AHVAAN - Call Of Dharma

सभी महानुभावों को जय श्रीराम, यह चैनल हमने मनुष्य के एकमात्र धर्म सनातन के प्रति हो रहे अन्यायपूर्ण कृत्यों के प्रतिकार स्वरूप बनाया है ।

सनातन धर्म के प्रमाणिक शास्त्र-सम्मत एवं सार्वभौम सिद्धान्तों द्वारा समाज में व्याप्त विभिन्न मत-मतान्तर तथा भ्रॉंतियों को समाप्त करते हुए हिन्दुओं को सङ्गठित कर सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, संपन्न, सेवापरायण, स्वस्थ, सर्वहितप्रद व्यक्ति व समाज की संरचना, तदानुसार सबके हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा ही हमारा उद्देश्य है ।

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॥धर्मेण हीना: पशुभि: समाना:॥


AHVAAN - Call Of Dharma

📢 महत्वपूर्ण सूचना – आह्वान धर्म रक्षार्थ

हमारी फिल्म "भगवान तो भाव के भूखे हैं | When Dharma meets Dharmabhaas | A Film by Ahvaan" कुछ तकनीकी कारणोंवश आज निर्धारित समय पर रिलीज़ नहीं हो सकी।

अतः आप सभी से क्षमाप्रार्थी हैं। अब यह फिल्म अगले रविवार को रिलीज़ की जाएगी।

आपके प्रेम, धैर्य एवं सहयोग के लिए हृदय से धन्यवाद। कृपया अपना स्नेह और समर्थन बनाए रखें।

– आह्वान धर्म रक्षार्थ

20 hours ago | [YT] | 22

AHVAAN - Call Of Dharma

हमें हाथी पर बैठकर हमारी विजय का ढिंढोरा नहीं पीटना पड़ता। छद्म सनातनाभासी पाखंडियों को स्वयं ही हमारी विजयगाथा का प्रचार करने हेतु विवश होना पड़ता है। परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष हमारे नाम 1 से 2 फतवे तो जारी कर ही देते हैं।

ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार पूर्व में इन छद्म भेषधारी वैदिकों ने हमारे विरुद्ध फतवा जारी किया था, ठीक उसी प्रकार इस वर्ष भी इन कायरों ने अपनी अब्राह्मिक सिद्धांतों की परंपरा का अनुगमन करते हुए हमारे विरुद्ध पुनः फतवा जारी कर दिया है, जिसमें इन भयभीत समाजियों ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने लोगों को हमसे सतर्क रहने की अपील की है।

तथापि अकाट्य सिद्धांतों के भय से पाखंडियों के इस प्रकार बौखलाने पर तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, परंतु हमारे विषय में कुछ भ्रामक जानकारियाँ भी इस लेख में लिखी गई हैं, जिनका समाधान हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

जब तक सामने वाले ने कोई आपत्तिजनक सामग्री हमारे विरुद्ध निर्गत नहीं की है, तब तक हमने उसके विरुद्ध कोई भी हास्यास्पद वीडियो नहीं बनाया है। और यदि सामने वाले पक्ष के प्रतिकारस्वरूप बनाया भी है, तो कभी कोई गाली-गलौज अथवा किसी प्रकार की अमर्यादित टिप्पणी नहीं की गई है। अतः गाली-गलौज का आरोप पूर्णतः असत्य, निराधार एवं स्वकल्पित है। हाँ, सैद्धांतिक विरोध हमने आर्य समाज का अवश्य किया है, जो किसी भी प्रकार से धर्मविरुद्ध आचरण नहीं माना जा सकता। उसमें विनोदपूर्ण कटाक्ष भी होते हैं, परंतु वह कभी भी व्यक्तिनिष्ठ नहीं होता। यदि इस पर भी आपत्ति है, तो ऐसा करने का कारण भी आर्य समाज है, जहाँ "सत्यार्थ प्रकाश" में सर्वप्रथम हमारे आचार्यों को "गपोड़े" इत्यादि कहा गया है।

एक ही प्रश्न कई लोगों से करके यह बात स्पष्ट की जा रही है कि पूरे आर्य समाज के पास उन प्रश्नों का उत्तर नहीं है, जो धर्म का मूल हैं। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति को गलत सिद्ध करना नहीं, बल्कि सार्वभौम सिद्धांतों के प्रचार द्वारा धर्म की स्थापना करना है।

शास्त्रार्थ से पलायन वाली बातों का उत्तर —

१:- जिस संस्थान से यह प्रस्ताव दिया गया था, उस संस्थान से सीधे तौर पर कृतेश पटेल जुड़ा हुआ है, जिसने हमारे प्रति अत्यंत अभद्रतापूर्वक परंपरा के चीथड़े उड़ा देने की बात कही थी, तथा "एक-एक मिनट की रेल बनाकर पैसा कमाने वाला" कहा था एवं उन लोगों का समर्थन किया था, जिन्होंने "मूत निकल जाने" जैसी बातें तक कही थीं। इसके ट्विटर हैंडल से हमारे आचार्यों को कही गई अत्यंत अश्लील टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट अभी भी हमारे पास सुरक्षित हैं। इस व्यक्ति के चैनल पर अनेक प्रकार की तथ्यरहित जानकारियाँ हमारे और हमारे आचार्य के संबंध में निर्गत की गई हैं। (इस संबंध में इस कार्यालय के प्रामाणिक नंबर पर हुई हमारी बातचीत की रिकॉर्डिंग सुरक्षित है, जिसमें सामने वाले व्यक्ति ने कृतेश पटेल को अपनी संस्था का पदाधिकारी बताया है।)

२:- जब इस संस्थान से कृतेश पटेल को लेकर प्रश्न किया गया, तो इस संस्थान ने उसे पहचानने से मना करते हुए पुनः हमें शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया। ऐसे में हमारा कहना था कि आप जब स्वयं उसके साथ सीधा संबंध स्वीकार कर चुके हैं, तो हम कैसे मान लें कि आपका उसके साथ कोई संबंध नहीं है? और जब आप अपनी बात से पलटकर असत्य भाषण भी कर रहे हैं, तो हम आपके द्वारा हमें शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित करने को कोई षड्यंत्र क्यों न मानें?

३:- आबू पर्वत गुरुकुल द्वारा जब हमें आमंत्रित किया गया, तब हमारे शब्दों के अर्थ में फेरबदल कर, स्वयं उनका अर्थ करते हुए, इन्होंने धर्मचर्चा में उन मूल विषयों से भागने का प्रयास किया, जिनके आधार पर हमारा आर्य समाज के प्रति मुख्य विरोध है। साथ ही, चर्चा का स्थान निष्पक्ष न होकर अपने ही प्रांगण में सुनिश्चित किया गया एवं यह शर्त भी रखी गई कि केवल उनके पक्ष के कैमरामैन द्वारा ही रिकॉर्डिंग की जाएगी। ऐसे में हमने भी इनके प्रस्ताव को सीधे तौर पर न ठुकराते हुए, इनकी कुतर्कपूर्ण शर्तों के समक्ष कुछ कुतर्कपूर्ण शर्तें रखी थीं, जिसके बाद इनका आज तक कोई प्रत्युत्तर प्राप्त नहीं हुआ।

४:- उक्त कार्यक्रम में उपस्थित न होने का कारण भी कृतेश पटेल व उसके ही जैसी एक मातृशक्ति "आर्यवीरा" थी, जो कार्यक्रम से जुड़ी हुई थी एवं जिसने हमारे परिवार की मातृशक्तियों की फोटोज़ इत्यादि निकालकर उन्हें अपने मंच पर सार्वजनिक करते हुए कई प्रकार की अभद्र टिप्पणियाँ व वीडियो निर्गत किए थे।

यदि इससे भी संतुष्टि नहीं होती है, तो हम आर्य समाज के इन विद्वानों को सीधे तौर पर धर्म और ब्रह्म से संबंधित चर्चा के लिए अभी आमंत्रित कर रहे हैं —

१. स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी
२. योगेश भारद्वाज जी
३. मुनी सत्यजीत जी
४. अंकुर आर्य जी
५. मोहित गौड़ जी
६. आचार्य अग्निव्रत जी


इस संबंध में विस्तृत रूप से लिखित सूचना भी पत्र द्वारा निर्गत करके उक्त सामग्री एवं सूचना भी सार्वजनिक कर दी जाएगी। अब यदि किसी भी कारण से इनमें से जो भी विद्वान चर्चा का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करता है तो अलंकारी समाज द्वारा उन्हें भगोड़ा कब घोषित किया जाएगा उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए।


जानकारी के लिए बता दें कि राधा-कृष्ण के संबंध को गाली देने वाले स्वामी सच्चिदानंद नामक व्यक्ति को भी हम चर्चा के लिए प्रस्ताव दे चुके हैं, परंतु उसने भी प्रत्यक्ष चर्चा करने की बजाय चर्चा से पलायन करना ही स्वीकार किया था। इसके साथ ही उक्त विद्वानों से भी संपर्क करने का प्रयास किया जा चुका है, जिनमें अधिकांशतः विद्वानों द्वारा प्रत्यक्ष चर्चा के प्रति अरुचि प्रकट की गई थी।

व्यक्तिगत परामर्श :-
“मत पड़ो चक्कर में, कोई है नहीं टक्कर में।” 🚩

जय श्री राम 🙏🏻

3 days ago (edited) | [YT] | 308

AHVAAN - Call Of Dharma

काशी शास्त्रार्थ से लेकर आज तक इन समाजियों की पर्चेबाजी की लत छूट नहीं पाई है। इसी कारण जब तथ्यात्मक रूप से विजय प्राप्त नहीं हो पाती है तब यह कायर कुटिल प्रचार व्यवस्था का सहारा लेने में जुट जाते हैं तथा अपनी पराजित और कुढ़ी हुई आत्मा को संतोष देने का प्रयास करते हैं। वह बात और है कि सनातन सिद्धांत को स्वीकार किए बिना किसी भी आत्मा को संतुष्टि का आभास तक देना भी संभव नहीं है।

तथापि इनको इन्हीं की भाषा में इनको उत्तर दिया जा रहा है

www.abhinews.co.in/news/kasi-me-sankaracary-ki-pra…

वो क्या है ना खेल इस बार भी अच्छा है इनका आदमी गलत चुन लिया

जय श्रीराम 🙏

3 days ago (edited) | [YT] | 156

AHVAAN - Call Of Dharma

आर्य समाज विदूषी प्रीति विमर्शिणी जी

ईश्वर के व्यावहारिक प्राकट्य की आवश्यकता, अवतार, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता, लक्षण सहित स्त्री-शूद्र वेदाध्ययन इत्यादि विषयों पर निर्णायक चर्चा।

प्राचार्या, महर्षि पाणिनि कन्या महाविद्यालय, वाराणसी।

Trailer Coming Tomorrow.

5 days ago | [YT] | 373

AHVAAN - Call Of Dharma

धन्यवाद @shastravaad⁩ जी

1 week ago | [YT] | 29

AHVAAN - Call Of Dharma

Discussion On Christian Conversion Policy A Girl From Bengal 04.05.2026
क्या ईसाई पंथ में ईश्वर सर्वशक्तिमान है?

1 week ago | [YT] | 36

AHVAAN - Call Of Dharma

मुझे ग्लानि होती है कि मैंने तुझ जैसे नीच को कभी अपना भाई माना था।

मुझे समझना चाहिए था कि तुझ जैसे अलंकारी के स्वरूपभूत लक्षण क्या हैं।

यद्यपि तूने मुझसे काफ़ी कुछ कॉपी-पेस्ट करने का प्रयास किया, परंतु दर्शन विज्ञान और व्यवहार को साध न पाया। साधता भी कैसे .. न गुरु है, न गोविंद है, न ग्रंथ है।

बात करें याद रखने की तो मारियो गेम में अमर हो जाने वाले हेलमेट नाम के प्राणी जैसे दिखने वाले बदबूदार कीड़े सर्दियों के दिनों में गिरते थे, वह भी मुझे याद हैं। ऐसे में एक और कीड़ा यदि मुझे याद रहेगा, जिसको मैंने मसला है, तो उसमें कौन-सी बड़ी बात है?

बड़ी बात तो वह है कि मैंने तुम लोगों के गढ़ में जा-जा कर, व्यवस्थित रूप से की गई चर्चाओं के द्वारा, तुम्हारा और तुम्हारे आकाओं का निरुत्तर और निराधार चेहरा जनता के समक्ष लाकर तुम्हारी रातों की नींद छीन ली, जो अब दिन-रात केवल यही सोचने में बिताते हैं कि कैसे आह्वान को रोक सकें। यही नहीं, इसके लिए तुम लोगों को मेरे विरोध में फ़तवा तक जारी करना पड़ गया। इससे बड़ी जीत और क्या होगी?

शंकराचार्य के एक अल्पज्ञ शिष्य का सामना करने के लिए तुम्हें तैयारी करनी होती है, जिसके लिए तुम्हें उसके वीडियो ध्यानपूर्वक अक्षरशः सुनने पड़ते हैं। और यह मैं नहीं कह रहा, स्वयं तूने और संदीपन जैसे निरे मूर्ख लोगों ने यह बात सार्वजनिक रूप से कही है। जबकि मुझे तुझ जैसे किसी भी कीड़े को मसलने के लिए किसी वीडियो को देखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मेरे पास मेरा सिद्धांत है। मुझे किसी षड्यंत्र को रचने की कोई प्लानिंग करने की आवश्यकता नहीं है। Anytime, anywhere, anybody ..मैं रेडी रहता हूँ। तेरी तरह मुझे सामने वाले का व्यक्तिनिष्ठ अध्ययन नहीं करना पड़ता।

फिर भी, यदि मुंगेरीलाल के सपने के सदृश मान लिया जाए कि तू मेरे घर में आकर झंडा गाड़ कर गया, तो कभी तूने सोचा है कि वह कौन व्यक्ति था जो तेरी कहानी में झंडा गाड़ कर आया है? क्या वह आर्य समाजी था? क्या वह दयानंदी था?

क्या तेरे अनुसार दयानंदी झूठे, दोगले, पक्षपाती, अपनी अविवाहित संगिनी को बहन बनाकर काम निकालने वाले, अथवा काम निकल जाने पर उसे उन्हीं तत्वों के बीच अकेला छोड़कर भाग जाने वाले होते हैं, जिन तत्वों को वह स्वयं अधर्मी मानते हैं?

क्या दयानंदी वही होते हैं जो न्यायशास्त्र को मानने का दावा तो करते हैं, तथापि स्वयं उसके विपरीत जाकर अर्ध-कुक्कुट न्याय करने की बात करते हैं?

क्या दयानंदी वह होते हैं जो अवतार को स्वरूप के विरुद्ध कार्य मानकर स्वीकार नहीं करते, परंतु सृष्टि-रचना में एकदेशीय क्रिया के निमित्त ईश्वर के एकदेशीय होकर कार्य करने वाले रूप को अस्वीकार कर देते हैं? यदि ऐसा नहीं है, तो क्या दयानंदी वही हैं जो प्रश्नों से भागने वाले होते हैं?

क्या दयानंदी वही होते हैं जो शंका-समाधान को शास्त्रार्थ बनाने के प्रयास को वितंडा कहते हैं, परंतु स्वयं के लाभ की संभावना होने पर शंका-समाधान को शास्त्रार्थ के रूप में प्रचारित करते हैं?

यदि तू कहता है कि आर्य समाजी के रूप में अपनी पहचान बताते हुए तूने अपना मत प्रस्तुत किया था, इसलिए उस वार्ता को 'वितण्डा' नहीं कहा जा सकता; तो क्या आर्य समाज का कोई व्यक्ति शंकराचार्य के सिद्धांतों से प्रभावित होकर या उनके प्रति आस्था रखते हुए जिज्ञासावश उनसे प्रश्न नहीं कर सकता? इसका अर्थ यह है कि स्वयं को मात्र आर्य समाजी बता देने से यह सिद्ध नहीं होता कि शंकराचार्य जी की जानकारी में तेरे प्रश्न करने का उद्देश्य शंका-समाधान न होकर शास्त्रार्थ ही था।

यदि तू कहता है कि पहचान बताने के साथ-साथ तूने यह भी बता दिया था कि तू चर्चा करने आया है, तो क्या तूने इस बात का ध्यान रखा कि तेरा चर्चा करने का उद्देश्य सामने बैठे ८४ वर्ष की आयु वाले वृद्ध के कानों तक भली-भांति पहुँच गया था? न्याय की रक्षा हेतु क्या तूने यह ध्यान रखा की जब वे तेरा प्रश्न ठीक से नहीं सुन पाए और उनके शिष्यों ने तेरा प्रश्न उनके समक्ष दोहराया, तब क्या तूने यह स्पष्ट किया था कि तेरा उद्देश्य शंका-समाधान नहीं अपितु सिद्धांतों पर चर्चा करना है?

यदि तूने वहां अपना उद्देश्य 'शास्त्रार्थ' नहीं बल्कि 'चर्चा' बताया था, तो तेरे द्वारा उसी वार्ता को शास्त्रार्थ के रूप में प्रचारित करना ही तेरे असत्य वाचन और दोगलेपन का प्रमाण है।

यदि तू कहे कि तेरे चर्चा के उद्देश्य को जान लेने पर शंकराचार्य के शिष्यों ने तुझे रोका नहीं, तो मूर्ख! तेरे उद्देश्य को भली-भांति जानते हुए ही मैंने वहां तुझे व्यवस्थित चर्चा का निमंत्रण दिया था।

अंततः, यदि यह मान भी लिया जाए कि गुरुदेव तेरा पक्ष जानते थे, तब भी जब तू जरा सी भी विरोध की स्थिति होने पर अपने कथित आर्य समाजी दर्शनाचार्य द्वारा चर्चा से दूरी बना लेने को 'शंका-समाधान के नाम पर शास्त्रार्थ करने के रूप में की जाने वाली वितंडा' से जोड़ते हुए उचित ठहराता है, तो सभा की व्यवस्था और जन-समूह के क्रम को ध्यान में रखते हुए, तेरे फूहड़पन से रखे गए प्रश्नों का एक सीमा तक उत्तर देने के बाद, वहां उपस्थित अन्य श्रद्धालुओं को अवसर देने के निमित्त शंकराचार्य द्वारा दूरी बना लेने को तेरे द्वारा 'शास्त्रार्थ में पराजित' होने के रूप में प्रचारित करना तेरे दोगलेपन और असत्यभाषण को सिद्ध करता है। अन्यथा, तेरे ही अनुसार किसी भी कारण से ऐसी चर्चा से दूरी बनाने की प्रवृत्ति रखने वाले तेरे स्वयं के दर्शन-आचार्य स्वामी विवेकानंद परिव्राजक भी शास्त्रार्थ में पराजित होने की प्रवृत्ति रखने वाले सिद्ध होते हैं।

यदि दयानंदी ऐसे होते हैं, और दुर्जनतोष न्याय से मान भी लिया जाए कि तेरे प्रश्न का उत्तर किसी विशेष सभा की अपनी व्यवस्था के कारण पूर्ण रूप से प्रदान नहीं किया जा सका, जिसके आधार पर तू झंडा गाड़ने की बात कर रहा है, तथापि तेरी यह जीत सैद्धांतिक न होकर एक षड्यंत्र मात्र ही सिद्ध होगी। तू पूरी दुनिया में भले ही अपना डंका पीट ले, परंतु जब-जब दर्पण देखेगा, तब-तब तुझे याद आएगा कि तू अब तक शंकराचार्य परंपरा , शंकराचार्य तो दूर की बात है, तू तो उनके एक अल्पज्ञ शिष्य शिवांश से भी विजय प्राप्त नहीं कर सका। तब-तब तुझे याद आएगा कि तू हारा हुआ है, तब-तब तुझे याद आएगा कि तेरा सिद्धांत खोखला है।

तू पूरी दुनिया को कुछ भी कहे, परंतु तेरी अपनी दृष्टि में मैंने तेरे सिद्धांत को निरावरण करके रख दिया है। अब तू दिन-रात अपने सिद्धांत के खोखलेपन को लेकर रोता रह। मेरा सिद्धांत आज भी सिद्ध है। मुझे अपने सिद्धांत पर गर्व है वह संतुष्टि कहाँ से लाएगा तू?

पहला प्रश्न यह था कि स्वरूप के विरुद्ध कार्य करने पर ईश्वर को 'बाधित' कहा जाएगा या नहीं? गुरुदेव के उत्तर का अभिप्राय था—'नहीं'। यदि नियमों के अनुसार देखा जाए, तो तेरे प्रश्न का उत्तर वहीं प्राप्त हो गया था और तब तुझे बैठ जाना चाहिए था। वहाँ से आगे प्रश्न करना अनुशासन का उल्लंघन ही था।

तथापि, गुरुदेव जब भी कोई उत्तर देते हैं, तो सामान्यत: समष्टि के दृष्टिकोण से उसके साथ कोई न कोई दृष्टांत, वृत्तांत अथवा सिद्धांत अवश्य बताते हैं; वही उन्होंने उस दिन भी किया, जिसे तू 'विषयांतर' कह रहा है।

परंतु, यदि तूने अपनी मर्यादा का अतिक्रमण कर प्रश्न किया भी, तो तू मूल विषय पर प्रश्न न करके अपनी ही बातों में उलझ गया। यदि तू अवतार के प्रति विरोध लेकर पहुँचा था, तो अगला प्रश्न यह होना चाहिए था—'तो फिर स्वरूप के विरुद्ध अवतरित न होने की स्थिति में ईश्वर को बाधित कहना गलत है या नहीं?' अथवा इसी प्रश्न को दूसरे शब्दों में पूछना चाहिए था। तब गुरुदेव का उत्तर आता कि 'अवतार लेना स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं है'। यदि इसे विरुद्ध मानेंगे, तो सृष्टि निर्माण हेतु ईश्वर जो सगुण-निराकार रूप धारण करता है, उसे भी स्वरूप के विरुद्ध मानना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में ईश्वर द्वारा सृष्टि-रचना सिद्ध नहीं हो पाएगी।

'सत्यार्थ प्रकाश' के अनुसार, संसार में न्याय करने के लिए ईश्वर का सर्वव्यापक होना आवश्यक है, अर्थात सर्वव्यापक क्रिया के लिए सर्वव्यापक उपस्थिति अनिवार्य है। ठीक उसी प्रकार, एकदेशीय क्रिया करने के लिए ईश्वर को एकदेशीय रूप में उपस्थित होने की भी आवश्यकता माननी पड़ेगी; क्योंकि एकरस सर्वव्यापक रूप एकदेशीय क्रिया नहीं कर सकता। ईश्वर का सर्वव्यापक होते हुए भी एकदेशीय क्रिया करने वाला रूप ही 'सगुण-निराकार' कहलाता है।

तब तेरा अगला प्रश्न यह होना चाहिए था कि 'स्वरूप से सर्वव्यापक होते हुए भी एकदेशीय रूप धारण करने को स्वरूप के विरुद्ध कार्य क्यों न माना जाए?' तब गुरुदेव का उत्तर होता कि इस प्रपंच रूपी संसार में, जहाँ सारी क्रियाएँ और विषय-वस्तु मात्र प्रतीति हैं, वहाँ होने वाली किसी भी घटना को ईश्वर के स्वरूप के विरुद्ध कार्य कैसे माना जा सकता है? इति सिद्धम्।

अर्थात, अद्वैत को स्वीकार करने पर ही ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, सृष्टि-रचना और जीव की अभिलाषा का वास्तविक विषय होना सिद्ध होता है, जिससे धर्म की स्थापना होती है। परंतु तुझ मूर्ख यही बोध नहीं हो पाया कि अगला तर्कसंगत प्रश्न क्या होना चाहिए था।


यदि दयानंदी ऐसे नहीं होते, और यदि दुर्जनतोष न्याय से तेरी बात मान भी ली जाए कि तू मेरे घर में आकर कोई झंडा गाड़ कर गया है, तो वह झंडा दयानंद का नहीं, तुझ जैसे षड्यंत्रकारी का था, आर्य समाज का नहीं, तुझ जैसे लोकेष्णा के भूखे व्यक्ति का था , जिसकी समस्या यह थी कि जब तक वह अपनी चापलूसों की मंडली से बाहर नहीं निकला था, तब तक वह अपने हसीन सपनों की दुनिया में स्वयं को बहुत बड़ा शेर समझता था, परंतु जब उसका सामना अकाट्य सिद्धांतवादी से हुआ, तो उसका परिचय स्वयं की वास्तविक स्थिति से हो गया। अब किसी भी कीमत पर अपनी उस छवि को पुनः प्राप्त करना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया। परंतु क्या करता? सत का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता।

तो यदि झंडा गाड़ने की कल्पना कर भी ली जाए, तो उस कल्पना में भी यदि झंडा गड़ा भी है, तो क्या स्वामी दयानंद का झंडा गड़ा? आर्य समाज के सिद्धांत का झंडा गड़ा?

पुरी के शंकराचार्य जी द्वारा तुझे तेरे प्रश्न का उत्तर सटीक दिया गया। तूने उसे समझा ? नहीं समझा। वह एक अलग विषय है। तू कहेगा नहीं दिया, हम कहेंगे दिया। हम तुझे कूट-कूट कर पिलाएँगे, तू कुट-कुट कर उल्टी करेगा। परंतु इतना तो स्पष्ट है कि तेरी लड़ाई कभी सिद्धांत और धर्म की स्थापना के लिए थी ही नहीं, तेरी लड़ाई सदैव स्वयं के वर्चस्व के लिए थी। क्योंकि जिसकी लड़ाई सिद्धांत के लिए होती है, वह अपने सिद्धांतों का त्याग कभी नहीं करता।

अब बात करते हैं नपुंसक कौन होता है? तो सुन..

नपुंसक वह होता है जिसके पास सिद्धांत नहीं होता और वह षड्यंत्रपूर्वक अकाट्य सिद्धांत को पराजित करना चाहता है।

नपुंसक वह होता है जो आमना-सामना होने पर बहाने बनाकर भागता है।

नपुंसक वह होता है जो पीठ पीछे गालियाँ बकता है और सामने आकर सभ्य बनता है।

नपुंसक वह होता है जो धूल चाटने के बाद भी चार आदमियों को पीट देने की झूठी कहानी गढ़ता है।

नपुंसक वह होता है जो एक व्यक्ति की मार को पच्चीस लोगों की मार बताता है।

नपुंसक वह होता है जो पिटने से बचाने वालों पर ही, केवल सैद्धांतिक विरोध होने के कारण, उन पर पीटने वाले होने का आरोप लगाता है।

नपुंसक वह होता है जो अपनी अविवाहित संगिनी का उपयोग करने के बाद, उन्हीं लोगों के बीच उसे अकेला छोड़कर भाग जाता है, जिन लोगों को वह अधर्मी बता रहा होता है।

नपुंसक वह होता है जो सामने से चर्चा अथवा संवाद की संभावना को नष्ट करता है और दूर जाकर...

अब जा, न्याय के अनुसार हिजड़े के लक्षण ढूँढ़ और पंचावयव के रूप में अपनी आत्मा के समक्ष प्रस्तुत कर ले। यदि न मिलें, तो मेरे समक्ष पुनः आ जाना , स्वयं के भीतर के वे लक्षण तुझे पुनः दिख जाएँगे।

पश्चातापपूर्वक ही सही, बच्चा है तू मेरा। फेंटा नहीं पिला सकता तो क्या हुआ? तेरी नपुंसकता से तेरा परिचय तो करवा ही सकता हूँ।

जय श्रीराम 🙏

2 weeks ago (edited) | [YT] | 213

AHVAAN - Call Of Dharma

नृसिंह जयन्ती की अनन्तानन्त शुभकामनाऍं। 🚩

2 weeks ago | [YT] | 346

AHVAAN - Call Of Dharma

बंदीछोड़ 2.0 और उसकी अविवाहित संगिनी का काला चिठ्ठा ? #aryasamaj #truth

2 weeks ago | [YT] | 31

AHVAAN - Call Of Dharma

क्या ब्रह्माकुमारी इस्लाम को धर्म मानती है?
क्या BK वाले ईसाई धर्म को धर्म मानते हैं? #ब्रह्माकुमारी #BrahmaKumaris #BK

3 weeks ago | [YT] | 19