Poetry by Nishikant

कुछ क़िस्से किताबों के पन्नों के बीच मुरझाये हुए उन फूलों में है, जिनमे आज भी एकतरफा प्रेम का एहसास जीवित है। जिनमे अब सुगंध नहीं है।
मेरे लिए वह अनुभूति कुछ वैसी ही है जैसे किताब के बीच दबकर फूल अपना रंग छोड़ जाते हैं पन्नों पर।
मेरी कविताएँ उसी रंग की कहानी हैं।


कुछ किस्से उस नींद में छुपे हैं, जो दिन भर की मेहनत के बाद दो रोटी खा कर आती है।
मेरी नज़्म मेरे लिए उस दिहाड़ी की तरह है, जैसे एक मज़दूर के लिए उसके दिनभर की मेहनत के हक़ के पैसे।

मेरी रचनायें जीवन के हर उस पहलू की तरह है जो किसी के लिए सुख और किसी के लिए दुःख के भावनाओं को प्रेरित करते हैं।

कुछ रचनायें मुझे रुलाती हैं तो कुछ मेरे अंदर ढाढस पैदा करती हैं।

कुछ तो अभी बचपने में हैं।

उन कच्चे-पके लेखनियों का संयोजन हूँ मैं।

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