19 सितंबर 1965 : भारत-पाकिस्तान युद्ध के वीर योद्धा राइफलमैन दल बहादुर की अमर शौर्यगाथा
सियालकोट सेक्टर में 5/9 गोरखा राइफल्स के साथ लड़ते हुए दिया सर्वोच्च बलिदान
दीपक राई वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क भारत के सैन्य इतिहास में 1965 का भारत-पाक युद्ध उन संघर्षों में शामिल है, जिसमें भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। इस युद्ध में 5/9 गोरखा राइफल्स के जवानों ने भी सियालकोट सेक्टर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं वीर सैनिकों में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के कनारी गांव में जन्मे राइफलमैन दल बहादुर भी शामिल थे। दल बहादुर भारतीय सेना में भर्ती होकर 5/9 गोरखा राइफल्स का हिस्सा बने। देशसेवा के अपने दायित्व को निभाते हुए उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सियालकोट सेक्टर में अपनी यूनिट के साथ मोर्चा संभाला।
{ सियालकोट सेक्टर में वीरता }
सितंबर 1965 में सियालकोट सेक्टर में भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच भीषण सैन्य संघर्ष हुआ। 5/9 गोरखा राइफल्स के जवानों ने कठिन परिस्थितियों में मोर्चे पर डटे रहते हुए अपने सैन्य दायित्व का निर्वहन किया। 19 सितंबर 1965 को सियालकोट सेक्टर के सोरड्रेके में हुई लड़ाई के दौरान राइफलमैन दल बहादुर भी अपनी यूनिट के साथ तैनात थे। संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीव्र गोलीबारी हुई। इसी भीषण मुठभेड़ में दल बहादुर गंभीर रूप से घायल हो गए।
गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। अंततः 19 सितंबर 1965 को 5/9 गोरखा राइफल्स के साथ देश की सेवा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।
{ कनारी से रणभूमि तक }
पिथौरागढ़ के कनारी गांव की धरती से निकलकर भारतीय सेना में शामिल हुए राइफलमैन दल बहादुर ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय राष्ट्रसेवा को समर्पित किया। सियालकोट के रणक्षेत्र में दिया गया उनका बलिदान उत्तराखंड और भारतीय सेना के गौरवशाली सैन्य इतिहास का हिस्सा है।
उनकी शहादत इस बात की याद दिलाती है कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए कर्तव्य सर्वोपरि होता है। 1965 के युद्ध में सियालकोट सेक्टर की कठिन परिस्थितियों में अपने साथियों के साथ डटे रहना और अंततः राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करना उनके सैन्य जीवन की अमिट विरासत है।
राइफलमैन दल बहादुर को राष्ट्र की सेवा, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए शत-शत नमन।
18 सितंबर 1965 : जब वीर चक्र विजेता नायब सुबेदार राम प्रसाद छेत्री ने पाकिस्तानी चौकी तबाह कर वहाँ भारतीय तिरंगा फहराया
भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में लड़ा गया युद्ध अब अंतिम चरणों पर था। भारतीय सेना एक के बाद एक पाकिस्तानी इलाकों में अपनी विजय पताका फहरा रही थी। पाकिस्तानी सेना के हाथों से उनके इलाके लगातार छूटते जा रहे थे। आलम यह था कि भारतीय सेना के रणबांकुरे पाकिस्तान के तमाम इलाकों में जीत का परचम फहराते चले जा रहे थे। भारतीय सेना के इन्हीं रणबांकुरों में एक थे नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री को अद्भुत युद्ध कौशल, साहस और नेतृत्व क्षमता के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आइये, आपको बताते हैं नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की बहादुरी की वह दास्तान , जिसने इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए उनका नाम दर्ज कर दिया
{ अखनूर सेक्टर के फीचर कब्जे का मिला था आदेश }
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, एक गोरखा राइफल्स कीपहली बटालियन को अखनूर सेक्टर के पश्चिम में स्थित एक चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई थी. गोरखा राइफल्स की इसी बटालियन में राम प्रसाद छेत्री बतौर नायब सूबेदार तैनात थे। 18 सितंबर 1965 को नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री के नेतृत्व वाली पलटन को दुश्मन के गहराई वाले इलाकों पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। इस इलाके पर दुश्मन ने मजबूत पकड़ बना रखी थी। नायब सूबेदान राम प्रसाद छेत्री अपने लक्ष्य के बेहद करीब थे. तभी दुश्मन की एमएमजी से निकली गोली के चपेट में आ गए। गोली लगने के बावजूद नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री रुके नहीं, वह लगातार दुश्मन की पैठ वाले ठिकाने की तरफ बढ़ते रहे। लंबी जद्दोजहद के बाद, उन्होंने उस एमएमजी के ठिकाने और दुश्मन को खोज लिया, जहां से निकली गोली ने उन्हें जख्मी किया था।
{ अचेत होने तक दुश्मनों से मोर्चा लेते रहे छेत्री } लगातार हो रही गोलियों की बौछार को नजरअंजाद कर आगे बढ़े और अपने अचूक निशाने से दुश्मन को मौत की नींद सुलाकर, उसकी एमएमजी को खामोश कर दिया। नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की इस साहसिक विजय के साथ इलाके को दुश्मन से मुक्त करा लिया गया था।
इस ऑपरेशन में बुरी तरह से जख्मी नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की सांसे उनका साथ छोड़ती, इससे पहले वहां से उन्हें रेस्क्यू कर लिया गया। नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की इस सफलता की मदद से गोरखा राइफल्स अखनूर सेक्टर स्थित चोटी पर अपना विजय पताका फहराने में कामयाब रही।
इस ऑपरेशन में नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को देखते हुए वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
डा. महेन्द्र पी. लामाज्युको वयान तथा दस्तावेजमाथि सम्पुर्ण राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी र नागरिक समाजलाई संयमित भई आपसी सद्भाव र भाइचारा कायम राख्न हार्दिक अपिल' : विनय तामाङ
१९८६ को ऐतिहासिक गोर्खाल्याण्ड आन्दोलनदेखि आजसम्म निरन्तर संवैधानिक अधिकार , चिन्हारी अनि छुट्टै राज्य गोर्खाल्याण्डको मागंमा समर्पित म एक सिपाही हुँ। हाम्रा पुर्खा र शहीदहरूको बलिदानले कोरेको यस यात्रा सत्ताको खेल होइन ; स्वाभिमानको लडाइँ हो।
हालै आदरणीय डा. महेन्द्र पी लामाज्युको 'स्थायी राजनैतिक समाधान' सम्बन्धी दस्तावेज र भनाइलाई लिएर मित्र राज्य सिक्किममा उत्पन्न भएको चिन्ता र विरोधप्रति मेरो गम्भीर ध्यान आकर्षण भएको छ। यस सन्दर्भमा म एक जिम्मेवार दार्जिलिङको नागरिक भएको नाताले म मेरो विचारधारा निम्नलिखित कुराहरू स्पष्ट पार्न चाहन्छु:
सिक्किमका जनताको भावनाको कदर :- सिक्किम हाम्रा लागि केवल छिमेकी राज्य मात्र होइन तर रगत र संस्कृतिको सम्बन्ध भएको भातृ राज्य हो। भारतको संविधानको धारा ३७१ एफ अन्तर्गत सिक्किमले पाएको विशेष अधिकार र त्यहाँका जनताको स्वाभिमानको रक्षा हुनुपर्छ भन्नेमा म दृढ छु । सिक्किमलाई असर पर्ने कुनैपनि राजनैतिक मोडल वा ढाँचा स्वीकार्य हुन सक्दैन।
गोर्खाल्याण्डको स्पष्ट सीमा र मांग :- गोर्खाल्याण्डको हाम्रो माग दार्जिलिङ पहाड़ अनि तराई-डुवर्सका गोर्खा बहुल क्षेत्रहरूलाई समेटेर भारतको संविधानभित्रै रही पश्चिम बंगालबाट अलग राज्य निर्माण गर्नु नै १९८६ देखि आजपर्यन्त उद्देश्य रहिआएको छ । यो मांगमा कुनै अन्य कसैको भुभाग वा अधिकार खोस्नका लागि बनाइएको होइन।
सुझाव र आधिकारिक आन्दोलनको अन्तर :- डा. महेन्द्र पी°लामा एक अति सम्मानित अर्थशास्त्री र विद्वान हुनुहुन्छ। वहाँले प्रस्तुत गर्नुभएको दस्तावेज वहाँको अध्ययन र व्यक्तिगत अवधारणा हुन सक्छ अनि आफनो प्रस्ताव हुनसक्छ तर वहाॅको यस प्रस्ताव गोर्खाल्याण्डको अन्तिम समाधान दार्जिलिङ पहाड, तराई र डुवर्सका जनताको भावना तथा सबै सरोकारवालाहरूको सर्वसम्मतबाट लिएको निर्णय पटक्कै होइन । सिङ्गो व्यक्तिले लिएको मन्तव्य वा विचार वा प्रस्तावलाई साह्रै गम्भीरतापुर्वक लिनु त्यति उचित नहोला कारण दार्जिलिङ पहाड तराई डुवर्स अनि गोर्खाजातिले केवल डा° महेन्द्र पी° लामाज्युलाई यस प्रकारको आधिकार दिए कै छैन् । गोर्खाल्याण्ड विषयमाथि जोपनि निर्णय हुनेछ सो सामुहिक निर्णय हुनेछन् ; विशेष व्यक्तिको एक्लो निर्णयले कुनै स्थान पाउनेछैन् ।
म सिक्किमका दाजुभाइ-दिदी- बहिनीहरूलाई पुर्ण आश्वस्त पार्न चाहन्छु कि गोर्खाल्याण्डको संवैधानिक लड़ाईले सिक्किमको शान्ति, सुरक्षा अनि १९७५ मा प्राप्त अधिकारमा कहिल्यै आँच पुर्याउने छैन।
म सम्पूर्ण राजनीतिक दल, बुद्धिजीवी र नागरिक समाजलाई संयमित भई आपसी सद्भाव र भाइचारा कायम राख्न हार्दिक अपिल गर्दछु।
महावीर चक्र विजेता नायक महाबीर थापा : कांगो की धरती पर अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान
दीपक राई वीर.गोरखा न्यूज नेटवर्क भारतीय सैन्य इतिहास में गोर्खा सैनिकों की वीरता की अनेक गाथाएँ दर्ज हैं। इन्हीं गौरवशाली अध्यायों में नायक महाबीर थापा, महावीर चक्र (मरणोपरांत) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने वर्ष 1961 में संयुक्त राष्ट्र के कांगो मिशन के दौरान अदम्य साहस, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए अपने प्राण न्योछावर किए।
{ नायक महाबीर का जन्म और शुरुआती सैन्य करियर }
नायक महाबीर थापा का जन्म 3 दिसंबर 1923 को हुआ था। उनके पिता का नाम बिरखे बताया गया है। 3 दिसंबर 1942 को वे 3/1 गोरखा राइफल्स में भर्ती हुए। सेना में उनका सैन्य जीवन अनुशासन, कर्तव्य और साहस से जुड़ा रहा। 3/1 गोरखा राइफल्स उस समय भारतीय सेना की गोर्खा रेजिमेंटों की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा थी।
{ कांगो में संयुक्त राष्ट्र मिशन }
1960 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद कांगो में गंभीर राजनीतिक और सैन्य संकट उत्पन्न हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने वहाँ शांति स्थापना के लिए United Nations Operation in the Congo (ONUC) शुरू किया। भारतीय सेना ने भी इस अंतरराष्ट्रीय मिशन में अपनी सैन्य टुकड़ियाँ भेजीं। नायक महाबीर थापा की 3/1 गोरखा राइफल्स भी कांगो में तैनात थी। सितंबर 1961 में लुफिरा ब्रिज के आसपास हुए अभियान में उनकी भूमिका निर्णायक बनी।
{{ बेहद गंभीर घायल होने के बाद भी पीछे नहीं हटे }}
16 सितंबर 1961 को लुफिरा ब्रिज से पीछे हट रही राहत सेना पर दुश्मन ने घात लगाकर हमला किया। सड़क को माइन किया गया था और घात वाले क्षेत्र में मोर्टार, मीडियम मशीन गन तथा एंटी-टैंक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा था। नायक महाबीर थापा को पीछे हट रही सेना की सुरक्षा के लिए बनाए गए रीयरगार्ड प्लाटून की एक सेक्शन का कमांडर बनाया गया था।
रोडब्लॉक तक पहुँचने से पहले ही वे घायल हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सेक्शन को संगठित किया और दुश्मन पर प्रभावी फायरिंग शुरू कर दी। उन्होंने अपनी टुकड़ी को दुश्मन के घात के फ्लैंक की ओर बढ़ाते हुए ऐसा दबाव बनाया कि पीछे हट रही मुख्य सेना को सुरक्षित निकलने का अवसर मिल सके।
दुश्मन की मशीनगन की गोलियों से उन्हें गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने नेतृत्व करना बंद नहीं किया। वे अपनी सेक्शन को निर्देश देते रहे और तब तक मोर्चे पर डटे रहे, जब तक पीछे हट रही पूरी सेना सुरक्षित रूप से घात वाले क्षेत्र को पार नहीं कर गई। वे इस स्थान से निकलने वाले आखिरी सैनिक थे। कुछ ही समय बाद गंभीर चोटों के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली।
{ मरणोपरांत मिला महावीर चक्र }
नायक महाबीर थापा के असाधारण साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। आधिकारिक सम्मान संबंधी विवरण में उनके कार्य को उच्च कोटि के नेतृत्व और साहस का उदाहरण बताया गया है तथा यह दर्ज है कि उनकी कार्रवाई ने पीछे हट रही सेना के सुरक्षित एवं व्यवस्थित वापसी में योगदान दिया।
उनका नाम महावीर चक्र प्राप्त करने वाले सैनिकों की सूचियों में भी दर्ज है।
{ एक महान सैनिक, जिसने साथियों को किया सुरक्षित }
नायक महाबीर थापा की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने साथियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उनका अंतिम अभियान केवल व्यक्तिगत वीरता की कहानी नहीं, बल्कि नेतृत्व, कर्तव्य और साथी सैनिकों के प्रति जिम्मेदारी का उदाहरण है। भारतीय सेना की वर्दी पहनने वाले महाबीर थापा ने हजारों किलोमीटर दूर कांगो की धरती पर अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी स्मृति भारतीय सेना और गोर्खा सैनिकों की वीर परंपरा के इतिहास में दर्ज है।
नायक महाबीर थापा (3 दिसंबर 1923-16 सितंबर 1961) की गाथा आज भी यह याद दिलाती है कि सैनिक की वीरता केवल युद्धभूमि में हथियार उठाने में नहीं, बल्कि कठिनतम परिस्थितियों में अपने साथियों और कर्तव्य के लिए अंतिम क्षण तक डटे रहने में भी निहित होती है।
{ नायक महाबीर थापा का सैन्य विवरण }
सेवा: 3/1 गोरखा राइफल्स सर्वोच्च सम्मान: महावीर चक्र (मरणोपरांत) जन्म: 3 दिसंबर 1923 बलिदान: 16 सितंबर 1961 सेवा संख्या: 5030815
14 सितंबर 1965 : पाकिस्तान युद्ध की दौरान रसूलपुर की जंग में अमर शहीद नायक देबी बहादुर गुरुंग की वीरगाथा
दीपक राई वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क आज ही की दिन 14 सितंबर 1965 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान सियालकोट सेक्टर के रसूलपुर में 2/1 गोरखा राइफल्स की एक कंपनी पर दुश्मन की एक कंपनी ने हमला कर दिया। स्थिति बेहद गंभीर थी, लेकिन मोर्चे पर तैनात नायक देबी बहादुर गुरुंग ने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया।
पोस्ट की रक्षा करते हुए नायक देबी बहादुर गुरुंग 3 इंच मोर्टार संभाल रहे थे। जैसे ही दुश्मन के सैनिक आगे बढ़े, उन्होंने अपने मोर्टार से उन पर लगातार और सटीक गोलाबारी शुरू कर दी। उनकी प्रभावी फायरिंग ने दुश्मन की बढ़त को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुश्मन ने स्थिति पर कब्जा करने के लिए दोबारा हमला किया। नायक देबी बहादुर गुरुंग एक बार फिर अपने मोर्टार के साथ मोर्चे पर डट गए और हमलावर सैनिकों पर लगातार प्रहार करते रहे। लेकिन लड़ाई के दौरान उनके मोर्टार का गोला-बारूद समाप्त हो गया।
इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी स्टेन गन उठाकर वे कंपनी के जवानों के साथ मोर्चे पर शामिल हो गए और बेहद नजदीक से आगे बढ़ रहे दुश्मन पर लगातार गोलियां बरसाते रहे। वे आखिरी क्षण तक लड़ते रहे और अपनी पोस्ट पर वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अदम्य साहस और प्रतिरोध के सामने दुश्मन को भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा।
नायक देबी बहादुर गुरुंग की यह वीरगाथा केवल एक सैनिक के साहस की कहानी नहीं, बल्कि कर्तव्य, शौर्य, त्याग और मातृभूमि के प्रति सर्वोच्च समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना अंतिम सांस तक मोर्चा संभाले रखा।
14 सितंबर 1965 का रसूलपुर का युद्धक्षेत्र उनके बलिदान का साक्षी बना—जहां एक गोरखा सैनिक ने अपने अदम्य साहस से भारतीय सेना की सर्वोत्तम परंपराओं को गौरवान्वित किया।
अशोक चक्र विजेता नायक नर बहादुर थापा : गोर्खाली वीरता की अमर गाथा
दीपक राई वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
गोरखा रेजिमेंट का इतिहास शौर्य और बलिदान से भरा है, और इसी इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में एक नाम है - नायक नर बहादुर थापा, जिन्हें स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
{ प्रारंभिक जीवन और सेना में भर्ती }
नायक नर बहादुर थापा (सर्विस नंबर - 10341) का जन्म मार्च 1921 में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री जंगबीर थापा था। वे 11 नवंबर 1940 को 5/5 गोरखा राइफल्स (फ्रंटियर फोर्स) में भर्ती हुए थे।
{ 1948 - ऑपरेशन पोलो और तुंगभद्रा का युद्ध }
आजादी के बाद हैदराबाद रियासत भारत में विलय को तैयार नहीं थी। उसे मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो चलाया। 1948 में हैदराबाद पुलिस कार्रवाई के दौरान 5/5 गोरखा राइफल्स ने मद्रास एरिया के अंतर्गत संगठित 'माइकल फोर्स' के साथ दक्षिण सेक्टर की कार्रवाई में भाग लिया। 13 सितंबर 1948 का दिन था। बटालियन की 'ए' कंपनी को तुंगभद्रा पुल पर कब्जा करने का आदेश मिला। कंपनी दोपहर 2 बजे गुंटकल से चली और शाम 4:20 बजे पुल पर पहुंच गई। जैसे ही जवानों ने पुल के पास दुश्मन के ठिकाने पर धावा बोला, एक तरफ से ब्रेन गन चौकी से स्वचालित फायर और दूसरी तरफ से छुपकर फायरिंग शुरू हो गई। इससे कंपनी की नंबर 2 प्लाटून पुल के बाईं ओर फंस गई।
{ खुखरी से किया ब्रेन गन का खात्मा }
स्थिति गंभीर थी। इसी समय नायक नर बहादुर थापा ने अदम्य साहस दिखाया। दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच उन्होंने 90 मीटर के खुले मैदान को पार किया और सीधे ब्रेन गन के कर्मीदल पर खुकुरी लेकर टूट पड़े। अपनी वीरतापूर्ण कार्रवाई से उन्होंने खतरनाक ब्रेन गन को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। उनकी इस कार्रवाई से ही पूरी कंपनी पुल पर कब्जा करने में सफल हो सकी। इस कार्रवाई में नायक थापा ने अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए असीम साहस का परिचय दिया।
{ अशोक चक्र सम्मान }
उनके इस असाधारण शौर्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें अशोक चक्र (13 सितंबर 1948 की कार्रवाई के लिए) से सम्मानित किया। नायक नर बहादुर थापा अशोक चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम वीरों में से एक थे। उस समय इस पुरस्कार को अशोक चक्र वर्ग-1 कहा जाता था।
{ वीर गोरखा समाज के लिए प्रेरणा }
देहरादून और प्रेमनगर क्षेत्र जो गोरखा बहुल क्षेत्र है, वहां के युवाओं के लिए नायक नर बहादुर थापा की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा है। नेपाल की माटी में जन्म लेकर भारतीय सेना में 5 गोरखा राइफल्स की शान बढ़ाने वाले इस वीर ने साबित किया कि गोरखा की खुकुरी और निडरता के सामने कोई भी दुश्मन टिक नहीं सकता।
रक्षा राज्य मंत्री ने किया 39 Gorkha Training Centre का दौरा
वाराणसी : रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने 39 गोरखा प्रशिक्षण केंद्र (39 GTC) का दौरा किया और लगभग 1,000 अग्निवीरों, टीए रंगरूटें, प्रशिक्षकों और प्रशिक्षण प्राप्त सैनिकों को संबोधित किया। उन्होंने भारत के युद्ध नायकों के सर्वोच्च बलिदान को सलाम किया, गोरखाओं की शानदार युद्ध परंपराओं और युद्ध लोकाचार की सराहना की और युवा योद्धाओं को साहस, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्र के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
असम : दीमा हासाओ के गोर्खापुत्र हर्षवर्धन उपाध्याय वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (CPL) प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया
हाफलोंग, दीमा हासाओ के ऋषिकेश उपाध्याय और श्रीमती आरती उपाध्याय के पुत्र हर्षवर्धन उपाध्याय ने अमेरिका में एएजीएसयू ट्रेजर कोस्ट फ्लाइट ट्रेनिंग (टीसीएफटी), स्टुअर्ट, फ्लोरिडा, यूएसए में वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (सीपीएल) प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया है। लगभग दो वर्षों तक, हर्षवर्धन ने दृढ़ संकल्प, अनुशासन और धैर्य के साथ अपने विमानन सपने को पूरा किया। उनकी यात्रा कठिन प्रशिक्षण, परीक्षाओं, चुनौतीपूर्ण मौसम की स्थिति और उन क्षणों से भरी थी जिन्होंने उनके आत्मविश्वास की परीक्षा ली - लेकिन वह दृढ़ रहे और मजबूत होकर उभरे।
उनके अपने शब्दों में - "पीछे मुड़कर देखें, तो यह यात्रा विमान उड़ाने का तरीका सीखने से कहीं अधिक थी। इसने मुझे अनुशासन, जिम्मेदारी, निर्णय लेने और चीजें मुश्किल होने पर कभी हार न मानने का महत्व सिखाया। हाफलोंग की पहाड़ियों से लेकर फ्लोरिडा के आसमान तक, उनकी उपलब्धि उनके परिवार के लिए गर्व का क्षण है और दीमा हासाओ की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।
हर्षवर्धन को उम्मीद है कि उनकी यात्रा युवाओं को बड़े सपने देखने और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसके बारे में वे भावुक हैं, भले ही वे कहीं से भी आए हों।एएजीएसयू आसमान में इस नए अध्याय की शुरुआत करते हुए उनकी निरंतर सफलता की कामना करता है। वह और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचें और दीमा हसाओ को गौरवान्वित करें।
बधाई हो, हर्षवर्धन! आकाश की कोई सीमा नहीं है—यह तो बस शुरुआत है।
अदम्य साहस की मिसाल : 1 गोरखा राइफल के कीर्ति चक्र विजेता नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की वीरगाथा
10 सितंबर 2014 भारतीय सेना के इतिहास में साहस, नेतृत्व और अदम्य जज्बे की एक ऐसी कहानी लिख गया, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के सुंदरमली क्षेत्र में करीब 12,500 फीट की ऊंचाई पर नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग, 15 राष्ट्रीय राइफल्स की घातक प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे।
ऊंचे पहाड़, घना अंधेरा और दुर्गम चट्टानों के बीच आतंकवादियों के एक भारी हथियारों से लैस समूह ने घुसपैठ की कोशिश की। उनके पास असॉल्ट राइफलें और यूबीजीएल जैसे हथियार थे। परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन नायब सूबेदार गुरुंग ने खतरे के सामने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर नेतृत्व करने का फैसला किया।
भारी गोलीबारी के बीच वह चट्टानों की आड़ लेते हुए रेंगकर आगे बढ़े। एक संकरे रास्ते का पता लगने पर उन्होंने असाधारण साहस का परिचय देते हुए अकेले ही आगे बढ़कर आतंकवादियों को निशाना बनाया। हथगोले दागकर उन्होंने आतंकवादियों की स्थिति को दबाव में ला दिया और अपनी प्लाटून के लिए निर्णायक बढ़त बनाई।
इसके बाद गुरुंग लगभग दस मीटर की दूरी तक रेंगते हुए पहुंचे। चट्टानों के बीच बने एक छोटे से अंतराल से उन्होंने सटीक गोलीबारी की और एक आतंकवादी को मार गिराया।
लेकिन खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ था।
दूसरे आतंकवादी ने उन पर गोली चलाते हुए हमला कर दिया। ऐसी स्थिति में जहां एक क्षण की चूक जानलेवा साबित हो सकती थी, नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग ने असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी खुकरी निकाली और सीधे मुकाबले में आतंकवादी से भिड़ गए।
दोनों के बीच आमने-सामने की भीषण लड़ाई हुई। गुरुंग ने अदम्य साहस और शारीरिक शक्ति का परिचय देते हुए आतंकवादी को जमीन पर दबोच लिया और उसका अंत कर दिया।
वीरता केवल हथियार चलाने में नहीं, डर के बावजूद आगे बढ़ने में है
नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की यह कहानी केवल एक सैन्य ऑपरेशन की कहानी नहीं है। यह कर्तव्य, नेतृत्व और आत्मविश्वास की उस भावना का प्रतीक है, जिसमें सैनिक अपने साथियों की सुरक्षा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने जीवन तक की परवाह नहीं करता।
12,500 फीट की ऊंचाई, अंधेरा, दुर्गम चट्टानें और सामने भारी हथियारों से लैस आतंकवादी—इन सबके बावजूद गुरुंग ने एक ही संदेश दिया:
“सच्चा सैनिक खतरे का इंतजार नहीं करता, वह खतरे की ओर बढ़कर उसका सामना करता है।”
उनकी वीरता हमें यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियां इंसान की क्षमता को नहीं, बल्कि उसके चरित्र और हौसले को परखती हैं।
नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की वीरगाथा भारतीय सेना की उस गौरवशाली परंपरा का उदाहरण है, जहां नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे खड़े होना और बलिदान का अर्थ राष्ट्र को सर्वोपरि रखना है।
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19 सितंबर 1965 : भारत-पाकिस्तान युद्ध के वीर योद्धा राइफलमैन दल बहादुर की अमर शौर्यगाथा
सियालकोट सेक्टर में 5/9 गोरखा राइफल्स के साथ लड़ते हुए दिया सर्वोच्च बलिदान
दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
भारत के सैन्य इतिहास में 1965 का भारत-पाक युद्ध उन संघर्षों में शामिल है, जिसमें भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। इस युद्ध में 5/9 गोरखा राइफल्स के जवानों ने भी सियालकोट सेक्टर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं वीर सैनिकों में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के कनारी गांव में जन्मे राइफलमैन दल बहादुर भी शामिल थे। दल बहादुर भारतीय सेना में भर्ती होकर 5/9 गोरखा राइफल्स का हिस्सा बने। देशसेवा के अपने दायित्व को निभाते हुए उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सियालकोट सेक्टर में अपनी यूनिट के साथ मोर्चा संभाला।
{ सियालकोट सेक्टर में वीरता }
सितंबर 1965 में सियालकोट सेक्टर में भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच भीषण सैन्य संघर्ष हुआ। 5/9 गोरखा राइफल्स के जवानों ने कठिन परिस्थितियों में मोर्चे पर डटे रहते हुए अपने सैन्य दायित्व का निर्वहन किया। 19 सितंबर 1965 को सियालकोट सेक्टर के सोरड्रेके में हुई लड़ाई के दौरान राइफलमैन दल बहादुर भी अपनी यूनिट के साथ तैनात थे। संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीव्र गोलीबारी हुई। इसी भीषण मुठभेड़ में दल बहादुर गंभीर रूप से घायल हो गए।
गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। अंततः 19 सितंबर 1965 को 5/9 गोरखा राइफल्स के साथ देश की सेवा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।
{ कनारी से रणभूमि तक }
पिथौरागढ़ के कनारी गांव की धरती से निकलकर भारतीय सेना में शामिल हुए राइफलमैन दल बहादुर ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय राष्ट्रसेवा को समर्पित किया। सियालकोट के रणक्षेत्र में दिया गया उनका बलिदान उत्तराखंड और भारतीय सेना के गौरवशाली सैन्य इतिहास का हिस्सा है।
उनकी शहादत इस बात की याद दिलाती है कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए कर्तव्य सर्वोपरि होता है। 1965 के युद्ध में सियालकोट सेक्टर की कठिन परिस्थितियों में अपने साथियों के साथ डटे रहना और अंततः राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करना उनके सैन्य जीवन की अमिट विरासत है।
राइफलमैन दल बहादुर को राष्ट्र की सेवा, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए शत-शत नमन।
वीर जवान अमर रहें।
13 hours ago | [YT] | 211
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18 सितंबर 1965 : जब वीर चक्र विजेता नायब सुबेदार राम प्रसाद छेत्री ने पाकिस्तानी चौकी तबाह कर वहाँ भारतीय तिरंगा फहराया
भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में लड़ा गया युद्ध अब अंतिम चरणों पर था। भारतीय सेना एक के बाद एक पाकिस्तानी इलाकों में अपनी विजय पताका फहरा रही थी। पाकिस्तानी सेना के हाथों से उनके इलाके लगातार छूटते जा रहे थे। आलम यह था कि भारतीय सेना के रणबांकुरे पाकिस्तान के तमाम इलाकों में जीत का परचम फहराते चले जा रहे थे। भारतीय सेना के इन्हीं रणबांकुरों में एक थे नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री को अद्भुत युद्ध कौशल, साहस और नेतृत्व क्षमता के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आइये, आपको बताते हैं नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की बहादुरी की वह दास्तान , जिसने इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए उनका नाम दर्ज कर दिया
{ अखनूर सेक्टर के फीचर कब्जे का मिला था आदेश }
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, एक गोरखा राइफल्स कीपहली बटालियन को अखनूर सेक्टर के पश्चिम में स्थित एक चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई थी. गोरखा राइफल्स की इसी बटालियन में राम प्रसाद छेत्री बतौर नायब सूबेदार तैनात थे। 18 सितंबर 1965 को नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री के नेतृत्व वाली पलटन को दुश्मन के गहराई वाले इलाकों पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। इस इलाके पर दुश्मन ने मजबूत पकड़ बना रखी थी। नायब सूबेदान राम प्रसाद छेत्री अपने लक्ष्य के बेहद करीब थे. तभी दुश्मन की एमएमजी से निकली गोली के चपेट में आ गए।
गोली लगने के बावजूद नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री रुके नहीं, वह लगातार दुश्मन की पैठ वाले ठिकाने की तरफ बढ़ते रहे। लंबी जद्दोजहद के बाद, उन्होंने उस एमएमजी के ठिकाने और दुश्मन को खोज लिया, जहां से निकली गोली ने उन्हें जख्मी किया था।
{ अचेत होने तक दुश्मनों से मोर्चा लेते रहे छेत्री }
लगातार हो रही गोलियों की बौछार को नजरअंजाद कर आगे बढ़े और अपने अचूक निशाने से दुश्मन को मौत की नींद सुलाकर, उसकी एमएमजी को खामोश कर दिया। नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की इस साहसिक विजय के साथ इलाके को दुश्मन से मुक्त करा लिया गया था।
इस ऑपरेशन में बुरी तरह से जख्मी नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की सांसे उनका साथ छोड़ती, इससे पहले वहां से उन्हें रेस्क्यू कर लिया गया। नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री की इस सफलता की मदद से गोरखा राइफल्स अखनूर सेक्टर स्थित चोटी पर अपना विजय पताका फहराने में कामयाब रही।
इस ऑपरेशन में नायब सूबेदार राम प्रसाद छेत्री के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को देखते हुए वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1 day ago | [YT] | 176
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डा. महेन्द्र पी. लामाज्युको वयान तथा दस्तावेजमाथि सम्पुर्ण राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी र नागरिक समाजलाई संयमित भई आपसी सद्भाव र भाइचारा कायम राख्न हार्दिक अपिल' : विनय तामाङ
१९८६ को ऐतिहासिक गोर्खाल्याण्ड आन्दोलनदेखि आजसम्म निरन्तर संवैधानिक अधिकार , चिन्हारी अनि छुट्टै राज्य गोर्खाल्याण्डको मागंमा समर्पित म एक सिपाही हुँ। हाम्रा पुर्खा र शहीदहरूको बलिदानले कोरेको यस यात्रा सत्ताको खेल होइन ; स्वाभिमानको लडाइँ हो।
हालै आदरणीय डा. महेन्द्र पी लामाज्युको 'स्थायी राजनैतिक समाधान' सम्बन्धी दस्तावेज र भनाइलाई लिएर मित्र राज्य सिक्किममा उत्पन्न भएको चिन्ता र विरोधप्रति मेरो गम्भीर ध्यान आकर्षण भएको छ। यस सन्दर्भमा म एक जिम्मेवार दार्जिलिङको नागरिक भएको नाताले म मेरो विचारधारा निम्नलिखित कुराहरू स्पष्ट पार्न चाहन्छु:
सिक्किमका जनताको भावनाको कदर :-
सिक्किम हाम्रा लागि केवल छिमेकी राज्य मात्र होइन तर रगत र संस्कृतिको सम्बन्ध भएको भातृ राज्य हो। भारतको संविधानको धारा ३७१ एफ अन्तर्गत सिक्किमले पाएको विशेष अधिकार र त्यहाँका जनताको स्वाभिमानको रक्षा हुनुपर्छ भन्नेमा म दृढ छु । सिक्किमलाई असर पर्ने कुनैपनि राजनैतिक मोडल वा ढाँचा स्वीकार्य हुन सक्दैन।
गोर्खाल्याण्डको स्पष्ट सीमा र मांग :-
गोर्खाल्याण्डको हाम्रो माग दार्जिलिङ पहाड़ अनि तराई-डुवर्सका गोर्खा बहुल क्षेत्रहरूलाई समेटेर भारतको संविधानभित्रै रही पश्चिम बंगालबाट अलग राज्य निर्माण गर्नु नै १९८६ देखि आजपर्यन्त उद्देश्य रहिआएको छ । यो मांगमा कुनै अन्य कसैको भुभाग वा अधिकार खोस्नका लागि बनाइएको होइन।
सुझाव र आधिकारिक आन्दोलनको अन्तर :-
डा. महेन्द्र पी°लामा एक अति सम्मानित अर्थशास्त्री र विद्वान हुनुहुन्छ। वहाँले प्रस्तुत गर्नुभएको दस्तावेज वहाँको अध्ययन र व्यक्तिगत अवधारणा हुन सक्छ अनि आफनो प्रस्ताव हुनसक्छ तर वहाॅको यस प्रस्ताव गोर्खाल्याण्डको अन्तिम समाधान दार्जिलिङ पहाड, तराई र डुवर्सका जनताको भावना तथा सबै सरोकारवालाहरूको सर्वसम्मतबाट लिएको निर्णय पटक्कै होइन । सिङ्गो व्यक्तिले लिएको मन्तव्य वा विचार वा प्रस्तावलाई साह्रै गम्भीरतापुर्वक लिनु त्यति उचित नहोला कारण दार्जिलिङ पहाड तराई डुवर्स अनि गोर्खाजातिले केवल डा° महेन्द्र पी° लामाज्युलाई यस प्रकारको आधिकार दिए कै छैन् । गोर्खाल्याण्ड विषयमाथि जोपनि निर्णय हुनेछ सो सामुहिक निर्णय हुनेछन् ; विशेष व्यक्तिको एक्लो निर्णयले कुनै स्थान पाउनेछैन् ।
म सिक्किमका दाजुभाइ-दिदी- बहिनीहरूलाई पुर्ण आश्वस्त पार्न चाहन्छु कि गोर्खाल्याण्डको संवैधानिक लड़ाईले सिक्किमको शान्ति, सुरक्षा अनि १९७५ मा प्राप्त अधिकारमा कहिल्यै आँच पुर्याउने छैन।
म सम्पूर्ण राजनीतिक दल, बुद्धिजीवी र नागरिक समाजलाई संयमित भई आपसी सद्भाव र भाइचारा कायम राख्न हार्दिक अपिल गर्दछु।
विनय तामाङ
दार्जिलिङ
१७ सेप्टेम्बर,२०२६
2 days ago | [YT] | 74
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महावीर चक्र विजेता नायक महाबीर थापा : कांगो की धरती पर अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान
दीपक राई
वीर.गोरखा न्यूज नेटवर्क
भारतीय सैन्य इतिहास में गोर्खा सैनिकों की वीरता की अनेक गाथाएँ दर्ज हैं। इन्हीं गौरवशाली अध्यायों में नायक महाबीर थापा, महावीर चक्र (मरणोपरांत) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने वर्ष 1961 में संयुक्त राष्ट्र के कांगो मिशन के दौरान अदम्य साहस, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए अपने प्राण न्योछावर किए।
{ नायक महाबीर का जन्म और शुरुआती सैन्य करियर }
नायक महाबीर थापा का जन्म 3 दिसंबर 1923 को हुआ था। उनके पिता का नाम बिरखे बताया गया है। 3 दिसंबर 1942 को वे 3/1 गोरखा राइफल्स में भर्ती हुए। सेना में उनका सैन्य जीवन अनुशासन, कर्तव्य और साहस से जुड़ा रहा। 3/1 गोरखा राइफल्स उस समय भारतीय सेना की गोर्खा रेजिमेंटों की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा थी।
{ कांगो में संयुक्त राष्ट्र मिशन }
1960 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद कांगो में गंभीर राजनीतिक और सैन्य संकट उत्पन्न हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने वहाँ शांति स्थापना के लिए United Nations Operation in the Congo (ONUC) शुरू किया। भारतीय सेना ने भी इस अंतरराष्ट्रीय मिशन में अपनी सैन्य टुकड़ियाँ भेजीं। नायक महाबीर थापा की 3/1 गोरखा राइफल्स भी कांगो में तैनात थी। सितंबर 1961 में लुफिरा ब्रिज के आसपास हुए अभियान में उनकी भूमिका निर्णायक बनी।
{{ बेहद गंभीर घायल होने के बाद भी पीछे नहीं हटे }}
16 सितंबर 1961 को लुफिरा ब्रिज से पीछे हट रही राहत सेना पर दुश्मन ने घात लगाकर हमला किया। सड़क को माइन किया गया था और घात वाले क्षेत्र में मोर्टार, मीडियम मशीन गन तथा एंटी-टैंक हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा था। नायक महाबीर थापा को पीछे हट रही सेना की सुरक्षा के लिए बनाए गए रीयरगार्ड प्लाटून की एक सेक्शन का कमांडर बनाया गया था।
रोडब्लॉक तक पहुँचने से पहले ही वे घायल हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सेक्शन को संगठित किया और दुश्मन पर प्रभावी फायरिंग शुरू कर दी। उन्होंने अपनी टुकड़ी को दुश्मन के घात के फ्लैंक की ओर बढ़ाते हुए ऐसा दबाव बनाया कि पीछे हट रही मुख्य सेना को सुरक्षित निकलने का अवसर मिल सके।
दुश्मन की मशीनगन की गोलियों से उन्हें गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने नेतृत्व करना बंद नहीं किया। वे अपनी सेक्शन को निर्देश देते रहे और तब तक मोर्चे पर डटे रहे, जब तक पीछे हट रही पूरी सेना सुरक्षित रूप से घात वाले क्षेत्र को पार नहीं कर गई। वे इस स्थान से निकलने वाले आखिरी सैनिक थे। कुछ ही समय बाद गंभीर चोटों के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली।
{ मरणोपरांत मिला महावीर चक्र }
नायक महाबीर थापा के असाधारण साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें महावीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। आधिकारिक सम्मान संबंधी विवरण में उनके कार्य को उच्च कोटि के नेतृत्व और साहस का उदाहरण बताया गया है तथा यह दर्ज है कि उनकी कार्रवाई ने पीछे हट रही सेना के सुरक्षित एवं व्यवस्थित वापसी में योगदान दिया।
उनका नाम महावीर चक्र प्राप्त करने वाले सैनिकों की सूचियों में भी दर्ज है।
{ एक महान सैनिक, जिसने साथियों को किया सुरक्षित }
नायक महाबीर थापा की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अपने साथियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उनका अंतिम अभियान केवल व्यक्तिगत वीरता की कहानी नहीं, बल्कि नेतृत्व, कर्तव्य और साथी सैनिकों के प्रति जिम्मेदारी का उदाहरण है। भारतीय सेना की वर्दी पहनने वाले महाबीर थापा ने हजारों किलोमीटर दूर कांगो की धरती पर अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनकी स्मृति भारतीय सेना और गोर्खा सैनिकों की वीर परंपरा के इतिहास में दर्ज है।
नायक महाबीर थापा (3 दिसंबर 1923-16 सितंबर 1961) की गाथा आज भी यह याद दिलाती है कि सैनिक की वीरता केवल युद्धभूमि में हथियार उठाने में नहीं, बल्कि कठिनतम परिस्थितियों में अपने साथियों और कर्तव्य के लिए अंतिम क्षण तक डटे रहने में भी निहित होती है।
{ नायक महाबीर थापा का सैन्य विवरण }
सेवा: 3/1 गोरखा राइफल्स
सर्वोच्च सम्मान: महावीर चक्र (मरणोपरांत)
जन्म: 3 दिसंबर 1923
बलिदान: 16 सितंबर 1961
सेवा संख्या: 5030815
3 days ago | [YT] | 283
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14 सितंबर 1965 : पाकिस्तान युद्ध की दौरान रसूलपुर की जंग में अमर शहीद नायक देबी बहादुर गुरुंग की वीरगाथा
दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
आज ही की दिन 14 सितंबर 1965 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान सियालकोट सेक्टर के रसूलपुर में 2/1 गोरखा राइफल्स की एक कंपनी पर दुश्मन की एक कंपनी ने हमला कर दिया। स्थिति बेहद गंभीर थी, लेकिन मोर्चे पर तैनात नायक देबी बहादुर गुरुंग ने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया।
पोस्ट की रक्षा करते हुए नायक देबी बहादुर गुरुंग 3 इंच मोर्टार संभाल रहे थे। जैसे ही दुश्मन के सैनिक आगे बढ़े, उन्होंने अपने मोर्टार से उन पर लगातार और सटीक गोलाबारी शुरू कर दी। उनकी प्रभावी फायरिंग ने दुश्मन की बढ़त को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुश्मन ने स्थिति पर कब्जा करने के लिए दोबारा हमला किया। नायक देबी बहादुर गुरुंग एक बार फिर अपने मोर्टार के साथ मोर्चे पर डट गए और हमलावर सैनिकों पर लगातार प्रहार करते रहे। लेकिन लड़ाई के दौरान उनके मोर्टार का गोला-बारूद समाप्त हो गया।
इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी स्टेन गन उठाकर वे कंपनी के जवानों के साथ मोर्चे पर शामिल हो गए और बेहद नजदीक से आगे बढ़ रहे दुश्मन पर लगातार गोलियां बरसाते रहे। वे आखिरी क्षण तक लड़ते रहे और अपनी पोस्ट पर वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अदम्य साहस और प्रतिरोध के सामने दुश्मन को भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा।
नायक देबी बहादुर गुरुंग की यह वीरगाथा केवल एक सैनिक के साहस की कहानी नहीं, बल्कि कर्तव्य, शौर्य, त्याग और मातृभूमि के प्रति सर्वोच्च समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना अंतिम सांस तक मोर्चा संभाले रखा।
14 सितंबर 1965 का रसूलपुर का युद्धक्षेत्र उनके बलिदान का साक्षी बना—जहां एक गोरखा सैनिक ने अपने अदम्य साहस से भारतीय सेना की सर्वोत्तम परंपराओं को गौरवान्वित किया।
नायक देबी बहादुर गुरुंग को शत्-शत् नमन।
5 days ago | [YT] | 387
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अशोक चक्र विजेता नायक नर बहादुर थापा : गोर्खाली वीरता की अमर गाथा
दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
गोरखा रेजिमेंट का इतिहास शौर्य और बलिदान से भरा है, और इसी इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में एक नाम है - नायक नर बहादुर थापा, जिन्हें स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
{ प्रारंभिक जीवन और सेना में भर्ती }
नायक नर बहादुर थापा (सर्विस नंबर - 10341) का जन्म मार्च 1921 में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री जंगबीर थापा था। वे 11 नवंबर 1940 को 5/5 गोरखा राइफल्स (फ्रंटियर फोर्स) में भर्ती हुए थे।
{ 1948 - ऑपरेशन पोलो और तुंगभद्रा का युद्ध }
आजादी के बाद हैदराबाद रियासत भारत में विलय को तैयार नहीं थी। उसे मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो चलाया। 1948 में हैदराबाद पुलिस कार्रवाई के दौरान 5/5 गोरखा राइफल्स ने मद्रास एरिया के अंतर्गत संगठित 'माइकल फोर्स' के साथ दक्षिण सेक्टर की कार्रवाई में भाग लिया। 13 सितंबर 1948 का दिन था। बटालियन की 'ए' कंपनी को तुंगभद्रा पुल पर कब्जा करने का आदेश मिला। कंपनी दोपहर 2 बजे गुंटकल से चली और शाम 4:20 बजे पुल पर पहुंच गई। जैसे ही जवानों ने पुल के पास दुश्मन के ठिकाने पर धावा बोला, एक तरफ से ब्रेन गन चौकी से स्वचालित फायर और दूसरी तरफ से छुपकर फायरिंग शुरू हो गई। इससे कंपनी की नंबर 2 प्लाटून पुल के बाईं ओर फंस गई।
{ खुखरी से किया ब्रेन गन का खात्मा }
स्थिति गंभीर थी। इसी समय नायक नर बहादुर थापा ने अदम्य साहस दिखाया। दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच उन्होंने 90 मीटर के खुले मैदान को पार किया और सीधे ब्रेन गन के कर्मीदल पर खुकुरी लेकर टूट पड़े। अपनी वीरतापूर्ण कार्रवाई से उन्होंने खतरनाक ब्रेन गन को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। उनकी इस कार्रवाई से ही पूरी कंपनी पुल पर कब्जा करने में सफल हो सकी। इस कार्रवाई में नायक थापा ने अपनी सुरक्षा की परवाह न करते हुए असीम साहस का परिचय दिया।
{ अशोक चक्र सम्मान }
उनके इस असाधारण शौर्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें अशोक चक्र (13 सितंबर 1948 की कार्रवाई के लिए) से सम्मानित किया। नायक नर बहादुर थापा अशोक चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम वीरों में से एक थे। उस समय इस पुरस्कार को अशोक चक्र वर्ग-1 कहा जाता था।
{ वीर गोरखा समाज के लिए प्रेरणा }
देहरादून और प्रेमनगर क्षेत्र जो गोरखा बहुल क्षेत्र है, वहां के युवाओं के लिए नायक नर बहादुर थापा की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा है। नेपाल की माटी में जन्म लेकर भारतीय सेना में 5 गोरखा राइफल्स की शान बढ़ाने वाले इस वीर ने साबित किया कि गोरखा की खुकुरी और निडरता के सामने कोई भी दुश्मन टिक नहीं सकता।
जय हिंद!
जय गोरखा!
6 days ago | [YT] | 363
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BRICS SUMMIT 2026 : नई दिल्ली घोषणा की 10 महत्वपूर्ण बिंदु :-
1. पहलगाम आतंकी हमले की निंदा : 22 अप्रैल 2025 के हमले की कड़ी निंदा, 26 लोगों की मौत का जिक्र।
2. आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख : आतंकवाद के हर रूप और हर वजह की निंदा की गई।
3. आतंकवाद को धर्म से न जोड़ें : आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता या समुदाय से जोड़ने का विरोध।
4. सीमा पार आतंकवाद पर कार्रवाई : आतंकवाद, उसकी फंडिंग और आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ मिलकर कार्रवाई पर जोर।
5. आतंकियों की जवाबदेही तय हो : आतंकियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की बात।
6. संयुक्त राष्ट्र की आतंकरोधी संधि जल्द बने : अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर प्रस्तावित संधि को जल्द अपनाने की मांग।
7. ब्रिक्स के मूल सिद्धांत मजबूत होंगे : आपसी सम्मान, संप्रभु समानता, एकजुटता और सहमति से फैसलों पर जोर।
8. एकतरफा टैरिफ की निंदा : एकतरफा टैरिफ और व्यापारिक पाबंदियों पर चिंता जताई गई। कहा कि ऐसे कदम WTO के नियमों के अनुरूप होने चाहिए।
9. परमाणु खतरा : परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के खतरे और बढ़ते वैश्विक तनाव पर चिंता जताई गई।
10. भारत की अध्यक्षता की सराहना : BRICS देशों ने भारत की अध्यक्षता में हुए BRICS प्लस और आउटरीच संवाद की सराहना की।
1 week ago | [YT] | 101
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रक्षा राज्य मंत्री ने किया 39 Gorkha Training Centre का दौरा
वाराणसी : रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने 39 गोरखा प्रशिक्षण केंद्र (39 GTC) का दौरा किया और लगभग 1,000 अग्निवीरों, टीए रंगरूटें, प्रशिक्षकों और प्रशिक्षण प्राप्त सैनिकों को संबोधित किया। उन्होंने भारत के युद्ध नायकों के सर्वोच्च बलिदान को सलाम किया, गोरखाओं की शानदार युद्ध परंपराओं और युद्ध लोकाचार की सराहना की और युवा योद्धाओं को साहस, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्र के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
1 week ago | [YT] | 142
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असम : दीमा हासाओ के गोर्खापुत्र हर्षवर्धन उपाध्याय वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (CPL) प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया
हाफलोंग, दीमा हासाओ के ऋषिकेश उपाध्याय और श्रीमती आरती उपाध्याय के पुत्र हर्षवर्धन उपाध्याय ने अमेरिका में एएजीएसयू ट्रेजर कोस्ट फ्लाइट ट्रेनिंग (टीसीएफटी), स्टुअर्ट, फ्लोरिडा, यूएसए में वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (सीपीएल) प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया है। लगभग दो वर्षों तक, हर्षवर्धन ने दृढ़ संकल्प, अनुशासन और धैर्य के साथ अपने विमानन सपने को पूरा किया। उनकी यात्रा कठिन प्रशिक्षण, परीक्षाओं, चुनौतीपूर्ण मौसम की स्थिति और उन क्षणों से भरी थी जिन्होंने उनके आत्मविश्वास की परीक्षा ली - लेकिन वह दृढ़ रहे और मजबूत होकर उभरे।
उनके अपने शब्दों में - "पीछे मुड़कर देखें, तो यह यात्रा विमान उड़ाने का तरीका सीखने से कहीं अधिक थी। इसने मुझे अनुशासन, जिम्मेदारी, निर्णय लेने और चीजें मुश्किल होने पर कभी हार न मानने का महत्व सिखाया। हाफलोंग की पहाड़ियों से लेकर फ्लोरिडा के आसमान तक, उनकी उपलब्धि उनके परिवार के लिए गर्व का क्षण है और दीमा हासाओ की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।
हर्षवर्धन को उम्मीद है कि उनकी यात्रा युवाओं को बड़े सपने देखने और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसके बारे में वे भावुक हैं, भले ही वे कहीं से भी आए हों।एएजीएसयू आसमान में इस नए अध्याय की शुरुआत करते हुए उनकी निरंतर सफलता की कामना करता है। वह और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचें और दीमा हसाओ को गौरवान्वित करें।
बधाई हो, हर्षवर्धन! आकाश की कोई सीमा नहीं है—यह तो बस शुरुआत है।
1 week ago | [YT] | 162
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अदम्य साहस की मिसाल : 1 गोरखा राइफल के कीर्ति चक्र विजेता नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की वीरगाथा
10 सितंबर 2014 भारतीय सेना के इतिहास में साहस, नेतृत्व और अदम्य जज्बे की एक ऐसी कहानी लिख गया, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के सुंदरमली क्षेत्र में करीब 12,500 फीट की ऊंचाई पर नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग, 15 राष्ट्रीय राइफल्स की घातक प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे।
ऊंचे पहाड़, घना अंधेरा और दुर्गम चट्टानों के बीच आतंकवादियों के एक भारी हथियारों से लैस समूह ने घुसपैठ की कोशिश की। उनके पास असॉल्ट राइफलें और यूबीजीएल जैसे हथियार थे। परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन नायब सूबेदार गुरुंग ने खतरे के सामने पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर नेतृत्व करने का फैसला किया।
भारी गोलीबारी के बीच वह चट्टानों की आड़ लेते हुए रेंगकर आगे बढ़े। एक संकरे रास्ते का पता लगने पर उन्होंने असाधारण साहस का परिचय देते हुए अकेले ही आगे बढ़कर आतंकवादियों को निशाना बनाया। हथगोले दागकर उन्होंने आतंकवादियों की स्थिति को दबाव में ला दिया और अपनी प्लाटून के लिए निर्णायक बढ़त बनाई।
इसके बाद गुरुंग लगभग दस मीटर की दूरी तक रेंगते हुए पहुंचे। चट्टानों के बीच बने एक छोटे से अंतराल से उन्होंने सटीक गोलीबारी की और एक आतंकवादी को मार गिराया।
लेकिन खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ था।
दूसरे आतंकवादी ने उन पर गोली चलाते हुए हमला कर दिया। ऐसी स्थिति में जहां एक क्षण की चूक जानलेवा साबित हो सकती थी, नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग ने असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी खुकरी निकाली और सीधे मुकाबले में आतंकवादी से भिड़ गए।
दोनों के बीच आमने-सामने की भीषण लड़ाई हुई। गुरुंग ने अदम्य साहस और शारीरिक शक्ति का परिचय देते हुए आतंकवादी को जमीन पर दबोच लिया और उसका अंत कर दिया।
वीरता केवल हथियार चलाने में नहीं, डर के बावजूद आगे बढ़ने में है
नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की यह कहानी केवल एक सैन्य ऑपरेशन की कहानी नहीं है। यह कर्तव्य, नेतृत्व और आत्मविश्वास की उस भावना का प्रतीक है, जिसमें सैनिक अपने साथियों की सुरक्षा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने जीवन तक की परवाह नहीं करता।
12,500 फीट की ऊंचाई, अंधेरा, दुर्गम चट्टानें और सामने भारी हथियारों से लैस आतंकवादी—इन सबके बावजूद गुरुंग ने एक ही संदेश दिया:
“सच्चा सैनिक खतरे का इंतजार नहीं करता, वह खतरे की ओर बढ़कर उसका सामना करता है।”
उनकी वीरता हमें यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियां इंसान की क्षमता को नहीं, बल्कि उसके चरित्र और हौसले को परखती हैं।
नायब सूबेदार कोश बहादुर गुरुंग की वीरगाथा भारतीय सेना की उस गौरवशाली परंपरा का उदाहरण है, जहां नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे खड़े होना और बलिदान का अर्थ राष्ट्र को सर्वोपरि रखना है।
जय हिंद 🇮🇳
जय गोरखा ।
1 week ago | [YT] | 347
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