Manjit Thakur

रणधीर ,ऋषि ,के साथ हैं मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन, लेकिन ये तीसरा बच्चा कौन है ।कोई अनुमान लगा सकता है क्या ?

7 months ago | [YT] | 5

Manjit Thakur

10 जून, 2025/ मुख्य समाचार
1. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारतीय इतिहास में आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ी कार्रवाई: राजनाथ
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई में चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत के इतिहास में आतंकवाद के खिलाफ की गई सबसे बड़ी कार्रवाई है.
2. अगर आतंकवादी हमलों से उकसाया गया, तो पाकिस्तान में अंदर तक हमला करेगा भारत : जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चेतावनी दी है कि अगर आतंकवादी हमलों से उकसाया गया, तो भारत पाकिस्तान में अंदर तक हमला करेगा. उन्होंने कहा कि पहलगाम हमले जैसी जघन्य घटनाओं के मामले में आतंकवादी संगठनों और उनके नेताओं के खिलाफ प्रतिशोध के लिये जवाबी कार्रवाई की जाएगी.
3. राजा रघुवंशी हत्याकांड: 'भरोसे के कत्ल' का भयंकर अंजाम, तीन मांओं के नहीं थम रहे आंसू
इंदौर के ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी की पत्नी सोनम के साथ मिलकर उनके हत्याकांड की साजिश को अमली जामा पहनाने के आरोपी राज कुशवाह की गिरफ्तारी के बाद उसकी मां चुन्नी देवी का रो-रोकर बुरा हाल है.
4. दिल्ली : द्वारका की बहुमंजिला इमारत में आग लगने से पिता और दो बच्चों की मौत
दिल्ली के द्वारका इलाके में मंगलवार सुबह एक रिहायशी इमारत की आठवीं और नौवीं मंजिल पर लगी आग से बचने के लिए एक शख्स और उसके दो बच्चे इमारत से कूद गए जिससे उनकी मौत हो गई.
5. राजस्थान के टोंक जिले में आठ युवक नदी में डूबे: पुलिस
राजस्थान के टोंक जिले में आठ युवकों की मंगलवार को बनास नदी में डूबने से मौत हो गई.
6. केंद्र सरकार पड़ोसी देशों से ‘सार्थक संवाद’ के लिए अनुकूल माहौल बनाने में विफल रही है: पवार
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अध्यक्ष शरद पवार ने भाजपानीत केंद्र सरकार की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा कि यह सरकार पड़ोसी देशों के साथ ‘सार्थक संवाद’ के लिए अनुकूल माहौल बनाने में विफल रही है.
7. ऑस्ट्रिया : स्कूल में गोलीबारी, सात छात्रों समेत आठ लोगों की मौत
ऑस्ट्रिया के ग्राज शहर के एक स्कूल में हुई गोलीबारी में सात छात्रों समेत आठ लोगों की मौत हो गई और संदिग्ध हमलावर भी मारा गया है.
8. भारतीय नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार के मुद्दे पर ट्रंप से बात करें प्रधानमंत्री: कांग्रेस
कांग्रेस ने अमेरिका में एक भारतीय नागरिक के साथ कथित तौर पर अमानवीय व्यवहार किये जाने के मामले में कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी को तत्काल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत करके भारतीय नागरिकों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार और अत्याचार पर हस्तक्षेप के लिए कहना चाहिए.
9. चैटजीपीटी हुआ तकनीकी व्यवधान का शिकार, दुनियाभर के लाखों यूजर प्रभावित
कृत्रिम मेधा (एआइ) क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ओपनएआई के एआई टूल चैटजीपीटी को मंगलवार को वैश्विक स्तर पर व्यवधान का सामना करना पड़ा जिससे दुनिया भर में फैले लाखों यूजर इसका देर तक इस्तेमाल नहीं कर पाए.
10. रॉकेट प्रक्षेपणों में 10 गुना वृद्धि से ओजोन परत को नुकसान पहुंचना शुरू हो जाएगा: नया शोध
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष उद्योग विकास की राह पर है, लेकिन नए शोध से पता चलता है कि रॉकेट प्रक्षेपण में तेजी से वृद्धि होने से ओजोन परत को नुकसान पहुंचेगा।
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8 months ago | [YT] | 0

Manjit Thakur

1. भारत ने बीते 11 वर्षों में विविध क्षेत्रों में तेजी से बदलाव देखा: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार के 11 वर्षों के कार्यकाल में भारत न केवल सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गया है, बल्कि जलवायु कार्रवाई और डिजिटल नवाचार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक प्रमुख वैश्विक आवाज भी बन गया है.

2. कांग्रेस ने मोदी सरकार के 11 साल पूरे होने पर रिपोर्ट कार्ड जारी किया; असमानता, अधूरे वादों को किया उजागर
कांग्रेस ने केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के 11 साल पूरे होने पर सोमवार को एक पुस्तिका जारी की, जिसमें स्थिर विकास दर, बढ़ती भुखमरी और उनके 'अधूरे वादों'’ की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है.

3. निर्वाचन आयोग हरियाणा-महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़े डेटा कब तक सौंपेगा : राहुल
राहुल गांधी ने हरियाणा और महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़े डेटा साझा करने संबंधी निर्वाचन आयोग के कथित फैसले की सोमवार को सराहना करते हुए इसे ‘पहला अच्छा कदम’ करार दिया. उन्होंने आयोग से अनुरोध किया कि वह उस तारीख का ऐलान करे, जब डिजिटल और ‘मशीन द्वारा पठनीय’ फॉरमेट में डेटा सौंपा जाएगा.

4. मेघालय में इंदौर के व्यक्ति की उसकी पत्नी ने कराई थी हत्या, पांच लोग पकड़े गए : पुलिस
मेघालय में हनीमून के दौरान इंदौर के पर्यटक राजा रघुवंशी की हत्या में कथित रूप से उसकी पत्नी शामिल थी, जिसने भाड़े के हत्यारे बुलाए थे. मेघालय की पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) आई नोंगरांग ने यह जानकारी दी.

5. दिल्ली में 49 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी महसूस की गई, मौसम विभाग ने जारी किया ‘ऑरेंज अलर्ट’
दिल्ली में सोमवार को भीषण गर्मी का प्रकोप जारी रहा. तापमान इतना ज़्यादा था कि शरीर को 48.9 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी महसूस हुई. वहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अगले दो दिनों के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी करते हुए लोगों से सतर्क रहने को कहा है.

6. मुंबई के निकट लोकल ट्रेन से गिरकर चार लोगों की मौत; रेलवे की स्वचालित दरवाजे लगाने की योजना
महाराष्ट्र के ठाणे जिले में सोमवार की सुबह बेहद व्यस्त समय के दौरान भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन से गिरकर चार लोगों की मौत हो गई और नौ अन्य घायल हो गए.

7. छत्तीसगढ़ के सुकमा में बारूदी सुरंग विस्फोट में एएसपी की मौत, दो अधिकारी घायल
सुकमा, छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सोमवार को नक्सलियों द्वारा लगाए गए प्रेशर बम में विस्फोट होने से एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की मौत हो गई तथा दो अन्य पुलिस अधिकारी घायल हो गए.

8. बेंगलुरु भगदड़ पर आरसीबी अधिकारी ने अदालत में दावा किया, मुख्यमंत्री के निर्देश पर हुई गिरफ्तारी
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोमवार को रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) के मार्केटिंग हेड निखिल सोसले को अंतरिम राहत नहीं दी तथा मामले की सुनवाई मंगलवार के लिए स्थगित कर दी है. सोसले को एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम के पास हुई भगदड़ के सिलसिले में छह जून को गिरफ्तार किया गया था.

9.आतंकवाद संबंधी चिंताओं के समाधान होने तक भारत सिंधु जल संधि पर बातचीत नहीं करेगा: सूत्र
भारत सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के साथ तब तक कोई बातचीत नहीं करेगा, जब तक कि आतंकवाद के संबंध में नयी दिल्ली की चिंताओं का समाधान नहीं हो जाता और संधि को पूरी तरह से नया रूप नहीं दे दिया जाता. (यह खबर सूत्रों के हवाले से है)
10. लॉस एंजिलिस में सैन्य जवानों की तैनाती के बाद विरोध तेज; राजमार्ग अवरुद्ध किया, वाहनों को आग लगाई

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर लॉस एंजिलिस में ‘नेशनल गार्ड’ के जवानों की असाधारण तैनाती को लेकर रविवार को तनाव और बढ़ गया, जहां हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए, उन्होंने एक प्रमुख राजमार्ग पर जाम लगा दिया और स्वचालित गाड़ियों में आगजनी की.
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8 months ago | [YT] | 1

Manjit Thakur

'देखन' में कॉटन लगे, घाव करे गंभीर
मंजीत ठाकुर

कुछ वक्त हुआ जब यूरोपीय संघ ने सिंगल यूज़ यानी एक बार इस्तेमाल किये जाने लायक प्लास्टिक उत्पादों पर बंदिश आयद कर दी. इसके साथ ही यह प्रतिबंध प्लास्टिक की प्लेटों, कटलरी, खाने के डब्बों और कॉटन बड्स पर भी लागू है.

आप हैरत में हो सकते हैं कि प्लास्टिक पर बंदिश तो समझ में आती है, पर कॉटन बड्स क्यों? आखिर कान साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इस छुटकी-सी डंडी और उस पर चिपकी छटांक भर रुई से समंदर कैसे गंदा होता होगा?

आखिर, हम हिंदुस्तानी ठहरे! सड़क के किनारे खड़े होकर मूत्र विसर्जन करने से भी हमें यह लगता है कि 50 मिलीलीटर अपशिष्ट जल से आखिर बीमारी कैसे फैलेगी या प्रदूषण कैसे बढ़ेगा!

अगर दफ्तर से लौटते हुए सब्जीवाले के पास से हरी-हरी ताजी भिंडी खरीद ली तो उसको प्लास्टिक की थैली में न लाएं तो क्या कपड़े का थैला ले जाएं? कपड़े या जूट का थैला तो वैसे भी आपको 'आउटडेटेड' लगता होगा. कपड़े का थैला हाथ में लेकर मार्केट जाएंगे तो मुहल्ले वाले भी जाने किस निगाह से देखेंगे!

यूरोपीय कमीशन ने आकलन किया है कि सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल पर बैन लगने से कम से कम 3.4 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन रुकेगा. इन सिंगल यूज प्लास्टिकों में पॉलीथिन बैग, प्लास्टिक की बोतलें, कप, खाने के पैकेट, सैशे, रैपर, स्ट्रॉ, थर्मोकोल से बने थाली-कप-ग्लास भी शामिल हैं.

हिंदुस्तान ने 2022 तक सिंगल यूज़ प्लास्टिक से मुक्त होने का फैसला किया था, पर अभी तक देश में कहीं से संपूर्ण प्रतिबंध लगाने की किसी योजना पर फैसला नहीं लिया गया है क्योंकि लोगों का रवैया बदलता नहीं दिख रहा. इस तय समय सीमा के तीन साल बाद तक कहीं कोई सुधार दिखा तो नहीं है.

विश्वास न हो तो अपने सब्जीवाले के पास थोड़ी देर खड़े होकर देख लीजिए. और गरीब सब्जीवाले को छोड़िए, आप अपने पास के कूड़ेदान में झांक लीजिए.

विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के मुताबिक प्लास्टिक जैविक रूप से अपघटित नहीं किये जा सकते और उन्हें गलने-पचने में कई साल लग जाते हैं. अगर यह तापमान-हवा के संपर्क में कुदरती तौर पर अपघटित हो भी जाएं तो मिट्टी का हिस्सा बनने के बजाय माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाते हैं.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के मुताबिक यह माइक्रोप्लास्टिक हमारी मिट्टी और पानी को संदूषित (कंटैमिनेट) करते हैं. इसके ज़हरीले घटक रसायन जीव कोशिकाओं में और उसके जरिये खाद्य श्रृंखला में आ जाते हैं.

इसका असर वन्य जीवन पर भी पड़ता है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के आकलन के मुताबिक एक व्यक्ति हर हफ्ते करीबन पांच ग्राम प्लास्टिक खा रहा है. हर साल प्लास्टिक की वजह से 10 लाख समुद्री परिंदे मारे जा रहे हैं और पाचनतंत्र में मौजूद प्लास्टिक कचरे की वजह से 700 नस्लों पर असर पड़ा है.

अन-प्लास्टिक कलेक्टिव रिपोर्ट के मुताबिक 1950 के दशक के बाद से करीबन 8.3 अरब टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जा चुका है और इसका करीब 60 फीसद हिस्सा या तो गाजीपुर या भलस्वा जैसे देश (और दुनिया) के हर हिस्से में मौजूद लैंडफिल साइट्स में जमा है या फिर यह खुली जगहों पर पड़ा है.

अकेले हिंदुस्तान में 90.46 लाख टन प्लास्टिक कचरा हर साल पैदा होता है, जिसमें से 43 फीसद कचरा एक बार इस्तेमाल किये जाने वाले प्लास्टिक का है. हिंदुस्तान में यह समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि देश में 40 फीसद प्लास्टिक कचरा उठाया ही नहीं जाता.
स्वास्थ्य संबंधी मसलों की जटिलताएं तो हैं ही, जिस पर विस्तार से समझने की जरूरत है कि आखिर प्लास्टिक का इस्तेमाल क्यों रोका जाना चाहिए, लेकिन पटना, दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में- जहां बारिश के पानी के जमाव की समस्या रहती है- उसकी एक बड़ी वजह यह प्लास्टिक ही है. यह प्लास्टिक कचरा नालियों में जाकर जमा रहता है और फिर नालियों और सीवर को जाम कर देता है.

जहां तक कॉटन बड्स का सवाल है यूरोपीय संघ ने 3 जुलाई 2021 से प्लास्टिक से बने कॉटन बड्स पर प्रतिबंध लगा दिया था. यह प्रतिबंध उस व्यापक नीति का हिस्सा था जिसे ‘सिंगल यूज प्लास्टिक डायरेक्टिव’ कहा जाता है, जिसका उद्देश्य समुद्रों और तटीय क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण को कम करना था.

लेकिन, यह कदम झटके में नहीं उठाया गया. यूरोपीय आयोग ने मई, 2018 में प्लास्टिक से बने कॉटन बड्स, स्ट्रॉ, प्लेट, कटलरी, और अन्य एकल-उपयोग प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा था. अनुमोदन में एक साल लगे और मार्च, 2019 में, यूरोपीय संसद ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी, और इसके करीब दो साल बाद यह कानून 3 जुलाई, 2021 से लागू हुआ.

असल में, कॉटन बड्स समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण का एक प्रमुख कारण बन गए थे. ये छोटे प्लास्टिक उत्पाद समुद्रों में आसानी से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाते हैं, जिन्हें समुद्री जीव निगल सकते हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला में प्रदूषण फैलता है. यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी के अनुसार, यूरोपीय समुद्र तटों पर पाए जाने वाले प्लास्टिक कचरे में कॉटन बड्स लगभग 4 फीसद का योगदान करते हैं.

इसलिए कान साफ करने के लिए इस्तेमाल में आने वाले कॉटन बड्स को छोटा मत समझिए। ये देखन में ‘कॉटन’ लगे, घाव करे गंभीर ही है!

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Manjit Thakur

चावल और भेड़ का जीन संपादनः जैव-तकनीक में भारत की तीन उपलब्धियां, जो भविष्य की नींव रखेंगी
-मंजीत ठाकुर

युद्ध के मैदान में पाकिस्तान को पीटने की खबरों के शोर-शराबों के बीच दो ऐसी खबरें आईं, जिन पर कम ही लोगों का ध्यान गया, लेकिन जिसका असर आने वाले वक्त में किसी क्रांति से कम नहीं होगा.

पहली, दुनिया में पहली बार भारत के कृषि वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग के जरिए धान की दो नई किस्में तैयार की हैं. चावल की इन दो नई किस्मों को कम पानी और कम खाद तथा उर्वरकों की जरूरत होगी. ये बदलते मौसम के प्रति प्रतिरोधी गुणवत्ता वाली होंगी और इनकी पैदावार भी मौजूदा किस्मों की तुलना में तीस फीसद अधिक होगी. फसल भी सामान्य समय से बीस दिन पहले तैयार हो जाएगी. इन दो किस्मों के नाम डीआरआर-100 या कमला और पूसा डीएसटी राइस-1 रखे गए हैं और उम्मीद की जा रही है कि दोनों बीज देश के धान उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकेंगे.

दूसरी खबर, कश्मीर से आई जो अभी पहलगाम आतंकवादी हमलों के बाद से नकारात्मक रूप से खबरों में बना हुआ था और ऑपरेशन सिंदूर में कश्मीर पाकिस्तान की ज़द में था. लेकिन, शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज ऐंड टेक्नोलॉजी (एसकेयूएएसटी) के वैज्ञानिकों ने भारत की पहली जीन संपादित (जीन एटिटेड) भेड़ की किस्म भी तैयार की है और इसे एनिमल बायोटेक्नोलॉजी में मील का पत्थर माना जा रहा है.

वैज्ञानिकों ने इस मेमने में 'मायोस्टैटिन' जीन को एडिट किया है. यह जीन शरीर में मांस बनने के लिए जिम्मेदार होता है. इस संपादन के बाद नई किस्म वाली इस भेड़ में मांस की मात्रा तीस फीसद तक बढ़ जाएगी. इससे पहले यह गुण भारतीय भेड़ो में नहीं होती थी.

कुछ लोगों में जीएम फसलों को लेकर एक चिंता रही है लेकिन ध्यान रहे कि जीनोम एडिटिंग जेनेटिक मॉडिफिकेशन या जीएम नहीं है. जीनोम एडिटिंग में उसी पौधे में मौजूद डीएनए में एडिटिंग के जरिए डीएनए सीक्वेंसिंग बदली जाती है. जीनोम एडिटिंग एक सटीक तकनीक है जिसमें किसी जीव के डीएनए में छोटे-छोटे बदलाव किए जाते हैं. इसमें किसी विशेष जीन को काटा, हटाया या बदला जा सकता है. यह प्रक्रिया आमतौर पर CRISPR-Cas9 जैसी तकनीकों से की जाती है. इस विधि में बाहरी डीएनए को जीव के जीनोम में नहीं जोड़ा जाता, बल्कि प्राकृतिक जीन को ही संशोधित किया जाता है.

वहीं जेनेटिक मोडिफिकेशन (जीएम) में किसी दूसरे जीव का जीन लेकर उसे लक्षित जीव में जोड़ा जाता है. मसलन, बैक्टीरिया का जीन यदि किसी पौधे में जोड़ा जाए तो वह पौधा कीट प्रतिरोधी बन सकता है. यह परिवर्तन स्वाभाविक रूप से नहीं होता और इसे ‘ट्रांसजेनिक’ प्रक्रिया कहा जाता है.

इस प्रकार, जीनोम एडिटिंग अधिक सटीक और प्राकृतिक उत्परिवर्तन के करीब मानी जाती है, जबकि जीएम तकनीक में बाहरी जीन जोड़ने से अधिक जैविक परिवर्तन होते हैं.

यह क्रांतियां मौन हैं लेकिन कुछ समय के बाद इनके मुखर होने के संकेत दिखने लगेंगे. जलवायु परिवर्तन और बारिश के पैटर्न में आ रहे बदलावों से फसल चक्र को फिर से दुरुस्त किए जाने की जरूरत है. मॉनसून के बीच में आ रहे लंबे ड्राई स्पैल धान की पैदावार पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ रही है, जबकि भूमिगत जल के सोते सूखते जा रहे हैं. डीजल या बिजली चालित पंपों से सिंचाई खेती में इनपुट लागत को बढ़ा रही है, इससे किसानों का मुनाफा सिकुड़ता जा रहा है.

दूसरी तरफ हमें और अधिक अन्न उपजाने की जरूरत है क्योंकि देश की आबादी डेढ़ अरब को पार कर गई है और खाद्यान्न आदि में आत्मनिर्भर ही नहीं, सरप्लस होकर ही हम किसी भी रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर पाएंगे. खाद्य सुरक्षा के साथ ही, सरप्लस अनाज हमारे विश्व व्यापार को अधिक व्यापकता देगा.

लेकिन बड़ा फायदा यह होगा कि पंजाब में चावल उगाने के लिए जो 5000 लीटर प्रति किलोग्राम और बंगाल में जो 3000 लीटर प्रति किलोग्राम पानी की जरूरत होती है उसको कम किया जा सकेगा. बढ़ती आबादी और कम होते जल संसाधनों के मद्देनजर यह बेहद महत्वपूर्ण खोज है.

इन सब चुनौतियों के मद्देनजर ही, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘माइनस 5 और प्लस 10’ का नारा दिया है. इसके तहत, धान के मौजूदा रकबे में से पांच मिलियन हेक्टेयर कम क्षेत्र में दस मिलियन टन ज्यादा चावल उगाने का संकल्प है. खाली हुए पांच मिलियन रकबे को दलहन और तिलहन के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश होगी. किसानों को अत्यधिक पानी की खपत वाली चावल की खेती से दलहन और तिलहन की ओर ले जाने की कोशिशें अभी बेअसर साबित हुई हैं.

गेहूं और चावल की खेती पर तिलहन और दलहन की तुलना में प्राकृतिक मार कम पड़ती है. एमएसपी के कारण पैदावार बेचने में भी दिक्कत नहीं होती. बहरहाल, जीनोम एडिटिंग का अन्य फसलों के बीजों पर भी प्रयोग होने लगे तो किसान अपनी लाभकारी उपज के प्रति आश्वस्त हो सकेगा. और इसकी मिसाल है, भेड़ की नई जीन संपादित नस्ल, जो अधिक मांस उत्पादित करने में सक्षम होगी.
जलवायु परिवर्तन और तेजी से घटते भूमिगत जल भंडारों के मद्देनजर अगले दस साल में दुनिया में खाद्य उत्पादन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाएगा. भारत में जैव-प्रौद्योगिकी की यह नई खोजें भविष्य की ओर बढ़ाया मजबूत कदम है.
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8 months ago | [YT] | 0

Manjit Thakur

भारत की राष्ट्रीयता 'धर्म' और 'भाषा' से कहीं अधिक व्यापक है
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भारत को राष्ट्र बताने पर मेरे एक मित्र की राय है कि, “राष्ट्र की अवधारणा ही 19वीं-20वीं शताब्दी की है. इस पर नहीं जाऊंगा कि गायत्री मंत्र किसने रचा पर वैदिक काल को स्थापित हिंदू धर्म के खांचे में समेट लेना ठीक नहीं. इसका कोई आधार भी नहीं.”
मेरे उक्त मित्र वैदिक काल को स्थापित हिंदू धर्म के खांचे में समेट लेने से नाराज हैं. फिर भी, हिंदूपन को लेकर उनकी अलग राय हो सकती है, रंगनाथ सिंह की अलग, सुशांत झा की अलग और मंजीत ठाकुर की एकदम अलहदा. वैसे ही, जैसे हिंदू धर्म को लेकर संघ, कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना और बजरंग दल की अलग व्य़ाख्याएं रही हैं.
हिंदू धर्म की सबने अलग व्याख्याएं की हैं. मिथिला के हिंदू धर्म की परंपराएं, तमिलनाडु के हिंदू धर्म से और तमिल हिंदू परंपराएं राजस्थानी हिंदू परंपराओं से अलग हैं. इन समाजों की स्थापित मान्यताएं और परंपराएं अलग हैं, फिर भी उनमें के प्रवाहित धारा एक है और इसी वजह से तमिल, कन्नड़, मलयाली समाजों को अलग ‘राष्ट्र’ नहीं कहा जा सकता. यह सारे समाज एक साझा प्रवाह के अंग हैं.
यही प्रवाह वैदिक काल से लेकर आज के हिंदू धर्म में हैं. (कृपया कुरीतियों को इसमें न समेटें, सभी धर्मों में अपने हिसाब के कुरीतियां हैं और पर्याप्त हैं, वह मानव स्वभाव है)
बहरहाल, हिंदू धर्म की खासियत ही यही है कि यह सुप्रीम कोर्ट की निगाह में 'जीवन शैली' है और इसकी व्याख्या में आप हर तरह की छूट ले सकते हैं. हिंदू होते हुए आप नास्तिक, आस्तिक, शैव, शाक्त, वैष्णव 'कुछ भी' या 'कुछ भी नहीं' हो सकते हैं. आप मांस खा सकते हैं, मछली खा सकते हैं, देवी के सामने बलि प्रदान कर सकते हैं और शाकाहारी भी हो सकते हैं. यहां तक कि एक ही परिवार में एक व्यक्ति शाकाहारी और दूसरा मांसाहारी हो सकता है. बच्चे के ननिहाल में देवी के सामने बलि प्रदान हो सकता है और अपने घर में कुलदेवी को बलि की मनाही हो सकती है.
आपको मिली यही छूट हिंदू धर्म को एक साथ बेहद मजबूत, सहिष्णु और साथ ही सबसे अधिक कमजोर (आप ‘वलनरेबल’ पढ़ें) भी बनाता है.
कम ज्ञानी लोग कहते हैं (और ऐसा सभी धर्मों के उग्र लोग कहते हैं) कि उनका धर्म खतरे में है. धर्म कभी खतरे में नहीं हो सकता क्योंकि धर्म तो शाश्वत है (अपनी-अपनी पवित्र किताबों में आप इसके संदर्भ को देख सकते हैं).
आप को एक साथ गर्व है कि हिंदू धर्म तो भैय्या, बहुत सहिष्णु है, यह वसुधैव कुटुंबकम का संदेश देता है. दूसरी तरफ, इसी धर्म के कुछ लोग उग्रता और कट्टरता के उन्माद में दूसरे धर्मों के लोगों को निशाना बनाते हैं. (कृपया यहां तुलना न लाएं, विवेचना सिर्फ हिंदू धर्म की कर रहा हूं. अन्य धर्मों की कट्टरता और उग्रता के स्वादानुसार इसी व्याख्या में चिपका लें.)
लेकिन, राष्ट्र के संदर्भ में एक दफा फिर से हमें याद रखना चाहिए कि अगर विद्वान साथी यह कह रहे हैं कि ‘राष्ट्र की अवधारणा ही 19वीं-20 शताब्दी की है’ तो हमें राष्ट्र को संकीर्ण परिभाषाओं की बजाए, उसके सांस्कृतिक संदर्भों में समझना चाहिए.
यह राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के उस विचार जैसा नहीं है जो 1648 में जर्मनी के वेस्टफेलिया में 100 से अधिक यूरोपीय ताकतों के बीच हुए शांति समझौते से उपजा था. मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि जिन दिनों हम गणितीय सूत्रों को सुलझाने में अनुपात के मुताबिक शहरों के नियोजन में व्यस्त थे यूरोपीय लोग तकरीबन बर्बर थे.
बहरहाल, यूरोप का इतिहास और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भारतीय पृष्ठभूमि से अलहदा है. व्यक्तिवाद पर यूरोप के विचार भारतीय विचारों से अलग हैं. गुलाम मानसिकता के औपनिवेशिक किस्म के लोग हर भारतीय विचार और सिद्धांत, खोज और आविष्कार, परंपरा और आस्था को अविश्वास से देखते हैं और एक हद तक मखौल उड़ाते हैं.
यूरोपीय राष्ट्र की परिभाषाओं की बैक स्टोरी अलग है, भारत की अलग. वहां के इतिहास में अलग-अलग समयावधि में जो कुछ घटा, उसी का नतीजा है कि उनके लिहाज का ‘राष्ट्र-राज्य’ (नेशन स्टेट) और लोकतंत्र निकला. जिस पर भारतीय बौद्धिक लहालोट होते हैं.
भारत के इतिहास में यह तरीका नहीं रहा. यहां समाज, व्यक्ति या राज्य से अधिक शक्तिशाली इकाई रहा है. भारतीय समाज में हमेशा धर्मदंड राजदंड से अधिक शक्तिशाली रहा है. वरना, क्या वजह थी कि एक ऋषि किसी राजा से उसके दो बेटे मांगने आ जाता है और राजा भयभीत होकर, अपने दोनों बेटे ऋषि के साथ भेज देता है. (कुछ लोग इस घटना को इतिहास का हिस्सा नहीं मानेंगे, पर आपकी यह मनमानी नहीं चलेगी)
फिलहाल, कई जगहों से पढ़ने और सुनने के बाद हमारे वाले ‘राष्ट्र’ को ‘नेशन’ का पर्यायवाची मानना उचित नहीं जान पड़ता. दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक ही मतलब में करना, दोनों के प्रति अन्याय होगा.
हमारा राष्ट्र ‘नेशन-स्टेट’ नहीं है बल्कि यह हमारी परंपराओं और विश्वासों की निरंतरता है. जो भी कुछ पढ़ा है उसमें मैं भी आर्यों के भारत आगमन के सिद्धांत को मानता रहा था, पर मोटे तौर पर मुझे इस पर शक होने लगा है. इस पर थोड़ा और गहरा अध्ययन करने के बाद ही मैं कुछ लिखूंगा. लेकिन मुझे लगता है कि हड़प्पा सभ्यता की जिस एक मिसाल से मैंने सांस्कृतिक और सभ्यतामूलक निरंतरता की बात की थी, उसको विस्तार देने की जरूरत है.
विचारक किस्म के लोगों से मेरा अनुरोध यही है कि जब हमारी लोक विरासत ईसा से भी कई हजार साल (ईसा से कम से कम आठ हजार साल) पुरानी है तो हम अपनी विरासत को संकुचित करके क्यों देख रहे हैं? हमारी परिभाषाएं वेस्टफेलिया संधि से क्यों उधार लिए हुए हैं? हमारी अपनी समस्याओं के समाधान का तरीका भी हमारा अपना होना चाहिए.
बाकी, जहां तक वामपंथ के विचारकों की बात है गोविंदाचार्य ने एक बार इंडिया टुडे के साथ साक्षात्कार में कहा था कि "आजादी के समय कम्युनिस्ट पार्टी आजादी के समय भारत में 17 अलग-अलग राष्ट्रीयता के अस्तित्व की बात करती थी. क्या आपको वाकई लगता है कि ऐसा ही था? कुछ लोग सन सैंतालीस के बाद के भारत को ही भारत मानते हैं और इसे एक राष्ट्र की निरंतरता की बजाए नवगठित देश मानते हैं."
पर उनकी इस परिभाषाओं में बहुत झोल हैं. कि अगर भारत था ही नहीं, तो भारत को भारत नाम मिला कैसे? क्या भारत नाम आनंद भवन में गढ़ा गया था? इसलिए मुझे लगता है कि भारत राष्ट्र विभिन्न संस्कृतियों का एक मिश्रण है और ऐसा राष्ट्र कभी यूरोपीय लोगों ने देखा नहीं था इसलिए उनकी परिभाषा के विचार बिंदु में भी नहीं आया होगा. जैसे मेरे उक्त मित्र ने कभी 'डोंका' का मांस नहीं खाया होगा. उनका का पहला प्रश्न मुझसे मिलते ही यही होगा कि आखिर डोंका होता क्या है. इसलिए जो डोंका को जानता ही नहीं हो, उसका जायका कैसे जानेगा?
अधिकतर विचारक अनजाने में या जानबूझकर स्मृतिलोप का शिकार होते हैं. उनकी शह का परिणाम है कि बामियान में बुद्ध की मूर्ति का विध्वंस करने वाले ध्वंस के बाद भी इन्हीं कथित उदारवादियों की तरफ से मासूमों की तरह पेश किए जाते हैं हैं.
भारत की निरंतरता बतौर राष्ट्र इसी में है कि इसने अपने मूल गुणसूत्रों को कमोबेश बनाए रखा है.

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9 months ago (edited) | [YT] | 3

Manjit Thakur

भारत से अधिक निरंतरता किस राष्ट्र में है भला!
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भारत के बारे में मेरे बहुत अधिक ‘उदार’ मित्र एक बात कहते रहे हैं कि भारत तो कभी एक ‘राष्ट्र’ था ही नहीं. और यह एक ‘राष्ट्र’ बना ही है 1947 के बाद. मेरे ऐसे मित्रों में कई लोग राजनैतिक रूप से मध्यममार्गी (पढ़ें, कांग्रेस) हैं या वाम दलों के सदस्य हैं या सक्रिय या 'अक्रिय' रूप से इन पार्टियों से संबद्ध हैं.
बहरहाल, एक 'राष्ट्र' की 'परिभाषा' के रूप में इन बौद्धिकों को 'पश्चिम' की अवधारणाएं ही समझ में आती हैं. पश्चिम विरोधी होते हुए भी परिभाषाओं के लिए यह लोग पश्चिम पर इतने अधिक आश्रित हैं कि अरब प्रायद्वीप या पश्चिम एशिया को अभी भी मध्य-पूर्व या 'मिड्ल ईस्ट' कहते हैं, जरा भी दिमाग नहीं लगाते कि अपन पूरब की तरफ देखें तो कंबोडिया-मलेशिया-इंडोनेसिया-जावा-सुमात्रा-मलय आएगा. न कि दुबई और शारजाह. खैर. कंक्रीट खांचे में बंद विचारधाराएँ, विचारने की स्वतंत्रता नहीं देती.
बहरहाल, सहस्राब्दियों से देश के सभ्यतामूलक या संस्कृतिमूलक एकरूपता को यह कथित 'उदार' लोग आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं. हड़प्पा शहरों की खुदाई में निकली बैलगाड़ी क्या अब भी हाल तक भारत के देहातों में प्रचलित नहीं थी? मैंने खुद लकड़ी के पहियों वाली इन बैलगाड़ियों में यात्राएं की हैं. हां, यह बात और है कि अब उनके कटही (काठ की) पहियों की जगह रबर के टायरों ने ले ली है और मेरे गांव में अब उस गाड़ी को बैलगाड़ी की जगह ‘टैरगाड़ी’ कहा जाता है.
'गायत्री मंत्र' और नहीं तो आज से कम से कम साढ़े चार हजार साल पहले रचा गया, लेकिन उत्तर हो या दक्कन करोड़ों सनातनी हिंदू घरों में इस पवित्र मंत्र का पाठ होता है. क्या कोई सोच रहा है कि यह प्रसारित कैसे हुआ होगा!
भारतीयता को लेकर और भारतीय इतिहास को लेकर एक ‘मिसकॉन्सेप्शन’ इन बुद्धिजीवियों ने यह फैलाया, और जानबूझकर फैलाया कि भारत के लोग खुद के एक 'राष्ट्र' नहीं मानते और हम भारतीयों ने कभी अपने इतिहास की परवाह नहीं की.
इस विचार को पहले तो औपनिवेशिक काल के अधिकारियों ने फैलाया और उनके राजनैतिक हितों के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. इस बात को आजादी के बाद जिन बुद्धिजीवियों ने बनाए रखा, उनके भी निजी और राजनैतिक हितों के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.
सर जॉन स्ट्रेची ने उन्नीसवीं सदी के अंत में लिखा था, ‘भारत के बारे में जानने लायक सबसे अहम बात यही है कि पहले कभी कोई भारत था ही नहीं.’ (याद करिए, पिछले एकाध बरस में ऐसा किस आदमी ने कहा था!)
खैर, स्ट्रेची के इस बात कहने के आधी सदी के बाद विन्स्टन चर्चिल ने लगभग यही बात कही थी कि “भारत एक भौगोलिक टर्म है. यह उतना ही एकीकृत राष्ट्र है, जितना कि बिषुवत रेखा.”
याद करिए कि आज के दौर के कौन से लोग हैं जो भारत के संदर्भ में 'चर्चिल' की तरह की बातें कर रहे हैं. मेरे एक और मित्र हैं और उनका वामपंथी रुझान (मैं रुझान शब्द का इस्तेमाल सोच-समझ कर कर रहा हूं) स्पष्ट है, उनने मुझसे कहा था कि 'आखिर भारत का योगदान क्या है दुनिया को!' मैं चकित रह गया. चकित इसलिए क्योंकि वह प्रखर पत्रकार रहे हैं. खैर.
भारत अपनी प्राचीन सभ्यता के उत्कर्ष की निरंतरता क्यों नहीं बनाए रख सका. इसके उत्तर को खोजना कोई कठिन काम नहीं है. कभी लंदन जाकर देखें, उनके आलीशान शहर की ईंट-ईंट की रकम हिंदुस्तान और हम जैसे अन्य उपनिवेशों के लूट-खसोट के माल पर टिकी है. वरना, शाहजहां के वक्त अनुमानित रूप से दुनिया के कुल जीडीपी का 26 फीसद हिंदुस्तान में था.
जहां तक निरंतरता की बात है, आप एक अनुपात लें. 5:4. आठवीं में गणित की किताब में 'अनुपात' वाले अध्याय को कामचलाऊ ढंग से भी पढ़ा होगा तो आपको पता चल जाएगा कि इस अनुपात में लंबाई, चौड़ाई से 1.25 गुना अधिक है.
हिंदी की पट्टी में इतनी ही मात्रा को ‘सवा’ कहते हैं.
फिलहाल इतना जान लीजिए कि हड़प्पा के शहरों में शहर नियोजन में यह अनुपात काम में लाया गया था. और वह वक्त ईसा मसीह के जन्म से कोई तीन हजार साल पहले का था. तब, यूरोपीय देशों के लोग तकरीबन बर्बर थे और संभवतया शौच से निबटने के बाद हाथ भी नहीं धोते थे.
बहरहाल, गुजरात के हड़प्पा शहर धौलावीरा का आकार 771 मीटर गुणा 617 मीटर का था. कैलकुलेटर तो होगा ही आपको मोबाइल में.
इसके कोई एक हजार साल के बाद, 'शतपथ ब्राह्मण' और 'शुल्व सूत्र' में भी यज्ञ वेदी बनाने और वैदिक कर्मकांडों के लिए इसी अनुपात का पालन किया गया.
इसके ठीक एक हजार साल बाद और, इसी अनुपात को 'वास्तु शास्त्र' से जुड़े पाठ्यों में बनाए रखा गया.
चीनी फेंग शुई की तरह इस वास्तु शास्त्र का भी प्रयोग लोग अब करते हैं. छठी सदी में वराहमिहिर ने कहा कि राजमहलों का निर्माण इस तरह होना चाहिए कि महल की लंबाई, चौड़ाई से कोई एक चौथाई अधिक रहे. (सवा) कुतुब मीनार गए हों तो वहां के लौह स्तंभ के बारे में भी पढ़कर आइएगा. वहां भी यही सवा है. लंबाई 7.67 मीटर. चौड़ाई 6.12 मीटर. अनुपात 5:4.
हिंदुस्तान, आर्यावर्त, भारतवर्ष, जंबूद्वीप... कुछ भी कहें. पर आप आंख मूंद लीजिए कि भारत एक राष्ट्र नहीं था, पर जितनी निरंतरता भारत में है. दुनिया में कहीं नहीं.
सीरीज जारी रहेगी.

9 months ago | [YT] | 1