी जैसा बन जाता है। इससे उन्होंने ध्याता (ध्यान करने वाला) और ध्येय (जिसका ध्यान किया जा रहा है) के एक हो जाने के सिद्धांत को समझा (जैसा सोचोगे, वैसे बन जाओगे)। * शरीर: स्वयं अपने शरीर से दत्तात्रेय ने सीखा कि यह नाशवान है और इसे अत्यधिक महत्व नहीं देना चाहिए। यह केवल आत्मा का एक अस्थायी वाहन है और यह दुख का मूल भी हो सकता है। इससे उन्होंने वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा ली। दत्तात्रेय का यह अद्वितीय दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि ज्ञान का कोई निश्चित स्रोत नहीं है। एक सच्चा जिज्ञासु व्यक्ति हर छोटी-बड़ी घटना, हर प्राणी और प्रकृति के हर कण से जीवन के गूढ़ रहस्यों को सीख सकता है। यह उनकी अवधूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वह सभी बंधनों से मुक्त होकर, हर अनुभव से सीखते हुए परम ज्ञान को प्राप्त करते हैं।
युधिष्ठिर ने पूछा : भगवन् ! आषाढ़ के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसका नाम और विधि क्या है? यह बतलाने की कृपा करें ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘शयनी’ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ । वह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, सब पापों को हरनेवाली तथा उत्तम व्रत है ।
आषाढ़ शुक्लपक्ष में ‘शयनी एकादशी’ के दिन जिन्होंने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान विष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया ।
‘हरिशयनी एकादशी’ के दिन मेरा एक स्वरुप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भलीभाँति धर्म का आचरण करना चाहिए ।
जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए ।ऐसा करनेवाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं ।
राजन् ! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वपापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय रहनेवाला है । जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते हैं, वे मेरे प्रिय हैं । चौमासे में भगवान विष्णु सोये रहते हैं, इसलिए मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए ।
सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए । जो चौमसे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है ।
राजन् ! एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, अत: सदा इसका व्रत करना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए ।🙏🙏
krishna behal
गोपियाँ बाबा के द्वार पे ठाडी पूछ रही है :- बाबा वो जशोदा का छोरा तेरे इहाँ आयो है?
बाबा :- ना इहाँ ना आयो।
गोपी :- परन्तु हमनें तो इही आतो देखो थो।
बाबा :- देखूँ तो मैं भी प्रतिदिन हूँ कि वो मेरे इहाँ आ रहयो है।परन्तु जब आंख खुले है तो पता पडे हैं कि बाबा तो स्वप्न देख रहयो थो।
गोपी :- परन्तु बाबा जे स्वप्न की बात ना हैं।हमनें स्वम् वाको तेरे घर में घुसतो देखयो है।
बाबा :- तुममे और मोहमें केवल एक ही अंतर है कि तुम खुली आंखन ते स्वप्न देखो हो और मैं बंद आंखन ते।
गोपी :- बाबा नेक द्वार ते हट तो सही।भीतर तो आन दे।
बाबा :- ना मैं विरक्त बाबा जी।मेरे इहाँ स्त्रीयों का प्रवेश वर्जित है।
गोपी :- और जो रात-रात भर स्वप्न में हमारे संग रास में घूमतो डोले है।तब तेरी विरक्ताइ कहाँ चली जाए है।
बाबा गोपी की बात सुन स्तंभ सा खड़ो रह गयो।
अब बाबा सोच रहयो है कि ये तो भीतर तक की जाने है।
बाबा अपने मुख के हावभाव छूपाते भए :- उस समय तुम हमारी गुरू होती हो और मैं मंजरी स्वरूप में तुम्हारी दासी।
गोपी :- बाबा दासी तो आठों पहर ही दासी रहे है।फिर चाहे स्वप्न में होए या प्रत्यक्ष।
बाबा :- सो तुम्हारी बात ठीक है परन्तु अभी मोहे अच्छे से भान हैं कि मैं पुरुष शरीर में हूँ।अर्थात मैं अपने मंजरी स्वरूप कू भूले बैठो हूँ।
गोपी :- बाबा अब तू चाहवे काह है?
बाबा :- तुम तो भीतर तक की जानों हो।अपने आप ही जान लेओ।
गोपी :- हम तो तोहे स्थाई रूप ते मंजरी स्वरूप प्रदान कर देंगी।परन्तु बाबा तू वा स्वरूप कू झेल ना पाएंगो।सांझ तक ही तेरे प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।अब सोच ले जे थोड़ो-थोड़ो सुख लेके बृज में ही रहनो है या एक बारी में ही बैकुंठ कू वास करनो है।
गोपी की बात सुन बाबा मार्ग छोड़कर एक ओर हट गयो।
इहाँ बाबा कू शरीर के छूटबे को भय ना है।भय तो केवल उस थोड़े-थोड़े सुख के छूटबे को है जो बृज में रहकर मिल रहयो है।
****(जय जय श्री राधे)****
#लाला #बाबा #बिंदुसखी #गिरिराजजी #गोवर्धन #परिक्रमामार्ग #श्रीराधाकुण्ड #बरसानाधाम #नन्दगाँव #यमुनामहारानी
#वृंदावन #बृज #बांकेबिहारी #राधावल्लभ #राधारमन #बृजवासी #भावराज्य
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2 weeks ago | [YT] | 7
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krishna behal
🦚मोरकुटी युगलरस लीला ( भाव 8 )🦚
अद्भुत नृत्य क्रीड़ा अप्राकृत राज्य के अप्राकृत प्रेम का अप्राकृत भाव प्रदर्शन श्री युगल करते करते भाव विभोर हुए डूबे सखियों को आनंद प्रदान कर रहे हैं।वहीं सखियाँ अपने अभिन्न स्वरूप भावों से प्रियाप्रियतम जु की नृत्य क्रीड़ा में गहरा संगीत गान कर उन्हें स्पंदन दे रही हैं।परस्पर सुख हेतु युगल सखियाँ सेवारत हो लीलारस को बढ़ा रही हैं।
श्यामा जु के चरणों में पहनी पायल के नन्हे घुंघरू कटि पर करधनी की मधुर छोटी घंटियाँ और चूड़ियों की सुरीली खनक सब ताल से ताल मिला कर"राधे राधे"पुकार रहे हैं।उनकी श्यामल वेणी की सुनहरी कनखियाँ तो झूम झूम कर श्यामसुंदर जु को मंत्रमुग्ध करती"श्याम श्याम"कह उनको अपने प्रेम पाश से बाँध रही हैं।श्यामा जु के अधरों को स्पंदन देती नथ बेसर और मस्तक पर लगा माँग का टिक्का उनके मस्तक को चूमता"सांवरा सांवरा"कह सांवल सरकार के नेत्रों में समाता जा रहा है।
श्यामा जु के कर्णफूल उनके कपोलों पर नाचते इतराते हिल हिल कर श्यामसुंदर जु के मुखकमल पर लिश्कोरें मारते उन्हें खींच रहे हैं।श्यामा जु के चरणों के अंगुष्ठ व नखों के नूपुर व दसों उंगली में पहनी अंगुठियाँ"श्यामाश्याम श्यामाश्याम"नाम ध्वनि करतीं तालबद्ध गान कर रही हैं।उनके गले पर पहने सुंदर मनमोहक हार श्यामा जु के वक्ष् का मंथन कर उनके हृदय के भावों को उनके कजरारे काले नयनों से रससुधा बहाते श्यामसुंदर जु को श्यामा जु का सब भाव वृतांत खोल सुना रहे हैं और काजल की लम्बी रेख की नुकीली धारें सीधे श्यामसुंदर जु के वक्ष् से हृदय में प्रवेश पा रही हैं।श्यामा जु के सुर्ख लाल अधरों की लाली"पिया पिया"रस में डूबी श्यामसुंदर जु के रस पिपासु अधरों को वाचाल करती जा रही है।
श्यामा जु के मुख पर प्यारी सी मुस्कन उनकी दंतकांति मंद मंद श्यामसुंदर जु को आकर्षित कर रही है।श्यामा जु के माथे पर सजी चाँद सी लाल बिंदिया व भौहों पर चमकती छोटी बिन्दु सरीखी बिदियाँ श्वेत कणों से मिल चंदन की सीली महक बन श्यामसुंदर जु की नासिका को स्पंदन दे रहीं हैं।उनके मुखकमल से जैसे चाँदनी छिटक कर श्यामसुंदर जु के श्यामल नीलरंग को चमका चटका रहीं हो।नृत्य करतीं श्यामा जु जैसे श्यामसुंदर जु को ही रिझा रहीं हैं और अनवरत अद्भुत रस संचार करतीं उनकी श्वासों में महक बन घुलती जा रहीं हैं।
वहीं समक्ष श्यामसुंदर जु के सिर पर लगा सुनहरी मोरपखा श्यामा जु को बार बार श्यामसुंदर जु की ओर आकर्षित कर रहा है।उनकी अद्भुत नृत्य क्रीड़ाओं में श्यामसुंदर जु का अंग अंग श्यामा जु को पुकार रहा है।श्यामसुंदर जु के मस्तक पर कस्तूरी तिलक श्यामा जु के वक्ष् पर लगे अंगराग से टकरा कर मनमोहक सतरंगी इन्द्रधनुषी झूला बना रहा है जिसकी तरंगें बिखर बिखर कर ब्यार में रंग भर रही है।
श्यामसुंदर जु की अंगकांति से एक अद्भुत चमकता चटकीला प्रकाश प्रदान कर रहा है जिससे श्यामा जु की अंगकांति की चमक को चार चाँद लग रहे हैं।श्यामसुंदर जु के कानों के कुण्डल व नखबेसर"श्यामा श्यामा"पुकार कर दिव्य नाद कर रही है।उनके बाजुबंध व कंगन श्यामा जु का नाम ले ले कर उन्हें पुकारते हुए भुजपाश में श्यामा जु को भर लेने को उत्सुक हैं।
श्यामसुंदर जु की पतली टेढ़ी कमर पर बंधा कमरबंध व विशाल वक्ष् पर लटकती गुंजामाल व हार"श्यामा श्यामा"पुकार उन्हें आमंत्रण दे रहे हैं।श्यामसुंदर जु के चरणों में बजते घुंघरू श्यामा जु के चरणों को छूने का प्रयास करते"श्याम राधिका"नामुच्चारण कर रहे हैं।उनकी आँखों का काजल व अधरों की लाली तो श्यामा जु के काजल व अधरों की लाली में घुलने को आतुर लालित्य रस बिखराती हुई रस ही रस बहा रही है।
श्यामसुंदर जु के गहरे काले घुंघराले केश श्यामा जु के लिए सर्परूप अनगिनत श्यामसुंदर ही हैं जिनमें बंधने के लिए श्यामा जु स्वयं उन्मादित उत्तावली हैं।श्यामसुंदर जु पल पल श्यामा जु को अपनी चंचल दिव्य मुस्कान से मोहित कर रहे हैं।उनकी अचंबित मयूर रूप नृत्य भावभंगिमाएँ श्यामा जु को चकित करतीं उन्हें आकर्षित कर रही हैं प्रियतम के गहनतम प्रेमरस में डूबने के लिए।
बलिहार !!परस्पर सुख देते प्रियाप्रियतम जु नृत्य क्रीड़ा करते एकभाव लिए दो देह में अवतरित हुए हैं।कभी श्यामा जु का पीछा करते श्यामसुंदर जु तो कभी श्यामसुंदर जु के इर्द गिर्द झूमती नाचती गुनगुनाती श्यामा जु।
अद्भुत रसक्रीड़ा करते युगल और अद्भुत गहन स्पंदन रसिक हृदय की दैहिक क्रियाओं में उफनता झुकता।श्यामा श्यामसुंदर जु को नमन करता नतमस्तक होता एक अभिन्न स्वरूप जो उनकी प्रेम रस सुधा में डूबने को सदा बह जाता।
क्रमशः ( अगला भाग कल को पोस्ट किया जाएगा )
जय जय श्यामाश्याम !!
जय जय युगल !!
जय जय युगलरस विपिन वृंदावन !!
2 months ago | [YT] | 6
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krishna behal
❤️भक्त और भगवान ( भाग 44 )❤️
🙏🏻श्री नेह नागरीदास जी🙏🏻
सुन्दर श्री बरसानो निवास और बास बसों श्री वृन्दावन धाम है।
देवी हमारे श्री राधिका नागरी गोत सौं श्री हरिवंश नाम है॥
देव हमारे श्रीराधिकावल्लभ रसिक अनन्य सभा विश्राम है।
नाम है नागरीदासि अली वृषभान लली की गली को गुलाम है॥
नेह नागरीदास का जन्म सन. 1590 के लगभग मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्रान्तर्गत बेरछा नामक गाँव के एक सम्पन्न पँवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था।
बाल्यावस्था से ही भगवद्भक्ति और साधु सेवा में इनकी रुचि थी । एक बार राधावल्लभीय महात्मा चतुर्भुजदास, जो मध्यप्रदेश के ही गढ़ा नामक गाँव के निवासी थे, सन्त-मण्डली सहित इनके गाँव में पधारे । उनके सत्संग से ये प्रेमोपासना की ओर आकृष्ट हुए
श्री चतुर्भुजदास जी के सत्संग के प्रभाव से श्री नेह नागरीदास जी घर-बार त्यागकर वृन्दावन चले गए। साथ में इनकी कृपापात्री ओरछा की रानी भागमती भी गई। वहाँ जाकर दोनों राधावल्लभ आचार्य गोस्वामी वनचन्द्र जी से दीक्षा लेकर रस-साधना में प्रवृत्त हो गये।
श्री हितहरिवंश की वाणी तथा आराध्ययुगल के नित्य-विहार में इनकी अगाध आस्था थी। ये प्रतिदिन हितवाणी के किसी एक पद को उठा लेते और अहर्निश उसीकी भावना में मग्न रहते थे। हितवाणी के आगे इनको रासलीला तथा श्रीमद्भागवत की कथा भी फीकी लगती थी। वृन्दावन के कुछ रसभक्तिहीन उपासक इनके इस व्यवहार की आलोचना करते थे।
एक बार की बात है, गोस्वामी वनचंद्र जी के पुत्र श्री नागरवर गोस्वामी राधावल्लभ जी के मन्दिर में भागवत की कथा कह रहे थे। विरोधियों ने उनसे नागरीदास के कथा में सम्मिलित न होने की शिकायत की। इस पर नागरवर जी ने नागरीदास को बुलाकर कहा, 'आजकल दशम-स्कन्ध की कथा चल रही है। इसे तो आपको अवश्य श्रवण करना चाहिए। गुरु पुत्र की आज्ञा शिरोधार्य कर उस दिन नागरीदास जी कथा-मण्डप में उपस्थित हुए। धेनुकासुर-वध का प्रसंग चल रहा था। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण द्वारा धेनुकासुर के सहायक गधों का पैर पकड़ कर पटकने का वृत्तान्त सुना, ये अकुलाकर उठ खड़े हुए और उसी झोंक में बाहर चले गये। इनके इस आचरण से वहाँ उपस्थित सभी लोग खिन्न हो गये। दूसरे दिन जब गोस्वामी नागरवरजी ने इन्हें बुलाया और शपथ देकर कथा मण्डप से अकस्मात् उठ जाने का कारण पूछा तो ये बोले - 'उस समय मैं श्री हिताचार्य के एक पद की भावना में लीन था, जिसमें श्यामसुन्दर मानवती श्री राधा का सुन्दर चिबुक सहलाकर मनुहार कर रहे थे।
आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किशोर नवीन किसोरी।
हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपौ, विभ्रम विकल मानजुत भोरी॥
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधित, पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी।
नेति नेति वचनामृत सुनि सुनि, ललितादिक देखति दुरि चोरी।
हित हरिवंश करत कर धूनन, प्रणय कोप मालावलि तोरी॥
इसी बीच मेरे कानों में भगवान द्वारा धेनुकासुर के सहयोगी गधों के पैर पकड़ कर पटके जाने के शब्द पड़े। मन में विचार आया कि प्रिया की सुकोमल ठोढ़ी सहलाने वाले नागर के हस्त-कमल में गधे की टाँग कैसे शोभा देगी --
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधित,
तिनकर गदहनि पग क्यों सोभित।
अप्रत्याशित व्यवधान से मेरी मानसी भावना खंडित हो गई और मैं उद्विग्न होकर बाहर चला गया। इस स्पष्टीकरण से नागरीदास जी की उच्च आध्यात्मिक स्थिति का संधान पाकर गोस्वामी नागरवर जी ने इन्हें हृदय से लगा लिया।
बरसाने में इन्होंने गहवरवन की पहाड़ी पर अपनी कुटी बनाई जो आज मोर कुटी के नाम से प्रसिद्ध है।
कहा जाता है कि एक दिन यहीं सखियों सहित श्री राधाजी ने इन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया। स्वामिनी के तेजोमय दिव्यरूप पर दृष्टि पड़ते ही ये मूच्च्छित हो गये
नागरीदास जी ने परम हर्षित हो राधाजी को अर्द्धरात्रि में भोजन कराया और निशीथ-भोग (खीर और पूड़ि) के इस नियम का आजीवन निर्वाह करते रहे। राधाजी ने उस समय दूसरी बात बरसाने में अपना मन्दिर बनवाकर प्रति वर्ष जन्मोत्सव मनाने की कही थी। इसके परिपालनार्थ नागरीदास जी ने अपनी कृपापात्री रानी भागमती के सहयोग से वहाँ श्रीराधा-मन्दिर का निर्माण कराया और बड़ी धूमधाम से राधाष्टमीपर्व मनाने की परंपरा स्थापित की जो अब तक अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
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krishna behal
पौराणिक कथा : सती अनुसूया
(सम्पूर्ण मातृशक्ति का सम्मान बढ़ाया ।।)
अत्रि ऋषि की पत्नी और सती अनुसूया की कथा से अधिकांश धर्मालु परिचित हैं। उन की पति भक्ति की लोक प्रचलित और पौराणिक कथा है। जिसमें त्रिदेव ने उनकी परीक्षा लेने की सोची और बन गए नन्हे शिशु ...
एक बार नारदजी विचरण कर रहे थे तभ तीनों देवियां मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को परस्पर विमर्श करते देखा। तीनों देवियां अपने सतीत्व एवं मन की पवित्रता की चर्चा कर रही थी। नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण "पातिव्रत्य धर्म " के बारे में बताया। नारद जी बोले उनके समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। तीनों देवियों को मन में अनुसूया के प्रति ईर्ष्या होने लगी। तीनों देवियों ने सती अनसूया के पातिव्रत्य को खंडित करने के लिए अपने पतियों को कहा तीनों ने उन्हें बहुत समझाया पर पर वे राजी नहीं हुई।
इ स विशेष आग्रह पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनसूया के सतित्व और ब्रह्मशक्ति परखने की सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने यतियों का भेष धारण किया और अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे तथा भिक्षा मांगने लगे।
अतिथि-सत्कार की परंपरा ( मनुष्य यज्ञ ) के चलते सती अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत कर उन्हें खाने के लिए निमंत्रित किया। लेकिन यतियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा, ‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे।'
अनसूया असमंजस में पड़ गई कि इससे तो उनके पातिव्रत्य के खंडित होने का संकट है। उन्होंने मन ही मन ऋषि अत्रि का स्मरण किया। दिव्य शक्ति से उन्होंने जाना कि यह तो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।
मुस्कुराते हुए माता अनुसूया बोली 'जैसी आपकी इच्छा'.... तीनों यतियों पर जल छिड़क कर उन्हें तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व भाव ( सात्विक भाव ) उमड़ पड़ा। शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए।
अनसूया माता ने तीनों को झूले में सुलाकर कहा- ‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी।
उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा, एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर उड़ने लगा और एक राजहंस कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। यह नजारा देखकर नारद, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे।
नारद ने विनयपूर्वक अनसूया से कहा, ‘माते, अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर देखकर यह तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। यह अपने पतियों को ढूंढ रही थी। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।'
अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा, ‘माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं।'
लेकिन जब तीनों देवियों ने तीनों शिशुओं को देखा तो एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं।
नारद ने उनकी स्थिति जानकर उनसे पूछा- ‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लीजिए।'
देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया। वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। तीनों देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा याचना की और यह सच भी बताया कि उन्होंने ही परीक्षा लेने के लिए अपने पतियों को बाध्य किया था। फिर प्रार्थना की कि उनके पति को पुन: अपने स्वरूप में ले आए।
माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। तीनों देव सती अनसूया से प्रसन्न हो बोले, देवी ! वरदान मांगो।
त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं...
तभी से वह मां सती अनुसूया के नाम से प्रख्यात हुई तथा कालान्तर में भगवान दतात्रेय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म माता अनुसूया के गर्भ से हुआ। मतांतर से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्त तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ।
🌸💦🌸💦🌸💦🌸💦
2 months ago | [YT] | 3
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krishna behal
#जैमिनी_ज्योतिष के गुप्त द्वार: चर कारकों की रहस्यमयी कुंजी से #राजयोग तक का अनकहा सफर
कल्पना कीजिए, एक प्राचीन मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई सूत्रों की पंक्तियाँ, जहाँ नक्षत्रों की चमक तारों से कहीं गहरी रहस्य छिपाए हुए हो। पराशरी ज्योतिष की तरह यहाँ ग्रहों की स्थिरता नहीं, बल्कि चर गति का जादू है—एक ऐसी प्रणाली जो आत्मा के कारकों को जगाती है, आयु के सूत्र बुनती है, और करियर के पथ को राजसी सिंहासन की ओर मोड़ देती है। जैमिनी ज्योतिष, #महर्षि_जैमिनी के उपदेश सूत्रों से जन्मा यह रहस्यमय विज्ञान, पराशरी से अलग है क्योंकि यहाँ कारक चर होते हैं—ग्रहों की डिग्री पर आधारित, जो हर कुंडली में नया रूप धारण करते हैं।
यहाँ कोई स्थिर नक्षत्र-केंद्रित दशा नहीं, बल्कि चर दशा का प्रवाह है, जो जीवन की लहरों को पूर्वानुमानित करता है। लेकिन सावधान! इन सूत्रों की गहराई इतनी है कि आज भी अधिकांश ज्योतिषी केवल सतह छूते हैं। आइए, इस गहन शोध के माध्यम से, उपनिषदों की #ज्योतिषीय_व्याख्या और खगोलीय गणित के सूत्रों को उकेरें, उदाहरणों से रोशन करें, और तांत्रिक उपायों से समस्याओं का निवारण खोजें—एक ऐसा विश्लेषण जो अभी तक किसी ने न उजागर किया हो।
चर कारक: आत्मा के चंचल दूत, जो भाग्य के सूत्र बुनते हैं
जैमिनी सूत्रों के प्रथम अध्याय में, महर्षि कहते हैं: "अंशकाला विकलादीनां चरकारकनिर्णयः" (#जैमिनी_सूत्र 1.1.14)—अर्थात्, ग्रहों की अंश (डिग्री), कला (मिनट) और विकला (सेकंड) के आधार पर चर कारकों का निर्धारण। यहाँ सात या आठ कारक (राहु को शामिल कर) चर होते हैं, जो पराशरी के स्थिर कारकों से भिन्न हैं। सबसे ऊँचा डिग्री वाला ग्रह आत्मकारक (एके) बनता है—आत्मा का दूत, जो कर्म के गहन रहस्य को उजागर करता है। फिर #अमात्यकारक (एमके) करियर का संरक्षक, भ्रातृकारक (बीके) भाई-बहनों का, मातृकारक (एमके) माँ का, पुत्रकारक (पीके) संतान का, ग्नातिकारक (जीके) संघर्ष और आध्यात्मिक साधना का, तथा दाराकारक (डीके) जीवनसाथी का।
खगोलीय गणित की दृष्टि से, यह निर्धारण सूर्य सिद्धांत पर आधारित है: प्रत्येक ग्रह की ज्योतिषीय स्थिति (longitude) को 30° राशि में मापें। उदाहरणस्वरूप, यदि सूर्य 29°50' पर हो और मंगल 29°45' पर, तो सूर्य आत्मकारक बनेगा। यह गणना नवांश (D9) चार्ट में स्थानांतरित होकर करकांश लग्न बनाती है—आत्मकारक की राशि को जन्म कुंडली में लग्न मानें। #मंडूक्य उपनिषद की व्याख्या में, यह "ॐ" के चतुर् अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय) से जुड़ता है: आत्मकारक तुरीय अवस्था का प्रतीक है, जो माया से मुक्ति का द्वार खोलता है। शोध बताता है कि यदि केतु नवांश में आत्मकारक से 12वें या 4थे भाव में हो, तो मोक्ष योग बनता है—एक अनकहा रहस्य जो उपनिषदों की ज्योतिषीय परत को उकेरता है।
एक काल्पनिक लेकिन शोध-आधारित उदाहरण लीजिए: मान लीजिए किसी कुंडली में आत्मकारक शनि हो, नवांश में सिंह राशि में। #करकांश लग्न सिंह बन जाता है। यदि गुरु इससे 5वें भाव में दृष्टि डाले, तो राजयोग जन्म लेता है—व्यक्ति आध्यात्मिक गुरु या राजनेता बनेगा। लेकिन यदि राहु दृष्टि डाले, तो कर्म बंधन बढ़ेगा।
यह विश्लेषण पराशरी से गहरा है, क्योंकि यहाँ राशि दृष्टि (सभी राशियाँ समदृष्टि) का उपयोग होता है—चर राशियाँ पूर्ण, स्थिर द्वितीय-त्रतीय, द्विपद चतुर्थ।
विशेष लग्न: #होरा और #घटी—समय के छिपे हुए पहरेदार
#जैमिनी की यह प्रणाली विशेष लग्नों पर टिकी है, जो खगोलीय गणित से बुने जाते हैं। होरा लग्न (एचएल): सूर्योदय से जन्म समय तक सूर्य की गति को 15° प्रति घंटे मानकर गणना। सूत्र कहता है: "सूर्योदयाद् होरा लग्न" (1.2.10)—सूर्य की स्थिति से होरा लग्न निकालें। यदि जन्म रात्रि का हो, चंद्रमा की स्थिति जोड़ें। खगोलीय रूप से, यह #सूर्य सिद्धांत के अनुसार: लंबitude (λ) = सूर्य की ecliptic longitude + (जन्म समय - सूर्योदय) × 15°/घंटा।
घटी लग्न (जीएल) और भी रहस्यमय: यह आयु निर्धारण का द्वार है।
गणना: घटी (24 मिनट) इकाई में, सूर्योदय से जन्म तक की दूरी × 120 (क्योंकि 5 घंटे = 12.5 घटी, लेकिन जैमिनी सूत्र में "घटिका लग्न पञ्चमात्" 1.2.15)। एक अनोखा शोध: यदि घटी लग्न को उपनिषदों के "प्राण" से जोड़ें (#प्रश्नोपनिषद्, प्राण की गति), तो यह जीवन शक्ति का माप बन जाता है। उदाहरण: यदि घटी लग्न मेष में हो और मंगल exalted हो, तो दीर्घायु (पूर्णायु) योग—व्यक्ति 100 वर्ष जीवित रहेगा, लेकिन राहु की दृष्टि से मध्यायु में संकट।
ये लग्न #राजयोग के लिए कुंजी हैं। यदि एक ग्रह होरा, घटी और जन्म लग्न को दृष्टि डाले, तो "राजा समो भवति" (जैमिनी सूत्र 1.3.5)—व्यक्ति राजा तुल्य बनेगा। एक गहन उदाहरण: स्वामी विवेकानंद की कुंडली में आत्मकारक सूर्य, शनि भ्रातृकारक के साथ 10वें भाव में—चर दृष्टि से राजयोग, जो उनके आध्यात्मिक साम्राज्य को जन्म देता है। लेकिन पराशरी में यह सामान्य लगता; #जैमिनी में यह आत्मा का उदय है।
#राजयोग: सिंहासन का गुप्त सूत्र, उपनिषदों की छाया में
राजयोग जैमिनी में आत्मकारक और पंचमेश (5वें भाव स्वामी) के संयोग से बनता है। सूत्र: "आत्मकारक पञ्चमेश योगः राजयोगः" (1.3.2)—यदि दोनों exalted या केंद्र में, तो राज्य प्राप्ति। खगोलीय गणना: दोनों की longitude अंतर <180°, और नवांश में संयोजन। उपनिषद ज्योतिष शास्त्र से उदाहरण: #बृहदारण्यक उपनिषद् (3.8.11) में "आत्मा राजा सर्वस्य" का अर्थ आत्मकारक से जोड़ें—यह योग आत्मा को राजा बनाता है।
शोधात्मक विश्लेषण: यदि करकांश लग्न में गुरु-शनि योग हो, तो धन राजयोग—व्यक्ति धनी राजा बनेगा। लेकिन एक अनकहा रहस्य: यदि यह योग 8वें भाव में हो, तो "#विष_योग" जैसा, जहाँ सफलता मृत्यु का द्वार खोलती है। उदाहरण: राजीव गांधी की कुंडली में आत्मकारक-मातृकारक संयोग, लेकिन घटी लग्न से संकट—1980 के दशक में चर दशा ने राजयोग दिया, परंतु 1991 में अंत। यह पराशरी से भिन्न, जहाँ दशा स्थिर; जैमिनी में चर प्रवाह रहस्यमय है।
#आयु_निर्धारण: जीवन की घड़ी, जो उपनिषदों से गूंजती है
जैमिनी में आयु तीन प्रकार: #अल्पायु (0-32 वर्ष), #मध्यायु (32-64), #पूर्णायु (64+)। सूत्र: "रुद्र माहेश्वर ब्रह्म राशयः" (2.3.10)—रुद्र राशियाँ (मेष आदि) अल्प, ब्रह्म (कर्क आदि) पूर्ण। गणना: घटी लग्न से द्वार राशि निकालें—सूर्योदय से जन्म दूरी × 5 (पंचम सूत्र)। खगोलीय: sidereal time को घटी में बदलें।
उपनिषद से श्लोक उदाहरण: तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1) "मृत्योर्मा अमृतं गमय" को घटी लग्न से जोड़ें—यदि केतु 12वें से दृष्टि, तो अमृत (दीर्घायु)। शोध: यदि आत्मकारक exalted हो, तो +20 वर्ष जोड़ें। समस्या: #अल्पायु योग में संकट। तांत्रिक उपाय: काल भैरव तंत्र से "रुद्राक्ष माला पर शनि होम"—शनिवार को 108 बार "ॐ भैरवाय नमः" जपें, काले तिल दाहें। यह आयु वृद्धि का गुप्त मंत्र है, जो जैमिनी के विष योग को शांत करता है।
करियर: अमात्यकारक का साम्राज्य, रहस्यमय उदय
करियर के लिए #अमात्यकारक (दूसरा उच्च डिग्री ग्रह) कुंजी। सूत्र: "अमात्यकारक दशमस्थः राजा भवति" (1.4.5)—यदि 10वें भाव में, तो राजसी पद। गणना: अमात्यकी longitude से चर दशा चलाएं—प्रत्येक राशि 12 वर्ष, लेकिन संतान/संबंधी राशियों में कटौती। उदाहरण: यदि अमात्य मंगल हो, करकांश से 10वें में, तो योद्धा/नेता करियर। शोध: उपनिषदों में "#कर्म_ब्रह्म" (ईश उपनिषद् 1) को अमात्य से जोड़ें—यह कर्म का राजा है।
एक अनोखा विश्लेषण: यदि अमात्य-आत्मक संयोजन हो, लेकिन राहु दृष्टि, तो करियर में विश्वासघात। उदाहरण: संजय गांधी की कुंडली में अमात्य कमजोर, चर दशा में पतन। समस्या निवारण: तांत्रिक उपाय—#कामाख्या तंत्र से "शुक्रवार को लाल चंदन का तिलक, 'ॐ ह्रीं कामेश्वराय नमः' 21 बार"—करियर बाधा दूर, राजयोग सक्रिय।
तांत्रिक उपाय: समस्याओं के अंधेरे को रोशनी का स्पर्श
जैमिनी की समस्याएँ—जैसे कमजोर आत्मकारक से आत्मिक संकट—तांत्रिकों से हल होती हैं। राजयोग के लिए: अग्नि तंत्र से "सूर्य को अर्घ्य, 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' 108 बार"—सफलता का द्वार खुलता। आयु के लिए: काली तंत्र "महाकाली यंत्र स्थापना, रात्रि जप"—मृत्यु भय शांत। करियर: #दुर्गा_सप्तशती से "अमात्य ग्रह के बीज मंत्र"—धन-प्रतिष्ठा वृद्धि।
ये उपाय उपनिषदों के "तपः" से प्रेरित, रहस्यमय और प्रभावी।
इस गहन यात्रा में, जैमिनी ज्योतिष आत्मा का दर्पण बन जाता है—एक ऐसा विज्ञान जो न केवल #भविष्य बताता, बल्कि कर्म के गुप्त द्वार खोलता है। क्या आप तैयार हैं, इस रहस्य को अपनाने को? सितारों की पुकार सुनिए, और जीवन का राजा बनिए।
3 months ago | [YT] | 3
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krishna behal
भगवान का गुप्त स्थान....!!
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कि कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता है
तब मेरे पास भागा-भागा आता है और मुझे सिर्फ अपनी परेशानियां बताने लगता है,मेरे पास आकर कभी भी अपने सुख या अपनी संतुष्टि की बात नहीं करता मेरे से कुछ न कुछ मांगने लगता है!
अंतत: भगवान ने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- कि हे देवो, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं
जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं
न ही शास्वत स्वरूप में रह कर साधना कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।
प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट करने शुरू किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं।
उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि आप किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।
भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- "क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं"।
अंत में सूर्य देव बोले- प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, क्योंकि मनुष्य बाहर की प्रकृति की तरफ को देखता है
दूसरों की तरफ को देखता है खुद के हृदय के अंदर कभी झांक कर नहीं देखता इसलिए वह यहाँ आपको कदापि तलाश नहीं करेगा।
करोड़ों में कोई एक जो आपको अपने ह्रदय में तलाश करेगा वह आपसे शिकायत करने लायक नहीं रहेगा क्योंकि उसकी बाहरी इच्छा शक्ति खत्म हो चुकी होगी ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई।
उन्होंने ऐसा ही किया और भगवान हमेशा के लिए मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।
उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, पर्वत पहाड़ कंदरा गुफा ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।
परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर ईश्वर को ढूंढने की कोशिश नहीं करता है
इसलिए मनुष्य "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता और ईश्वर को पाने के चक्कर में दर-दर घूमता है पर अपने ह्रदय के दरवाजे को खोल कर नहीं देख पाता।
4 months ago | [YT] | 5
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krishna behal
श्रीकृष्ण का गोपियों से दधि का दान मांगना..
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भगवान श्रीकृष्ण का व्रज में आनन्द-अवतार है। उनकी व्रज की लीलाएं भक्तों को आनन्द और प्रेम बांटने के लिए हुईं हैं। इसी कारण नन्दरायजी के यहां नौ लाख गायें होने पर भी वे गोपियों से कहते हैं..
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ग्वालिनी मीठी तेरी छाछ।
कहा दूध में मेलि जमायो सांचि कहुं किन बाछि।।
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द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों के साथ बरसाना और चिकसौली के मध्य ‘सांकरी खोर’ नामक संकरी गली में तथा गोवर्धन स्थित ‘दानघाटी’ में गोपियों से दही-माखन का दान लिया था। इसी स्थान पर श्रीकृष्ण ने व्रजगोपियों को अपना गौरस (दूध, दही, माखन, छाछ) मथुरा जाकर बेचने से रोका था। भगवान श्रीकृष्ण की इस लीला का उद्देश्य था.. व्रजवासियों का दूध-दही-माखन व्रजवासी ही खाएं और बलिष्ठ बनें। व्रज का गौरस कंस और उसके अत्याचारियों को ना मिले।
बरसाने की गोपियों से गौरस का दान लेने के लिए श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ उनका मार्ग रोकते थे। आइये इस लीला की मिठास का अनुभव कीजिये। .
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बरसाने की ओर से श्रीराधा रानी अपनी सखियों के साथ आपस में बतियाती-इठलाती सिर पर दधि-माखन की चिकनी-चुपड़ी मटुकियों को रखकर दानघाटी की ओर चली आ रहीं हैं।
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काले-कजरारे नुकीले नयनों में कटीला कजरा डाले, माथे पर लाल-लाल बड़ी-सी बिन्दी, गोरे-गोरे सुडौल शरीर पर घुमेरदार रंगरगीला लहंगा और उस पर लहराती-फहराती टेसू के फूलों के रंग में रंगी चुनरी, घूंघट में से झांकती तिरछी चितवन।
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ऐसा लग रहा था मानो रंग-बिरंगी घटाएं आकाश से उतरकर व्रज की हरियाली धरती पर उमड़ती-घुमड़ती चली आ रहीं हैं।
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सोने और चांदी के आभूषणों से लरकती-मटकती ये गोपियां जब कान्हा और उसकी टोली के भय से जल्दी-जल्दी कदम बढ़ातीं तो इनके कंगनों, कमर की कौंधनियों और पैरों में पहनी झांझर-बिछुओं की रुनझुन कदम्बवृक्ष पर बैठे कन्हैया के कानों में एक अपूर्व माधुर्यरस उडेल देती और वे अपने सखाओं को पुकार उठते..
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आओ आओ रे सखा,
घेरौ घेरौ रे सखा।
दही लैके ग्वालिन जाय रही,
सब गोपी चलीं न जाय कहीं।
दूध दही के माट भरे हैं,
माखन अपने सीस धरे हैं।
मैंने जानी रे सखा,
पहचानी रे सखा।
सौंधी-सी सुगन्ध है आय रहीं,
सब गोपी चलीं न जाय कहीं।।
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कान्हा अपने सखाओं को शीघ्रता से गोपियों को घेर लेने के लिए पुकारते.. ’अरे ओ सुबल ! अरे सुदामा ! ओ मधुमंगल ! धाऔ धाऔ (दौड़ो दौड़ो), कहीं ये ग्वालिन निकसि न जायं ( दूर न चली जाएं)। इनकी राह में अपनी-अपनी लकुटियां कूं टेक देओ (अपनी-अपनी लकड़ी से इनका रास्ता रोक दो)।
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श्रीकृष्ण के इतना कहते ही सभी सखाओं की टोली यहां-वहां से लदर-पदर आ निकली। उस समय की नयनाभिराम झांकी का वर्णन बड़ा ही रसमय और मन को गुदगुदाने वाला है..
एक तरफ तो सकुचाता-लजाता, गोरस की मटकियों को सिर पर रखे कुछ ठगा-सा, कुछ भयभीत पर कान्हा की रूपराशि पर मोहित व्रजवनिताओं का झुण्ड और दूसरी ओर चंदन और गेरु से मुख पर तरह-तरह की पत्रावलियां बनाए, कानों में रंग-बिरंगे पुष्पों के गुच्छे लटकाए, गले में गुंजा की माला पहने, हरे-गुलाबी अगरखा (छोटा कुर्ता) पर कमर में रंग-बिरंगे सितारों से झिलमिलाते फेंटा कसे, मोरपंखों से सजी लकुटिया (बेंत) लिये ग्वालबालों सहित श्रीकृष्ण का टोल (दल)।
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श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों के साथ गोपवधुओं को चारों ओर से घेर लिया और उनके आगे पैर रखकर खड़े हो गए।
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तभी एक ग्वालिन चित्रासखी ने हिम्मत करते हुए कान्हा से कहा.. ’क्यों जी! क्या बात है हमारी गैल (रास्ता) क्यों रोकौ हौ?
दूध दही नाय तेरे बाप की और यह गली नाय तेरे बाप की, छाछ हमारी वो पीवै जो टहल करै सब दिना की।’
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.जबाव में कान्हा ने कहा.. ’या दानघाटी पर हमारौ दान होय है। चतुराई त्यागौ और दान दै जाओ।’
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ब्रजेन्द्रनन्दन का इतना कहना था कि तपाक से एक चतुर ग्वालिन चन्द्रावली ने उत्तर दिया.. ’अजी दान काहे बात कौ? यहां के राजा तो श्रीवृषभानुजी हैं। हटौ हमारी रस्ता छोड़ौ, नहीं तो मथुरा में जाय कै कंस से कहि दीनी जाएगी। सबरी खबर परि जाएगी लाला कूं। दान देओ जाय दान (दान दो इसको दान)।’
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तभी दूसरी गोपी बोली..
’हे मनमोहन! मैं बरसाने की ग्वालिन हूँ, मुझसे बेकार में झगड़ा मत कर। तूने केवल पांच टके का कम्बल ओढ़ रखा है, उस पर इतना घमण्ड! तुम नन्दबाबा की गाय चराते हो और मुझसे दान मांगते हो ! देखो लाला ! हाथापाई करोगे तो तुम जानो। हीरों से जड़ी ये मेरी ईडुरी (सिर पर मटकी रखने के लिए गोल पहिया जैसा) है जिसमें करोड़ों के हीरे लगे हैं, यदि इसमें से एक भी निकल कर कहीं गिर गया तो देख लेना। तुम्हारी सब गायों की कीमत भी इतनी नहीं होगी।’
कन्हैया ने कहा.. ’तू बाबरी क्या जाने, मैं तो त्रिलोकी का राजा हूँ। जड़, जीव, जल-थल सबमें मैं समाया हुआ हूँ। ब्रह्मा, शंकर, सनकादि ऋषि भी मेरा पार नहीं पाते। तू गंवार ग्वालिन मुझे क्या समझाती है। मैं अपने भक्तों की रक्षा और दुष्टों का संहार करता हूँ। कंस के तो केश पकड़ कर मैं पृथ्वी का भार उतार दूंगा। ब्रह्मारूप में सृजन, शिवरूप में संहार और विष्णुरूप में जगत की रक्षा... मैं नन्दकुमार ही करता हूँ।’
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गोपी कंस के नाम पर कन्हैया को धमकाती है..
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इस पर एक सखा बोला.. ’कन्हैया! बात बनाना तो इस गोपी को बहुत आता है। कन्हैया! तू सुन रहा है ये गोपी क्या कह रही है?’
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कन्हैया ने अपने साथी की बात सुनकर गोपी से कहा.. ’अच्छा तो तू धोंस दे रही है और वो भी उस कंस की।’ कंस की धोंस भला कन्हैया को कैसे सहन होती।
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कन्हैया ने कहा–‘मैं गौओं की शपथ खाकर कहता हूँ, उस कंस को मैं उसके बंधु-बांधवों सहित मार डालूंगा।’ बस होने लगी दोनों में परस्पर मधुर ऐंचातानी (खींचतान)..
और छैल-छबीले कन्हैया ने एक हाथ से ग्वालिन का कंगन और दूसरे से आंचल पकड़ लिया और बोले कि बहुत दिनों तक तुम सब ग्वालिन दान देने से बच गयीं पर आज मैं पूरा हिसाब करुंगा..
गोपी ने कन्हैया को ताना मारते हुए कहा.. ’नंदबाबा भी गोरे हैं और जसुमति मैया भी गोरी हैं, तुम इन्हीं लक्षणों (करतूतों) के कारण सांवरे हो।’
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कान्हा से पीछा छूटता न दिखने पर एक चतुर गोपी बोली.. ’मेरे कन्हैया ! हम तुम पर बलिहारी जाती हैं। कल हम बहुत सारा गौरस लेकर आयेंगी तब तुम्हें चखायेंगी। हमारे जीवनधन! आज हमें जाने दो।’ पर कन्हैया जब पकड़ता है तब क्या कोई सरलता से छूट सकता है?
कन्हैया ने गोपी से कहा..
हमें तुम पर विश्वास नहीं है। तुम्हारे गौरस को चखने के लिए मेरा मन बहुत ललचा रहा है। हाथ में आये अमृत को छोड़कर कल की आशा करना व्यर्थ है। पूर्ण चन्द्र को पाकर चकोर धैर्यवान बना रहे, यह तो असम्भव है!
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हुआ भी वही.. नयनों से नयनों का मिलन हुआ। यह सांकरी खोर श्रीप्रिया-प्रियतम के प्रेमरस की लूट की अनोखी दान स्थली बन गयी, जहां श्यामसुन्दर अपनी प्यारीजू और उनकी सखियों को दान के लिए रोका करते थे।
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गोपियां आपस में कहने लगीं.. ’यह नन्द का लाला तो बड़ा ढीट और निडर है। गांव में तो निर्बल बना रहता है और वन में आकर निरंकुश बन जाता है। हम आज ही चलकर यशोदाजी से इसकी करतूत कहती हैं।’ पर मन-ही-मन अपने प्यारे कन्हैया के प्रेम में मग्न होकर उनके आगे समर्पण करती हुई कहती हैं..
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तुम त्रिभुवन के नाथ जोई करो सो जिय भावे।
तिहारे गुन अरु कर्म कछु हम कहत न आवे।।
मटकी आगे धरी परी स्याम के पाय।
मन भावे सो लीजिए बचे सो बेचन जाय।।
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नन्दनन्दन ने ग्वालबालों के साथ सबके दहीपात्र भूमि पर पटक दिए। फिर श्रीकृष्ण और सखाओं ने कदम्ब व पलाश के पत्तों के दोने बनाकर टूटे पात्रों से दही लेकर खाया।
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तब से वहां के वृक्षों के पत्ते दोने के आकार के होने लग गए और यह जगह ‘द्रोण’ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। आज भी यहां दही दान करके स्वयं भी पत्ते में रखकर दही खाना बहुत पुण्यमय माना जाता है।
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भगवान श्रीकृष्ण की दानलीला भक्तों को परमसुख देने वाली है। हिंदी साहित्य के तमाम कृष्णभक्त कवियों ने इस लीला को और भी सजीव बना दिया है। इस लीला को पढ़ने में जितना आनंद प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक देखने और सुनने से मिलता है। सांकरी खोर नामक स्थान पर इस लीला का आयोजन किया जाता है।बरसाना के लोग राधाजी का, चिकसौली के लोग चित्रासखी का और नंदगांव के लोग श्रीकृष्ण और ग्वालों का प्रतिनिधित्व करते हुए सांकरी खोर पर पहुंचते हैं। लीला का आयोजन किया जाता है। चित्रासखी के गांव से आई मटकी पर नंदगांव के ग्वाल टूट पड़ते हैं। छीनाझपटी में मटकी टूट जाती है।
श्रद्धालुओं में मटकी प्रसाद की होड़ लग जाती है।
4 months ago | [YT] | 3
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krishna behal
बरसाने की कुंजों की कृपा
बरसाने की एक सुगंधित बगिया में राधारानी अपने सखी संग बैठी थीं। आकाश में मंद पवन बह रही थी और वृंदावन के हर पुष्प में मानो श्याम का ही नाम झूम रहा था। राधा जी के हाथ में एक गुलाबी कमल खिला हुआ था। वह कमल उनके ही हृदय जैसा निर्मल और कोमल प्रतीत हो रहा था।
राधारानी उस बगिया के बीच एक शिला पर विराजमान थीं। नीले रंग की साड़ी, लाल ओढ़नी, गले में पुष्पों की माला और हाथों में कंगन की मधुर झंकार — वे दृश्य ऐसा लग रहा था मानो स्वयं भक्ति का सागर मूर्त रूप धरकर बैठा हो। उनके हाथ में एक खिला हुआ कमल था।
पास ही घुटनों के बल बैठी थी उनकी सखी।
उसकी आँखें भक्ति के अश्रुओं से भीग रही थीं। वह अपने दोनों हाथों से राधारानी का आँचल थामे बैठी थी, मानो कह रही हो —
"प्राण भी यदि छूट जाए, पर यह आँचल कभी न छूटे।"
उसकी आँखों में अपार प्रेम और समर्पण झलक रहा था। वह अपने हृदय की सारी व्याकुलता, सारी थकान भूलकर बस राधा को निहार रही थी।
राधारानी मुस्कुराती हुई उस सखी के सिर पर हाथ फेरने लगीं। उनके स्पर्श में इतनी करुणा और माधुर्य था कि मानो सखी को सम्पूर्ण जगत का सुख मिल गया हो।
“हे सखी! यह कमल देखती है? यह कीचड़ में जन्मा है, फिर भी निर्मल और सुगंधमयी है। ऐसे ही भक्त भी संसार रूपी कीचड़ में रहते हुए भी अपने हृदय को निर्मल रखते हैं। यही तो सच्चा प्रेम है, यही तो सच्ची भक्ति है।”
"वैसे ही हमारी भक्ति भी संसार के झंझटों में रहकर शुद्ध बनी रहनी चाहिए। प्रेम में कोई स्वार्थ न हो, तभी कृष्ण उसमें बसते हैं।"
राधारानी ने करुणा से भरे अपने हाथ उस सखी के सिर पर रख दिए। उस स्पर्श से सखी का सम्पूर्ण शरीर रोमांचित हो उठा।
राधा ने कहा —
“सखी! जान ले, श्याम के हृदय तक पहुँचने का मार्ग मेरे आँचल से होकर ही जाता है। जो मुझे पा लेता है, उसे कृष्ण अपने आप मिल जाते हैं। और तेरे इन आँसुओं ने आज मुझे बाँध लिया है। अब तू मेरे बिना कभी न रह पाएगी, और मैं तेरे बिना।”
लाड़ली सखी से बोली —
"ललिता, विशाखा, और सब गोपियों से बढ़कर मेरे लिए तुम हो, क्योंकि तुमने मेरे श्याम के लिए अपना हृदय पूरी तरह खाली कर दिया है। जिस सखी का मन केवल कृष्ण-कृष्ण करता है, वही सच्ची राधा की प्रिय सखी बन सकती है।"
सखी ने भावविभोर होकर राधा के चरणों पर सिर रख दिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे — पर वे आँसू दुःख के नहीं, वरन् राधा की करुणा के थे।
बरसाने की उस बगिया में उस क्षण सारा वातावरण गूंज उठा —
"राधे राधे श्याम मिले तो जीवन धन्य हो जाए।"
और कहते हैं, जो भी सखी-भाव से राधारानी की शरण में जाता है, वह ऐसा ही सुख अनुभव करता है जैसा इस चित्र में दिख रहा है — राधा की गोदी, राधा की करुणा और राधा का अमृतमय प्रेम। 🌸
सखी की आँखें बंद हो गईं, और उसने अनुभव किया —
"यही वैकुंठ है, यही स्वर्ग है। राधा की गोदी में बैठकर भक्ति करना ही सबसे बड़ा सुख है।"
4 months ago | [YT] | 1
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krishna behal
भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है, क्योंकि उन्होंने यह शिक्षा दी कि ज्ञान किसी भी स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए, जिनमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और विभिन्न जीव-जंतु भी शामिल थे। इन सभी से उन्होंने कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सीखा। यह दर्शाता है कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती और हर चीज में हमें गुरु तत्व दिख सकता है, बशर्ते हमारे पास विवेक और जिज्ञासा हो।
आइए जानते हैं भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे मिली शिक्षाएँ:
दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे प्राप्त शिक्षाएँ
* पृथ्वी: पृथ्वी से दत्तात्रेय ने सहनशीलता, क्षमा और परोपकार की शिक्षा ली। पृथ्वी सभी जीवों का भार सहन करती है और बिना किसी भेदभाव के उन्हें आश्रय और पोषण देती है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को संसार के सुख-दुख को सहन करते हुए, अपनी प्रकृति में दृढ़ रहना चाहिए और दूसरों का भला करना चाहिए।
* वायु: वायु हर जगह मौजूद होती है, लेकिन किसी से चिपकती नहीं। इससे उन्होंने निर्लिप्तता और अनासक्ति सीखी। जिस प्रकार वायु अच्छी-बुरी गंध से अप्रभावित रहती है, उसी प्रकार ज्ञानी को भी संसार के भोगों और दोषों से अप्रभावित रहना चाहिए।
* आकाश: आकाश सर्वव्यापी है और किसी भी चीज से दूषित नहीं होता। इससे दत्तात्रेय ने असंगता और निराकारता का ज्ञान प्राप्त किया। आत्मा भी आकाश की तरह सर्वव्यापी, असंग और शुद्ध है।
* जल: जल स्वाभाविक रूप से पवित्र और शुद्ध होता है, और दूसरों को भी पवित्र करता है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को स्वयं शुद्ध होकर दूसरों को भी पवित्रता की प्रेरणा देनी चाहिए।
* अग्नि: अग्नि जिस भी वस्तु को ग्रहण करती है, उसे स्वयं में समाहित कर लेती है और पवित्र कर देती है। इससे उन्होंने प्रकाश, तेज और समदर्शिता की शिक्षा ली। जिस प्रकार अग्नि चाहे किसी भी वस्तु को जलाए, उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता, वैसे ही ज्ञानी को भी सभी अवस्थाओं में एक समान रहना चाहिए।
* चंद्रमा: चंद्रमा अपनी कलाओं को घटाता-बढ़ाता है, लेकिन उसका मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि शरीर का जन्म, विकास, क्षय और मृत्यु तो होती है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है।
* सूर्य: सूर्य एक होते हुए भी विभिन्न पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, और अपने प्रकाश से सभी को प्रकाशित करता है। इससे उन्होंने आत्मा की एकता और प्रकाश का ज्ञान प्राप्त किया।
* कबूतर: एक कबूतर जोड़ा अपने बच्चों के अत्यधिक मोह में इतना अंधा हो जाता है कि वह शिकारी के जाल में फंस जाता है। इससे दत्तात्रेय ने अत्यधिक मोह और आसक्ति से होने वाले दुखों को सीखा।
* अजगर: अजगर बिना किसी प्रयास के जो कुछ भी मिल जाए, उसी में संतोष करता है और बिना चले उसी स्थान पर रहता है। इससे उन्होंने संतोष, धैर्य और अपरिग्रह की शिक्षा ली।
* समुद्र: समुद्र की नदियाँ हमेशा भरती रहती हैं, लेकिन वह कभी अपनी सीमा नहीं लांघता। इससे दत्तात्रेय ने शांत मन, स्थिरता और असीम गहराई का पाठ पढ़ा। ज्ञानी का मन भी समुद्र की तरह शांत और गहरा होना चाहिए।
* पतंगा: पतंगा आग की लौ के प्रति इतना आकर्षित होता है कि स्वयं को जला लेता है। इससे दत्तात्रेय ने भौतिक इच्छाओं और इंद्रियों के वश में होने से होने वाले विनाश को समझा।
* मधुमक्खी: मधुमक्खी विभिन्न फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस इकट्ठा करती है, और भिक्षुक भी अलग-अलग घरों से थोड़ा-थोड़ा भोजन ग्रहण करता है। इससे उन्होंने थोड़ा-थोड़ा संग्रह करने और आवश्यकतानुसार ग्रहण करने की शिक्षा ली। (यह भी सीखा कि अधिक संचय विपत्ति का कारण बन सकता है, जैसे मधुमक्खी का शहद छीन लिया जाता है)।
* हाथी: हाथी मादा हाथी के मोह में फंसकर बंदी बना लिया जाता है। इससे दत्तात्रेय ने इंद्रिय-भोग, विशेषकर कामवासना से होने वाले पतन को सीखा।
* हिरण: हिरण मधुर संगीत पर मोहित होकर शिकारी का शिकार बन जाता है। इससे उन्होंने शब्द (श्रवण) इंद्रिय के प्रति अधिक आसक्ति से होने वाले खतरे को समझा।
* मछली: मछली कांटे में फँस जाती है, क्योंकि वह स्वाद के लालच को नहीं छोड़ पाती। इससे उन्होंने जिह्वा (स्वाद) इंद्रिय के वश में होने से होने वाले बंधन को सीखा।
* पिंगला वेश्या: एक वेश्या (पिंगला) रात भर एक धनी ग्राहक का इंतजार करती रही, लेकिन कोई नहीं आया। अंत में, उसने सभी आशाएँ त्याग दीं और ईश्वर में मन लगाया, जिससे उसे परम शांति मिली। इससे दत्तात्रेय ने निराशा से वैराग्य और सच्ची शांति की शिक्षा ली।
* कुरर पक्षी: कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का टुकड़ा लेकर उड़ रहा था, जिसे देखकर दूसरे पक्षी उसका पीछा कर रहे थे। जब उसने मांस का टुकड़ा छोड़ दिया, तो उसे शांति मिली। इससे उन्होंने अपरिग्रह (संग्रह न करना) और त्याग से मिलने वाली शांति का महत्व सीखा।
* बालक (शिशु): एक बालक हमेशा आनंदमय, चिंतामुक्त और निरपेक्ष होता है। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि व्यक्ति को संसार की चिंताओं से मुक्त होकर सहज आनंद में रहना चाहिए।
* कुमारी कन्या: एक अकेली कुमारी कन्या धान कूट रही थी। जब उसकी चूड़ियाँ बजने लगीं तो उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक ही पहनी रखी, जिससे शोर न हो। इससे दत्तात्रेय ने सीखा कि एकान्त में रहकर ध्यान करना चाहिए और अत्यधिक संगति से बचना चाहिए, क्योंकि अधिक लोग होने पर अनावश्यक विवाद या शोर हो सकता है।
* बाण बनाने वाला (तीरंदाज): एक तीरंदाज बाण बनाने में इतना तल्लीन था कि उसे पास से गुजरती हुई एक बारात का भी आभास नहीं हुआ। इससे दत्तात्रेय ने एकाग्रता और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की शिक्षा ली।
* सर्प (साँप): साँप किसी एक घर में नहीं रहता, बल्कि बिना घर बनाए बिलों में रहता है और अपने लिए कुछ भी इकट्ठा नहीं करता। इससे उन्होंने अनासक्ति, अपरिग्रह और बिना किसी स्थायी निवास के विचरने की शिक्षा ली।
* मकड़ी: मकड़ी अपने भीतर से ही जाल बुनती है और फिर उसी में स्वयं को बांध लेती है, या उसे तोड़कर बाहर निकल जाती है। इससे दत्तात्रेय ने ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना और संहार का रहस्य और योगियों द्वारा माया से मुक्ति का मार्ग समझा।
* भृंगी (भौंरा): भृंगी एक छोटे कीड़े (इल्ली) को अपने बिल में लाकर उसे बार-बार डंक मारता है, जिससे वह कीड़ा भी भृंगी जैसा बन जाता है। इससे उन्होंने ध्याता (ध्यान करने वाला) और ध्येय (जिसका ध्यान किया जा रहा है) के एक हो जाने के सिद्धांत को समझा (जैसा सोचोगे, वैसे बन जाओगे)।
* शरीर: स्वयं अपने शरीर से दत्तात्रेय ने सीखा कि यह नाशवान है और इसे अत्यधिक महत्व नहीं देना चाहिए। यह केवल आत्मा का एक अस्थायी वाहन है और यह दुख का मूल भी हो सकता है। इससे उन्होंने वैराग्य और आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा ली।
दत्तात्रेय का यह अद्वितीय दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि ज्ञान का कोई निश्चित स्रोत नहीं है। एक सच्चा जिज्ञासु व्यक्ति हर छोटी-बड़ी घटना, हर प्राणी और प्रकृति के हर कण से जीवन के गूढ़ रहस्यों को सीख सकता है। यह उनकी अवधूत स्थिति को दर्शाता है, जिसमें वह सभी बंधनों से मुक्त होकर, हर अनुभव से सीखते हुए परम ज्ञान को प्राप्त करते हैं।
6 months ago | [YT] | 5
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krishna behal
!! देवशयनी एकादशी !! → 6th July, 2025 (रविवार )
युधिष्ठिर ने पूछा : भगवन् ! आषाढ़ के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसका नाम और विधि क्या है? यह बतलाने की कृपा करें ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘शयनी’ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ । वह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, सब पापों को हरनेवाली तथा उत्तम व्रत है ।
आषाढ़ शुक्लपक्ष में ‘शयनी एकादशी’ के दिन जिन्होंने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान विष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया ।
‘हरिशयनी एकादशी’ के दिन मेरा एक स्वरुप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भलीभाँति धर्म का आचरण करना चाहिए ।
जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए ।ऐसा करनेवाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं ।
राजन् ! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वपापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय रहनेवाला है । जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते हैं, वे मेरे प्रिय हैं । चौमासे में भगवान विष्णु सोये रहते हैं, इसलिए मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए ।
सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए । जो चौमसे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है ।
राजन् ! एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, अत: सदा इसका व्रत करना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए ।🙏🙏
6 months ago | [YT] | 5
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