“माघ आया है, पुण्य कमाने का अवसर लाया है।” “ठंड शरीर की है, माघ आत्मा को गर्म करता है।” “स्नान, दान और ध्यान—यही है माघ की पहचान।” 📿 कैप्शन (सोशल मीडिया): माघ मास का शुभारंभ—जहाँ आस्था स्नान करती है और जीवन पवित्र होता है। 🌊☀️ 🏷️ हैशटैग: #माघप्रारंभ#MaghMaas#पावनमास#गंगास्नान#सनातनधर्म#भक्ति#दान#स्नान#आस्था
प्राचीन समय से ही विजयादशमी (दशहरा) का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
कथा के अनुसार, त्रेतायुग में लंका का राक्षस राजा रावण अपनी तपस्या और शक्ति के बल पर बहुत बलवान हो गया था। उसने स्वर्ग, धरती और पाताल तक में आतंक मचा रखा था। रावण विद्वान और शिवभक्त था, परंतु अहंकार और अधर्म के मार्ग पर चलकर उसने अनेक अत्याचार किए। जब उसने माता सीता का हरण कर लिया, तब भगवान राम ने रावण का वध करने का संकल्प लिया।
राम ने हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की। नौ दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। अंततः दशमी के दिन भगवान राम ने रावण को पराजित कर उसका वध कर दिया। उसी दिन से यह पर्व विजयादशमी कहलाया।
एक अन्य कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। उसकी अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने माँ दुर्गा की रचना की। माँ दुर्गा ने लगातार नौ दिन तक महिषासुर से युद्ध किया और दशमी के दिन उसे मारकर देवताओं को पुनः स्वर्गलोक प्रदान किया।
इसीलिए विजयादशमी के दिन लोग रामलीला का आयोजन करते हैं और रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के पुतले जलाकर बुराई के अंत और सत्य की विजय का संदेश देते हैं।
👉 इस प्रकार, विजयादशमी हमें सिखाती है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य, धर्म और अच्छाई की ही जीत होती है।
मैंने खोजा, बलिया जिले के ब्राह्माइन गाँव में माता ब्राह्मणी देवी के मंदिर से जुड़ी लोककथा / पौराणिक इतिहास मिल गया है। नीचे वो “वास्तविक” (लोकश्रुति / पुराण-आधारित) कहानी हिन्दी में संक्षेप में प्रस्तुत है:
ब्राह्माइन गाँव की माँ ब्राह्मणी देवी की कथा
स्थान
ब्राह्माइन गाँव, हनुमानगंज ब्लॉक, बलिया (उत्तर प्रदेश) में स्थित। यह बलिया-सिकंदरपुर मुख्य मार्ग के उत्तर दिशा में लगभग 5 कि.मी. दूरी पर है। मंदिर का पिन कोड 277121 है।
कथात्मक स्रोत
कथा ‘दुर्गा सप्तशती’ और ‘मार्कण्डेय पुराण’ आदि पुराणों में वर्णित राजा सूरथ की तपस्या से जुड़ी है।
मुख्य घटनाएँ
1. युद्ध में पराजय और घाव राजा सूरथ युद्ध में हार जाते हैं। उनके शरीर पर कई घाव होते हैं जो मवाद से भर चुके थे।
2. जल से चंगा होना यात्रा के दौरान उन्हें प्यास लगती है; सैनिक एक सरोवर (तालाब) से पानी लाते हैं। जब राजा उस पानी से अपने घावों को स्पर्श कराते हैं, तो घाव ठीक होने लगते हैं। पूरी तरह से चंगा हो जाते हैं।
3. ऋषि मेधा का आश्रम वह जगह जहाँ तालाब है, एक जंगल क्षेत्र था। राजा वहां से आगे बढ़ते हैं और ऋषि मेधा का आश्रम पाते हैं। राजा सूरथ आश्रम में कुछ समय रहते हैं।
4. समाधि नामक वैश्य की कथा आश्रम में एक वैश्य जिसका नाम ‘समाधि’ था, वह अपने परिवार द्वारा त्यागा गया था। राजा सूरथ और समाधि दोनों ऋषि मेधा से शांति पाने का उपाय पूछते हैं।
5. आदि शक्ति की उपासना और देवी का प्रकट होना ऋषि मेधा उन्हें ‘आदि शक्ति’ की उपासना करने का निर्देश देते हैं। राजा सूरथ और समाधि तीन वर्ष तक तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ब्राह्मणी देवी यहाँ प्रकट होती हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
6. मंदिर की स्थापना आदि तपस्या पूरी होने के बाद, राजा सूरथ ने माता ब्राह्मणी तथा माता वीराणी के मंदिर बनवाए। उस स्थान की तपस्थली का नाम ‘सुरा’ या ‘सुरहा’ ताल हुआ। एक नाला या झरना जो वहाँ से निकलता है, ‘कटहल नाला’ (कष्टहर नाला) कहलाता है क्योंकि उस जल ने राजा के कष्टों को हराया। महत्ता और मान्यता
यह मंदिर राजा सूरथ की तपस्थली के रूप में माना जाता है।
नवरात्र के दिन विशेष पूजा-वृत्ति होती है, विशेष रूप से ‘निशा पूजन’ (रात्रि पूजा) का आयोजन।
कहा जाता है कि सच्चे मन से, श्रद्धा पूर्वक माँ ब्राह्माणी देवी से जिसे भी कुछ माँगा, उसकी मनोकामना पूरी होती है।
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टाइटल: बंटी–बबली और AI प्रेमिका#BuntyBabli
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“माघ आया है, पुण्य कमाने का अवसर लाया है।”
“ठंड शरीर की है, माघ आत्मा को गर्म करता है।”
“स्नान, दान और ध्यान—यही है माघ की पहचान।”
📿 कैप्शन (सोशल मीडिया):
माघ मास का शुभारंभ—जहाँ आस्था स्नान करती है और जीवन पवित्र होता है। 🌊☀️
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जैसे को तैसा नहीं जरा ये सोचो
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मंगलमय संकट मोचन हनुमान
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youtube.com/shorts/3Ba3I7vHac..., this video is generate by mera AI & Chat GPT tools how this video block.
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Ghumakadi@POOJACHAUHAN-v2b
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विजयादशमी की कहानी
प्राचीन समय से ही विजयादशमी (दशहरा) का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
कथा के अनुसार, त्रेतायुग में लंका का राक्षस राजा रावण अपनी तपस्या और शक्ति के बल पर बहुत बलवान हो गया था। उसने स्वर्ग, धरती और पाताल तक में आतंक मचा रखा था। रावण विद्वान और शिवभक्त था, परंतु अहंकार और अधर्म के मार्ग पर चलकर उसने अनेक अत्याचार किए। जब उसने माता सीता का हरण कर लिया, तब भगवान राम ने रावण का वध करने का संकल्प लिया।
राम ने हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की। नौ दिनों तक भीषण युद्ध हुआ। अंततः दशमी के दिन भगवान राम ने रावण को पराजित कर उसका वध कर दिया। उसी दिन से यह पर्व विजयादशमी कहलाया।
एक अन्य कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। उसकी अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने माँ दुर्गा की रचना की। माँ दुर्गा ने लगातार नौ दिन तक महिषासुर से युद्ध किया और दशमी के दिन उसे मारकर देवताओं को पुनः स्वर्गलोक प्रदान किया।
इसीलिए विजयादशमी के दिन लोग रामलीला का आयोजन करते हैं और रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के पुतले जलाकर बुराई के अंत और सत्य की विजय का संदेश देते हैं।
👉 इस प्रकार, विजयादशमी हमें सिखाती है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य, धर्म और अच्छाई की ही जीत होती है।
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मैंने खोजा, बलिया जिले के ब्राह्माइन गाँव में माता ब्राह्मणी देवी के मंदिर से जुड़ी लोककथा / पौराणिक इतिहास मिल गया है। नीचे वो “वास्तविक” (लोकश्रुति / पुराण-आधारित) कहानी हिन्दी में संक्षेप में प्रस्तुत है:
ब्राह्माइन गाँव की माँ ब्राह्मणी देवी की कथा
स्थान
ब्राह्माइन गाँव, हनुमानगंज ब्लॉक, बलिया (उत्तर प्रदेश) में स्थित। यह बलिया-सिकंदरपुर मुख्य मार्ग के उत्तर दिशा में लगभग 5 कि.मी. दूरी पर है। मंदिर का पिन कोड 277121 है।
कथात्मक स्रोत
कथा ‘दुर्गा सप्तशती’ और ‘मार्कण्डेय पुराण’ आदि पुराणों में वर्णित राजा सूरथ की तपस्या से जुड़ी है।
मुख्य घटनाएँ
1. युद्ध में पराजय और घाव
राजा सूरथ युद्ध में हार जाते हैं। उनके शरीर पर कई घाव होते हैं जो मवाद से भर चुके थे।
2. जल से चंगा होना
यात्रा के दौरान उन्हें प्यास लगती है; सैनिक एक सरोवर (तालाब) से पानी लाते हैं। जब राजा उस पानी से अपने घावों को स्पर्श कराते हैं, तो घाव ठीक होने लगते हैं। पूरी तरह से चंगा हो जाते हैं।
3. ऋषि मेधा का आश्रम
वह जगह जहाँ तालाब है, एक जंगल क्षेत्र था। राजा वहां से आगे बढ़ते हैं और ऋषि मेधा का आश्रम पाते हैं। राजा सूरथ आश्रम में कुछ समय रहते हैं।
4. समाधि नामक वैश्य की कथा
आश्रम में एक वैश्य जिसका नाम ‘समाधि’ था, वह अपने परिवार द्वारा त्यागा गया था। राजा सूरथ और समाधि दोनों ऋषि मेधा से शांति पाने का उपाय पूछते हैं।
5. आदि शक्ति की उपासना और देवी का प्रकट होना
ऋषि मेधा उन्हें ‘आदि शक्ति’ की उपासना करने का निर्देश देते हैं। राजा सूरथ और समाधि तीन वर्ष तक तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां ब्राह्मणी देवी यहाँ प्रकट होती हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
6. मंदिर की स्थापना आदि
तपस्या पूरी होने के बाद, राजा सूरथ ने माता ब्राह्मणी तथा माता वीराणी के मंदिर बनवाए। उस स्थान की तपस्थली का नाम ‘सुरा’ या ‘सुरहा’ ताल हुआ। एक नाला या झरना जो वहाँ से निकलता है, ‘कटहल नाला’ (कष्टहर नाला) कहलाता है क्योंकि उस जल ने राजा के कष्टों को हराया।
महत्ता और मान्यता
यह मंदिर राजा सूरथ की तपस्थली के रूप में माना जाता है।
नवरात्र के दिन विशेष पूजा-वृत्ति होती है, विशेष रूप से ‘निशा पूजन’ (रात्रि पूजा) का आयोजन।
कहा जाता है कि सच्चे मन से, श्रद्धा पूर्वक माँ ब्राह्माणी देवी से जिसे भी कुछ माँगा, उसकी मनोकामना पूरी होती है।
3 months ago | [YT] | 0
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