धर्म अथवा अध्यात्म का तात्पर्य निष्क्रियता अथवा उदासीनता नहीं है। बल्कि उसका तात्पर्य है- सजगता के साथ, समर्पित भाव से, अपने कर्तव्य-कर्मों का सुचारु-संपादन करते हुए निरंतर ईश्वर का स्मरण।
~ पूज्यपाद परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वतीजी महाराज
संसार में हमें जो प्रेम दिखता है, वह यथार्थ में स्वार्थ का ही बदला हुआ स्वरूप है। सच्चा प्रेम वह है जिसमें कामना नहीं, वासना नहीं, स्वार्थ नहीं। सच्चा प्रेम परमार्थ है, और परमार्थ का अर्थ है परमात्मा। अर्थात् निःस्वार्थ भाव से परमात्मा के प्रति जो प्रेम होता है, उसे कहते हैं "परमप्रेम"।
~ पुज्यपाद परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वतीजी महाराज
Swami Satyaprajnananda Saraswati स्वामी सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वती @topfans
बंधुओ। जीवन में सच्चा सौभाग्य तभी आता है जब हृदय में प्रेम प्रकट होता है; और प्रेम भी तब प्रकट होता है जब हम अपने प्रियतम को जानते हैं। अनजान व्यक्ति के प्रति कभी श्रद्धा या प्रेम प्रकट नहीं होता। वहाँ तो केवल संदेह ही होता है। इसीलिए संतों ने कहा है-"पहले जानो, फिर मानो।" पिछले कुछ दिनों से हम यही प्रयास कर रहे हैं कि आप महाप्रभु श्री जगनाथ जी के तत्व, रहस्य और लीला को जानें और उन्हें पहचानें। जैसे-जैसे उन्हें आप जानेंगे, उनके संबंध में आपका ज्ञान बढ़ेगा, वैसे-वैसे उनके प्रति आपके अंदर प्रेम भी जागेगा। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं- "जानें बिनु न होड़ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।" अर्थात् जाने बिना विश्वास नहीं होता, और बिना विश्वास के प्रेम नहीं होता।
यह बहुत सुंदर सिद्धान्त है। यह व्यावहारिक भी है और पारमार्थिक भी। परन्तु कुछ लोग कहते हैं- "जानने की आवश्यकता क्या है? केवल प्रेम करो। ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं, केवल भक्ति करो।" परन्तु भक्ति करोगे किसकी? जिसे जानोगे नहीं, उसे मानोगे कैसे ? उससे कैसे प्रेम करोगे? मानलो कोई व्यक्ति आपके घर आता है, क्या आप बिना जाने उसे अतिथि बना लेते हैं? उस पर भरोसा कर लेते हैं? नहीं करते। इसलिए पहले जानना आवश्यक है। उसके बाद विश्वास करना है। जब तक विश्वास नहीं होता, तब तक श्रद्धा या प्रेम भी नहीं होता है। गोस्वामीजी कहते हैं- "प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।"
प्रेम के बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती है। देवर्षि नारद ने अपने "भक्ति सूत्र" में कहा है-"सा त्वस्मिन्परमप्रेमरूपा"- अर्थात् परमात्मा के प्रति परमप्रेम ही भक्ति है। प्रेम दो प्रकार का होता है। एक परम (सर्वोच्च), और दूसरा अपरम, अर्थात् सामयिक और निकृष्ट। संसारिक प्रेम सामयिक (क्षणिक) होता है; क्योंकि वह वासना और स्वार्थ पर आधारित होता है। उस निकृष्ट प्रेम को, वासना एवं स्वार्थ आधारित प्रेम को अज्ञानतावश सांसारिक लोग प्रेम मान लेते हैं; परन्तु हम संतजन उसे प्रेम नहीं मानते। हम उसे वासना मानते हैं। उदाहरण के लिए- आजकल युवक-युवतियों में आप जो प्रेम देखते हैं, क्या वह यथार्थ में प्रेम, परमप्रेम होता है? नहीं। वह प्रेम वासना से प्रेरित प्रेम है। वह प्रेम तन, मन या धन तक सीमित होता है। इसी प्रकार सांसारिक जीवन में पति-पत्नी का प्रेम भी स्वार्थ से संबंधित प्रेम होता है।
बृहदारण्यक उपनिषद में एक कथा है। याज्ञवल्क्य जी अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं - "न वा अरे पत्यु: कामया पति प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामायै पति: प्रियो भवति।" अर्थात् - "हे मैत्रेयी! पति, पत्नी, पुत्र या देवर, कोई भी किसी का प्रिय नहीं है। सभी अपने-अपने स्वार्थ के कारण ही प्रिय हैं।" अतः जब तक संसार में स्वार्थ रहता है, तब तक प्रेम भी रहता है; किन्तु जैसे ही स्वार्थ टूटता है, उनमें परस्पर प्रेम भी टूट जाता है।
आप देखना- वही मित्र जो कल तक प्राणों से भी अधिक प्यारे थे, स्वार्थ टूटते ही वे परस्पर के दुश्मन बन जाते हैं। इसी प्रकार से पति-पत्नी, जो विवाह में सात जन्मों तक साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं, वे भी स्वार्थ टूटते ही सात दिनों के अन्दर डाइवोर्स के लिए अदालत पहुँच जाते हैं। यह प्रेम नहीं है। यह तो प्रेम के नाम पर स्वार्थ का एक छद्म स्वरूप है। इसीलिए संत कहते हैं- "सुर नर मुनि सबकी यह रीति। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।" इसका मतलब यह होता है कि "संसार में हमें जो प्रेम दिखता है, वह यथार्थ में स्वार्थ का ही बदला हुआ स्वरूप है।" सच्चा प्रेम वह है जिसमें कामना नहीं, वासना नहीं, स्वार्थ नहीं। सच्चा प्रेम परमार्थ है, और परमार्थ का अर्थ है परमात्मा। अर्थात् निःस्वार्थ भाव से परमात्मा के प्रति जो प्रेम होता है, उसे कहते हैं "परमप्रेम"। इसलिए बंधुओ। जब आप भगवान के सामने खड़े होते हो, तब हाथ मत फैलाना। वह अंतर्यामी है, सब कुछ जानता है। वह आपकी आवश्यकताओं को भी जानता है और आपकी विवशताओं को भी समझता है। इसलिए उस पर पूर्ण विश्वास रखना और सच्चे मन से उससे प्रेम करना। यही सच्ची भक्ति है और यही सच्चा प्रेम है।
(पूज्यश्री के "जगन्नाथ-तत्त्व-दर्शन" प्रवचन से संकलित...)
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर एवं विग्रह-प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में पूज्यपाद सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वती जी महाराज का संदेश…..
Viswatma Chetana
धर्म अथवा अध्यात्म का तात्पर्य निष्क्रियता अथवा उदासीनता नहीं है। बल्कि उसका तात्पर्य है- सजगता के साथ, समर्पित भाव से, अपने कर्तव्य-कर्मों का सुचारु-संपादन करते हुए निरंतर ईश्वर का स्मरण।
~ पूज्यपाद परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वतीजी महाराज
2 months ago | [YT] | 22
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संसार में हमें जो प्रेम दिखता है, वह यथार्थ में स्वार्थ का ही बदला हुआ स्वरूप है। सच्चा प्रेम वह है जिसमें कामना नहीं, वासना नहीं, स्वार्थ नहीं। सच्चा प्रेम परमार्थ है, और परमार्थ का अर्थ है परमात्मा। अर्थात् निःस्वार्थ भाव से परमात्मा के प्रति जो प्रेम होता है, उसे कहते हैं "परमप्रेम"।
~ पुज्यपाद परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वतीजी महाराज
Swami Satyaprajnananda Saraswati
स्वामी सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वती
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2 months ago | [YT] | 13
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2 months ago | [YT] | 23
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Glimpses from 9th Interschool Science, Arts & Handicrafts Exhibition 2025...
2 months ago | [YT] | 17
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Viswatma Chetana
परम प्रेम का स्वरूप
बंधुओ। जीवन में सच्चा सौभाग्य तभी आता है जब हृदय में प्रेम प्रकट होता है; और प्रेम भी तब प्रकट होता है जब हम अपने प्रियतम को जानते हैं। अनजान व्यक्ति के प्रति कभी श्रद्धा या प्रेम प्रकट नहीं होता। वहाँ तो केवल संदेह ही होता है। इसीलिए संतों ने कहा है-"पहले जानो, फिर मानो।" पिछले कुछ दिनों से हम यही प्रयास कर रहे हैं कि आप महाप्रभु श्री जगनाथ जी के तत्व, रहस्य और लीला को जानें और उन्हें पहचानें। जैसे-जैसे उन्हें आप जानेंगे, उनके संबंध में आपका ज्ञान बढ़ेगा, वैसे-वैसे उनके प्रति आपके अंदर प्रेम भी जागेगा। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं- "जानें बिनु न होड़ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।" अर्थात् जाने बिना विश्वास नहीं होता, और बिना विश्वास के प्रेम नहीं होता।
यह बहुत सुंदर सिद्धान्त है। यह व्यावहारिक भी है और पारमार्थिक भी। परन्तु कुछ लोग कहते हैं- "जानने की आवश्यकता क्या है? केवल प्रेम करो। ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं, केवल भक्ति करो।" परन्तु भक्ति करोगे किसकी? जिसे जानोगे नहीं, उसे मानोगे कैसे ? उससे कैसे प्रेम करोगे? मानलो कोई व्यक्ति आपके घर आता है, क्या आप बिना जाने उसे अतिथि बना लेते हैं? उस पर भरोसा कर लेते हैं? नहीं करते। इसलिए पहले जानना आवश्यक है। उसके बाद विश्वास करना है। जब तक विश्वास नहीं होता, तब तक श्रद्धा या प्रेम भी नहीं होता है। गोस्वामीजी कहते हैं- "प्रीति बिना नहिं भगति दृढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।"
प्रेम के बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती है। देवर्षि नारद ने अपने "भक्ति सूत्र" में कहा है-"सा त्वस्मिन्परमप्रेमरूपा"- अर्थात् परमात्मा के प्रति परमप्रेम ही भक्ति है। प्रेम दो प्रकार का होता है। एक परम (सर्वोच्च), और दूसरा अपरम, अर्थात् सामयिक और निकृष्ट। संसारिक प्रेम सामयिक (क्षणिक) होता है; क्योंकि वह वासना और स्वार्थ पर आधारित होता है। उस निकृष्ट प्रेम को, वासना एवं स्वार्थ आधारित प्रेम को अज्ञानतावश सांसारिक लोग प्रेम मान लेते हैं; परन्तु हम संतजन उसे प्रेम नहीं मानते। हम उसे वासना मानते हैं। उदाहरण के लिए- आजकल युवक-युवतियों में आप जो प्रेम देखते हैं, क्या वह यथार्थ में प्रेम, परमप्रेम होता है? नहीं। वह प्रेम वासना से प्रेरित प्रेम है। वह प्रेम तन, मन या धन तक सीमित होता है। इसी प्रकार सांसारिक जीवन में पति-पत्नी का प्रेम भी स्वार्थ से संबंधित प्रेम होता है।
बृहदारण्यक उपनिषद में एक कथा है। याज्ञवल्क्य जी अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं - "न वा अरे पत्यु: कामया पति प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामायै पति: प्रियो भवति।" अर्थात् - "हे मैत्रेयी! पति, पत्नी, पुत्र या देवर, कोई भी किसी का प्रिय नहीं है। सभी अपने-अपने स्वार्थ के कारण ही प्रिय हैं।" अतः जब तक संसार में स्वार्थ रहता है, तब तक प्रेम भी रहता है; किन्तु जैसे ही स्वार्थ टूटता है, उनमें परस्पर प्रेम भी टूट जाता है।
आप देखना- वही मित्र जो कल तक प्राणों से भी अधिक प्यारे थे, स्वार्थ टूटते ही वे परस्पर के दुश्मन बन जाते हैं। इसी प्रकार से पति-पत्नी, जो विवाह में सात जन्मों तक साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हैं, वे भी स्वार्थ टूटते ही सात दिनों के अन्दर डाइवोर्स के लिए अदालत पहुँच जाते हैं। यह प्रेम नहीं है। यह तो प्रेम के नाम पर स्वार्थ का एक छद्म स्वरूप है। इसीलिए संत कहते हैं- "सुर नर मुनि सबकी यह रीति। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।" इसका मतलब यह होता है कि "संसार में हमें जो प्रेम दिखता है, वह यथार्थ में स्वार्थ का ही बदला हुआ स्वरूप है।" सच्चा प्रेम वह है जिसमें कामना नहीं, वासना नहीं, स्वार्थ नहीं। सच्चा प्रेम परमार्थ है, और परमार्थ का अर्थ है परमात्मा। अर्थात् निःस्वार्थ भाव से परमात्मा के प्रति जो प्रेम होता है, उसे कहते हैं "परमप्रेम"। इसलिए बंधुओ। जब आप भगवान के सामने खड़े होते हो, तब हाथ मत फैलाना। वह अंतर्यामी है, सब कुछ जानता है। वह आपकी आवश्यकताओं को भी जानता है और आपकी विवशताओं को भी समझता है। इसलिए उस पर पूर्ण विश्वास रखना और सच्चे मन से उससे प्रेम करना। यही सच्ची भक्ति है और यही सच्चा प्रेम है।
(पूज्यश्री के "जगन्नाथ-तत्त्व-दर्शन" प्रवचन से संकलित...)
2 months ago | [YT] | 6
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Viswatma Chetana
ପୂଜ୍ୟପାଦ ସଦ୍ଗୁରୁଦେବ
ପରମହଂସ ସ୍ବାମୀ ଶ୍ରୀ ସତ୍ୟପ୍ରଜ୍ଞାନନ୍ଦ ସରସ୍ଵତୀଜୀ ମହାରାଜ ଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସାନ୍ନିଧ୍ୟରେ
"ଶବରୀ କଥା ପ୍ରସଙ୍ଗ"
୩ ଫେବୃଆରୀ ୭ ଫେବୃଆରୀ ୨୦୨୫
ସନ୍ଧ୍ୟା ୫.୩୦ ରୁ ୮.୩୦ ଟା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ
ସ୍ଥାନ ~ ଶିବାନନ୍ଦ ଆଶ୍ରମ, ବଲାଙ୍ଗୀର
Program 🔴 LIVE on 🟥 ViswatmaChetana YouTube Channel
youtube.com/@viswatmachetana?si=bLlbu2NrIUEPrQ5K
1 year ago | [YT] | 21
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Viswatma Chetana
चमत्कार प्रवचन....
अवश्य सुनें...
महिमा श्रावण मास की | आध्यात्मिक प्रवचन | पूज्यपाद सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वतीजी महाराज
https://youtu.be/LcQ_tovbOBg
https://youtu.be/LcQ_tovbOBg
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1 year ago | [YT] | 13
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Viswatma Chetana
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर एवं विग्रह-प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में पूज्यपाद सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी श्री सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वती जी महाराज का संदेश…..
आओ! मिलकर दीप जलाएँ । घर-घर में आनन्द मनायें ॥
2 years ago | [YT] | 6
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Viswatma Chetana
Watch Live | Srimadbhagvat Swadhyay Satra | Day 6 | Sambalpur @ViswatmaChetana
2 years ago | [YT] | 5
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Viswatma Chetana
The Srimad Bhagavad Swadhyaya Satra Live Stream starts at 5:45 PM in the evening and continues until January 14, 2024.
2 years ago | [YT] | 37
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